वतन की फिक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है

राकेश कुमार आर्य 

ममता दी का प.बंगाल बहुत ही भयानक परिस्थितियों को प्रकट कर रहा है । अनेक ‘ प्रतिबंधों ‘ के बीच जीते हिंदू को लगता है हमने अपनी किसी ‘ करनी ‘ का फल भोगने के लिए अकेला छोड़ दिया है । सचमुच देश के हर देशभक्त के लिए सोचने और विचारने का समय है । पश्चिम बंगाल से जो समाचार निकल कर आ रहे हैं , उनसे बहुत ही भयानक तस्वीर उभर कर सामने आ रही है और लग रहा है कि हम इस समय किसी प्रमाद में जी रहे हैं । 
वतन की फिक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है , 
तेरी बरबादियों के चर्चे हैं आसमानों में ।
गर अब भी न संभले ऐ हिन्दोस्तां वालो ! 
तुम्हारी दास्तां भी ना रहेगी दास्तानों में ।।

आने वाली भयानक तस्वीर के प्रति हमारा कोई ध्यान नहीं है । पिछले दिनों पश्चिम बंगाल के बारे में समाचार मिला कि वहां पर मुसलमानों की संख्या सरकारी आंकड़ों के अनुसार तो 27% है , परंतु वास्तविकता में वहां पर मुस्लिम जनसंख्या 44 – 45 प्रतिशत हो चुकी है । इतनी बड़ी जनसंख्या के बीच में हिंदुओं को अपने त्यौहार तक मनाना दूभर हो गया है । हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं और उन घटनाओं का संज्ञान लेने के लिए न तो किसी पत्रकार का साहस हो पाता है और न ही पुलिस कुछ कर पाती है । परिस्थितियां कितनी विकट हो चुकी हैं , इसका अनुमान आप इसी से लगा सकते हैं कि भारतीय जनता पार्टी जैसी बड़ी पार्टी को भी वहां पर अपनी यात्रा निकालने के लिए न्यायालय से अनुमति लेनी पड़ रही है । पश्चिम बंगाल से लगता हुआ बांग्लादेश पश्चिम बंगाल की परिस्थितियो को बिगाड़ने में बढ़-चढ़कर भाग ले रहा है। हम राष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश को अपना मित्र मान रहे हैं और बांग्लादेश परंपरागत रूप में हमारी बगल में छुरी घोंप रहा है । ऊपर से उसके चेहरे की मुस्कुराहट है परंतु भीतर से उसके हृदय में हमारे विनाश की सारी योजनाएं बन रही हैं । उसके इस रूप को देखकर शत्रु की वही परंपरागत तस्वीर उभर कर सामने आती है जो वह अपने जन्मकाल से ही करता रहा है । पश्चिमी बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठिए आकर जनसंख्या के आंकड़े को एक योजना के अंतर्गत बिगाड़ने में लगे हैं और अब उनकी यह योजना फलीभूत होने के बहुत निकट है ।
केरल और बंगाल में स्वतंत्रता के पश्चात 60 वर्ष से अधिक समय तक वामपंथियों का वर्चस्व रहा । इस काल में वहां पर हिंदू समाज के लिए जो – जो संकट आए उनका तथ्यों के आधार पर यदि आंकलन किया जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि यहां पर हिंदू जनसंख्या को समाप्त करने का एक सुनियोजित षड्यंत्र रचा गया । ईसाई मिशनरियों के माध्यम से हिंदू जनसंख्या में बड़े पैमाने पर सेंधमारी की गई । मुस्लिम – वामपंथी गठजोड़ ने राज्य में हिंदुओं के अस्तित्व को संकट में डाल दिया । ऐसा लगा कि जैसे हिंदू समाज को दुष्टों के सामने शिकार बनाकर डाल दिया गया हो। 
भारत में इस समय ईसाइयों की जनसंख्या 2.78 करोड़ है जो कि भारत की कुल जनसंख्या का 2. 3 प्रतिशत है । यह जनसंख्या वृद्धि बहुत ही खतरनाक है क्योंकि 1947 में जब देश आजाद हुआ था तो उस समय ईसाई इस देश में मात्र आधा प्रतिशत थे ।यदि आज की स्थिति पर विचार किया जाए तो बंगाल ,केरल , उड़ीसा , पूर्वोत्तर के राज्य ,मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़ , तमिलनाडु ,बिहार , झारखंड में ईसाई मिशनरी बड़ी तेजी से सक्रिय हैं और यह सारी मिलकर जनसांख्यिकीय आंकड़े को गड़बड़ा रही हैं । सरकारों का ध्यान इस ओर है , परंतु इसके उपरांत भी कुछ भी नहीं किया जा रहा है ।
सरकारी स्तर पर बढ़ती जा रही इसी उदासीनता का परिणाम है कि अब बंगाल का एक बड़ा भाग हिंदू बहुसंख्यक नहीं रह गया है , जबकि कभी यह सारा प्रांत ही हिंदू बहुसंख्यक हुआ करता था । अब यहां पर कई क्षेत्रों को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे यह दूसरा बांग्लादेश हिंदुस्तान में बन चुका है। 1947 में देशद्रोही विघटनकारी शक्तियों ने नारा लगाया था कि — 
लड़के लिया पाकिस्तान ।
हँस के लहंगे हिंदुस्तान ।।
— और अब उनका वह सपना देश के किन्ही चुनिंदा क्षेत्रों में पूरा होता नजर आ रहा है । पश्चिम बंगाल में कई स्थानों पर हिंदू केवल 6% ही बचे हैं । पश्चिम बंगाल में 2001 में मुस्लिम 25% थे । 2011 की जनगणना में जो आंकड़े निकल कर आए उनसे पता चला कि इनकी संख्या वहां पर 27% हो गई है । 
भारत-बांग्लादेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं को मार काट कर भगाया जा रहा है । उनकी संपत्तियों पर कब्जे किए जा रहे हैं और उनकी महिलाओं के साथ अमानवीय अत्याचार हो रहे हैं। इस स्थिति पर वहां पर कार्यरत हिंदूवादी संगठन या आरएसएस जैसे संगठन भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं । 24 परगना , मुर्शिदाबाद , बीरभूम , मालदा की स्थिति तो इस समय बहुत ही शोचनीय बन चुकी है । रोहिंग्या शरणार्थी भी हिंदू के लिए काल बन कर आए हैं । ऐसे में हिंदुओं का ईसाईकरण करने की प्रक्रिया भी तेज हुई है । इन स्थिति – परिस्थितियों को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे पश्चिम बंगाल में मुस्लिमों ने और ईसाइयों ने मिलकर हिंदू को अपना ‘सांझा शिकार ‘ समझ लिया है। जहां राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिमों की आबादी 0.8 प्रतिशत बढ़ी है , वही पश्चिम बंगाल में 1.77 प्रतिशत बढी है । एक प्रांत में इतनी तेजी से बढ़ी मुस्लिम आबादी सचमुच चिंता का विषय है । 
2013 में जब पश्चिम बंगाल में दंगे हुए थे तो हिंदुओं को भारी क्षति उठानी पड़ी थी । उस समय वहां पर ममता बनर्जी की ही सरकार थी । ममता बनर्जी की सरकार का दृष्टिकोण उस समय ऐसा लगा था जैसे पूर्णतया हिंदू विरोधी है । तभी से कई लोगों को उन पर यह आरोप लगाने का अवसर भी मिला कि वह हिंदू विरोधी नीति अपनाकर पश्चिम बंगाल की सत्ता पर नियंत्रण करके रखना चाहती हैं । उन्हीं के शासनकाल में बांग्लादेश के कई ऐसे मुस्लिम नेता उभरे हैं जो वहां से आकर पश्चिम बंगाल के कई क्षेत्रों में बड़ी-बड़ी जन सभाओं का आयोजन करते हैं और सीधे हिंदुओं को मारने – काटने के पैगाम सुना कर जाते हैं । हिंदू समाज के मंदिरों को तोड़ने की घटनाएं 2013 के दंगों के समय तो हुईं ही थीं उसके बाद भी ऐसे समाचार अक्सर वहां से सुनने को मिलते रहते हैं । 2013 के उन दंगों के समय से लेकर अब तक हिंदुओं के घावों पर निरंतर नमक छिड़कने का ही काम किया जाता रहा है । जिस पर केंद्र की मोदी सरकार को संज्ञान लेने की आवश्यकता है।
वर्तमान में मुर्शिदाबाद में 47 लाख मुस्लिम और 23 लाख हिंदू रह गए हैं , जबकि मालदा में 20 लाख मुस्लिम और 19 लाख हिंदू और उत्तरी दिनाजपुर में 15 लाख मुस्लिम और 14 लाख हिंदू हैं । कभी इन तीनों जिलों में भी हिंदू बहुसंख्यक हुआ करते थे । पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती उप जिलों की बात करें तो यहां 42 क्षेत्रों में से तीन में मुस्लिम 90% से अधिक हैं , सात में 80 -90 प्रतिशत के बीच , 11 में 70 – 80% के बीच ,13 में मुस्लिमों की जनसंख्या 50 – 60% के बीच है । जनसंख्या का बिगड़ता यह आंकड़ा आने वाले भविष्य की भयावह तस्वीर को बयां कर रहा है । वोट बैंक की राजनीति और लोकतंत्र का प्रचलित स्वरूप ही हमारे देश के ‘हिंदू स्वरूप ‘ को मिटा देगा , जिसका अर्थ होगा संसार से मानवतावाद की समाप्ति । इस विषय पर देश के गंभीर चिंतकों को विचार करने की आवश्यकता है ।
1951 में 2. 63 करोड़ की कुल जनसंख्या पश्चिमी बंगाल की थी । जिनमें से मुस्लिम वहां पर 50 लाख थे , जबकि 2011 में 50 लाख से बढ़कर मुस्लिमों की जनसंख्या ढाई करोड़ हो गई । हिंदू जनसंख्या की वृद्धि दर यदि 10. 8% है तो मुस्लिम जनसंख्या की वृद्धि दर 21. 8 प्रतिशत है । जिससे पता चलता है कि मुस्लिम जनसंख्या की वृद्धि दर हिंदू वृद्धि दर के अनुपात में सीधे दो गुणा है। 
आज यदि पश्चिम बंगाल की ऐसी परिस्थितियां बन चुकी हैं कि जिनमें वहां पर हिंदू के लिए सांस लेना तक दूभर हो गया है तो इसके लिए दोषी कौन है ? यदि इस पर निष्पक्ष चिंतन किया जाए तो हमारी वर्तमान व्यवस्था ही इसके लिए दोषी है । हमारा यह वर्तमान लोकतंत्र हमारे लिए जी का जंजाल बन चुका है । इसमें वोटों के माध्यम से ही देश के जनसांख्यिकीय आंकड़े को गड़बड़ा कर देश के टुकड़े कर देने की तैयारियां 1947 से ही कुछ लोगों ने करनी आरंभ कर दी थीं। यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि जो लोग पहले दिन से ही जनसंख्या के आंकड़े को गड़बड़ाने के खेल में लगे उनको कुछ राजनीतिक पार्टियों ने भी अपना समर्थन देना आरंभ कर दिया था । उन राजनीतिक दलों की दृष्टि में यह लोग ‘ वोट बैंक ‘ से अधिक कुछ भी नहीं थे । अपनी विचारधारा को लागू करने के लिए राजनीतिक दलों ने जिस प्रकार का खेल खेलना आरंभ किया उससे ऐसा लगा कि उन्हें देश की एकता और अखंडता से कोई लेना देना नहीं है । उन्हें केवल सत्ता चाहिए और सत्ता के लिए उन्हें जो भी हथकंडे अपनाने पड़ेंगे , उन्हें वे अपना सकते हैं। 
हमें एक बात और भी विचार करनी चाहिए कि देश के इसी लोकतंत्र के चलते नेता अपने लिए अलग आलीशान कोठियां बनवाते हैं ,अधिकारी वर्ग अपने लिए अलग कॉलोनीज बनवाते हैं , अच्छे से अच्छे आलीशान बंगले बनवाते हैं । दूसरे , अन्य उच्च स्तर के लोग भी अपने लिए ऐसे ही भव्य बंगले ,कोठियां बनवाते हैं अर्थात देश के जनसाधारण से अपने आप को अलग दिखाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं और अपना स्तर देश के आम लोगों से अलग दिखाने में कोई किसी प्रकार की कमी छोड़ना नहीं चाहते । परंतु जब वोट देने की बारी आती है तो वहां पर ये लोग पूर्णतः लोकतांत्रिक बन जाते हैं और कहते हैं कि वोट का अधिकार सबको समान होता है । लोगों के रहन-सहन का स्तर सुधारना अर्थात भोजन , वस्त्र और आवास की सुविधाएं सबको उपलब्ध कराना लोकतंत्र में शासन का प्रमुख कर्तव्य है , परंतु बौद्धिक स्तर पर भी सबको समान मान लेना तो किसी भी शासन व्यवस्था के लिए सर्वथा त्याज्य है । बौद्धिक स्तर निश्चित रूप से सब का समान नहीं होता , एक ही माता पिता की चार संतानों में से भी सब एक जैसे नहीं होते । इसी प्रकार किसी विद्यालय की कक्षा में पढ़ रहे सभी विद्यार्थी यद्यपि एक समान शिक्षा पाते हैं परंतु सभी के अंक एक जैसे नहीं आते । अतः चाहे देश का राष्ट्रपति हो और चाहे देश का एक अशिक्षित साधारण व्यक्ति हो दोनों के वोट का मूल्य समान नहीं हो सकता। यह कितना हास्यास्पद है कि रहने – सहने , खाने-पीने आदि जीवन स्तर की सारी चीजों में आम आदमी का स्तर कुछ और होगा और इन लोगों का जीवन स्तर कुछ और होगा , परंतु जब वोट देने की बात आएगी तो वहां पर दोनों बराबर हो जायेंगे । वास्तव में यह लोकतंत्र की मांग नहीं है , लोकतंत्र के नाम पर फैलाया गया एक पाखंड है। क्योंकि इस पाखंड के चलते ही आम आदमी के ही वोट से यह लोग देश के सत्ता प्रतिष्ठानों पर जाकर कब्जा करते हैं , आलीशान कोठियों , कार ,बंगला आदि के अधिकारी बनते हैं । अतः अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए अशिक्षित जनसाधारण को तो यह केवल एक माध्यम बनाए रखना चाहते हैं , उसके लिए करना कुछ नहीं है । यह नहीं चाहते कि देश का आम आदमी पढ़ा-लिखा , समझदार हो और अपनी वोट देने के लिए स्वतंत्र हो , स्वतंत्र चिंतन रखता हो , स्वतंत्र सोच रखता हो । यह उसे किसी न किसी प्रकार की भूल – भुलैयां में उलझाए रखना चाहते हैं और उसकी अज्ञानता का लाभ अपने लिए उठाना चाहते हैं। सब जगह इनके द्वारा असमानता का प्रदर्शन करने के उपरांत भी वोट में उनको समानता केवल इसलिए दी गई है कि पढ़ा-लिखा व्यक्ति यदि वोट का अधिकार पाएगा तो उससे उनकी दाल गलने वाली नहीं है । इसीलिए सत्ता के सौदागर और देश के गद्दार लोग अपने अपने लिए सत्ता प्रतिष्ठान बनाए रखने के लिए देश के अशिक्षित लोगों का लाभ उठाते हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या के आंकड़े इसीलिए बिगाड़े जा रहे हैं कि देश के कुछ गद्दार अपने लिए मुख्यमंत्री की या अलग देश में एक नए प्रधानमंत्री की कुर्सी सुरक्षित कर लें। जनसाधारण को और पढ़े लिखे वर्ग को सबको एक समान एक तराजू में तोल देने से ही इनके स्वार्थ सिद्ध हो सकते हैं । 
जबकि अच्छी बात यह होगी कि पढ़े-लिखे विवेकशील ऐसे लोगों की वोट का मूल्य उनकी शैक्षणिक योग्यता से निर्धारित किया जाए , जो देश की समस्याओं के बारे में पूर्णतया गंभीर हैं , और उन्हें बहुत ही गहराई से जानते हैं । जो लोग देश की समस्याओं को नहीं जानते ,उनकी वोट का मूल्य ‘एक’ रखा जाए । यदि ऐसा कर दिया जाता है तो अशिक्षा का रोग देश से समाप्त हो जाएगा । क्योंकि तब सभी नेता अपने लोगों को पढ़ाने – लिखाने का प्रयास करेंगे । इसका दूसरा लाभ यह होगा कि देश में समान नागरिक संहिता को लागू करने के लिए पढ़े – लिखे समझदार लोग ही अपने जन प्रतिनिधि चुनेंगे । तीसरे , जो लोग देश के टुकड़े करने की इच्छा से निर्धन लोगों के मतों को अपने लिए खरीदते हैं उनकी ऐसी प्रवृत्ति पर भी रोक लग जाएगी । 
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि व्यवस्था का आविष्कार इसलिए किया गया था कि राक्षस और अत्याचारी प्रवृत्ति के लोगों से जनसाधारण को मुक्त किया जा सके , परंतु जब व्यवस्था ही दुष्टता और अत्याचारों को बढ़ावा देने वाली हो जाए तो फिर क्या होगा ? हमने व्यवस्था की दुष्टता का शिकार बने हिंदुओं को एक कमरे में बंद कर वहां पर भेड़िया छोड़ दिये हैं । इसे ही बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने ‘ राक्षसों का संविधान ‘ और राक्षसों का राज्य कहकर संबोधित किया था। पूरी व्यवस्था ही पश्चिम बंगाल के हिंदुओं को न्याय देने में असफल रही है । यहां बाड़ ही खेत को खा रही है। रक्षक ही भक्षक बन चुके हैं। व्यवस्था पोषक न होकर शोषक हो चुकी है ।चारों ओर से दरवाजे बंद कर भीतर कुछ लोगों को बंद कर उनके बीच में भेड़िया छोड़ दिया गया है । इस स्थिति को आप क्या कहेंगे ? इससे भी अधिक लज्जाजनक स्थिति ये है कि लोकतंत्र के नाम पर देश के राजनीतिक दल ऐसा होने दे रहे हैं और पश्चिम बंगाल के हिंदुओं के लिए बोलने से इन राजनीतिक दलों के कहीं और वोट बैंक पर दुष्प्रभाव न पड़े इसलिए सब शांत है । यहां तक कि केंद्र सरकार भी उचित कदम नहीं उठा पा रही है । ऐसे में इस देश का क्या होगा ? – सोच कर बड़ा दुख होता है।

1 thought on “वतन की फिक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है

  1. देरी हो चुकी है.
    सर्वाधिक बुद्धिमान और देशभक्ति का परिचय देनेवाले बंगाल की क्रान्तिकारी उन्नति की अपेक्षा थी.
    (पिताजी ऐसा ही कहा करते थे)
    अपेक्षा थी, कि, अरविन्द, रामकृष्ण, विवेकानन्द, सुभाष, योगानन्द, ईश्वरचंद्र, जगदिश चंद्र ऐसे अनगिनत चमकते तारों का बंगाल,सबसे आगे और सब के पहले बढेगा.
    पर लाल रंग की घुन ही उसे खोखला कर गई.
    लेखक राकेश जी से १००% सहमति.
    .बडे दुःख की बात है.
    .लेखक को साधुवाद.
    मधुसूदन

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