लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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INDIAशैलेन्द्र चौहान

हाल ही में वर्ल्ड बैंक ने ये फ़ैसला किया है कि वह ‘विकासशील देश’ कैटेगरी का इस्तेमाल नहीं करेगा और देशों को प्रति व्यक्ति आय के आधार पर वर्गीकृत करेगा. भारत एक निम्न मध्य आय वाला देश हैं. इस वर्गीकरण के तहत प्रति व्यक्ति सालाना 1000 डॉलर से कम आमदनी वाले देश निम्न आय वाले देश होंगे. 1000 से 4000 डॉलर प्रति व्यक्ति सालाना आय वाले देश निम्न मध्य आय वाले देश होंगे. 4000 से 12000 डॉलर प्रति व्यक्ति सालाना आय वाले देश उच्च मध्य आय वाले देश होंगे. इससे ज़्यादा की आमदनी वाले देश उच्च आय वाले देश होंगे. यूरोप के ज़्यादातर देश उच्च आय वाले देश होंगे. एक जानकारी के मुताबिक़ सर्बिया की आमदनी सबसे कम होगी, वहां प्रति व्यक्ति सालाना आय 6000 डॉलर होगी. संयुक्त राष्ट्र ने प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से दुनिया भर के देशों की सूची जारी की है. इसमें भारत 150वें स्थान पर है. भारत में प्रति व्यक्ति सालाना आय 1586 डॉलर है. इससे ज़ाहिर होता है कि भारत का औसत व्यक्ति हर महीने 8,800 रुपए का सामान या सेवा उत्पादित करता है. इस संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजनका कहना है कि अगर भारत में ग़रीबी दूर करनी है तो प्रति व्यक्ति आय कम स कम 6000 और 7000 डॉलर के बीच होनी चाहिए. हालांकि ग़रीबी को पूरी तरह से दूर करना संभव नहीं है, राजन ने हाल ही में उसे कम करने के उपाय संकेतित किए. राजन का कहना है, “एक स्तर पर हम अभी भी 1500 डॉलर प्रति व्यक्ति औसत आय वाली अर्थव्यवस्था हैं. 1500 से 50000 डॉलर, जो सिंगापुर की प्रति व्यक्ति औसत आय है, तक पहुंचने के लिए काफ़ी कुछ किए जाने की ज़रूरत है. हम अभी भी एक ग़रीब अर्थव्यवस्था हैं और प्रत्येक आंख से आंसू पोंछने के लिए हमें कम से कम 6000 से 7000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय तक पहुंचना होगा. अगर इसका वितरण समुचित ढंग से हुआ तो हम ग़रीबी का सामना कर सकते हैं. इसके लिए कम से कम दो दशक तक काम करना होगा.” ऐसे में 1500 डॉलर से चार गुना छलांग लगाकर 6000 डॉलर तक पहुंचने के लिए भारत को क्या करना होगा? भारत में अब तक हर बहस के केंद्र में यही होता है कि सरकार क्या कर सकती है और उसे क्या करना चाहिए? असल में हमें कहीं ज़्यादा और बेहतर क़ानून की ज़रूरत है.

आर्थिक सुधार एकसमान गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) के जरिए हो सकते हैं. दूसरी बात ये है कि हमें सुशासन की ज़रूरत है, यानी भ्रष्टाचार मुक्त और प्रभावी प्रशासन की. संयुक्त राष्ट्र ने प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से दुनिया भर के देशों की सूची जारी की है. इसमें भारत 150वें स्थान पर है. भारत में प्रति व्यक्ति सालाना आय 1586 डॉलर है. इससे ज़ाहिर होता है कि भारत का औसत व्यक्ति हर महीने 8,800 रुपए का सामान या सेवा उत्पादित करता है. भारत से नीचे के पायदानों में यमन (1418 डॉलर), पाकिस्तान (1561 डॉलर), कीनिया (1358 डॉलर), बांग्लादेश (1,088 डॉलर), ज़िंबाब्वे (965 डॉलर), नेपाल (692 डॉलर), अफ़ग़ानिस्तान (688 डॉलर), कांगो (480 डॉलर) शामिल हैं. प्रति व्यक्ति सालाना 131 डॉलर की आमदनी के साथ सोमालिया सूची में सबसे अंतिम पायदान पर है. इस सूची में शीर्ष स्थानों पर यूरोप के छोटे देश शामिल हैं. इसमें मोनाको (187650 डॉलर), लिचटेंस्टाइन (157040 डॉलर) और लग्ज़मबर्ग (116560 डॉलर) काफ़ी अमीर देश हैं. जबकि सिंगापुर (55910 डॉलर) और संयुक्त राज्य अमरीका (54,306 डॉलर) उच्च आय वाले देशों में शामिल हैं. दक्षिण कोरिया (28,166 डॉलर) की कोशिश जापान (36298 डॉलर) को पकड़ने की है जबकि जर्मनी (47966 डॉलर) और ब्रिटेन (46,461 डॉलर) भी एक दूसरे से होड़ ले रहे हैं. ये आंकड़े अच्छे संकेतक तो हैं लेकिन हम केवल इस पर निर्भर नहीं हो सकते हैं. औसत आय की जगह सूची में मध्य में आने वाले किसी व्यक्ति की आमदनी भारत की तुलना में पाकिस्तान में ज़्यादा है. ऐसा होना बताता है कि पाकिस्तान में आय का वितरण भारत से बेहतर है और पाकिस्तान भारत की तुलना में आर्थिक तौर पर कम असमान लोगों का देश है. ज़ांबिया (1715 डॉलर), वियतनाम (2015 डॉलर), सूडान (2081 डॉलर) और भूटान (2569 डॉलर) जैसे देश भारत से आगे हैं. श्रीलंका (3635 डॉलर) में प्रति व्यक्ति आय भारत से दो गुनी है. इन आंकड़ों को देखने से हमें ये तो पता चलता ही है कि हम कहां हैं? इससे हम यह गणना कर सकते हैं कि भारत को विकसित देश बनाने के लिए हमें क्या करने की ज़रूरत है? विकसित देशों में वहां का समाज भारतीय समाज से अलग तरीक़े से काम करता है. उन देशों में व्यक्तियों के लिए सम्मान है, वे अजनबियों का अपमान नहीं करते हैं. उनके समाज में आपसी सद्भाव दिखता है. यह हमारे बेहतरीन शहरों में भी नहीं है. यानी सरकार से ज़्यादा समाज में सुधार की ज़रूरत है. इसी से देश की आमदनी बढ़ती है और प्रति व्यक्ति आय उच्च होती है. जब तक हमारा फोकस सरकार के बदलावों पर निर्भर रहेगा, हमारी रफ़्तार धीमी रहेगी. उनका मानना है कि हमें कहीं ज़्यादा और बेहतर क़ानून की ज़रूरत है. आर्थिक सुधार एक समान गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) के जरिए भी हो सकते हैं. लेकिन हमें सुशासन की ज़रूरत है, यानी भ्रष्टाचार मुक्त और प्रभावी प्रशासन देने की. यदि ये भी मान लिया कि जिस देश में भ्रष्टाचार और अक्षमता संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं, तो वहां दूसरी बात ही संभव हो जाए.” रघुराम राजन की बात में सचाई भी है। हमारे देश में लोगों का जीवन में एक ओर निम्न स्तर का है तो वहीँ उनमें सामुदायिक नागरिक सोच का अत्यन्त अभाव है। सरकारें न तो इस ओर ध्यान देती हैं न इसके लिए कुछ करने के लिए उत्सुक ही दिखाई देती हैं। उनके लिए सुरक्षा, समता और आर्थिक संपन्नता महज एक विकलांग सोच है। वे कानून व्यवस्था की ओर से भी उदासीन रहते हैं। रोजगार मुहैय्या करना उनकी प्राथमिकता नहीं है। तब हम किस विकास की बात करते हैं यह समझ के परे है।

One Response to “भारत को विकसित देश बनाने के लिए सामाजिक सुधार आवश्यक है”

  1. विनय शाह

    सोच और समाजिक व्यवहार ही तय करते है की कौन सा देश विकसित है, स्वच्छ भारत एक सही सार्थक कदम है, लेकिन वर्तमान राजनितिक व्यवस्था से परिवर्तन सम्भव नही, कड़ाई आवश्यक है.

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