ताकत भी है बढ़ती आबादी

प्राकृतिक संसाधनों और भौगोलिक विविधता, ऋतुओं कि विलक्षण्ता और अनुकूल जलवायु के चलते हम बेहद समृद्धशाली देश हैं। नतीजतन देश के हर क्षेत्र में खेती योग्य भूमि, पानी, वन संपदा और अनेक प्रकार के खनिज संसाधनो के विपुल भंडार हैं। खाद्यान्न के क्षेत्र में भी हम आत्मनिर्भर हैं। हालांकि जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में 2024 तक हम इस निर्भरता को खो भी सकते हैं। क्योंकि हमारी खाद्यान्न की आज जरूरतें 20 करोड़ टन हैं, वही 2020 में इसकी जरूरत 40 करोड़ टन होगी। लेकिन संसाधनों के बंटवारे में हम समानता का रुख अपनाने वाली नीतियों को अमल में लाएं तो इस समस्या से भी निजात पा सकते हैं। इसके लिए हमें प्राकृतिक संपदा को उधोगपतियों के हवाले करने की बजाए, विकेंदीकृत करके बहुसंख्यक आबादी के हवाले करने की जरूरत है।

संदर्भः संयुक्त राष्ट्र की ‘संभावित वैश्विक आबादीः पुनरावलोकन-2017 रिपोर्ट‘

प्रमोद भार्गव

भारत की बढ़ती आबादी के परिप्रेक्ष्य में संयुक्त राष्ट्र संघ की ‘संभावित वैश्विक आबादीः पुनरावलोकन-2017‘ रिपोर्ट में कहा है कि आने वाले सात सालों में भारत की आबादी 1.44 अरब हो जाएगी। अर्थात चीन को पीछे छोड़ते हुए भारत दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा। इस रिपोर्ट में 2 महत्वपूर्ण बातें सामने आई है कि पिछले 50 सालों में भारतीयों की प्रजनन दर आदि होकर 2.3 प्रतिशत रह गई है। दूसरे बीते 25 वर्षों में व्यक्ति की औसत उम्र बढ़कर 69 साल हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार 2024 में भारत और चीन की आबादी 1.44 अरब होने की उम्मीद है। वर्तमान में भारत की आबादी 1.34 अरब और चीन की 1.41 अरब है। इसके बाद भी भारत की आबादी कई दशकों तक बढ़ती रहेगी। नतीजतन 2030 में 1.5 अरब और 2050 में 1.66 अरब हो जाएगी। जबकि चीन की आबादी 2030 तक स्थिर रहेगी। भारत की आबादी 2050 के बाद स्थिर तो होगी ही, इसमें गिरावट भी संभव है। इस बढ़ती आबादी को एक भयावह संकट के रूप में पेश किया जाता है, जबकि चीन ने अपनी आबादी को जिस तरह रोजगार सृजन और उत्पादन से जोड़ा है, यदि प्रबंधन की यही कुशलता भारत अपनाए तो देश के लिए बढ़ती आबादी एक आर्थिक शक्ति बन सकती है।

यदि बढ़ती आबादी के इन आंकड़ों को सही माना जाए, तो बढ़ी जनसंख्या एक ताकत के रूप में पेश आ रही है। विश्व आबादी में हमारा हिस्सा 1.50 प्रतिशत हो जाएगा। मसलन विश्व जनसंख्या में प्रत्येक चार लोगों में से एक भारतीय होगा। हमें इस जन-बल पर इसलिए गौरवन्ति होने की जरूरत है, क्योंकि अमेरिका, इंडोनेशीया, ब्राजील, पाकिस्तान और बंगलादेश की कुल मिलाकर जितनी आबादी है, उतने अकेले हम अभी भी हैं। एक मात्र चीन ऊपर है। इस बड़ी आबादी को लेकर पूंजीवादी मूल्यों के पोशक अर्थशास्त्री चिंता जता रहे हैं कि बढ़ती जनसंख्या देश की आर्थिक सामाजिक व शैक्षणिक विकास के लिए बाधा बनने जा रही है। दरअसल संयुक्त राष्ट्र भी वर्तमान में पूंजीवादी पोषण की संस्था बनी हुई है। आशंका जताई जा रही है कि आने वाले कुछ सालों में इस वजह से गरीबी, कुपोषण, शहरीकरण और गंदी बस्तियों का विस्तार होगा। आज की स्थिति में भी भूख और कुपोषण से पीड़ित दीन-हीनों की संख्या 23 करोड़ 30 लाख है। आबादी के अनुपात के हिसाब से यदि आवास एवं शहरी गरीबी निवारण मंत्रालय के आकड़ों को सही मानें तो करीब 2.47 करोड़ घरों की हमें तत्काल जरूरत है। हां, इस बाबत हमारे पास जमीन की कमी है, लेकिन भू-प्रंबधन की नई नीतियां बनाकर अमल में लाई जाएं तो इस समस्या से निपटा जा सकता है। फिलहाल भूमि के कुल भाग में से महज 24 प्रतिशत भूखण्ड ही हमारे हिस्से में है।

वैश्विक शक्ति के रूप में अमेरिका को जाना जाता है। वहां आर्थिक संपन्नता भी है और भौतिक संसाधनों की बहुलता भी आबादी के अनुपात में कई गुना है। बावजूद 4 साल पहले अमेरिकी जनगणना की प्रकाशीत हुई रिपोर्ट में अमेरिका में 2008 की तुलना में गरीबों की संख्या 14.3 प्रतिशत बढ़ी है। 4 करोड़ 36 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं और बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत बढ़ी है। अमेरिका की इस भयावह स्थिति से तय होता है कि पूंजीपरस्त नीतियों और संस्था केंद्र्रित विकास गरीबी व गरीबीजन्य कारको को बढ़ावा देता है। इन तथ्यों से रूबरू होने के बावजूद हम अमेरिकी नीति निर्धारित आर्थिक विकास की पूंछ छोड़ने को तैयार नहीं हैं, जबकि डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनते ही सरंक्षणवाद के वे सब उपाय शुरू कर दिए हैं, जो स्थानीयता को सुरक्षित करने वाले हैं।

हम देश की आबादी को मानव संसाधन के रूप में देखने की बजाय, जनसंख्या विस्फोट के नजरिए से देख रहे हैं। हालांकि नए आकंड़ो ने तय किया है कि लिंगानुपात बिगड़ने के बावजूद आबादी बढ़ने की रफ्तार पर लगाम लगी है। भारत में प्रति महिला प्रजनन दी की क्षमता 1975-80 के 4.97 प्रतिशत के मुकाबले घटकर वर्तमान अवधि 2015-20 में 2.3 प्रतिशत आंकी गई है। साल 2025-30 तक यह घटकर 2.1 प्रतिशत होने और 2045-50 के दौरान 1.86 प्रतिशत और 2095-2100 के दौरान 1.78 प्रतिशत रह जाएगी। यह संख्या और भी नियंत्रित हो सकती है, बशर्ते गरीबी में कमी आए। गरीब – अमीर, ग्रामीण-शहरी वर्ग में परिवार छोटे हुए हैं। तीस साल पहले की तुलना में शहरी और ग्रामीण मां के बच्चों की संख्या में समान रुप से कमी आई है। त्रिस्तरीय पंचायती राज्य व्यवस्था के चलते गरीब और निचले तबके के लोग भी परिवार छोटा रखना चाहते हैं, लेकिन उन्हें प्रथामिक और उप स्वास्थ केंद्र्रों पर परिवार नियोजन के न तो साधन उपलब्ध हैं और न ही स्वास्थकर्मी ? यदि यह व्यवस्था चाक-चौबंद हो जाए तो कई राज्यों में 20 फीसदी आबादी घट सकती है ?

अक्सर बड़ी आबादी को गरीबी और आर्थिक रफतार की धीमी गति को माना जाता है। लेकिन यह धारणा अमेरिका,चीन और बंगलादेश को आधार मानकर चलें तो गलत साबित हुई है। बंगलादेश ने 1975 से 1988 के बीच प्रजनन दर को 7 से घटाकर 3.1 कर दिया, किंतु गरीबी की मार अब भी झेल रहा है। चीन ने जोर-जबरदस्ती करके एक बच्चे की नीति पर अमल किया। बावजूद वहां आबादी का घनत्व सबसे ज्यादा है। बाद में इस नीति को देश के लिए खतरनाक माना गया। इसके चलते चीन का लिंगानुपात गड़बड़ा गया। जन्म के समय वहां एक लड़के पर औसत अनुपात 11 लड़कियों हो गया। इस विंसगति से उपजे संकटों के कारण इस नीति को चीन ने वापस ले लिया।

भारत में धार्मिक आधार भी जनसंख्या को बढ़ाने का एक प्रमुख घटक है। बांग्ला देश से लगे  सीमाई क्षेत्र के मुस्लिम बहुल इलाकों में आबादी का घनत्व तेजी से बढ़ रहा है। इसमें बंाग्लादेषी घुसपैठी भी शामिल हैं। इनकी तदाद 4 से 5 करोड़ बताई जाती है। यह घुसपैठ 21 वीं सदी के पहले दशक में सबसे ज्यादा हुई। इस दशक की गणना के नतीजे हमारे सामने हैं। एक दशक में बढ़ी आबादी 18 करोड़ में से 4 करोड़ घुसपैठीयों की संख्या घटा दी जाए तो यह आंकड़ा 14 करोड़ होगा। मसलन 45 प्रतिशत आबादी कम करके आंकी जाती तो वास्ताविक जनसंख्या वृद्धि दर 13.59 होती। अभी इस वृद्धि का प्रतिशत 17.64 है। यदि घुसपैठ पर अंकुश नहीं लगा तो आगे भी यह हमारी जनसंख्या वृद्धि दर और आर्थिक प्रगति के अनुपात को बिगाड़ता रहेगा।   हमें आबादी के परिप्रेक्ष्य में जापान को आदर्ष देश मानकर चलना चाहिए। वहां आबादी का घनत्व जमीन की तुलना में काफी ज्यादा है। प्राकृतिक संसाधन भी भारत की तुलना में बेहद कम है। जापान आयात पर निर्भर राष्ट्र है। लेकिन बेहतर नीतियों और व्यक्तिगत आचरण की नैतिकता शुचिता के बूते वह आगे बढ़ा और परमाणु हमला झेलने के बावजूद विकसित देशों की अग्रिम पांत में शामिल है।

प्राकृतिक संसाधनों और भौगोलिक विविधता, ऋतुओं कि विलक्षण्ता और अनुकूल जलवायु के चलते हम बेहद समृद्धशाली देश हैं। नतीजतन देश के हर क्षेत्र में खेती योग्य भूमि, पानी, वन संपदा और अनेक प्रकार के खनिज संसाधनो के विपुल भंडार हैं। खाद्यान्न के क्षेत्र में भी हम आत्मनिर्भर हैं। हालांकि जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में 2024 तक हम इस निर्भरता को खो भी सकते हैं। क्योंकि हमारी खाद्यान्न की आज जरूरतें 20 करोड़ टन हैं, वही 2020 में इसकी जरूरत 40 करोड़ टन होगी। लेकिन संसाधनों के बंटवारे में हम समानता का रुख अपनाने वाली नीतियों को अमल में लाएं तो इस समस्या से भी निजात पा सकते हैं। इसके लिए हमें प्राकृतिक संपदा को उधोगपतियों के हवाले करने की बजाए, विकेंदीकृत करके बहुसंख्यक आबादी के हवाले करने की जरूरत है।

देश की चाहें केंद्र्र सरकार हो अथवा राज्य सरकारें सत्ता में बने रहने के लिए हम वर्तमान सरकारी कर्मचारियों की न केवल नौकरी की आयु बढ़ाते जा रहे है, बल्कि उनके वेतन और भत्तों में भी बेतहाशा वृद्धि कर रहे हैं। कर्मचारियों की उम्र घटाकर और उनके वेतन और भत्तों को नियंत्रित करके बड़ी संख्या में युवाओं को नौकरी देकर बढ़ती आबादी के बोझ को रचनात्मक फायदे में बदल सकते हैं ? ग्रामों से आबादी पलायन न करे इसके लिए कृषि में पूंजी निवेश, फसल प्रसंस्करण और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने की जरूरत है। परिवार को ईकाई मानते हुए भवन निमार्ण हेतु एक भूखण्ड की षर्त का सख्ती से पालन हो। सांसद, विधायक और समूचे सरकारी अमले को कृषि भूमि क्रय करने से वंचित किया जाए। ऐसी समावेषी नीतियां सीमेंट-कंक्रीट के बढ़ते जंगल पर अंकुश लगाएंगी और कृषि भूमि बेवजह आवासीय भूमि में तब्दील नहीं होगी। यह नीति खाद्य समस्या के लिए भी सुरक्षा कवच साबित हो सकती है। लेकिन नीतिया उलटने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत है, जो फिलहाल के शासकों में दिखाई नहीं दे रही है।

 

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