More
    Homeसाहित्‍यलेखमंहगाई पर विपक्ष की बोथरी धार का बेअसर वार!

    मंहगाई पर विपक्ष की बोथरी धार का बेअसर वार!

    लिमटी खरे
    सुरसा की तरह मुंह फाड़ती महंगाई से आम आदमी बुरी तरह त्रस्त तो नजर आ रहा है किन्तु आम आदमी की ईमानदारी से सुध लेता कोई नहीं दिख रहा है। यही कारण है कि विपक्ष के द्वारा मंहगाई पर कितने भी हमले सरकार पर किए जा रहे हों, वे सारे के सारे बेअसर ही साबित होते दिख रहे हैं। विपक्ष लगातार सरकार पर हमले कर रहा है किन्तु सरकार को मानो इन हमलों से किंचित मात्र असर भी नहीं पड़ रहा है। चुनावों के चलते तीन महीनों तक तेल की कमतें स्थिर रहीं और उसके बाद हर दिन ही डीजल और पेट्रोल की दरें बढ़ रही हैं। रसोई गैस हो या फिर वाहनों में प्रयुक्त होने वाली सीएनजी, हर जगह मंहगाई का असर साफ तौर पर दिख रहा है। आखिर क्या कारण है कि सरकार के खिलाफ मंहगाई वाले आम आदमी से जुड़े अस्त्र का उपयोग कर विपक्ष के द्वारा सरकार के खिलाफ माहौल तैयार नहीं किया जा रहा है। आखिर चूक कहां हो रही है!
    ईंधन के दामों में बढ़ोत्तरी का सीधा असर बाजार पर पड़ता है। विधान सभा चुनावों के बाद अब तक ईंधन में लगभग सात रूपए तो सीएनजी में सवा रूपए तक की बढ़ोत्तरी की जा चुकी है। घरेलू गैस का सिलेण्डर हजार रूपए के आंकड़े को कब का स्पर्श कर चुका है। अब आप गैस में सब्सीडी ले रहे अथवा नहीं, इस बात का ज्यादा अंतर नहीं पड़ रहा है। रसोई गैस की कीमतें तो बढ़ी ही हैं इसके साथ ही पाईप लाईन के जरिए घरों तक पहुंचने वाली पीएनजी की कीमत भी पांच रूपए प्रति घन मीटर तक बढ़ चुकी हैं। आम जनता मंहगाई से बुरी तरह कराह रही है किन्तु आम जनता जब विपक्ष की ओर आशा भरी नजरों से देखती है तो उसके हाथ निराशा ही लगती है।
    दिल्ली हो या सूबाई राजधानियां, हर जगह सदन में जब चर्चा की बात आती है तो हंगामा इस कदर बढ़ जाता है कि या तो सदन को भंग करना पड़ता है या विपक्ष ही वाक आऊट कर जाता है। यक्ष प्रश्न यही है कि सदन में इन दो तरीकों से जो गतिरोध उतपन्न होता है उसका हल अंत में क्या निकलता है! क्या विपक्ष के वाक आऊट या सदन को भंग करने से जनता को राहत मिलती है! जाहिर है नहीं, तो इस तरह का काम करने का औचित्य आखिर क्या है! विपक्ष चाहे तो सदन के अंदर ही रहकर चर्चा में हिस्सा ले और अपनी बातें सारगर्भित रूप से संक्षेप में पूरी वजनदारी से रखे। आज संचार माध्यमों के जरिए आम जनता भी सदन की कार्यवाही देखती है और उसे लगता है कि उसके द्वारा जनादेश प्राप्त नुमाईंदा उसके हित को साधने के बजाए हंगामें में ही अपना समय गंवा रहा है। आखिर इस तरह की कवायद का सिला क्या है!
    आज आप घर का किराना लेने जाईए, जो किराना लगभग छः माह पहले तक दो ढाई हजार में आ जाता था, आज वह चार से साढ़े चार हजार तक पहुंच गया है। खाने का तेल 120 रूपए से 210 रूपए तक पहुंच गया है। सब्जी के दाम आसमान छू रहे हैं। गेंहूं, चावल, दाल कोई सामग्री ऐसी नहीं है जो मंहगाई के चंगुल से बाहर हो। आज आम आदमी यही कहता दिख रहा है कि जब भाजपा विपक्ष में भी तब मंहगाई पर वह इतनी हायतौबा मचा देती थी कि कांग्रेस के खिलाफ माहौल बन जाता था, किन्तु वर्तमान में केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ कांग्रेस अभी तक मंहगाई को ठीक से मुद्दा भी नहीं बना पाई है। आम आदमी की सुनवाई नहीं हो पा रही है और दूसरी तरफ मीडिया पर भी यही आरोप लग रहे हैं कि वह मोदी सरकार की तारीफ में कशीदे गढ़ रही है।
    देखा जाए तो अघोषित तौर पर सूचना प्रसारण मंत्री मंत्री या राज्यों के जनसंपर्क मंत्री सीधे सीधे मीडिया को अप्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित करते आए हैं। विपक्ष में बैठी कांग्रेस के केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्रियों या राज्यों के जनसंपर्क मंत्रियों के द्वारा भी अपने पूर्व के प्रभावों का उपयोग न किया जाना भी इसका एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है जिससे वे मंहगाई के मामले में प्रभावी रूप से कांग्रेस का पक्ष रखकर सरकार के खिलाफ कम से कम मंहगाई के मामले में तो माहौल बना ही सकते हैं। लगभग एक दशक से विपक्ष में बैठी कांग्रेस की धार भी बोथरी ही नजर आ रही है, संभवतः यही कारण है कि अब कांग्रेस की जगह त्रणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसी क्षेत्रीय पार्टियां अपेक्षाकृत सुद्धण स्थिति में दिखने लगी हैं।
    सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्यों की, अपने अपने कर्मचारियों को मंहगाई भत्ते की दरें बढ़ाती जा रही है। सवाल यही है कि निजि क्षेत्र में काम करने वाले, रोज कमाने खाने वालों के हिस्से में तो मंहगाई ही आ रही है, उन्हें मंहगाई भत्ता तो नहीं ही मिल पा रहा है। गरीब गुरबे किस तरह जीवन यापन कर रहे हैं यह बात न तो सांसद ही लोकसभा में रखते हैं और न ही विधान सभाओं में विधायकों के द्वारा रखी जाती है। सियासी दलों के लिए मंहगाई अब महज आंदोलन करने का अस्त्र भर रह गई है। मंहगाई पर किसी भी अनशन, धरना प्रदर्शन आदि में पहुंचने वाले नेता जब वातानुकूलित मंहगी गाड़ियों से उतरते हैं तभी यह भान हो जाता है कि इन्हें मंहगाई की कितनी चिंता है। सरकारों से सुविधा, वेतन भत्ते, यहां तक कि हर किलोमीटर यात्रा भत्ता भी माननीयों को मिलता है फिर उन्हें मंहगाई किस चिड़िया का नाम है यह पता कैसे चलेगा!
    अभी तो कोविड काल के चलते शालाओं की फीस नहीं बढ़ी है। अब जबकि पाबंदियां समाप्त हो चुकी हैं तब फीस बढ़ना स्वाभािवक ही है। कहा जाता है कि आम आदमी जो कमाता है उसमें से आधे से ज्यादा पैसा वह अपनी हारी बीमारी अर्थात इलाज के लिए रखता है, क्योंकि आज सरकारी स्तर पर मुकम्मल इलाज नहीं मिल पाता है, इसलिए निजि तौर पर इलाज कराना उसकी मजबूरी होती है। इसके बाद वह बच्चों की पढ़ाई के लिए शेष राशि खर्च कर देता है, क्योंकि गणवेश, पाठ्यक्रम की कापी पुस्तकें, विद्यालयों की फीस इस कदर मंहगी है कि मत पूछिए। इसके अलावा निजि तौर पर उसे अपने बच्चों को ट्यूशन देने पर भी मजबूर होना पड़ रहा है। इसके बाद जो बचता है वह उसके आजीविकोपार्जन के लिए अपर्याप्त ही मानी जा सकती है। रही सही कसर सरकारों की निशुल्क खाद्यान वितरण व्यवस्था निकाल देती है इससे निज क्षेत्र में काम करने वाले निम्न मध्यम वर्गीय लोगों का जीना मुहाल हो जाता है। किसानों को भी खाद बीज इस कदर मंहगे दामों पर मिल रहे हैं कि उनका जीवन भी मुश्किल में ही कटता नजर आता है।
    कुल मिलाकर विपक्ष को इस बारे में सोचना होगा कि आम आदमी के लिए वह किस तरह का संघर्ष कर रहे हैं। उन्हें अपने तौर तरीकों को बदलने की महती जरूरत आज महसूस होने लगी है। क्योंकि लोगों का यही कहना है कि मंहगाई को लेकर लोगों में गुस्सा जरूर है पर अपना कामकाज छोड़कर सड़क पर उतरना अब लोगों के लिए आसान नहीं रह गया है।

    लिमटी खरे
    लिमटी खरेhttps://limtykhare.blogspot.com
    हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    * Copy This Password *

    * Type Or Paste Password Here *

    12,262 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress

    Captcha verification failed!
    CAPTCHA user score failed. Please contact us!

    Must Read