लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार लखनऊ,उप्र

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1344681386_khudiram-bose-111 अगस्त पर विशेष:-

मृत्युंजय दीक्षित
क्रांतिकारी खुदीराम बोस भारत के ऐये महान सपूत थे जिन्होने सबसे कम आयु मंे भारत को आजादी दिलाने के लिए व अंग्रेजों के मन में भय उत्पन्न करने के कारण फांसी का फंदा चूम लिया। खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसम्बर 1889 को बंगाल के मिदनापुर जिले के एक गांव में बाबू त्रैलौक्यनाथ के घर पर हुआ था और माता कानाम लक्ष्मीप्रिया देवी था। बोस ने नौवी कक्षा के बाद से ही पढ़ाई छोड़ दी थी । उस समय अग्रेजो की ओर से भारतीयों पर घोर अत्याचार किये जा रहे थे जिससे आम भारतीयांे में गहरा आक्रोश था। रूकूल छोड़ने के बाद से ही बोस रिवोल्यूशनरी पार्टी मे शामिल हो गये थे । उन्होनें बंगाल विभाजन का भी विरोध किया और युगांतर के सदस्य बनकर आंदोलन में हिस्सा लिया। आज खुदीराम बोस का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है। उन दिनों अनेक अंग्रेज अधिकारी भाारतीयों से दुव्र्यवहार करते थे।ऐसा ही एक मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड मुजफ्फरपुर बिहार में तैनात था। वह छोटी छोटी बातों पर भारतीयों को दंड देता था। अतः क्रांतिकारियों ने उससे बदला लेने का निश्चय किया।
कोलकाता में प्रमुख क्रांतिकारियों की बैठक हुई। बैठक में किंग्सफोर्ड को यमलोक पहुचानेे की योजना पर गहन विचार विमर्श हुआ।बोस ने स्वयं को इस कार्य के लिए उपस्थित किया वह भी तब जब उनकी अवस्था बहुत कम थी। उनके साथ प्रफुल्ल कुमार चाकी को भी इस अभियान को पूरा करने का दायित्व सौंपा गया।
दोनों युवकों को एक बम ,तीन पिस्तौल व 40 कारतूस दिये गये ।दोनों ने मुजफ्फरपुर पहुंचकर एक धर्मशाला में डेरा जमा लिया। कुछ दिन तक किंग्सफोर्ड की गतिविधियों का अध्ययन किया। इससे उन्हें पता लग गया कि वह किस समय न्यायालय आता- जाता है पर उस समय उस साथ बड़ी सख्या में पुलिस बल तैनात रहता था। अतः उस समय उसे मारना कठिन था। अतः उन्होनें उसकी शेया दिनचर्या पर ध्यान दिया।किंग्सफोर्ड प्रतिदिन शाम को लाल रंग की बग्घी में क्लब जाता था। दोनेां ने उस समय ही उसको समाप्त करने का निश्चय किया।30 अप्रैल 19058 को दोनों क्लब के पास की झाढ़ियों में छिप गये। शराब और नाच गाना समाप्त करके लोग जाने लगे। अचानक एक लाल बग्घी क्लब से निकली। दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
परन्तु दुर्भाग्य कि उस दिन किंग्सफोर्ड क्लब आया ही नहीं था। उस बग्घी मंे केवल दो महिलाएं वापस घर जा रही थीं।क्रांतिकारियांे के हमले से वे यमलोक पहुंच गयीं।पुलिस ने चारों ओर जाल बिछा दिया। बग्धी के चालक ने दो युवकों की बात पुलिस को बतायी। खुदीराम और चाकी रातभर भागते रहे। वे किसी तरह सुरक्षित कोलकाता पहुंचना चाहते थे।
प्रफुल्ल किसी प्रकार से कोलकाता की रेल में बैठ गये। उस डिब्बे में एक पुलिस अधिकारी भी था। उसे शक हो गया। उसने प्रफुल्ल को पकड़ना चाहा लेकिन इसके पहले ही प्रफुल्ल ने स्वयंको अपनी पिस्तौल से समाप्त कर लिया।
इधर खुदीराम एक दुकान पर भोजन करने के लिए बैठ गये। वहां लोग रात वाली घटना की चर्चा कर रहे थे कि वहां दो महिलाएं मारी गयीं।यह सुनकर बोस के मुंह से निकल पड़ा – तो क्या किंग्सफोर्ड बच गया? यह सुनकर लोगों को संदेह हो गया और उन्होनें उसे पकड़कर पुलिस को सौंप दिया।मुकदमे में खुदीराम को फांसी की सजा सुनायी गयी।11 अगस्त, 1908 को हाथ में गीता लेकर खुदीराम फांसी पर झूल गये। उस सूय उनकी आयु 18 साल आठ महीने और 8 दिन थी।

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