लेखक परिचय

राजीव गुप्ता

राजीव गुप्ता

बी. ए. ( इतिहास ) दिल्ली विश्वविद्यालय एवं एम. बी. ए. की डिग्रियां हासिल की। राजीव जी की इच्छा है विकसित भारत देखने की, ना केवल देखने की अपितु खुद के सहयोग से उसका हिस्सा बनने की। गलत उनसे बर्दाश्‍त नहीं होता। वो जब भी कुछ गलत देखते हैं तो बिना कुछ परवाह किए बगैर विरोध के स्‍वर मुखरित करते हैं।

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राजीव गुप्‍ता

अरे प्रशांत भूषण की पिटाई वाला समाचार आपने सुना ? बड़ी उत्सुकता से एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने अपने एक अधेड़ उम्र के साथी से दिल्ली की लाइफ लाइन कही जाने वाली मैट्रो में सफ़र करते हुए पूछा ! हाँ देखा भी और सुना भी , परन्तु कुछ अच्छा नहीं लगा ! मुझे लगता है कि अगर थोड़ी बहुत शर्म और इज्ज़त प्रशांत भूषण जी में बची है तो अब घर बैठे ! अब बहुत वाह – वाही लूट ली ! कल तक जो युवा अन्ना टोपी पहने इनके साथ सरकार के खिलाफ हुंकार भर रहा था , इन्हें सर – आँखों पर बैठा रखा था आज वही इनको अपने लात – घूंसों से पीट रहा है ? कैसा दुर्भाग्य है अन्ना जी का ? पहले अग्निवेश जी का असली चेहरा जनता के सामने आया जो अब तक सफाई देते फिर रहे है और अब इनके एक और साथी का ? दूसरे साथी ने थोडा दुखी होकर जबाब दिया ! अरे तुम्हारा कहना तो सही है पर वो भी तो गुंडों की तरह इनको आकर मारने लगा ! भारत एक लोकतान्त्रिक देश है सभी को अपनी बात रखने का हक है ! ऐसे थोड़ी ही है कि अगर आपको कोई मेरी बात नागवार गुजरी तो आप मुझे मारने लगेगे ? अच्छा हुआ जो प्रशांत भूषण जी ने खुद भी उस गुंडे को पहले पीटा फिर पुलिस के हवाले कर दिया ! उस गुंडे की अब सारी हेकड़ी निकल जायेगी ! पहले दोस्त ने अपने दोस्त को कानून का पाठ पढ़ते हुए अपनी बात कही ! संविधान ने क्या बोलना है और विरोध कैसे करना है इसकी सीमाए बना रखा है ! आज तो अन्ना जी ने भी कह दिया कि कश्मीर को लेकर प्रशांत जी का निजी बयान था इससे अन्ना-टीम का कोई सरोकार नहीं है ! अन्ना – टीम सिर्फ भ्रष्टाचार मिटाने के लिए बनी है , इसके आलावा अगर कोई कुछ कहता है तो सबकी अपनी व्यक्तिगत राय होगी ! अरे भाई अगर व्यक्तिगत राय है तो अपने तक ही सीमित रखो न , मीडिया के सामने अपनी राय रखकर करोडो लोगो को दु:खी , हैरान और स्तब्ध क्यों करते हो ? प्रशांत जी की इस हरकत से अन्ना जी को भी आने वाले समय में दो-चार होना पड़ेगा ! मुझे तो डर है कि इनके साथियों के बडबोलेपन के करण कही जनता ही भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी इनसे मुह न मोड़ ले ? दूसरे साथी ने अपने दोस्त को जबाब दिया !

मैट्रो की ये बातचीत सुनकर मै भी सोचने पर विवश हो गया ! बहरहाल दोनों तरफ से जो भी क्रिया-प्रतिक्रिया हुई , बेहद खेदजनक है ! और होता भी ऐसे है बिना समाने वाले की भावनाओ को समझे हम अपनी व्यक्तिगत राय रख देते है या बना लेते है और जब उसका कोई जबाब आ जाता है तो हम दु:खी हो जाते है , और फिर उसे सबक सिखाने की सोच लेते है जो यहाँ पर भी देखने को मिल रहा है ! होना यह चाहिए की समस्या की तह में जकार उसका निदान करने की कोशिश की जाय , क्योंकि गलत तो दोनों ही है बस अंतर केवल इतना है कि कोई कम है और कोई ज्यादा है ! जम्मू-कश्मीर भारत का था और है ! आजादी के बाद अभी तक पाकिस्तान ने अपने नापक इरादे से कई बार भारत पर हमला किया और मुह की खाई ! आज भी वह भारत को अस्थिर करने के लिए आतंकवाद के सहारे अपनी नाकाम कोशिशे लगातार कर रहा है ! ऐसे सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत जी का ऐसा ओछा बयान पाकिस्तान की ही भाषा बोलता है जो कि पाकिस्तान के नाकाम इरादों को ही हवा देगा ! ऐसे में पाकिस्तान के लिए तो यही बात हो जायेगी कि – ‘ मुफ्त का चन्दन , घिस मेरे नंदन ‘ ! पाकिस्तान भी तो यही चाहता है कि भारत के अन्दर ही कश्मीर को लेकर फूट पड़ जाय ! जैसा कि अरुंधती राय , जिन्होंने कश्मीर की आज़ादी को ही इस समस्या का एकमात्र हल बताया है, दूसरे पत्रकार दिलीप पडगांवकर जिन्होंने कश्मीर को विवाद का मुद्दा मानते हुए इसे सुलझाने में पाकिस्तान की भूमिका पर ज़ोर दिया है ! दिलीप पडगांवकर कश्मीर के सभी पक्षों का मत जानने के लिए भारत सरकार द्वारा नियुक्त तीन वार्ताकारों में से एक हैं !

जहा तक प्रशांत जी जम्मू-कश्मीर से सेना हटाने की बात करते है तो मुझे समझ नहीं आया कि वकील साहब यह कैसे भूल गए कि जम्मू – कश्मीर भारत का एक सीमावर्ती राज्य के साथ साथ आतंकवाद से प्रभावित राज्य है ? सुरक्षा की दृष्टि से जम्मू-कश्मीर ही नहीं बल्कि देश के किसी भी सीमावर्ती राज्य को सेना से मुक्त करना न केवल घातक है, अपितु अव्यवहारिक भी है । बहरहाल ! २६ अक्टूबर १९४७ को जम्मू-कश्मीर राज्य के महाराजा हरिसिंह जी द्वारा अपनी रियासत को भारत में विलीन करने के पश्चात कश्मीर का मसला सदा के लिए हल हो जाना चाहिए था ! परन्तु यह सर्वविदित है कि स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भारत के अंग्रेज गवर्नर जनरल लार्ड माउन्टबेटन की सलाह मानकर भारत की विजयी सेना को रोका और पूरे मामले को राष्ट्रसंघ के राजनीतिक मंच पर पेश कर दिया ! १ जनवरी १९४८ को हुए इस महान प्रमाद को हम आज तक भोग रहे है ! स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की गलती और अदूरदर्शिता के कारण जम्मू-कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में पहले से ही चला गया और यह भी उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर के जम्मू क्षेत्र का लगभग 10 हजार वर्ग किमी. और कश्मीर क्षेत्र का लगभग 06 हजार वर्ग किमी. पाकिस्तान के कब्जे में है। 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण करके लद्दाख के लगभग 36,500 वर्ग किमी. पर अवैध कब्जा कर लिया। बाद में पाकिस्तान ने भी चीन को 5500 वर्ग किमी. जमीन भेंटस्वरूप दे दी, ताकि चीन उसकी सदैव रक्षा और मदद करता रहे !

प्रशांत जी की जहां तक जनमत-संग्रह की बात है, तो संयुक्त राष्ट्र के दो महासचिवों के साथ साथ बहुत लोग ऐसे हैं जो यह मानते हैं कि कश्मीर समस्या के समाधान के रूप में जनतम-संग्रह की मांग एकदम व्यर्थ है। यहां तक कि उन दोनों संयुक्त राष्ट्र के महासचिवों का ये भी मानना था कि जनमत-संग्रह की मांग अब अप्रासंगिक हो गया है। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने भी जनमत-संग्रह की बात को खारिज करते हुए कश्मीर समस्या के समाधान के लिए एक अलग ही फॉर्मूला पेश किया था। लेकिन पाकिस्तानी खर्चे पर पलने वाले कश्मीरी अलगाववादी व प्रशांत जी जैसे उनके समर्थक अब भी जनमत-संग्रह और आत्म-निर्णय का राग अलाप कर अपनी व्यक्तिगत राय दे रहे है यह बेहद खेदजनक है ! ऐसे में जो हमारी सुरक्षा के लिए रात दिन बम और गोलियों के बीच अपनी जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा करते करते शहीद हो जाते है उन लाखो सैनिकों की शहादत का क्या अर्थ रह जायेगा ? प्रशांत जी आज कश्मीर के बारे आप अपनी व्यक्तिगत राय दे रहे है कल को चीन अरुणाचल प्रदेश को चीन का हिस्सा बताने लगेगा तो कभी नागालैंड अपनी आजादी की बात करने लगेगा ऐसे में आप अपनी व्यक्तिगत राय दे देकर देश की एकता और अखंडता को ही खतरा पहुचायेंगे !

7 Responses to “व्यक्तिगत राय व्यक्तिगत तक ही सीमित होनी चाहिए”

  1. ARUN SINGH PARIHAR

    प्रशांत जी के शब्दों से हमें भी बहुत पीड़ा पहुंची. हमारे मन में उनके लिए बहुत सम्मान था … किन्तु इतने निम्न स्तर की सोच रखने वाले को हमने इतना सम्मान दिया, यह अब हमें पीड़ा दे रहा है. मारपीट करना ठीक नहीं किन्तु शायद उन नौजवानों को अन्य कोई रास्ता नहीं समझ में आया होगा … हम मारपीट की निंदा करते है किन्तु उससे ज्यादा निंदनीय तो प्रशांत जी के वो शब्द थे जिनके कारण उन नौजवानों को ये सब करना पड़ा, … काश ये समझदार लोग बोलना सीख लेते तो ऐसे न जाने कितने नौजवानों को अपना भविष्य दांव पर न लगाना पड़ता …….

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  2. आर. सिंह

    R.Singh

    बोलने की यानि मुंह खोलने की स्वतंत्रता तो भारतीय संविधान प्रदत अधिकार है,जिसका उत्तर तर्क द्वारा भी संभव है पर यह हाथ खोलने की स्वतंत्रता किस क़ानून के अंतर्गत आता है ,मुझे यह नहीं मालूम.रही बात कश्मीर के भारत में सम्पूर्ण विलय की तो यह तभी होगा जब हम कश्मीर से आर्म्ड फोर्सेस एस्पेशल पवार एक्ट हटाने लायक माहौल वहां पैदा कर सकेंगे.और जब तक ऐसा नहीं होता तब तक ये बहस चलते रहेंगे.

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  3. जगत मोहन

    jagat mohan

    जैसे कुछ लोगो को बोलने की स्वतंत्रता है वैसे ही कुछ लोगो को हाथ खोलने की भी स्वतंत्रता है . उसका कानूनी भुगतान भी वह करने के लिए तैयार है. चिंता बोलने वालो को करनी होगी कि वे कितना भुगतने को तैयार है या फिर कैलिर्फोनिया भागने वाले है मामले को ठंडा करने के लिए. कुछ लोगो के लिए भगवन, खुदा, god आस्था का विषय हो सकते है. देशभक्तों के लिए देश आस्था का विषय हो सकता है. तो आप समझ ही सकते है आस्था पर चोट लगेगी तो हाथ के चलने से ही मल्लम लगेगा. देखते है मग्सैसे पुरस्कार प्राप्त करने की होड़ में लगे देश तोड़ने वाली बिरादरी कब तक बोलने की स्वतंत्रता का लाभ उठाएगी

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  4. B K Sinha

    मै सिंह जी की बातों से सहमत हूँ भारत एक प्रजातान्त्रिक देश है जैसा की अब तक मै जनता आया हूँ अब या आगे भी ऐसा ही रहेगा मै नहीं कह सकता जैसे हालत चल रहे है अब जनतांत्रिक अधिकार अतीत की बात रह जाएगी कोई भी कहीं भी सार्वजानिक रूप से कुछ बात नहीं कर सकता न जाने कोंन आपको पीट दे जहाँ तक अन्ना के मुहीम में युवकों के शामिल होने क़ी बात है वह भी हवा हवाई है मसलन मस्ती के लिए जमघट लगा दिया उसे मैंने गंभीरता से नहीं लिया है अब उस मुद्दे पर बात करे जिस पर प्रशांत भूषण को जुल्म का शिकार होना पड़ा उन्होंने क्या ऐसा कहा क़ि कश्मीर को आजादी दे दो उन्होंने तो सिर्फ रायशुमारी क़ी बात क़ी थी इसका मतलब अलगाव वादी सोच है मेरा तो मानना है हरेक राज्य को अपने बारे में रायशुमारी का अधिकार होना चाहिए राज्यों को अपना वित्तीय और आंतरिक प्रशाशन खुद संभालना चाहिए में बिहार प्रदेश से हूँ और अभी झारखण्ड में रहता हूँ कुछ वर्ष पहले बिहारी लडको
    को हर जगह पीटने क़ी घटनाये सामने आती रहती थी उन्हें महाराष्ट्र से भगाया गया हैदराबाद से भगाया गया hariyana और panjab में bonded labour के रूप में use kiya गया rajthakre balthakre khule aam महाराष्ट्र महाराष्ट्र chillate है tab ye log kahan chale jaate है
    झारखण्ड khanijj प्रदेश है पर इसका laabh usko नहीं milta koyla yahan nikalta है पर yah उसे naseeb नहीं tharmal power क़ी dhool yahan के log phanke पर bijali yahan से Dilli जाएगी और yahan के logon को andhere में rahana padega .
    aaj isthiti is parakar ho gai है क़ि prakrtik sansadhn राज्य bhukmari के शिकार है और upnivesvadi sampann राज्य maje कर रहे है.
    kahsmirion का dil aap itne varshon में kyon नहीं jeet paye jaroor hamame भी कुछ khot raha hoga hamne भी unke saath bihariyon jaisi ganda vartav kiya hoga tabhi ve apse door hote ja रहे है kewal कश्मीर hamara abhinn ang है esa कहने से कुछ नहीं hoga vastav में ऐसा dikhana भी hoga kashmiri log sanjeeda tabiyat के log hote है chhal kapat unki jindagi में नहीं hota aaj jab vishvas क़ि kami ho gai है तो उन्हें is tarah का step lena pad raha है
    देश swatntra है पर राज्य upnivesh क़ि taur पर treet kiye jate है kendra क़ि satta को seemit ho jana चाहिए या bilkul नहीं होना चाहिए maurya shashan क़ि ati kendrit satta uske patan का karn भी bani मै प्रशांत जी को salam करता हूँ उन्होंने अपनी बात कहने क़ि हिम्मत dikhai
    bipin kr sinha

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    • जगत मोहन

      jagat mohan

      प्रजातंत्र में देश तोड़ने की अनुमति किसने दी है. महोदय संसद का एक प्रस्ताव है जिसमे पाक अधिकृत कश्मीर को भी भारत में लाने की शपथ भारत के सांसदों ने ली. दुर्भाग्य से हमारे नेतृत्व की कमजोरी ने हमें देशद्रोह की परिभाषा को भुलाने को मजबूर कर दिया है जिसके कारण विचारो की अभिव्यक्ति के नाम पर देश तोड़ने वालो की चल निकली है.

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  5. इंसान

    राजीव गुप्ता ने यह लेख मेट्रो में अधेड़ उम्र के दो मित्रों में हुई वार्तालाप को अपने स्वयं के दृष्टिकोण अनुरूप बहुत संतुलित ढंग से पाठकों के समक्ष रखा है| उन्होंने इस लेख में पाठकों के लाभार्थ प्रशांत भूषण से कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी पूछे हैं|

    आज जब भारतीय कानून और व्यवस्था की निंदनीय स्थिति के बीच उभर साम्प्रदायिक दलों ने कानून को अपने अपवित्र हाथों में ले लिया है तो भ्रष्टाचार और सामाजिक अनैतिकता में मीडिया ने भी राष्ट्रविरोधी तत्वों के दवाब के कारण समाचार को तोड़-मरोड़ कर निष्पक्ष-समीक्षा अथवा विश्लेषण कीये बिना समाचार को नौटंकी के इस्तेहार के स्वरूप प्रस्तुत कर साधारण भारतीयों को वाद-विवाद के अनन्त भंवर में फंसा उन्हें देश के हित में सोचने व कुछ कर पाने को असमर्थ बना रखा है| देश विदेश से टिप्पणीकारों के मनप्रिय अंग्रेज़ी भाषा में राष्ट्रीय-समाचारपत्र, टाइम्स ऑफ इंडिया, पर “प्रशांत भूषण अपनी कश्मीर टिप्पणी के लिए पिटा,” नामक शीर्षक और प्रस्तुत समाचार मेरे उपरोक्त कथन को पूर्ण रूप से सिद्ध करते हैं| अंग्रेज़ी में आधे-अधूरे संक्षिप्त समाचार को पढ़ लेने पर भी मेरी जिज्ञासा–कश्मीर को लेकर प्रशांत भूषण ने वास्तव में क्या कहा है; उनके कथन के पीछे उनकी भावना और अभिप्राय क्या है–वैसी की वैसी बनी है|

    लेकिन मैं राजीव गुप्ता से पूछूंगा प्रशांत भूषण को अरुंधती राय और दिलीप पडगांवकर के साथ ला खड़ा कर आप पाठकों को क्या कहना चाहते हैं? आपने ठीक कहा है कि स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु की गलती और अदूरदर्शिता के कारण जम्मू-कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में पहले से ही चला गया है, आज चौंसठ वर्ष पश्चात उन्हीं के कारण भारत में १९४७ की पैंतीस करोड जनसंख्या के दोगुना से कहीं अधिक लोग मात्र बीस रूपए दैनिक आय पर निर्भर हैं| यदि देश और समाज के लिए कुछ करने की ललक है तो आप अलग अलग इन तीनों व्यक्तियों को पढ़ें व ठीक से पहचाने और उनके विचारों से पूर्ण रूप से अवगत हो उन्हें विश्लेषात्मक ढंग से अपने पाठकों के लिए लिखें| व्यक्तिगत राय में सत्य को जाने और सत्य को ही दूसरों में बांटे|

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  6. आर. सिंह

    R.Singh

    मेरे विचार आपसे भिन्न हो सकते हैं.अगर कोई मुझसे प्रश्न करे कि किसी ख़ास समस्या पर मेरी क्या राय है तो क्या मुझे मुंह खोलने के पहले यह ध्यान देना होगा कि अन्य लोग इस के बाबत क्या कह रहे हैं.यह कौन सी मानसिकता है कि हम लाठी के जोर से किसी की भी जबान बंद कर देंगे.प्रशांत भूषण ने जो कहा उसे कहने का उन्हें पूरा अधिकार है.ऐसा अधिकार अगर चीन या पाकिस्तान अपने देश वासियों को नहीं देता तो हमें भी नहीं देना चाहिए,यह तो कोई बात नही हुई.जब तक आपका संविधान इसकी इजाजत देता है,दूसरे को इसमें दखलंदाजी का कोई अधिकार नहीं.इस लेख का शीर्षक भी गुमराह करने वाला है.मेरे विचार से ऐसा कहने का भी अधिकार संविधान ने नहीं प्रदान किया है.विचारों की भिन्नता स्वाभाविक है.अतः इसको उसी रूप में लेना हमें सीखना पड़ेगा,ऐसे भी काश्मीर समस्या भी हमारी निरंतर दुहराए जाने वाली गलतियों का परिणाम है और इस समस्या में भी भ्रष्टाचार का बहुत बड़ा हाथ है,फिलहाल तो मैं यही कहूँगा की किसी तरह की भी गुंडा गर्दी को बढावा नहीं दिया जाना चाहिए.

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