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    संवेदनहीन बनता जा रहा भारतीय समाज

    आख़िर देश में बलात्कार की घटनाएं कब तक घटित होती रहेगी? कब तक मासूम बेटियां हैवानियत का शिकार होती रहेगी? ऐसे अनगिनत सवाल हर क्षण दिलों-दिमाग़ पर छाए रहते हैं। जिस तरह से देश में यौन शोषण की घटनाएं घटित हो रही है, उन्हें देख कर तो यही लग रहा है, आज भी समाज महिलाओं के प्रति असंवेदनशील बना हुआ है। दुःखद स्थिति तो तब और अधिक बन जाती जब न्याय दिलाने के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकी जाने लगती है। आज भी महिलाओं को केवल भोग विलास की वस्तु ही समझा जा रहा है, यह भारत जैसे देश के लिए दुर्भाग्य की बात है। सदियां बदल गई। हमारे समाज ने, हमारी संस्कृति ने आधुनिकता की चादर ओढ़ ली है लेकिन आज भी समाज में महिलाओं को उचित सम्मान नही मिल पा रहा है। पितृसत्तात्मक और रूढ़िवादी समाज मे महिलाओं को आज भी पुरुषों से कमतर ही आंका जाता है। सच्चाई तो यहां तक है कि महिलाओं के प्रति बढ़ रही हिंसा को न ही समाज की नजरों में गलत समझा जा रहा है और न ही कानूनी ढंग से कोई कठोर दंड दिया जाता है। यही वजह है कि बलात्कारियों के हौसले बुलंद हो गए है। हर दिन देश मे न जाने कितनी मासूम जिंदगियों को अपनी हवस का शिकार बनाकर बे-मौत मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। वह भी न्यायप्रिय और समतामूलक संवैधानिक देश में! क्या वजह है कि सरकार और समाज इस अक्षम्य अपराध के प्रति सजग नहीं हो पा रही है? क्यों सरकार मौनी बाबा बनकर तमाशा देख रही है? कब तक इस देश की मासूम बेटियों को अपनी आबरू लुटानी होगी? कब तक उन्हें यूं बेमौत मार दिया जाएगा? ये कलंक देश को कब तक शर्मसार करता रहेगा? कब देश और समाज की बेटियों में अपनी बेटी की परछाईं समाज और देश के लोगों को दिखाई देनी शुरू होगी? सवाल बहुत है लेकिन इन सवालों के जवाब देने वाला कोई नही है। जब भी कोई बेटी दरिंदगी का शिकार होती है, उसकी आवाज को अनसुना कर दिया जाता है। लेकिन वही बेटी जब अपनी ज़िंदगी की जंग हार जाती है। तब शुरू होता है समाज और सियासत का नंगा नाच। चारो ओर से न्याय के लिए शोर शुरू हो जाता है। क्या इस बेरहम समाज में न्याय पाने के लिए मौत की बलि चढ़ना ही जरूरी है? हमारे समाज मे तो न्याय को भी धर्म और संस्कृति की तराजू पर तौल कर देखा जा रहा है। अपराध और अपराधी का महिमा मंडन भी जाति के आधार पर किया जाने लगा है। राजनीति के रणबांकुरे अपराध को भी धर्म का चोंगा पहनाने में देर नहीं लगाते। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल क्या बलात्कार जैसे दंडनीय अपराध को भी राजनीतिक दृष्टि से देखना सही है?

    क्या दरिंदगी का शिकार हुई महिला को धर्म और जाति के आधार पर बांट देने से अपराध की परिभाषा बदल जाएगी या फिर हैवानियत का शिकार हुई महिला का दर्द कम हो जाएगा? समाज मे उसे वही सम्मान वापस मिल जाएगा जिसकी वह हकदार है? अपराध सिर्फ अपराध होता है उसे अपराध की नजर से ही देखा जाना चाहिए लेकिन अफसोस कि हमारे ही समाज मे जब कोई रसूखदार व्यक्ति अपराध करता है तो पूरा प्रशासन उसे बचाने में लग जाता है। पितृसत्तात्मक समाज मे महिला और पुरुषों के लिए अलग अलग कानून बना दिये जाते है और बिना एक पल भी देर किए महिलाओं को गलत साबित कर दिया जाता है। क्या सभ्य समाज मे इस प्रकार का दोहरा व्यवहार करना उचित है? क्या यही हमारी सनातनी परम्परा है? हमारी संस्कृति में तो नारी को हर रूप में पूजनीय माना जाता है, लेकिन वर्तमान की परिस्थितियों को देख कर तो यही प्रतीत हो रहा है कि आज महिलाएं अपने घरों में भी सुरक्षित नही है। हाथरस में जिस तरह से 18 वर्षीय लड़की को हैवानियत का शिकार बना दिया गया। उसने सम्पूर्ण मानवता को शर्मशार कर दिया है। वही कुछ लोग इस घटना को भी जाति और धर्म के नाम पर एक नया रंग ही देने को आतुर है। बलात्कार की घटना न केवल किसी एक राज्य में घटित हो रही है बल्कि आज देश के हर कोने से बलात्कार की घटनाओं का शोर सुनाई दे रही है।

    नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों की बात करें तो रिपोर्ट कहती है कि भारत में 2018 में औसतन हर रोज में 91 महिला ने बलात्कार की शिकायत दर्ज कराई। आंकड़ों के अनुसार भारत महिलाओं के लिए अब भी सुरक्षित नहीं हो पाया है। 2012 में नई दिल्ली में चलती बस में पैरामेडिकल की छात्रा से जघन्य बलात्कार और हत्या के मामले से गुस्साए हजारों लोग न्याय की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए थे। ‘निर्भया’ कांड के बाद देश में यौन हिंसा के मामले को लेकर सख्त कानून और फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग की गई थी। उसके बाद देश में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को लेकर कानून सख्त किए गए लेकिन महिलाओं के खिलाफ हिंसा अब भी बेरोकटोक जारी है। ऐसे में समझ नहीं आता कि क़ानून में ही लोचा है या लोगों की नियति ही ख़राब हो गई है। एनसीआरबी के मुताबिक 2018 में महिलाओं ने करीब 33,356 बलात्कार के मामलों की रिपोर्ट की दर्ज कराई। तो वहीं 2017 में बलात्कार के 32,559 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2016 में यह संख्या 38,947 थी। वहीं दूसरी ओर एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक देश में दुष्कर्म के दोषियों को सजा देने की दर सिर्फ 27.2 प्रतिशत 2018 में रही। देश मे 2000 में फ़ास्ट ट्रैक लाए गए , लेकिन ये भी बस नाम भर के ही है। कानून और न्याय मंत्रालय के अनुसार 2019 तक देश में 581 फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट ही कार्यरत है। जिनमें 5.9 लाख मुकदमे दर्ज किए जा चुके है। वहीं दिल्ली स्थित पार्टनर्स फॉर लॉ इन डेवलपमेंट द्वारा 2016 में एक अध्ययन में पाया गया कि फास्ट ट्रैक कोर्ट अभी भी औसतन 8.5 महीने केस निपटाने में लेते हैं जो कि अनुशंसित अवधि से चार गुना से अधिक है। ऐसे में समझ सकते कि क़ानून कहीं न कहीं दुष्कर्म की घटनाओं को रोकने में नाकाफ़ी ही साबित हो रहें ऊपर से देश की राजनीतिक व्यवस्था और सामाजिक ढांचा भी माशाअल्लाह! उसके क्या पूछने फ़िर कभी- कभी तो बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ का नारा एक चेतावनी ही समझ आता है। समाज की सोच और राजनीतिज्ञों की नियति जब तक नहीं बदलेंगी। तब तक बेटियां सुरक्षित नहीं हो पाएगी। यह तो सब तय मानिए।
    सोनम लववंशी

    सोनम लववंशी
    सोनम लववंशी
    स्वतंत्र लेखिका

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