संघर्ष के सितारे………….

cs9gtafusaarp0gहौंसलों में हो उड़ान तो कुछ भी नामुमकिन नहीं होता। जज्बा और जुनून जीत की ऐसी इबारत लिख देते हैं कि जीत के किस्से मिसाल बन जाते हैं। लाख कमियों और कठिनाइयों के बावजूद इंसान अपनी मंजिल के लिए प्रयासरत होता.. और खुद पर भरोसा भी रखता है। हौंसलों को अपने पंख बनाकर वह ऐसी उड़ान भरता है जिसकी ऊंचाई तक पहुँचना किसी के लिए भी आसान नहीं होता। चाहे कला के क्षेत्र की बात हो या फिर जीवन यापन के लिए नौकरी करने की। हौसला हर घड़ी इंसान को अपनी पहुँच से ऊपर तक मेहनत करने को इस कदर प्रोत्साहित करता है कि परिणाम नये आयाम स्थापित करने वाले बन जाते हैं।
ऐसा ही कुछ नजारा ब्राजील की राजधानी रियो डी जनेरियो में चल रहे पैरालंपिक खेलों में देखने को मिला। जब भारतीय खिलाड़ियों ने एक के बाद एक चार पदक भारत की झोली में डाल दिए। ये पदक इसलिए भी खास हैं क्योंकि ये तब आये जब रियो ओलंपिक में ज्यादा पदक जीतने की भारतीय उम्मीदों को झटका लगा। पैरालंपिक खिलाड़ियों ने खुद को उस कसौटी पर कसा, जहां उनकी प्रतियोगिता दूसरों से कम स्वयं से ज्यादा थी। उन्हें दुनिया को दिखाने से ज्यादा खुद से किए वायदे को पूरा करना था, जो उन्होंने स्वयं से किया था कि तमाम कमियों के बावजूद वो विश्व पटल पर खुद को साबित करेंगे। और पदक जीत तक उन्होंने दर्शा दिया कि वो कितने अलग हैं।
रियो पैरालंपिक 2016 में भारतीय खिलाड़ियों का इतिहास रचने का सिलसिला प्रतियोगिता के दूसरे दिन ही शुरू हो गया। जब ऊंची कूद प्रतियोगिता टी-42 में भारत ने स्वर्ण और कांस्य पदक पर कब्जा जमाया। तमिलनाडु के मरियप्पन थांगावेलू ने 1.89 मी. की कूद लगायी और स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाते हुए इतिहास रचा। मुरलीकांत पेटकर (स्वीमिंग 1972 हेजवर्ग) और देवेंद्र झाझरिया (भाला फेंक, एथेंस 2004) के बाद मरियप्पन स्वर्ण जीतने वाले तीसरे भारतीय बने। जबकि उत्तरप्रदेश के वरूण भाटी ने 1.86 मी. की जंप लगाते हुए कांस्य पदक अपने नाम किया। वहीं, हरियाणा का दीपा मलिक ने शॉट पुट स्पर्धा में अपने छह प्रयासों में 4.61 मीटर की सर्वश्रेष्ठ थ्रो के साथ रजत पदक जीता।
रियो पैरालंपिक में भारत के पदकों की संख्या में इजाफा करते हुए देवेंद्र झाझरिया ने भाला फेंक प्रतिस्पर्धा में वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाते हुए गोल्ड मेडल जीता है। देवेंद्र ने अपना ही रिकॉर्ड तोड़ते हुए 63.97 मीटर भाला फेंककर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। इससे पहले 2004 में हुए एथेंस पैरालंपिक में भी देवेंद्र स्वर्ण पदक जीत चुके हैं, तब 62.15 मीटर जेवलिन फेंका था। इस तरह रियो पैरालंपिक में भारत के खाते में दो गोल्ड, एक सिल्वर और एक ब्रॉन्ज मेडल के साथ कुल चार पदक दर्ज हैं।
पैरालंपिक में पदक आने के बाद आज देश और देशवासियों को अपने इन खिलाड़ियों पर गर्व हो रहा है.. मगर इन पदकों के लिए खिलाड़ियों की मेहनत और लगन से लोग अब भी अपरिचित हैं। पदक जीतने पर खुशी और नहीं जीतने पर निराशा के बीच खिलाड़ी सदैव अपना बेस्ट देते हैं इसका ध्यान कोई नहीं रखता। मरियप्पन थंगावेलु गरीबी और शारीरिक अक्षमता से लड़ते हुए इस मुकाम तक पहुंचे हैं। पांच वर्ष की उम्र में सड़क हादसे में पैर गंवाने वाले मरियप्पन ने कभी भी शारीरिक कमियों को अपने जज्बे का आड़े नहीं आने दिया। वहीं, उसकी मां आज भी सब्जियां बेचती हैं जिससे उनके परिवार का गुजारा होता है। ऐसे में आर्थिक और सामाजिक लड़ाइयां लड़ते हुए मरियप्पन ने खुद पर भरोसा रखा और आज देश का मान बढ़ाने वाली ऐतिहासिकता का प्रमाण बने।
वहीं, उत्तर प्रदेश के रहने वाले वरुण भाटी का एक पैर पोलियो की वजह से खराब हो गया था। मगर वो रूके नहीं.. दिव्यांगता को अपनी लाचारी नहीं बनने दी.. बल्कि भाटी ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के बदौलत ‘बाधाओं के पार’ अपने सपने को साकार किया। आज वरूण भाटी ओलंपिक में कांस्य पदक विजेता हैं.. जिस पर परिजनों के साथ देशवासियों को भी गर्व है।
ऐसा ही कुछ 36 साल की उम्र में खेलना शुरू करने वाली दो बच्चों की मां दीपा मलिक के साथ भी घटित है। दीपा के कमर से नीचे का हिस्सा लकवा से ग्रस्त है। 17 साल पहले रीढ में ट्यूमर के कारण उनके 31 ऑपरेशन हुए थे और उनकी कमर और पांव के बीच 183 टांके लगे थे, दीपा का चलना असंभव हो गया था। मगर उसी दीपा ने रियो पैरालंपिक खेलों में रजत पदक जीतकर इतिहास रच दिया। दीपा ने व्हीलचेयर पर बैठकर शॉटपुट एफ-53 स्पर्धा में चांदी जीती। इतना ही नहीं, पैरालंपिक में पदक जीतने वाली देश की पहली भारतीय महिला खिलाड़ी भी बन गईं। 45 वर्षीय दीपा ने साबित किया कि हौसला है तो हुनर को परवाज मिल ही जाता है।
कहते हैं कि कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो मंजिलें झुककर सलाम करती हैं.. जो पैरालंपिक प्रतियोगिता में दिखा भी। देश और दुनिया के इन दिव्यांग (शारीरिक अक्षम) इंसानों ने भी अपने जज्बे से अपनी मंजिल को अपने सामने झुका दिया है। बहरहाल, जिस तरह मुफलिसी और मायूसी के अंधेरों से निकलकर इन दिव्यांग खिलाड़ियों ने अपने हौसलों से खुद का आसमान तैयार किया है। जिस तरह इन खिलाड़ियों ने अपनी गरीबी और अक्षमताओं को पीछे ढ़केल दिया, वह आने वाली पीढ़ी को अपने जज्बों और हौसलों पर भरोसा करने का पाठ साबित होगा। अब वह दिन दूर नहीं जब आर्थिक और शारीरिक रूप से कमजोर बच्चे समझदार होते ही स्टेडियमों का रुख खुद कर लिया करेंगे। उनके लिए बस एक ही बात मायने रखेगी कि हौसला और हिम्मत हो तो दिव्यांगता तरक्की में आड़े नहीं आती। शारीरिक अक्षम पर हुनरमंद खिलाड़ियों ने साबित कर दिया है कि आगे बढ़ने का जोश और जुनून अगर दिल में है.. तो जज्बा हर कामयाबी को आपकी झोली में डाल देगा।

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