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    मोदी, शाह व हार्दिक की लोकप्रियता में सवाल गुजरात के नेतृत्व का है!

    -राकेश दुबे

    गुजरात और गुजरातियों की ताकत देखने का वक्त आने ही वाला है। न केवल गुजरात में रहने वालों की, बल्कि दुनिया भर के गुजरातियों की नजर अभी से अपने प्रदेश के अगले विधानसभा चुनाव पर है। जिसके बारे में माना जा रहा है कि  नरेंद्र मोदी, अमित शाह व हार्दिक पटेल की ताकत तोलने  का यह वक्त होगा। देखा जाए, तो गुजरात हाल ही में बहुत तेजी से देश में एक ऐसे प्रदेश के रूप में पहचान बना चुका है, जिसने देश को बड़े राजनेता दिए। सरदार वल्लभभाई पटेल से लेकर नरेन्द्र मोदी, अमित शाह और हार्दिक पटेल ऐसा चेहरा बनकर उभरे हैं, जिनकी राष्ट्रीय स्तर पर अच्छी पैठ और पहचान है। नरेन्द्र मोदी देश में हिंदुत्व के पोस्टर बॉय के रूप में जाने जाते हैं, वहीं अमित शाह को मैनेजमेंट का गुरु माना जाता है, इन दोनों नेताओं ने भाजपा को एक चुनावी मशीन के रूप में स्थापित किया है, जो चुनाव जीतने में माहिर है। तो, 2017 के दमदार पाटीदार आंदोलन के बाद हार्दिक पटेल ने भी गुजरात की राजनीति में वही ताकतवर हैसियत पा ली है।

    नरेंद्र मोदी को गुजरात में एक हिंदुत्ववादी नेता अवश्य माना जाता है, लेकिन अमित शाह की छवि एक व्यापारिक परिवार से निकले जैन नेता के तौर पर ज्यादा बड़ी है। हाल ही में मुख्यमंत्री पद से हटाए गए विजय रूपाणी को भी जैन नेता के रूप में ही पहचान मिली, लेकिन हार्दिक पटेल इन सबके बीच कहीं ना कहीं इन बंधनों को तोड़ते दिखाई देते हैं। हार्दिक स्वयं पाटीदार समाज से आते हैं, जो गुजरात में एक बहुत ही समृद्ध व जल्दी एकजुट हो जानेवाला तबका माना जाता है। गुजरात के पाटीदारों यानी, पटेलों सहित गुजरात के सबसे बड़े तबके सवर्ण समाज को हार्दिक के आंदोलन का जो राजनीतिक लाभ हुआ, उसकी वजह से सवर्णों का एक बड़ा तबका हार्दिक पटेल को पसंद करता है। सवर्णों के साथ राजपूत, ओबीसी का एक बहुत बड़ा तबका, दलित, मुस्लिमों के साथ आने से हार्दिक ऐसे सामाजिक और जातिगत समीकरण बनाने में सफल हो रहे हैं, जो अभी तक गुजरात में नरेन्द्र मोदी के बाद शायद कोई भी नेता बनाने में सफल हुआ हो। हालांकि हिंदुओं में आज भी मोदी ही सबसे बड़ा चेहरा है, लेकिन उनके बाद सामाजिक समरसता के चेहरे के रूप में हार्दिक को समाज में बहुत बड़ी जगह मिल रही है।

    राजनीतिक रूप से देखा जाए, तो इन सबसे अलग हार्दिक पटेल के पक्ष में जो बात जाती है, वह यही है कि हार्दिक युवा हैं। गुजरात की युवा पीढ़ी में हार्दिक के लिए बीते कुछ सालों में जो मजबूत जगह बनी है, वह कोई य़ूं ही नहीं बनी है। उदाहरण के तौर पर, एक शहर में हो रहे आंदोलन को पहले राज्य और फिर राष्ट्रीय स्तर पर ले जा चुके हार्दिक पटेल को चुनावी राजनीति व रणनीतियों ता गहन अनुभव भले ही न हो, लेकिन राजनीति के सामाजिक और जातिगत समीकरणों को बदलने के मामले में वे गुजरात के बड़े बेटे नरेन्द्र मोदी की बराबरी में बहुत तेजी से खड़े होते दिखाई दे रहे हैं। हार्दिक एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं, पैंट-शर्ट अथवा जीन्स शर्ट पहने सादे लिबास वाले इस युवा राजनेता से गुजरात का जनमानस स्वयं को सीधे कनेक्ट करता है, यह उनकी सबसे बड़ी ताकत है। पंचायत से प्रदेश और राष्ट्रीय व अंतर्रराष्ट्रीय मुद्दों पर अपने तार्किक तीरों व तीके तेवर से केंद्र सरकार को घेरने वाले हार्दिक पटेल में गुजरात का जनमानस कहीं ना कहीं अपने भविष्य की संभावनाएं टटोलता दिखाई दे रहा है, जो कि बहुत संभव भी है, क्योंकि मोदी और अमित शाह अब पूरे देश के नेता है, जबकि गुजरात से बाहर भी बड़ी छवि वाले हार्दिक अभी भी गुजरात की राजनीति में सबसे तेजी से ताकतवर होते नेता के रूप में देखे जाते हैं।  

    एक सार्वजनिक सत्य है कि गुजराती संघर्ष करना जानता है, इसीलिए अहमदाबाद से अमेरिका, कच्छ से कनाड़ा, अमरेली से ऑस्ट्रेलिया, नवसारी से नैरोबी, आणंद से  इंग्लैंड पहुंचकर तो अपनी ताकत का लोहा मनवाया ही है, और गुजरात में एक छोटे से लेकर बड़े व्यापारी में जीवन में भी कुछ बड़ा करने की चाह रहती है। इतिहास देखें, तो नरसी मेहता से मोरारी बापू , सरदार पटेल से लेकर नरेन्द्र मोदी व अमित शाह सहित हार्दिक पटेल ने राजनीति में, धीरूभाई अंबानी से लेकर अडानी ने व्यापार में, इन सभी ने कहीं न कहीं बहुत छोटे स्तर से लेकर शुरुआत करके ही राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना मुकाम बनाया है। माना जाता है कि गुजरातियों के मन में कहीं ना कहीं यह भावना अवश्य है कि जिस प्रकार उनके बड़े बेटे नरेन्द्र मोदी ने देश-दुनिया में गुजरात का नाम आगे बढ़ाया, अब वही काम छोटा बेटा हार्दिक पटेल भी करने की क्षमता रखते हैं। इसीलिए लोग उनके साथ बहुत तेजी से जुड़ते जा रहे हैं। गुजरात ही नहीं देश के राजनीतिक इतिहास में यह पहली बार देखने को मिल रहा है कि कोई इतनी तेजी से उभरा हो, और लोगों के दिलों में बस गया हो।

    लेकिन फिर भी सवाल यह है कि आखिर कांग्रेस हार्दिक पटेल जैसे युवा नेता की पूर्ण क्षमता का उपयोग क्यों नहीं कर पा रही है ? जबकि सामान्यतया जब किसी को राजनीति विरासत में मिली हो, तो उसके लिए बहुत तेजी से आगे बढ़ना आसान हो जाता है, लेकिन हार्दिक को तो राजनीति भी विरासत में नहीं मिली। फिर भी उन्होंने अपने राजनीतिक संघर्ष, तेजतर्रार छवि, मुद्दों पर तीखी विवेचना, विषयों की राजनीतिक समझ और सामाजिक हितों के लिए सांगठनिक क्षमता के बल पर यह जगह बनाई है, इसीलिए सोशल और मैनस्ट्रीम मीडिया में भी उनकी ताकतवर उपस्थिति दिखाई देती है। गुजरात में एक सत्ताधारी पार्टी के तौर पर लगभग बूढ़ापे की ओर बढ़ती बीजेपी के बाद प्रदेश का एक बहुत बड़ा तबका प्रदेश के सबसे आशावान चेहरे के रूप में हार्दिक को देख रहा है, जबकि उनसे जुड़ रहे लोगों में सो ज्यादातर को कांग्रेस से कोई बहुत मतलब नहीं है। इसीलिए,  हार्दिक के हौसले को भी देखकर तो यही लग रहा है कि गुजरात की हर जंग में विजेता साबित होनेवाले युवा नेता वे ही हैं। फिर सवाल गुजरात के नेतृत्व का है, और नेतृत्व वही दे सकता है, जिसकी तरफ सामाजिक समीकरणों का साथ हो। समीकरणों की इसी बिसात पर, फिलहाल तो हार्दिक पटेल विजेता बनकर उभर रहे हैं, देखते हैं आगे क्या होता है।

    राकेश दुबे
    राकेश दुबे
    लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक टिप्पणीकार हैं लगभग डेढ़ दशक तक जनसत्ता में वरिष्ठ पदों पर रहे तीन दशक के अनुभवी पत्रकार राकेश दुबे को राजनीतिक पत्रकारिता का लंबा अनुभव है। संपर्क – +91 93229 31003

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