यादों में हमेशा रहेंगे आलोक

विवेक कुमार पाठक   
वरिष्ठ पत्रकार आलोक तोमर के जन्मदिन पर संस्मरण
तारीख ध्यान नहीं। साल वो भी पक्का नहीं मगर आठ दस साल पहले शायद। स्थान होटल सैन्ट्रल पार्क, मंजिल दूसरी या तीसरी, कमरा नंबर…………. जो भी हो यार।
विवेक तुम्हारे लाए पोहे और जलेबी अच्छे लगे। कचौडी़ अच्छा बनाता है बहादुरा वाला। और हमारी सिगरेट का क्या हुआ। ले आए न। लौटकर दुबारा जाना न पड़ जाए तुम्हे……..नाश्ता मजेदार कराया है मगर सिगरेट पैकिट के ये 100 रुपए रख लो। तुम्हारे पैसों से सिगरेट तो नहीं पिएंगे विवेक……..
1984 के दंगों के टाइम जनसत्ता में लिखकर देश दुनिया में पढे़ गए स्वर्गीय आलोक तोमर के ये शब्द मुझे आज याद आ रहे हैं। आज दिल्ली के धांसू कलमकार आलोक तोमर जी का जन्मदिन है। 20 मार्च 2011 को 50 साल की अधूरी आयु में देश दुनिया में नाम करने वाले आलोक तोमर जी ’काल की ठसक’ के कारण हमसे विदा हुए थे।
वे चंबल की माटी के लिक्खड़ और दबंग कलमकार थे। नई दिल्ली में उनके लिखे की धमक उनके विरोधी भी खुले मन से स्वीकारते रहे हैं। वे भिण्ड की माटी की तासीर का अहसास अपने जीवनकाल में भारत के कई अड़ामची भड़ामची से लेकर तमाम बड़े बडे़े नामों को करा चुके थे।
उनके जीवन की धमाकेदार फिल्म का समाज आधा हाफ ही देख पाया था। इंटरवल के बाद तो इस लिक्खड़ कलमकार की स्याही भगवान ने खत्म ही कर दी।
यकीनन आलोक तोमर अपने गुरु और हिन्दी पत्रकारिता की महान हस्ती स्वर्गीय प्रभाष जोशीजी के काबिल शिष्य थे। मैंने पढ़ा है कि आलोक तोमर से कई बिन्दुओं पर असहमत रहे प्रभाष जोशी ने कहा था “ मैं आलोक का लिखा चाव से पढ़ता हूं“।
आलोक तोमर की दबंगई ठसक उनकी लेखनी में भी स्थान पाती थी। वे लिखते वक्त 100 फीसदी पत्रकार होते थे ये बात मैं अपने अब तक के अधिकतम ज्ञान के आधार पर लिख रहा हूं। आगे हरि व्यापक सर्वत्र समाना। आलोक तोमर जी मिलने जुलने के अवसर मुझे शहर के संवेदनशील और कभी कभी अतिसंवेदनशील वरिष्ठ पत्रकार और विभिन्न विषयों के ज्ञान को जानने की विरले इच्छा रखने वाले आदरणीय जयंत तोमर जी के सानिध्य के कारण मिले। इसके लिए मैं उनका हृदय से हमेशा से शुक्रगुजार हूं।
जयंत तोमर जी को आलोक तोमर जैसे दबंग व्यक्तित्व का धांसू पत्रकार खूब पसंद करता था। मैंने ये अपनी आंखों से देखा है। आलोक तोमर जैसे बुलेटटाइप पत्रकार अपनी जिंदगी में बहुत कम लोगों से जी लगाकर बात करते होंगे ये मेरा अपना सच्चा झूठा आकलन है। खैर बात आलोकजी पर ही रखी जाए। आलोक तोमर जनसत्ता के बाद कहां कहां रहे मुझे अच्छे से पता नहीं है मगर मैं जब उनसे मिला उस दौरान वे वे वरिष्ठ पत्रकार और चेहरे पर करीने से कटी दाड़ी रखने वाले दिल्ली के नामी पत्रकार राहुल देव के साथ काम कर रहे थे।
राहुल देवजी के चैनल में वे लिखने के अहम दायित्व पर थे। उनका राष्ट्रीय ख्याति का वेबपोर्टल डेटलाइन भी तब में नईदुनिया में समय मिलते ही अपने डेस्कटॉप पर पढ़ लिया करता था। मैं बिना किसी संकोच के ऐसा कर पाता था क्योंकि तब वहां डॉ. राकेश पाठक जी जैसे संपादक थे। नेट खोलने देखने की हालांकि आज भी समाचार पत्रों में ऐसी कोई विशेष मनाही नहीं है मगर काम के वक्त ऐसा करने पर डांट स्वभाविक है।
हम जैसे सनकमिजाज बस इन्हीं संभावित स्वभाविक डॉंटों से बचने अपने आप सही सही काम करना पसंद करते हैं। राकेश पाठक जी के साथ करीब 9 साल तक काम के मेरे अपने अनुभव हैं जिन्हें मैं कभी लिखकर साझा करना चाहूंगा मगर एक बात विषयांतार करते हुए तो लिख ही दूं कि पाठकजी लोगों से सम्मानपूर्ण व्यवहार करने के साथ बोलचाल के लिए बेहतर वातावरण बनाते हैं। एक संपादक के लिए वर्तमान परिवेश में यह गुण बहुत ज्यादा जरुरी है। खबरें पत्रकार से पहले पब्लिक को पता होती हैं। पाठकजी नवभारत, नईदुनिया प्रदेश टुडे में वर्षों तक लोकप्रिय सफल संपादक रहने के बाद फिलहाल भोपाल के डिजियाना मीडिया ग्रुप में प्रबंध संपादक हैं। तो मध्यांतर के बाद फिर यादें आलोक तोमर जी की।
स्वर्गीय आलोक तोमर से घर जाकर मिलने का मौका मुझे जयंत तोमर सर के माध्यम से ही मिला। अपना माथा ठनका फिर रहा था । बिना सरकारी नौकरी के शादी के लिए किसी “दमदार पार्टी“ से रिश्ता नहीं आ रहा था। सोचा पत्रकारिता में ही दिल्ली लेबल पर धुआं उड़ाकर दिखा देंगे। जयंतजी को मन के इस सैलाब को बताए बिना मैंने उन्हें दिल्ली में मौका दिलाने का कभी निवेदन किया था। वे भी बात को याद रखते हुए दिल्ली जाते वक्त मुझे अपने साथ ले गए।
हमें आलोक जी ने चाय पिलाई। मैंने उनकी तीन सिगरेटों का धुआं उनसे सहृदयी बातचीत के दौरान जमकर सहा। सिगरेट फूंंककर वे भी सिगरेट की बुराइयांं का हम जैसों की भलाई के लिए धुआं उड़ा देते थे। उन्होंने तब मुझसे कहा था देश के एक बड़े अखबार में संभावित मौके का। शायद वे उस दौरान उस राष्ट्रीय अखबार के प्रधान संपादक बनने के बातचीत के दौर में थे। मगर बाद में नई दिल्ली से आकर कुछ दिनों में ही अपना दिल्ली वाला सैलाब शांत तालाब बन गया।
नई दुनिया में पाठकजी के टाइम में अपन ने ख्ूब मक्कारी मारी है। जितना काम करने की भगवान ने ताकत दी है कभी नहीं किया। तीन से पांच खबर लिखकर जमकर मस्ती करते थे अपने साथियों के साथ। बस पाण्डेजी के टैंपर का हमेशा ध्यान रखना पड़ता था। वे ऐसे आदमी हैं कि मन खुद का हो तो लड़के कितना उधम मचाएं कुछ नहीं मगर उनका माथा सनका तो अर्पण, नेताजी सबके लत्ते ले लेते थे। अपन हर समय राहुल द्रविड़ रहे हैं बाउंसरों के मामले में। बॉलें कितनी भी खाली निकल जाएं मगर स्टम्प उखड़ने से बचने अपना विकेट पूरा बचाकर चलते हैं जीवन के अलग अलग मामलों में।
आलोक तोमर जी ने अपना नंबर दिया था मगर अपने अव्यवस्थित जीवन में अपन ने दिए हुए कार्डों और नंबरों को कभी सही ठिकाने पर आज तक नहीं लिखा और फिर सुख की दो रोटी अपने शहर में मिलने पर परम आनंद करने वालों में से हैं अपन।
जयंत जी से भी फिर दिल्ली में मौका दिलाने की बात नहीं कही। मुझ जैसे उनके कई शिष्य मौका दिलाकर मौके पर गैरजिम्मेदारी से काम छोड़ने का काम कर भी चुके हैं जो संवेदनशील जयंत तोमर जी को कतई नहीं भाता।
आलोक तोमर जी को कैंसर होना हिन्दी पत्रकारिता के दुखद रहा। खुद से लेकर दोस्तों और परिवार तक फैल चुकी बुराइयां पर कलम चलाना आज हर किसी के बस की बात नहीं है। आलोक तोमर दबंग और ठसक में रहने वाले पत्रकार थे। उनके लिखे पर जायज नाजायज आपत्ति रखने की हिम्मत हर किसी में नहीं रही।
ये अलग बात है कि अपने लिखे के गुण दोषों को सुनने के प्रति वे दरवाजे खुले रखते थे।
देश समाज प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में आज बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जिस पर कलम चलाए जाने की आवश्यकता है। आत्मकेन्द्रित होते जा रहे समाज की मनमानी और तानाशाही के खिलाफ लिखने का काम ठसकदार पत्रकारों से हो जाए तो क्या बुराई है। सबका उदद्ेश्य समाज की गंदगी पर प्रहार करना तो है ही।
आलोक तोमरजी के व्यक्तित्व पर लिखने के लिए बहुत कुछ है। उनकी लेखनी ने समाज की बहुत गड़बड़ियों का पर्दाफाश किया है।
वे दोस्तों की भी बैण्डबजा चुके थे। उनके बहुत से शुभचिंतक और दोस्तों ने सुबह सुबह अपने खिलाफ अखबार में खबर देखकर इसका अनुभव किया है मगर वे जाने अनजाने दोस्त भी धन्यवाद के पात्र हैं जो खुले मन से सामने आए
। अगर बीच का कोई व्यक्ति अपनी उधेड़कर दुनिया को सही रास्ते पर लाने की बात करे तो इस बात के लिए उसके साथ हो ही जाना चाहिए।
आलोक तोमर साहब के बारे में और भी बहुत कुछ बातें लिखने का मन है मगर लिखने का विषय केन्द्रित अनुशासन इस वक्त नहीं है इसीलिए बात यहीं खत्म करुंगा मगर कोई शक नहीं कि भिण्ड से नई दिल्ली तक, स्वदेश से जनसत्ता तक, पत्रकारों से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की वयोवृद्ध याददाश्त तक और ठसकदार , धमकदार खरी खरी पत्रकारिता पसंद करने वालों की यादों में हमेशा रहेंगे आलोक।

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