लेखक परिचय

पियूष द्विवेदी 'भारत'

पीयूष द्विवेदी 'भारत'

लेखक मूलतः उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के निवासी हैं। वर्तमान में स्नातक के छात्र होने के साथ अख़बारों, पत्रिकाओं और वेबसाइट्स आदि के लिए स्वतंत्र लेखन कार्य भी करते हैं। इनका मानना है कि मंच महत्वपूर्ण नहीं होता, महत्वपूर्ण होते हैं विचार और वो विचार ही मंच को महत्वपूर्ण बनाते हैं।

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आज हम इस बात के लिए खुश हो सकते हैं कि हम ऐसे समय में हैं जब हमारे पास इंटरनेट जैसी अदभुत सुविधा या शक्ति मौजूद है। ऐसी शक्ति जिसके द्वारा हम अपने घर में बैठे-बैठे कितने भी दूर मौजूद व्यक्ति से संपर्क कर सकते हैं, मिनट भर में किसी भी तरह की जानकारी हासिल कर सकते हैं तथा और भी बहुत से काम जिनको करने में काफी वक़्त और मेहनत लगती है, इंटरनेट के जरिये चुटकियों में कर सकते हैं। मोटे तौर पर कहें तो आज इंटरनेट ने लोगों के जीवन में व्यापक बदलाव ला दिया है; अगर इस बदलाव को एक शब्द में ई-क्रांति कहें तो शायद गलत नहीं होगा। उसपर भी महत्वपूर्ण बात ये है कि आज इंटरनेट पहले की तुलना में बहुत अधिक सहजता से उपलब्ध होने वाली चीज बन गया है। हालत ये है कि अगर आपके पास कंप्यूटर, लैपटॉप आदि संसाधन नहीं हैं तो भी आप अपने मोबाइल के जरिये इंटरनेट का उपयोग कर सकते हैं। और इसके लिए किसी बहुत विशेष या महंगे मोबाइल की भी कोई आवश्यकता नहीं है, आप अपने सामान्य मल्टी-मिडिया मोबाइल में इंटरनेट का बड़े आराम से लाभ उठा सकते हैं और वह भी काफी कम खर्चे में। लेकिन, इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि इंटरनेट की सहज उपलब्धता के बावजूद आज भी भारत में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या भारत के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी चीन की अपेक्षा बेहद कम है। इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया  की एक रिपोर्ट के अनुसार अभी भारत में इंटरनेट के उपभोक्ताओं की संख्या २० करोड़ के आसपास है जो कि चीन से काफी पीछे है। यहाँ समझना होगा कि देश में जो भी इंटरनेट उपभोक्ता हैं, वे उच्च व मध्यम वर्ग के हैं। मध्यम वर्ग भी पूरी तरह से नहीं है, फिर निम्न वर्ग का तो कहना ही क्या! अब निम्न वर्ग तो मूलतः अपनी आर्थिक अक्षमता के कारण ही इंटरनेट आदि से पूर्णतया दूर है। लेकिन मध्यम वर्ग के पास तो इतना अधिक अभाव नहीं हैं, फिर मध्यम वर्ग आधा-अधूरा ही इंटरनेट से क्यों जुड़ा है, पूरी तरह से क्यों नहीं ? इस सवाल का एक ही जवाब है – जागरूकता व जानकारी का अभाव। भारत के मध्यम वर्ग का एक बड़ा हिस्सा जो गांवों में रहता है, के पास इंटरनेट के विषय में जागरूकता व जानकारी का बेहद अभाव है। इसलिए संसाधन और सामर्थ्य होते हुए भी वो तबका इंटरनेट से दूर है। लेकिन, यहाँ बहुत अधिक निराश होने की भी कोई जरूरत नहीं है क्योंकि हाल के वर्षों में देश में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या जितनी तेजी से बढ़ी है, वो इस बात का प्रमाण है कि लोगों में धीरे-धीरे जागरूकता आ रही है। इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया  के ही अनुसार, देश में दस करोड़ इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या होने में तकरीबन एक दशक का समय लगा था, जबकि उसके बाद दस से बीस करोड़ उपभोक्ता होने में महज ३ वर्ष ही लगे। तो साफ़ है कि ई-क्रांति तो इस देश में आ चुकी है, हाँ अब उसका पूर्णतया प्रसार होने में कितना समय लगेगा, ये सरकारी प्रयासों व जन-जागरूकता की गति पर निर्भर करता है।

यहाँ एक सवाल यह भी उठता है कि आखिर दस से बीस करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता होने में महज तीन वर्ष क्यों लगे, जब दस करोड़ होने में एक दशक लग गया था ? इस सवाल का अमूमन यही जवाब होगा कि लोगों में जागरूकता आई, इंटरनेट की जानकारी बढ़ी आदि इत्यादि। पर तब सवाल ये उठता है कि आखिर अचानक से ये जागरूकता आई कैसे ? इस सवाल के जवाब में हमें सन २०११ के अन्ना आन्दोलन को याद करना होगा जो कि इंटरनेट की बदौलत ही देशव्यापी हो सका था। कहीं ना कहीं वो आन्दोलन एक बड़ा कारक बना कि शहरी मध्यम वर्ग के लोगों में भी इंटरनेट को लेकर जागरूकता बढ़ी। लोगों ने जब ये देखा कि इंटरनेट के द्वारा एक आन्दोलन देशव्यापी होकर देश की हुकूमत को हिला सकता है, तब उन्हें इसकी प्रसार शक्ति का अंदाजा मिला। और यही वो वक्त था, जब इंटरनेट सूचनाओं के स्रोत के साथ-साथ धीरे-धीरे जनाभिव्यक्ति के एक सशक्त माध्यम के रूप में भी करवट लेने लगा। सूचनाओं का स्रोत तो ये पहले से था ही, लेकिन इस आन्दोलन ने लोगों को इसमें अभिव्यक्ति का एक सशक्त मंच भी दिखाया। परिणामस्वरूप जो शहरी मध्यम वर्गीय लोग पहले इंटरनेट को सिर्फ एक संपर्क व सूचना स्रोत के रूप में जानते थे और इसकी तरफ कुछ ख़ास गंभीर नहीं थे, वे अब फेसबुक, ट्विटर आदि अभिव्यक्ति के ई-माध्यमों से अधिकाधिक संख्या में जुड़ने लगे। हुआ ये कि जिसके पास भी संसाधन हो, वह कुछ नहीं तो कम से कम फेसबुक पर तो आ ही जाता। बहरहाल, कुछ आगे चलकर अन्ना आन्दोलन तो बिखरकर ख़त्म हो गया, लेकिन उससे लोगों में जो जागरूकता आई थी, वो कभी ख़त्म न हुई बल्कि बढ़ती ही गई। इसी का परिणाम रहा कि अन्ना आन्दोलन के आगाज यानि २०११ से आज यानि २०१४ के इन तीन वर्षों में देश में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या में दुगुनी वृद्धि हुई और वह दस से सीधे बीस करोड़ तक जा पहुँची। और इस अवधि में न केवल उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ी है, बल्कि इंटरनेट के स्वरूप और उसके प्रयोग क्षेत्र में भी काफी विस्तार हुआ है। आज इंटरनेट भारत में सूचनाओं के स्रोत तथा जनाभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनकर   पारंपरिक मीडिया के सामानांतर एक ‘नए मीडिया’ का रूप ले चुका है जिसे कई नामों से भी जाना जा रहा है जैसे – वेब मीडिया, नया मीडिया आदि।

वेब मीडिया अर्थात अभिव्यक्ति व सूचना प्राप्ति का अपना माध्यम। इसके उद्भव का मूल कारण पारंपरिक मीडिया का काफी हद तक कॉरपोरेट व सत्ता के हाथों की कठपुतली बन जाना ही है। जैसा कि ऊपर अन्ना आन्दोलन का जिक्र है तो जब वो आन्दोलन अन्ना के अनशन के रूप में ५ अप्रैल, २०११ को रामलीला मैदान में आरम्भ हुआ था तो उसमे हमारी पारंपरिक मीडिया की कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसकी सोच थी कि ये भी आए दिन होते रहने वाले तमाम आन्दोलनों की तरह ही है; लोग नहीं आएंगे तो चार दिन में ख़त्म हो जाएगा। कहीं न कहीं पारंपरिक मीडिया के इस उदासीन रवैये के कारण ही जब फेसबुक, ट्विटर आदि ई-माध्यमों से इण्डिया अगेंस्ट करप्शन जैसे संगठनों द्वारा उस आन्दोलन का प्रचार-प्रसार किया जाने लगा और फिर जब रामलीला मैदान में जनसैलाब उमड़ा, तो हमारी पारंपरिक मीडिया में सुगबुगाहट शुरू हुई। और तब जाके वहां टीआरपी के भूखे न्यूज चैनलों के कैमरे नज़र आने लगे और अख़बारों के मुख्य पृष्ठ पर उस आन्दोलन की खबरें भी आने लगीं। स्पष्ट है कि पारंपरिक मीडिया में पेड न्यूज व न्यूज सेंसरशिप जैसी चीजों के रूप में कुछ बड़े लोगों के हाथ में चले जाने व परिणामस्वरूप उसकी जन विश्वसनीयता ख़त्म हो जाने के कारण अभिव्यक्ति के लिए एक उचित माध्यम की तलाश कर रहे आम लोगों की जरूरत के कारण ही पारंपरिक मीडिया के समान्तर इस नई मीडिया या वेब मीडिया का उद्भव हुआ। कहीं न कहीं यह उक्ति एकबार फिर चरितार्थ हुई कि आवश्यकता ही अविष्कार की जननी होती है। आज वेब मीडिया की ताकत का अंदाजा तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब पारंपरिक मीडिया संस्थान भी स्वयं को अलग-थलग होने से बचाने के लिए अपना-अपना वेब संस्करण स्थापित कर दिए हैं। आज लगभग हर न्यूज चैनल और हर अख़बार अपनी-अपनी वेबसाइट्स के साथ इंटरनेट पर मौजूद हैं। अब पारंपरिक मीडिया भी वेब मीडिया के जरिये खुद को लोगों के बीच पहुँचाना चाहती है, क्योंकि उसे पता है कि आज अगर अपने लिए दर्शक व पाठक जोड़ने हैं तो वो वेब मीडिया से ही जुड़ेंगे।

एक बात और हमें स्वीकारनी होगी कि वेब मीडिया जैसे जनाभिव्यक्ति के माध्यम के उभार ने काफी कम समय में भारत की काफी अधिक बौद्धिक उन्नति की है और अब भी कर रही है। यहाँ बौद्धिक उन्नति का तात्पर्य जन-जागरूकता से है। वेब मीडिया के उद्भव से अभी बहुत अधिक नहीं तो कम से कम शहरी मध्यम वर्ग में ही सही, काफी अधिक जागरूकता आई है। अब चूंकि, वेब मीडिया पर न केवल अभिव्यक्ति के लिए भरपूर स्पेस है, बल्कि सूचनाओं व जानकारियों का असीमित भंडार भी है, और सबसे बड़ी बात कि ये जानकारियां अन्य सभी माध्यमों की अपेक्षा बेहद सहजता से और सस्ते में उपलब्ध हैं। समझने की कोशिश करें तो अगर आप जानकारी के लिए अख़बार पर निर्भर हैं तो आपको न्यूनतम २ से ३ रूपये तो खर्च करने ही पड़ेंगे और तब भी पक्का नहीं कि आपको मनचाही जानकारी मिल ही जाए। रही बात न्यूज चैनलों की तो उसके लिए टीवी, केबल आदि का खर्च जो है, सो है ही; तिसपर सबसे बड़ी चीज कि एकदम फुर्सत से बैठकर देखिए। जबकि वेब मीडिया का तो ऐसा है कि कुछ नहीं तो मोबाइल में नेट लगवाइये और फिर जहाँ और जो जानकारियां चाहिए, पाते रहिए। लिहाजा वेब मीडिया से जुड़ने पर लोगों को सूचनाएं प्राप्त होने लगी जिससे उनकी जानकारी बढ़ी। वे अपने अधिकारों व सरकारी क्रियाकलापों को जानने-समझने लगे और उनमे धीरे-धीरे जागरूकता आने लगी। परिणामस्वरूप अब लोग हर बात पर अपनी राय व विचार प्रकट करने लगे, सत्ता सियासत की अच्छाइयों की प्रशंसा तो दुराचरणों की भर्त्सना करने लगे। कुल मिलकर वेब मीडिया पर जनाभिव्यक्ति का अत्यंत प्रखर व निडर रूप उभरकर सामने आने लगा।

उपर्युक्त बातों से इतना तो स्पष्ट हो गया कि वेब मीडिया के उद्भव में जितना समय लगा, उससे काफी कम समय उसे सशक्त व जनप्रिय होने में लगा। कहना गलत नहीं होगा कि आज वेब मीडिया अपने यौवानोत्कर्ष पर है। दिनों-दिन इसकी शक्ति को एक नया आयाम मिल रहा है। आज इसकी शक्ति का कितना विस्तार हो चुका है, इसे इसी बात से समझ जा सकता है कि अब देश की सियासत तक में इसका महत्वपूर्ण स्थान हो गया है। देश के सियासतदां इसके जरिये अपनी सियासत को चमकाने में लगे हैं। अभी हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनावों में विजयी दल भाजपा की विजय में इस वेब मीडिया की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। जिस मोदी लहर के दम पर भाजपा सत्ता में पहुँची है, उस मोदी लहर को बनाने का बड़ा श्रेय इस वेब मीडिया को ही जाता है। इन चीजों को देखते हुए अब हर राजनीतिक दल वेब मीडिया को अपनी चुनावी रणनीति का एक महत्वपूर्ण अवयव मानकर चल रहा है।

हालांकि ऐसा कत्तई नहीं है कि फर्श से अर्श तक का वेब मीडिया का ये सफ़र बस यूँ ही तय हो गया हो, इसमे उसे तमाम रुकावटों व मुश्किलातों का सामना करना पड़ा है। बीती संप्रग-२ सरकार की तरफ से तो वेब मीडिया पर सरकारी नियंत्रण स्थापित करने की बात हमेशा की जाती रही साथ ही इसपर निगरानी व पहरेदारी के लिए सूचना प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत ‘न्यू मीडिया विंग’ का गठन भी किया गया। दरअसल, संप्रग-२ की वेब मीडिया पर नियंत्रण की इन कवायदों का मुख्य कारण यही था कि उसके भ्रष्टाचार व निष्क्रिय शासन के प्रति लोगों का भारी आक्रोश वेब मीडिया के जरिये सामने आ रहा था, जिसे सहना संप्रग के लिए मुश्किल था। लेकिन, अब अभिव्यक्ति की इन आवाजों पर वो सीधे-सीधे तो अंकुश लगा नहीं सकती थी, इसलिए तमाम बहानों, कि वेब मीडिया की निरंकुशता के कारण अफवाहें फ़ैल रही है और दंगे हो जा रहे हैं, इसपर काफी सारी गलत सामग्री आ रही है आदि, के जरिये इसपर सरकारी नियंत्रण के औचित्य को दर्शाने का प्रयास किया जाता था। कहीं न कहीं संप्रग-२ की सोच थी कि जिस तरह पारंपरिक मीडिया हमारे नियंत्रण में है, वैसे ही वेब मीडिया को भी कर लिया जाय। पर वेब मीडिया की संरचना ही ऐसी है कि इसपर किसी एक का नियंत्रण हो ही नहीं सकता – अब क्या हवा पर भी कोई लगाम लगा सकता है! हालांकि संप्रग-२ ने वेब मीडिया पर अंकुश के प्रयास जरूर किए और कुछ प्रयास मन में ही लेकर सत्ताच्युत भी हो गई, लेकिन वेब मीडिया पर इन चीजों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वो लोगों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनकर सतत आगे बढ़ती रही और आज बेहद मजबूत स्थिति में खड़ी है।

आज वेब मीडिया की स्वीकार्यता का आलम ये है कि अब कई दशक पुरानी इस देश की पारंपरिक मीडिया तक को खबरों के लिए कुछ साल पुरानी इस वेब मीडिया की शरण में आना पड़ रहा है। पहले होता था कि किसके पास कुछ नई खबर आई तो वो उसे अख़बार आदि को भेजता था, पर अब वो उसे सीधे वेब मीडिया पर डाल देता है। और वहीँ से फैलते-फैलते वो खबर अख़बारों व खबरिया चैनलों तक पहुँच जाती है। स्पष्ट है कि अभी देश के एक छोटे तबके यानी उच्च वर्ग व शहरी मध्यम वर्ग में ही सही, वेब मीडिया की स्वीकार्यता बढ़ रही है। अब जरूरत ये है कि वेब मीडिया को देश के गांवों तक भी पहुँचाया जाय। इससे ग्रामीण मध्यम वर्ग व निम्न वर्ग को भी जोड़ा जाय और इसके लिए कोई अन्ना आन्दोलन नहीं होने वाला, ये तो सरकार व आम लोगों के सम्मिलित प्रयासों से ही संभव होगा। प्रधानमंत्री के डिजिटल इण्डिया मिशन के आगाज से इस दिशा में काफी उम्मीदें जगी हैं, पर इसकी राह में मुश्किलातों का भंडार है। अब ये देखने वाली बात होगी कि ये मिशन मुश्किलातों को पार करता हुआ जमीन पर उतर पाता है या तमाम सरकारी कार्यक्रमों की तरह सिर्फ कागजों व बातों का भूषण बनकर ही रह जाता है।

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