भारत-मुकुट थे डाॅ. लोहिया

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कल (12 अक्तूबर) डाॅ. राममनोहर लोहिया की 51 वीं पुण्य-तिथि थी। 1967 में जब दिल्ली के विलिंगडन अस्पताल में वे बीमार थे, मैं वहां रोजाना जाया करता था। उन्हें देखने के लिए जयप्रकाश नारायण, इंदिरा गांधी, जाकिर हुसैन, मोरारजी देसाई और कौन-कौन नहीं आता था ? राजनारायणजी तो पास के एक कमरे में ही रहने लगे थे। मैं भी आखिरी तीन-चार दिन अस्पताल के सामने बने 216 और 218 नार्थ ऐवन्यू के श्री अर्जुनसिंह भदौरिया और जाॅर्ज फर्नाडींस के फ्लेट में रहा था। 7 गुरुद्वारा रकाबगंज से जब 57 वर्षीय डाॅ. लोहिया की शव-यात्रा निकली तो देश के सैकड़ों राजनीतिक और बौद्धिक लोग उनके पीछे-पीछे चल रहे थे लेकिन देखिए भारत की राजनीति का दुर्भाग्य कि आज की नई पीढ़ी उनका नाम तक नहीं जानती। 
मैं समझता हूं कि 20 वीं सदी के भारत में लोहिया से बढ़कर कोई राजनीतिक चिंतक नहीं हुआ। वे अपने आप को ‘कुजात गांधीवादी’ कहते थे और कांग्रेसियों को ‘मठी गांधीवादी’। उनके विचारों में इतनी शक्ति थी कि सिर्फ उनके दम पर उन्होंने जवाहरलाल नेहरु का दम फुला दिया था और 1967 में भारत के कई प्रांतों में गैर-कांग्रेसी सरकारें खड़ी कर दी थीं। मैंने 1961 या 62 में अपने इंदौर के क्रिश्चियन काॅलेज में उन्हें व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया था। प्राचार्य डाॅ. डेविड इतने नाराज हुए थे कि वे तीन दिन की छुट्टी पर चले गए थे। डाॅ. लोहिया जहां भी जाते, वे नौजवानों को अन्याय, असमानता, अंधविश्वास और संकीर्णता के खिलाफ लड़ना सिखाते थे। उनकी सप्तक्रांति की धारणा में जात तोड़ो, अंग्रेजी हटाओ, दाम बांधो, नर-नारी समता, विश्व-सरकार, भारत-पाक एका जैसे विचार होते थे। वे गांधीजी की अहिंसा और सिविल नाफरमानी (सविनय अवज्ञा) में विश्वास करते थे। उनके विचारों से दीनदयाल उपाध्याय और अटलबिहारी वाजपेयी भी गहरे में प्रभावित थे। दीनदयाल शोध संस्थान ने मेरे कहने पर ‘गांधी, लोहिया, दीनदयाल’ नामक पुस्तक भी प्रकाशित की थी। लोहिया के व्यक्तित्व और विचारों में इतनी प्रेरक-शक्ति थी कि मेरे-जैसे कई नौजवानों ने उस समय कई सत्याग्रहों का नेतृत्व किया और कई बार जेल काटी। वर्तमान राजनीतिक दल और नेता वैचारिक दृष्टि से अत्यंत गरीब हैं। न तो उनके पास कोई दृष्टि है न दिशा है। यदि सरकार लोहिया-साहित्य को छापकर करोड़ों की संख्या में नौजवानों को सस्ते में उपलब्ध करवाए तो देश का बड़ा कल्याण होगा। जहां तक भारत-रत्न का सवाल है, कुछ मित्रों का आग्रह है कि वह लोहियाजी को दिया जाए। जरुर दिया जाए लेकिन मैं मानता हूं कि उनका व्यक्तित्व और कृतित्व कई भारत-रत्नों से कहीं ऊंचा और बेहतर था। वे ऐसे भारत-मुुकुट थे, जिसमें कई भारत-रत्नों को सुशोभित किया जा सकता है।

Leave a Reply

%d bloggers like this: