स्वतंत्रता दिवस और देश की आधी आबादी


 देश की आजादी को 73 सावन बीत गए है और हम 74 वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहें लेकिन इस आजाद देश में आज भी आधी आबादी गुलामी की जंजीरों में जकड़ी हुई है। हम कहने को 21वीं सदी में जी रहे है। जहां समता और स्वतंत्रता की बात भी बहुतायत में होती है। हमारे संविधान का अनुच्छेद 14 से 18 महिलाओ को पुरुषों के समान समानता का अधिकार प्रदान करने की वक़ालत भी करता है। इन सब तथ्यों के बावजूद महिलाओं की स्वतंत्रता से जुड़ी बातें सिर्फ़ किताबी ही मालूमात पड़ती हैं। जो एक दुःखद स्थिति है। ऐसे में क्यों आज भी महिलाओं के प्रति समाज की सोच नही बदल पा रही है? क्यों आज भी पितृ-सत्तात्मक सोच समाज मे हावी है? ऐसे कुछ सवाल अंदर से झकझोरने का काम करते हैं। जब समाज के सृजन में महिलाओं और पुरुषों का सामान योगदान है तो फिर क्यों महिलाओं को पुरुषों से कमतर आका जा रहा है? जीवन की धुरी में जब महिला और पुरुष समान भूमिका निभाते है। जीवन के रंगमंच पर किसी एक के बिना जिंदगी की गाड़ी नही चल सकती। फिर क्यों महिलाओं को पुरुषों से कमतर आंका जाता है? इसका जवाब स्वतंत्र देश को सोचना चाहिए। 

     आख़िर क्या वजह है कि आज़ादी के सात दशक बाद भी आज हमें बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ के नारे को बुलंद करना पड़ता है। यह नारा सियासी तौर पर भले अच्छा लगता हो, लेकिन इसके गूढ़ अर्थ लोकतंत्र की एक दर्दनाक स्थिति को बयां करते हैं। जब देश को स्वाधीन कराने में महिलाओं का योगदान अविस्मरणीय रहा है। कौन भूल सकता है रानी लक्ष्मीबाई को? किसे स्मरण नहीं होगा रानी दुर्गावती के अद्भुत शौर्य की गाथा। ऐसी अनेक महिलाएं जिन्होंने अपने-अपने तरीक़े से देश की स्वतंत्रता में योगदान दिया। फिर आज़ादी के बाद स्वतंत्रता को सहेज कर रखने में भला वो कैसे पिछड़ गयी? आज सबसे बड़ा सवाल यही है? चलिए इक्कीसवीं सदी के भारत की एक ऐसी तस्वीर की बात करते हैं। जहां लोकतंत्र के साये तले आधी आबादी से भेदभाव होता है। आज देश का एक बड़ा तबका बेटियों से ज्यादा बेटों को महत्व देता है। कन्या भ्रूणहत्या के मामले में देश प्रथम पंक्ति में खड़ा नजर आता है। एक स्वतंत्र देश मे तो ऐसी कुरीतियों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए था। फ़िर भी आज प्यारे से हिन्द देश में ऐसी कुरीतियां पुष्पित और पल्लवित हो रही। फिर ऐसे में समझ नहीं आता हमारा समाज गुमान किस स्वतंत्रता पर करता है। 
     वैसे ऐसा भी नहीं कि आज़ादी के पहले देश में महिलाएं पूर्णतः पुरुषों के समकक्ष ही खड़ी थी और ऐसा भी नहीं कि आज उनकी स्थिति दोयम दर्जे की हो गई है। ये सच है कि देश में महिलाओं का एक तबका ऐसा भी है जो देश संचालन में आज़ादी के बाद से अग्रणी हुआ है। राजनीति, सेना और प्रशासन ऐसा कोई क्षेत्र नही जहां महिलाओं ने अपनी ताकत का लोहा न मनवाया हो। लेकिन फिर भी आज महिलाएं समाज में शोषण का शिकार हो रही है। हर दिन महिलाओं के ऊपर अत्याचार हो रहे है। क्यों महिलाएं आज घर पर हो या चाहे घर से बाहर हो। वह दुर्व्यवहार का शिकार हो रही है। इसका जवाब तो हमें खोजना पड़ेगा न! महिलाओं को अपने सम्मान की लड़ाई घर से लड़नी शुरू करनी पड़ती है। यह भी अजीब क़िस्म का पेशोपेश है। आज भी अधिकतर घरों में जरूरी निर्णय पुरुषों के द्वारा ही लिए जाते है। महिलाओं को अपने संघर्ष की लड़ाई की शुरुआत अपने जन्म के पूर्व ही शुरू करनी पड़ती है। 
          जन्म से पूर्व ही देश में भ्रूणहत्या के नाम पर लड़कियों की बलि चढ़ा दी जाती है। अगर किसी तरह बच भी जाए तो लड़कियों को आए दिन अपने सपनों की कुर्बानी देनी होती है। आज भी घरों में लड़कियों को लड़को के बराबर शिक्षा नही दी जाती है। बचपन से ही उन्हें पराया धन कह कर अपमानित किया जाता है। शादी के बाद भी उन्हें उचित सम्मान नही मिल पाता है। ससुराल में भी महिलाओं को ये कह कर संबोधित किया जाता है कि वह दूसरे घर से आई हुई है। उसके अस्तित्व को ही नकार दिया जाता है और यह कुचक्र उम्र भर चलता रहता है। इसके अलावा आज भी समाज में महिलाओं को भोग-विलास की वस्तुओं से बढ़कर देखा ही नहीं जाता। 
         महिलाओं में कभी कभी धारणा यह बन जाती, कि जैसी व्यवस्था है उसी में जीना पड़ेगा, लेकिन इन सब के बीच महिलाओ को आज यह समझना होगा कि वे कोई वस्तु नही है बल्कि उनका अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व है। आधुनिक समाज मे परिवर्तन होना अच्छी बात है लेकिन उन परिवर्तन में महिलाओं की दशा क्या है उसे भी समझना होगा। आज भी चाहे खेल का मैदान हो या फिर विज्ञापन का बाजार हो। हर जगह महिलाओ को सिर्फ एक बाजारू गुड़िया की तरह ही पेश किया जाता है। खेल के मैदान पर भी महिलाओं के ग्लैमर से भरे डांस प्रस्तुत किए जा रहे है तो वही विज्ञापन जगत की बात करे तो वहां महिलाओं का अश्लील चित्र उकेरा जाता, जैसे मानो वह महिला नही कोई प्रदर्शन का सामान हो। एक तरफ समाज महिलाओं के प्रति सम्मान प्रस्तुत करता है। तो दूसरी तरफ महिलाओं के साथ छेड़खानी बढ़ती जाती है। 

         ऐसे में देश में यूं तो 70 के दशक में  ही महिला सशक्तिकरण और फेमिनिज्म की शुरुआत हो गई थी। लेकिन आज भी समाज महिलाओं के प्रति उदारवादी नही बन सका है। आज भी महिलाओं को अपने हक के लिए संघर्ष करना होता है। अपने हक के लिए अपनो से लड़ना होता है। आज भले ही हमारी न्यायपालिका ने लड़कियों को पैतृक संपत्ति में बराबरी का हक देने की बात कही हो। लेकिन कड़वा सच यही है कि अगर लड़कियां संपत्ति में अपना हक मांगने लगी तो फिर उनके लिए अपने मायके का प्यार मिलना भी दूभर हो जाएगा। ऐसे में जब तक हमारे समाज की जड़ो में भेदभाव का जहर घुला है तब तक महिलाओं के लिए आज़ादी की बात करना बेमानी ही लगता है। आज वक्त की मांग है, कि महिलाएं खुद आगे आएं और अपनी आजादी की लड़ाई स्वयं लड़ें। महिलाओं को खुद आत्मनिर्भर बनना होगा। जिससे वे अपनी जिदंगी के महत्वपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम हो सके। तभी आधी आबादी स्वतंत्रता का पूर्ण एहसास कर पाएगी।
सोनम लववंशी

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