संस्कारों से निर्मित भारतीय संस्कृति

वेद के रूप में ईश्वर ने मानव को एक संविधान देकर सुव्यवस्था प्रदान की । जबकि उपनिषदों ने मानव मन में उभरने वाले अनेकों गम्भीर प्रश्नों का उत्तर देकर उसकी शंकाओं का समाधान किया । अब बारी थी एक सुव्यवस्थित समाज को आगे बढ़ाने की । जिसके लिए हमारे ऋषियों ने 16 संस्कारों का विधान किया। वास्तव में यह 16 संस्कार देवत्वीकरण व समाजीकरण के श्रेष्ठ सांचे में मानव को ढालकर उसे सुसंस्कृत बनाने की एक प्रक्रिया का नाम है ।
देवत्वीकरण और समाजीकरण की पवित्रतम प्रक्रिया का पाठ पढ़ाना केवल भारत की मौलिक चेतना का एक अंग है । इससे अलग किसी अन्य तथाकथित संस्कृति ने न तो कभी यह प्रयास किया और न कभी यह दावा किया कि वह भी संस्कार आधारित कोई सुव्यवस्था संसार को दे सकती है।
इन 16 संस्कारों के माध्यम से शरीर , मन , बुद्धि और आत्मा के सुसंस्कृत हो जाने से धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है और श्रेष्ठ संतान के निर्माण के माध्यम से समाज व राष्ट्र का भी उत्तमता से निर्माण होता है । आज संपूर्ण संसार केवल इसीलिए दुखी है कि उसने भारत की इस संस्कार प्रणाली को अपनाने से बहुत दूरी बना ली है।
इस श्रेष्ठ प्रक्रिया को पूर्ण करने के लिए हमारे ऋषि पूर्वजों ने जिन 16 संस्कारों का विधान किया है , उनके नाम इस प्रकार हैं :– 1. गर्भाधान, 2. पुंसवन, 3. सीमन्तोन्नयन, 4. जातकर्म, 5. नामकरण, 6. निष्क्रमण, 7. अन्नप्राशन, 8. चूड़ाकर्म, 9. कर्णवेध, 10. उपनयन, 11. वेदारम्भ, 12. समावर्तन, 13. विवाह, 14. वानप्रस्थ, 15. संन्यास एवं 16. अन्त्येष्टि।
संस्कार एक बीज है , कर्म वृक्ष उसका विस्तार है । यह कर्म वृक्ष किसी प्रकार के प्रदूषण से ग्रस्त ना हो शरीर , मन , आत्मा आदि शुद्ध और पवित्र हों , इसके लिए बीज ही काम करता है । जैसा बीज होता है , वैसा वृक्ष का होना निश्चित है । यही कारण रहा कि हमारे ऋषियों ने बीज को शुद्ध और पवित्र रखने के लिए 16 संस्कारों का विधान किया । इस प्रकार 16 संस्कारों का अर्थ है जीवन निर्माण की एक वृहद योजना का निर्माण करना । एक अच्छी फसल लेने के लिए आज के कृषि वैज्ञानिकों को भी हम देखते हैं कि वह भी बीज को परिष्कृत और शोधित करते रहते हैं । उनका यह प्रयास बीज के भीतर वे उत्तम संस्कार डालना है जिससे आने वाली फसल अच्छी हो सके । बस , यही बात मनुष्य के बारे में लागू होती है।
इन्हीं संस्कारों से शोभामय सम्यक कृति अर्थात संस्कृति का निर्माण होता है । इसी सम्यक कृति से भारत का अतीत शोभामय बना । इसी से वर्तमान शोभामय बन सकता है और इसी को अपनाकर भविष्य उज्ज्वल हो सकता है । शोभामय सम्यक कृति के माध्यम से ही कभी भारत ने विश्वगुरु का सम्मानजनक स्थान प्राप्त किया था । यह उस काल की बात है जब शोभामय सम्यक कृति के धनी भारत की ओर संपूर्ण भूमण्डल के देश बहुत ही सम्मानपूर्ण दृष्टि से देखते थे और यह जानते थे कि यदि ज्ञान क्षुधा का निवारण हो सकता है तो वह केवल भारत की पवित्र भूमि और वेदवाणी के माध्यम से ही हो सकता है।
इसी संस्कृति से भारत के शोभामय अतीत का निर्माण हुआ । ऐसी सोच और चिंतन ने ही भारत को विश्व गुरु बनाया । आज यद्यपि 16 संस्कारों में से नामकरण संस्कार , विवाह संस्कार और अंतिम संस्कार ये 2 – 3 संस्कार ही रह गए हैं , परंतु इसके उपरांत भी भारत संस्कारों के बल पर ही आगे बढ़ रहा है । कोई एक ऐसी अदृश्य शक्ति संस्कार रूप में अथवा बीज रूप में कहीं छुपी हुई है जो भारत को आगे बढ़ा रही है। यज्ञ के अवसर पर हम सत्य , यश और श्री को अपना ओढ़ना और बिछौना बनाने की मांग परमपिता परमेश्वर से करते हैं। यही वह संस्कार है जो हमें सुन्दर से सुन्दर बना रहा है।
आठ चक्र और नौ द्वारों के मानव शरीर के इस पुतले के भीतर वह आत्मा रथी के रूप में रहता है जो ईश्वर का शाश्वत साथी है , मित्र है । उस रथी की सारथि हमारी बुद्धि है । जबकि मन उसकी लगाम है। इंद्रियों उसके घोड़े हैं । इस बात को हमारे ऋषियों ने बड़ी गंभीरता से समझा । रथी और सारथि यह सभी रथ पर सवार होते हैं । इस प्रकार हमारे शरीर को विद्वानों ने एक रथ की संज्ञा दी । भारत के लोगों में इस शरीर को एक रथ या गाड़ी मानने का संस्कार आज भी देखा जाता है । जब लोग अक्सर यह कहते हैं कि जैसे – तैसे गाड़ी को हांक रहे हैं या जैसे – तैसे गाड़ी को धकेल रहे हैं तो उसका अभिप्राय यही होता है कि वह इस शरीर को एक रथ या गाड़ी मानते हैं । जिसे वह चला रहे हैं । जब कोई व्यक्ति अपने शरीर को रथ या गाड़ी कहता है तो समझना चाहिए कि उसके भीतर हिंदुत्व की चेतना का स्वर बोल रहा है।
यह रथ कहीं व्यर्थ की बातों में टूट-फूट न जाए , इसलिए इसका कुशल संचालन और सदुपयोग होना बहुत आवश्यक है । जैसे एक रथ को गंतव्य तक पहुंचने में सहायक बनाने के लिए उसका स्वामी उसकी हर प्रकार से देखभाल करता है , उसी प्रकार हमें भी अपने शरीर रूपी रथ की उचित देखभाल करते रहना चाहिए । उचित देखभाल की इस प्रक्रिया का नाम ही संस्कृति है । जब व्यक्ति शोभामय सम्यक कृति के प्रति संकल्पित होता है और अपने प्रत्येक कार्य के परिणाम पर ध्यान देकर उसका संपादन करने लगता है , तब समझना चाहिए कि वह एक सुसंस्कृत मानव बन चुका है । जो अपना ही शोधन और परिष्कार कर रहा है । वह अब देवत्वीकरण और समाजीकरण की प्रक्रिया के अर्थ को समझ गया है और उसमें अपने आप को एक सहायक अंग के रूप में स्थापित करने के लिए संकल्पित हो उठा है।
डॉक्टर त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय लिखते हैं कि वर्तमान मानव का विकास तो पर्याप्त हुआ है। परन्तु वह विकास सर्वांगणीय नहीं है। भौतिक विकास की दर ने आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक विकास को बहुत पीछे छोड़ दिया है। विज्ञान की एक लय प्रगति सतत जारी है पर ज्ञान का विकास रुक गया है। ज्ञान विज्ञान से सूक्ष्म है। मानव अस्तित्व में सप्त ऋषि वाक्, प्राण, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, तथा इससे सम्बंधित व्यवस्था तानना तथा इसका विकास कर मानव सशक्त करना आधिदैविक ज्ञान है। भौतिक संसाधनों को जानना , पहचानना तथा उनका सुख हेतु प्रयोग करना विज्ञान है। इस विज्ञान का मानवीय सम्बन्धों के विकास क्षेत्र में उपयोग करना आधिभौतिक ज्ञान है। आधिदैविक पार क्षेत्र मानव तप द्वारा ऋद्धि, सिद्धि, तितिक्षा द्वारा ऋत, शृत, धृत, भृग, ऋण सिद्ध कर मुमुक्षुत्व आत्म क्षेत्र कारण संकल्प शरीरों को मुमुक्षुत्व सिद्धि पा ब्रह्मलय अपने कार्यों में उतारता है। भारतीय संस्कृति को यह मानव अस्तित्व पहचान अभीष्ट है।
आजकल जो लोग एक सुसंस्कृत और सुसभ्य समाज के सृजन की बात करते हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि भारतीय संदर्भों में एक सुसंस्कृत और सुसभ्य समाज के सृजन के लिए कितनी बड़ी साधना की आवश्यकता है ? सप्त ऋषि की साधना तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही ज्ञान – विज्ञान की साधना भी बहुत महत्वपूर्ण है । यदि इस साधना में कहीं भी थोड़ा सा ठहराव या भटकाव आ गया तो सारा कुछ उलट-पुलट हो सकता है । जैसा कि हम आज के भौतिक विज्ञान की उन्नति में देख रहे हैं कि विश्व की सज्जन शक्ति निरंतर तीसरे विश्वयुद्ध को लेकर शंकित – आशंकित ही नहीं है अपितु वह भयभीत भी है ।सज्जन शक्ति के इस भय का कारण केवल यह है कि आज का ज्ञान – विज्ञान कुछ ऐसे लोगों के हाथों में पड़ गया है जो उसकी उपयोगिता को नहीं समझते हैं। सचमुच बंदर के हाथों बटेर आ गई है।
ज्ञान – विज्ञान की सात्विकता की उपासना करना भारत का मौलिक संस्कार है । प्राचीन काल से ही भारत का चिंतन रहा है कि ज्ञान – विज्ञान ऐसा हो जो मानवता के लिए उपयोगी हो । उसमें ऐसा चिंतन समाविष्ट हो जो न केवल मेरे लिए अपितु समस्त संसार के प्रत्येक प्राणी के लिए भी उसे उपयोगी बना दे । शत्रु का अर्थ यह नहीं है कि मुझसे अलग जो कोई भी मानव इस संसार में है या कोई भी प्राणी इस संसार में है , वही मेरा शत्रु है । शत्रु वह है जो मानवता और प्राणीमात्र के हितों के विपरीत कार्य करता है । ईश्वर की सृष्टि के नियमों का उल्लंघन करने के लिए लोगों को या लोगों के किसी समूह या सम्प्रदाय को प्रेरित करता है। उस शत्रु का विनाश करने के लिए भी साधना की आवश्यकता है और उसके विनाश के लिए बनाए गए अस्त्र – शस्त्रों के रखरखाव के लिए भी साधना की आवश्यकता है ।
आज के विश्व ने शत्रु की परिभाषा पलट दी है । आज हम देख रहे हैं कि जो भी कोई व्यक्ति मेरे काम को पूरा नहीं होने देता है मैं उसी को अपना शत्रु मान लेता हूं । मैं भूल जाता हूं कि उस व्यक्ति को भी अपने अधिकारों की रक्षा करने का पूरा – पूरा अधिकार है । यदि मैं उसके अधिकारों का अतिक्रमण कर किसी अपनी इच्छा की पूर्ति करना चाहता हूं तो उसे भी अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करने का अधिकार है ।इस सत्य की अनदेखी करके हमने पूरे संसार को ही अपना शत्रु समझ लिया है । इसी कारण आज के भौतिक विज्ञान की चकाचौंध में चुंधियाया हुआ मनुष्य मार्ग से भटक गया है । जबकि भारत के पास आज भी वह आत्मशक्ति है , जिसके आधार पर वह अपने सात्विक ज्ञान – विज्ञान की साधना में रत है।
भारत इसलिए महान रहा है कि वह अपने आधिभौतिक , अधिदैविक और आध्यात्मिक बल या ज्ञान – विज्ञान का सदुपयोग करते हुए उनका उचित समन्वय उपरोक्त उल्लिखित सप्तर्षियों के साथ पूर्ण उत्तमता के साथ समन्वित करने की योजना पर काम करना जानता है। भारत आज भी विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता केवल इसीलिए रखता है कि वह समस्त संसार को अधिभौतिक ,अधिदैविक और आध्यात्मिक क्षेत्र में नेतृत्व देते हुए सप्तर्षियों के साथ उसका समन्वय करने की क्षमता रखता है । उसकी चेतना का मूल स्वर आज योग को वैश्विक मान्यता दिलाने में झंकृत होता हुआ दिखाई दे रहा है। हमें आशा करनी चाहिए कि कल भारत शोभामय सम्यक कृति के सृजन के माध्यम से समस्त संसार को संस्कृति के निर्माण का पाठ पढ़ायेगा। यद्यपि संसार को अपनी उत्कृष्टता या श्रेष्ठता की प्राप्ति के लिए भारत के ज्ञान -विज्ञान का लाभ उठाने के दृष्टिकोण से उसका शिष्य तो बनना ही पड़ेगा।
संस्कारों को मुख्य रुप से गृह्यसूत्रों में ही स्थान दिया गया है । संस्कार हमारे भीतर छुपी हुई एक वैसी ही चेतना है जैसे लकड़ी के भीतर आग छुपी होती है । जैसे लकड़ी की आग को प्रकट करने के लिए उसे जलती हुई आग के संपर्क में लाना अनिवार्य होता है वैसे ही हमारे भीतर छुपी हुई संस्कारों की अग्नि को बाहर प्रकट करने के लिए हमें भी इसे अग्नि संपन्न अर्थात तपे – तपाए साधक किसी महात्मा या गुरु का सानिध्य प्राप्त कराना अनिवार्य होता है । इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हमारे यहां पर शिक्षा ग्रहण करने का विधान किया गया था । यही कारण था कि प्राचीन काल में विद्यार्थी जब गुरु के आश्रम में प्रविष्ट होता था तो उस समय वह अपने हाथों में समिधाएं लेकर जाता था ।
शिक्षा के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए महर्षि दयानन्द कहते हैं कि वही शिक्षा है, जिससे विद्या, सभ्यता, धर्मात्मा, जितेन्द्रियतादि की वृद्धि हो और अविद्यादि दोष छूटें। महर्षि विद्या को यथार्थ का दर्शन कराने वाली और भ्रम से रहित मानते हैं। अथर्ववेद में ब्रह्मचारी को दो समिधाओं वाला बताया गया है। प्रथम समिधा ‘भोग’ की प्रतीक है और द्वितीय समिधा ‘ज्ञान’ की। ज्ञान और भोग इन दोनों समिधाओं के द्वारा अन्तरिक्ष स्थानीय हृदय की सन्तुष्टि और पूर्णता प्राप्त करना ब्रह्मचारी का उद्देश्य है। कहने का आशय यह है कि केवल भोग या केवल ज्ञान से मनुष्य जीवन सफल नहीं हो सकता। इसलिये भारतीय वैदिक शिक्षा जीवन के दोनों रूपों में सामञ्जस्य स्थापित करके मनुष्य को पूर्णता तक पहुँचाती है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती के अनुसार जब बालक और बालिका आठ वर्ष के हों, तभी उन्हें अध्ययन करने हेतु पाठशाला में भेज देना चाहिये। इस विषय में महर्षि का स्पष्ट अभिमत है कि बालिकाओं और बालकों को पृथक्-पृथक् विद्यालय में पढ़ाना चाहिये अर्थात् महर्षि की दृष्टि में सहशिक्षा उचित नहीं है। वे यहाँ तक कहते हैं कि कन्याओं की पाठशाला में पाँच वर्ष का लड़का और पुरुषों की पाठशाला में पाँच वर्ष की लड़की का प्रवेश पूर्ण वर्जित होना चाहिये। जब तक बालक और बालिका शिक्षा प्राप्त करें, तब तक एक-दूसरे का दर्शन, स्पर्शन, एकान्त सेवन, भाषण, विषय कथा, परस्पर क्रीडा, विषय का ध्यान और सङ्ग- इन आठ प्रकार के मैथुनों से अलग रहना चाहिये। इसलिये वे सुरक्षात्मक उपाय के रूप में बालक और बालिकाओं की पाठशाला कम से कम पाँच किलोमीटर दूर रखना आवश्यक समझते हैं। इस प्रकार महर्षि ने बालक और बालिकाओं को भिन्न लिङ्ग के व्यक्ति के सम्पर्क में आने का पूर्ण निषेध किया है।
लेकिन प्राचीन(वैदिक) काल में सहशिक्षा पूर्णतया निषिद्ध थी, को पूर्णरूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता है। भवभूति के नाटक ‘मालती माधव’ में नारी शिष्या कामन्दकी पुरुष शिष्य भूरिवसु एवं देवराट् के साथ एक ही गुरु से अध्ययन करती थी।
कुछ विद्वानों का मानना है कि विद्यार्थी के हाथ में गुरुकुल में प्रवेश करते समय तीन समिधाएं होती थीं । तीन समिधाओं को ले जाने का अभिप्राय यही था कि जैसे इन समिधाओं के भीतर अग्नि छुपी हुई है वैसे ही मेरे भीतर की अधिदैविक , अधिभौतिक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार की अग्नि को आप प्रज्ज्वलित कर दो । अधिभौतिक , अधिदैविक और आध्यात्मिक अग्नि का अभिप्राय ज्ञान – विज्ञान की प्राप्ति करने से था। जिससे आत्मा का परिष्कार होता था । इस प्रकार मानव निर्माण करना हमारी शिक्षा का उद्देश्य हुआ करता था । मानव निर्माण का अभिप्राय उसके बालमन के भीतर संस्कारों का आधान करना ही है । साथ ही उसके भीतर की सोई हुई अग्नि को प्रज्ज्वलित कर देना है । उसको शिक्षासंपन्न , गुण संपन्न कर सुसंस्कृत बना देना है । मनु और याज्ञवल्क्य के अनुसार संस्कारों से द्विजों के गर्भ और बीज के दोषादि की शुद्धि होती है। जैसे शुद्ध गर्भ और बीज अच्छी संतति का कारण बनता है , वैसे ही सुसंस्कारों से मानव समाज उन्नत बनता है । कुमारिल भट्ट ( ई. आठवीं सदी ) ने ‘तन्त्रवार्तिक ‘ ग्रंथ में इससे कुछ भिन्न विचार प्रकट किए हैं। उनके अनुसार मनुष्य दो प्रकार से योग्य बनता है – पूर्व- कर्म के दोषों को दूर करने से और नए गुणों के उत्पादन से।
 वैखानस स्मृति सूत्र ( 200 से 500 ई.) में सबसे पहले शरीर संबंधी संस्कारों और यज्ञों में स्पष्ट अन्तर दिखाई देता है। विश्व की सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद के कई  सूक्तों में विवाह, गर्भाधान और अंत्येष्टि से संबंधित कुछ धार्मिक कृत्यों का वर्णन मिलता है। यजुर्वेद में श्रौत यज्ञों का उल्लेख है। अथर्ववेद में विवाह, अंत्येष्टि और गर्भाधान संस्कारों का पहले से अधिक विस्तृत वर्णन मिलता है।  इसके अतिरिक्त हम देखते हैं कि हमारे यहाँ गोपथ ब्राह्मण और शतपथ ब्राह्मण में उपनयन, गोदान संस्कारों के धार्मिक कृत्यों का उल्लेख मिलता है। तैत्तिरीय उपनिषद में शिक्षा समाप्ति पर आचार्य के दीक्षान्त समारोह के माध्यम से अपने विद्यार्थियों को शिक्षा देने का उल्लेख मिलता है।
इन सबसे भारतीय संस्कृति की महत्ता का बोध होता है और हमें पता चलता है कि भारत किस प्रकार सुसंस्कारों और सुसंस्कृत मानव समाज के प्रति दृढ़ निष्ठा रखने वाला देश रहा है ? विद्वानों की मान्यता है कि गृह्यसूत्रों में संस्कारों के वर्णन में सबसे पहले विवाह संस्कार को ही स्थान दिया गया है । इसके पश्चात गर्भाधान , पुंसवन , सीमंतोन्नयन , जातकर्म , नामकरण , निष्क्रमण , अन्नप्राशन , चूड़ाकर्म , उपनयन और समावर्तन संस्कारों को समाविष्ट किया गया है।
संस्कारों की मर्यादा में जीवन को बांधने का अर्थ यह नहीं है कि जीवन को हंसी – मजाक और मनोरंजन से हीन कर दिया जाए । ना ही इसका अभिप्राय यह है कि हंसी – मजाक और मनोरंजन को अश्लीलता का प्रतीक माना जाए । इसके विपरीत इसका अभिप्राय है कि जीवन में हंसी – मजाक और मनोरंजन को भरपूर स्थान देकर भी उसे फूहड़पन और अशोभनीयता से बचाया जाए । हमारी किसी भी बात में फूहड़ता न हो । ऐसा कोई वाक्य हमारी वाणी से ना निकले जो अश्लीलता को प्रकट करने वाला हो या जिससे समाज की मान – मर्यादा भंग होती हो । यह हमारा सामाजिक और राष्ट्रीय चरित्र है । इस सामाजिक और राष्ट्रीय चरित्र ने हमें युग – युगों तक अपना नेतृत्व प्रदान किया है । अपने इसी सामाजिक और राष्ट्रीय चरित्र के कारण हम विश्व में बौद्धिक क्षेत्र में अग्रगण्य रहे। यही कारण है कि भारत की आर्य भाषा संस्कृत में एक भी ऐसा शब्द नहीं है जिसे गाली कहा जा सके और यही कारण है कि भारत के लोग कभी भी आपस में गाली देकर बात नहीं किया करते थे । आज यदि ऐसा कहीं दिखाई देता है तो वह हम पर बाहरी सभ्यताओं के आक्रमण का प्रभाव है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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