लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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निर्मल रानी

देश की राजनीति पर भले ही पुरुष समाज का नियंत्रण क्यों न हो परंतु महिलाओं ने भी स्वतंत्रता संग्राम से लेकर अब तक भारतीय राजनीति में अपनी जो ज़बरदस्त उपस्थिति दर्ज कराई है उसे भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। आज भी देश में महिलाएं महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित करती हुई देखी जा सकती हैं। चाहे वह देश के राष्ट्रपति का पद हो या लोकसभा अध्यक्ष का पद या फिर सत्तारुढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के अध्यक्ष का पद। देश के कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बात या राज्यपालों अथवा केंद्र व राज्य सरकार के मंत्रियों के पद। जहां तक उत्तर प्रदेश जैसे देश के विशाल राज्य का प्रश्र है जिसका कि क्षेत्रफल आज सिमट कर 2 लाख 43 हज़ार 286 किलोमीटर रह गया है, भी महिलाओं की भरपूर राजनैतिक दखलअंदाज़ी से अछूता नहीं रहा है। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, इस पंक्ति को देश का बच्चा-बच्चा बड़े ही गौरवपूर्ण तरीके से बखान करता है। झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई सौभाग्यवश इसी विशाल प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र की महिला थीं जिन्होंने अपनी राजनैतिक कुशलता व जुझारूपन के दम पर अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ा दिए। उसके पश्चात श्रीमती इंदिरा गांधी ने स्वतंत्र भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में 14 वर्ष तक देश को मज़बूत शासन दिया तथा अपने राजनैतिक कौशल का लोहा देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मनवाया।

आज वही उत्तर प्रदेश जोकि देखने में तो पुरुष वर्चस्व रखने वाला राज्य प्रतीत होता है। परंतु हकीकत में आज भी इस राज्य पर महिला राजनीतिज्ञों की पकड़ काफी मज़बूत है। वर्तमान मुख्यमंत्री मायावती जोकि 2007 में हुए राज्य के पंद्रहवें विधानसभा चुनाव के पश्चात चौथी बार राज्य की मुख्यमंत्री निर्वाचित की गईं थीं, इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। कुछ ही दिनों में राज्य की 404 सीटों के लिए सोलहवीं विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। इन चुनावों में भी सत्तारुढ़ बहुजन समाज पार्टी की ओर से जहां मायावती ने चुनाव की बागडोर अपने हाथों में संभाल रखी है वहीं कांग्रेस की ओर से भी एक महिला नेत्री प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्षा रीटा बहुगुणा जोशी ने मोर्चा संभाला हुआ है। ज़ाहिर है चूंकि भारतीय जनता पार्टी को भी उत्तर प्रदेश में इन दो महिला नेत्रियों के मुकाबले में एक महिला की ही तलाश थी जोकि उत्तर प्रदेश में पार्टी को नहीं मिल सकी। लिहाज़ा भाजपा ने पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश से श्आयातित नेत्री्य के रूप में उमा भारती को प्रयोग किया और उन्हें राज्य के चुनाव के लिए प्रमुख चेहरे के रूप में प्रयोग करने का फैसला किया। जहां तक समाजवादी पार्टी का प्रश्र है तो सपा तो राजनीति में महिलाओं के वर्चस्व या इनकी अत्यधिक दखलअंदाज़ी को ही पसंद नहीं करती। इसी प्रकार राज्य का एक अन्य क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय लोकदल भी पुरुष प्रधान राजनैतिक दल है।

उत्तर प्रदेश में हो रहे सोलहवें विधानसभा चुनावों के बाद राज्य विधानसभा की तस्वीर क्या होगी इसको लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। तमाम पर्यवेक्षकों का मत है कि मायावती पुनरू सत्ता में वापसी कर सकती हैं। और यदि उन्हें सत्ता में लौटने में कुछ सीटों की कमी पड़ी तो भारतीय जनता पार्टी उन्हें समर्थन देकर उनके लिए सत्ता का रास्ता साफ कर सकती है। जबकि कुछ राजनैतिक विशलेषक समाजवादी पार्टी की सत्ता में वापसी का कयास लगा रहे हैं। कुछ लोगों का मत है कि यदि सपा पूर्ण बहुमत में नहीं आई तो कांग्रेस पार्टी सपा को समर्थन देकर मिली-जुली सरकार बना सकते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य राजनैतिक दलों के नेताओं के अत्यधिक आत्मविश्वास दर्शाने वाले अपने-अपने दावे भी हैं। इस प्रकार के दावे सभी राजनैतिक दल महज़ इसलिए करते हैं ताकि उनके कार्यकर्ताओं व प्रत्याशियों का मनोबल बना रहे तथा वे पूरी तरह संघर्षशील होकर व गंभीरता से चुनाव लड़ें। ऐसे ही दावों में कांग्रेस व भाजपा दोनों ही दलों के कुछ नेता अपने-अपने दलों के बहुमत में आने तथा राज्य के चमत्कारिक परिणाम आने की बातें भी कर रहे हैं।

परंतु राज्य के ज़मीनी राजनैतिक हालात तो यही दिखाई दे रहे हैं कि पहले और दूसरे नंबर की लड़ाई में सपा व बसपा हैं तो तीसरे और चौथे नंबर की जंग में कांग्रेस और भाजपा। अब देखना यह है कि राहुल गांधी की बेपनाह मेहनत व राज्य में कई जगहों पर प्रियंका गांधी के दौरे क्या कोई चमत्कार कर पाने में सफल हो पाते हैं। बहरहाल, जहां तक बात प्रदेश की राजनीति में महिलाओं के वर्चस्व की है तो यदि बसपा की राज्य में वापसी होती है तो राज्य एक बार पुनरूमायावती के रूप में एक महिला मुख्यमंत्री को देख सकता है। और यदि बसपा-भाजपा गठबंधन की नौबत आती है तब भी मायावती व उमा भारती प्रदेश की राजनीति में अपना अहम किरदार अदा करेंगी। इसी प्रकार समाजवादी पार्टी को यदि सत्ता में आने के लिए कांग्रेस के सहारे की ज़रूरत पड़ी तो रीता बहुगुणा जोशी की राजनैतिक भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। वैसे तो रीता बहुगुणा जोशी के समर्थक उन्हें प्रदेश की भावी मुख्यमंत्री के रूप में भी देख रहे हैं। परंतु ऐसा सोचना बहुत दूर की कौड़ी प्रतीत होती है। कोई बहुत बड़ा करिश्मा या चमत्कार ही ऐसी स्थिति ला सकता है। अन्यथा स्वयं केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आज़ाद राज्य में सौ सीटें मिलने की उम्मीद जता चुके हैं। अब यदि उनकी मुंह मांगी मुराद पूरी भी हो जाए जोकि शायद संभव नहीं लगता तब भी रीटा जोशी के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता फिलहाल साफ नहीं होता।

इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में पार्टी में जान फंूकने के लिए जितनी मेहनत की है पार्टी कार्यकर्ता व नेता उसकी उम्मीद भी नहीं कर सकते थे। शायद स्वयं राहुल को भी प्रदेश में इतने परिश्रम की कल्पना नहीं करनी पड़ी होगी। ज़ाहिर है जब राहुल गांधी स्वयं प्रथम पंक्ति में खड़े होकर राजनैतिक युद्ध की अगुआई कर रहे हों ऐसे में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का भी राहुल गांधी के कदम से कदम मिलाकर चलना स्वाभविक है। निश्चित रूप से रीता जोशी ने राहुल का राज्य स्तर पर पूरा साथ देने का बखूबी ज़िम्मा उठाया है। अपने इन्हीं राजनैतिक संघर्षों के दौरान उन्हें मुरादाबाद में मायावती के विरुद्ध कथित अभद्र टिप्पणी करने के विरोध में जुलाई 2009 में गिरफ्तार किया गया था। इसके पश्चात बसपा के कार्यकर्ताओं द्वारा लखनऊ स्थित उनके आवास में आग लगा दी गई थी। इस घटना से रीता जोशी के प्रति लखनऊ व प्रदेश में सहानुभूति भी पैदा हुई थी। संभव है उन्हें इस सहानुभूति का लाभ भी लखनऊ कैंट से लड़े जा रहे उनके विधानसभा चुनाव में मिल सके।

मई 2011 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किसानों के भूअधिग्रहण के मामले को लेकर किसानों पर हुए पुलिस ज़ुल्म का विरोध करने हेतु नोएडा के समीप भट्टा-पारसौल गांव जाते समय उन्हें राहुल गांधी व दिग्विजय सिंह के साथ मेरठ क्षेत्र की पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया था। रीटा जोशी की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी काफी सुदृढ़ है। उनके पिता स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तथा केंद्रीय मंत्री रहे हैं। उनकी माता कमला बहुगुणा भी सांसद रही हैं। स्वयं रीटा जोशी को दक्षिण एशिया की प्रतिष्ठित महिला का सम्मान संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा दिया जा चुका है। वे महिला कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं तथा महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के लिए दिल्ली में ज़बरदस्त रैली आयोजित कर अपनी राजनैतिक क्षमता का एहसास करा चुकी हैं। वह 1995 से 2000 तक इलाहाबाद की पहली मेयर भी रह चुकी हैं। निश्चित रूप से उनका राजनैतिक कैरियर व उनका व्यक्तिगत जुझारुपन कांग्रेस पार्टी को राज्य में मज़बूत करने में तो काम आ ही रहा है साथ ही साथ उनके अपने राजनैतिक भविष्य में भी आशाओं की आस जगाता है।

जहां तक महिला नेत्री के रूप में अपनी अलग पहचान रखने वाली उमा भारती का प्रश्र है तो वे भी उत्तर प्रदेश में महिलाओं के वर्चस्व की लड़ाई में काफी आगे हैं। राजनैतिक अनुभव की उनके पास भी कोई कमी नहीं है। मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री के पद से लेकर केंद्रीय मंत्री होने तक का शानदार अनुभव उनके पास है। धार्मिक मुद्दों पर जनता को वरगलाना तथा संप्रदाय के आधार पर मतों का ध्रुवीकरण करना उन्हें बखूबी आता है। भाजपा के फायर ब्रांड नेताओं में वे अपना प्रमुख स्थान रखती हैं। अयोध्या आंदोलन में उनकी अहम भूमिका थी और आज फिर वह अपने साध्वी रूपी व्यक्त्वि, भगवा वेशभूषा तथा राममंदिर के नाम पर वोट मांगते हुए सत्ता तक पहुंचने का खेल खेल रही हैं। गोया कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश आज भी महिलाओं के राजनैतिक वर्चस्व से अछूता नहीं है।

2 Responses to “उत्तर प्रदेश की राजनीति में महिलाओं का बढ़ता वर्चस्व”

  1. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbal hindustani

    कमल है आप सिर्फ इस बात पर खुश हैं की इतनी महिलाएं चुनाव में हैं ये भी देखो वे कैसी हैं? आज मायावती भ्रष्टाचार के लिए चर्चा में हैं औरों की तो बात क्या करें. माया बुरी तरह हरने जा रही हैं लिख लें.

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