लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन किसी की नहीं सुन रहे हैं। उनसे संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा और श्रीलंका ने अनुरोध किया है कि वे अपने संविधान और सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान करें। मालदीव के सबसे बड़े पड़ोसी और शुभेच्छु राष्ट्र भारत के अनुरोध को वे ठुकरा चुके हैं। मालदीव के सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वसम्मति से यह फैसला दिया था कि जिन 12 सांसदों को संसद से निकाल दिया गया था, उन्हें वापस लिया जाए और विरोधी दलों के नौ नेताओं को रिहा किया जाए। इनमें मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद और यामीन के अपने एक उपराष्ट्रपति भी हैं।
यह फैसला मानने की बजाय यामीन ने मालदीव में आपातकाल लगा दिया। अब उनका बर्ताव किसी निरंकुश तानाशाह जैसा हो गया है। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश अब्दुल्ला सईद और एक न्यायाधीश अली हमीद को गिरफ्तार कर लिया है। सईद के वकील ने आरोप लगाया है कि सईद से यह कहा गया है कि यदि वे फैसला वापस नहीं लेंगे तो उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएंगे। डर के मारे शेष तीन जजों ने वह फैसला रद्‌द कर दिया है। यदि सांसदों और नेताओं की वापसी हो जाती तो यामीन की गद्‌दी हिल जाती। चुनाव तो साल भर बाद है लेकिन, यामीन को अभी ही गद्‌दी छोड़नी पड़ती, क्योंकि 85 सदस्यीय संसद में इन 12 सांसदों के विरोध के कारण उनकी पार्टी अल्पमत में आ जाती और यदि उन पर महाभियोग चलता तो उनके हारने की नौबत आ जाती। पूर्व राष्ट्रपति नशीद को 2015 में 13 साल के लिए जेल में डाल दिया गया था। लेकिन, इलाज के बहाने नशीद लंदन चले गए और अब यामीन के खिलाफ जबर्दस्त अभियान छेड़े हुए हैं।

यदि नशीद और शेष आठ नेता मुक्त होकर आज मालदीव में राजनीति करें तो यामीन का जीना मुश्किल हो सकता है। नशीद ने यामीन-सरकार के भ्रष्टाचार के ऐसे आंकड़े पेश किए हैं, जिनका तथ्यपूर्ण खंडन अभी तक नहीं किया जा सका है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि नशीद का साथ दे रहे हैं 80 वर्षीय मौमून गय्यूम, जो कि यामीन के सौतेले भाई हैं और जिन्होंने 30 साल तक राष्ट्रपति के रुप में मालदीव पर राज किया है। पूर्व राष्ट्रपति नशीद और गय्यूम, दोनों के साथ दिल्ली में मेरी व्यक्तिगत भेंट और लंबी वार्ता हुई है। दोनों ही भारत के अभिन्न मित्र हैं। यामीन ने इतनी क्रूरता दिखाई है कि 80 वर्षीय गय्यूम को भी जेल में डाल दिया है।

मालदीव की संसद के अध्यक्ष और यामीन के एक मंत्री ने तंग आकर इस्तीफा दे दिया है। खुद यामीन इतने बौखलाए हुए हैं कि उन्होंने पहले दो दिन में अपने दो पुलिस मुखियाओं को बर्खास्त कर दिया। अब उन्होंने अपने तीन परम मित्र राष्ट्रों- चीन, पाकिस्तान और सऊदी अरब को अपने विशेष दूत भिजवाए हैं। भारत ने उनके विशेष दूत को दिल्ली आने की अनुमति नहीं दी है। इस समय चीन खुलकर यामीन का समर्थन कर रहा है। उसने घुमा-फिराकर भारत को धमकी भी दी है कि मालदीव में बाहरी हस्तक्षेप अनुचित होगा। मालदीव भारत का पड़ोसी है और दक्षेस का सदस्य है लेकिन, ऐसा लग रहा है कि वह चीन का प्रदेश-सा बनता जा रहा है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग तो 2014 में ही मालदीव जा चुके हैं। हमारे प्रधानमंत्री बाकी सारे पड़ोसी देशों में हो आए, पाकिस्तान भी, लेकिन अभी तक मालदीव नहीं जा सके।

मालदीव ने अभी-अभी चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौता कर लिया है। 777 पृष्ठ के इस समझौते को संसद ने सिर्फ 10 मिनिट में बिना बहस हरी झंडी दे दी। 85 सदस्यीय संसद में सिर्फ 30 वोटों से उसे पास कर दिया गया। बिल्कुल इसी तरह जुलाई 2015 में संसद ने एक ऐसा कानून आनन-फानन बना दिया, जिसके तहत कोई भी विदेशी सरकार या व्यक्ति मालदीव के द्वीपों को खरीद सकता था। ये दोनों सुविधाएं चीन के लिए की गई हैं ताकि वह वहां अपना सैनिक अड्‌डा बना सके। राष्ट्रपति शी की मालदीव-यात्रा के दौरान दोनों पक्षों ने 8 समझौते किए थे। सबसे बड़ा समझौता इब्राहिम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्‌डा बनाने का था। इस हवाई अड्‌डे को पहले एक भारतीय कंपनी बना रही थी। उसे रद्‌द करके यह चीन को दे दिया गया। माले और उससे 10 किमी दूर समुद्र में स्थित द्वीप हुलहुले के बीच चीन अब एक पुल बनाएगा। मालदीव चीन के रेशम महापथ की योजना में सक्रिय हिस्सा लेगा। इसके अलावा चीन ने वहां सड़कें और मकान बनाने की योजनाएं भी शुरू कर दी हैं। गत वर्ष मालदीव पहुंचने वाले पर्यटकों में 90 प्रतिशत चीनी थे। मालदीव आजकल इस्लामी कट्‌टरवाद का अड्‌डा भी बनता जा रहा है। उसके सैकड़ों युवक आजकल सीरिया में छापामारी कर रहे हैं। पिछले तीन-चार महीनों में मैं कई बार लिख चुका हूं कि मालदीव में भारत-विरोधी लहर उठने वाली है। पिछले माह जब हमारे विदेश मंत्रालय की नींद खुली तो उसने मालदीव के विदेश मंत्री मोहम्मद असीम को भारत बुलवाया। उन्होंने सरकार परस्त एक मालदीवी अखबार के इस कथन का खंडन किया कि ‘मालदीव का सबसे बड़ा दुश्मन भारत है और सबसे बड़ा दोस्त चीन है।’ उसने भारत के साथ भी मुक्त व्यापार समझौते की बात कही। मैंने लिखा था कि यह सिर्फ जबानी जमा-खर्च है।

अब भारत क्या करे? यदि अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण विरोधी नेताओं को यामीन रिहा कर दें, उनमें सर्वसम्मति करवाएं और चुनावों की घोषणा कर दें तो भारत को कुछ करने की जरूरत नहीं है लेकिन, यदि वे तानाशाही रवैया जारी रखेंगे तो मालदीव में अराजकता फैल सकती है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा। भारत ने यदि 1988 में सैन्य-हस्तक्षेप नहीं किया होता तो सिंगापुर और श्रीलंका से आए हुए हुड़दंगी मालदीव में राष्ट्रपति गय्यूम का तख्ता पलट देते। 1971 में श्रीलंका की प्रधानमंत्री सिरिमाओ भंडारनायक के अनुरोध पर भारत ने सेना भेजकर उन्हें बचाया था। नेपाल के राजा त्रिभुवन की भी 1950 में भारत ने रक्षा की थी। 1971 में शेख मुजीब के निमंत्रण पर भारत ने सेना भेजकर बांग्लादेश का निर्माण करवाया था। मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति नशीद तथा अन्य महत्वपूर्ण नेताओं ने इस संकट की घड़ी में भारत से मदद मांगी है। भारत को अपने लिए कुछ नहीं चाहिए लेकिन, इस चार लाख लोगों के देश में खून की नदियों को बहने से रोकना उसका कर्तव्य है।

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