दिलचस्प दिन

साठ के दशक के मध्य में अमेरिका में युवा आन्दोलन की एक धारा के रुप में हिप्पी उपसंस्कृति का जन्म हुआ और दुनिया भर के अनेको देशों में फैल गया। हिप्पियों के फैशन और मूल्य-बोध ने संगीत, फिल्म, साहित्य और शिल्प पर गहरा असर डाला। इस हिप्पी संस्कृति के अनेको पहलुओं का दुनिया भर के देशों की आज की संस्कृति की मुख्य धारा में समावेश हो गया है। साठ के दशक में दुनिया के विभिन्न देशों में प्रतिवाद और प्रतिरोध के स्वर गूँजते रहे थे। अमेरिका, यूरोप और एशिया के विश्वविद्यालयों के कैम्पस में छात्र अशान्त और उत्तेजित रहा करते थे।

interesting day के लिए चित्र परिणामसन 2014 के आम चुनाव की गहमागहमी में श्री नरेन्द्र मोदी ने आश्वासन दिया था कि अच्छे दिन आनेवाले हैं। यह नई बात लगी। यों तो जब से आदमी ने खेती और लिखने पढ़ने का ईजाद किया तब से अच्छे दिनों, की जुगत और आस करता रहा है। शिक्षा और विकास वंचित वर्ग को सशक्त होने के अवसर उपलब्ध कराते हैं जिससे समाज के सशक्त एवम् सुविधाप्राप्त वर्ग के लिए संकट उत्पन्न होने लगते हैं। सभ्यता के सफर में द्वंद्व की बुनियाद यहीं पर पड़ती है। दिन दिलचस्प होने लगते हैं। अच्छे दिन मरीचिका की तरह पकड़ में आते आते रह जाते हैं।
प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरु मौजूदा पीढ़ी को कष्ट सहने को प्रस्तुत रहने का आह्वान करते रहते थे ताकि अगली पीढ़ियाँ अधिक उन्नत जीवन जी सकें। इन्दिरा गाँधी नव वर्ष सन्देश में लगातार कहती थीं कि आनेवाला समय अधिक कठिन होगा। भारत जितना विशाल और प्राचीन देश है उतनी ही जटिल और कठिन इसकी समस्याएँ और चुनौतियाँ हैं। हम कहते थे तो फिर आसान दिन कब आएँगे। आज जब अच्छे दिनो का आश्वासन मिलता है तो हम आश्वस्त नहीं हो पा रहे। अच्छे दिनों का कोई तजुर्बा हमें जो नहीं है, शायद अच्छे दिनों में सब कुछ सहूलियत से होता होगा, मंहगाई, लड़ाइयों और चुनौतियों से आजाद होते होंगे वे दिन। हमने तो बस दिलचस्प दिन देखे सुने हैं।
दिलचस्प वह है जो ध्यान खींचता है। जिसके बारे में और जानने का मन होता है। दिलचस्प आदमी हों अथवा हालत अथवा वस्तु—उससे जुड़े रहने का मन होता है। वह कभी उबाऊ नहीं होता, कभी सपाट नहीं होता। पचास के दशक के एक पत्रकार की यह टिप्पणी दिलचस्प कही जाएगी।— “आइसनहॉवर महान हैं क्योंकि अमेरिका महान है, ख्रुस्चोव महान हैं क्योंकि सोवियत यूनियन महान है, भारत महान है क्योंकि नेहरु महान है।“
बीसवीं सदी के चालीस के दशक के दिन काफी दिलचस्प थे। यह काल-खण्ड अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर द्वितीय विश्व-युद्ध का था, राष्ट्रीय स्तर पर स्वतन्त्रता संग्राम चरमावस्था में था; साम्प्रदायिक दंगों का, देश के विभाजन का और विदेशी हुकूमत से आज़ादी हासिल करने का काल-खण्ड था यह । सन 1942 ई में “करो या मरो” तथा “अंगरेजो भारत छोड़ो” के आन्दोलन की आग देश भर में फैली हुई थी। सन 1943 ई में बंगाल का भीषण अकाल, साथ में चेचक, हैजे जैसी बीमारियों की महामारी से बड़ी संख्या में बच्चों की मौतें, सन 1943 ई में स्ट्रेप्टोमायसिन के आविष्कार के साथ यक्ष्मा जैसे असाध्य मारक रोग से निवृत्ति का आश्वासन। विज्ञान की चरम उपलब्धि नाभिकीय ऊर्जा को परम विध्वंसक परमाणु बम का उपयोग मानवीय समस्याओं को सुलझाने के लिए किए जाने का दृष्टान्त भी इसी कालखण्ड में मिला।
भारत में इस कालखण्ड ने अकाल, महामारी, मिलावट और कालाबाज़ारी को भोगा था; आदमी के नृशंस और क्षुद्र रूप के निर्लज्ज प्रदर्शन के साथ साथ अपनी व्यक्तिगत चिन्ताओं के ऊपर दस और देश के हित को तरज़ीह देने वालों के बीच जिन्दगी की अभिव्यक्ति हो रही थी। समाज और परम्परा में मौजूद कुसंस्कारों के विरूद्ध चेतना उभाड़ने के प्रयास काफी मुखर थे । सती प्रथा और बाल विवाह के विरोध तथा विधवा विवाह के पक्ष में राजा राममोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर और स्वामी दयानन्द सरस्वती तथा अन्य अनेकों द्वारा किए गए आन्दोलनों से प्रेरणा पाई थी ।
सन १९४२ में अंगरेजो भारत छोड़ो, सन १९४५ में परमाणु बम द्वारा नागासाकी-हिरोशिमा का नाश और विश्व युद्ध की समाप्ति। द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हुआ, लेकिन शान्ति का माहौल नहीं आया। अच्छे दिन नहीं आ पाए। शीत युद्ध का दौर शुरु हुआ।
सन १९४७ में एक साथ देश का विभाजन और विदेशी हुकूमत का खात्मा — इन सब के साक्ष्य ने हमारी संवेदनशीलता को गढ़ा था । एक ही देश के नागरिकों में से एक वर्ग आजादी के जश्न में डूबा था, तो एक दूसरा वर्ग था जो वतन और देश के फर्क की यन्त्रणा झेल रहा था। उनका वर्तमान निःस्व का था और भविष्य का कोई रोडमैप उनके पास नहीं था। उनकी संज्ञा विस्थापित और शरणार्थी थीं। उन्हें इस पहचान से मुक्त होकर समाज की मुख्य धारा में मिल जाने की लड़ाई लड़नी थी।
चालीस के दशक में सोवियत रूस नाम से एक देश अन्तर्राष्ट्रीय धरातल पर लोगों की चेतना को चकाचौंध करते हुए प्रलुब्ध किया करता था कि ऐसा समाज आदमी गढ़ लेगा जिसमें दुर्बल का सम्मान के साथ जीवित रहा करना सहज और स्वाभाविक होगा ।
यह पूरा कनवास कैसी तस्वीरों का कोलाज है?
पचास के दशक में एक नए सांस्कृतिक और साहित्यिक आन्दोलन ने अमेरिका की राष्ट्रीय चेतना पर दस्तक दी। इस आन्दोलन को बिट जेनरेशन के नाम से पहचान मिली थी। यह आन्दोलन संख्या के लिहाज से कभी भी विशाल नहीं होते हुए भी प्रभाव एवम् सांस्कृतिक हैसियत में दूसरे किसी भी तुलनात्मक एस्थेटिक से अधिक था। दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के तुरत बाद के कालखण्ड में समाज की पारम्परिक संरचनाओं पर थोक पुनर्मूल्यांकन का दबाव बनने लगा । ज्यों ज्यों अचानक आई आर्थिक तेजी की पकड़ बढ़ती गई, विश्वविद्यालयों में छात्रो ने समाज में व्याप्त भौतकतावाद के विरोध में सवाल उठाने शुरु कर दिए। बिट जेनरेशन इस बहस की उपलब्धि थी। वे अपने तब प्रचलित बेलगाम पूँजीवाद को मानवीय संवेदनाओं और मूल्यबोध को नष्ट करनेवाला और सामाजिक समानता का विरोधी समझते थे । उपभोक्तावादी संस्कृति से असंतुष्टि के अलावे वे तत्कालीन समाज के पाखंड के दमघोंटु नजरिए के खिलाफ लामबन्दी की घोषणा करते थे।
सन 1961 ई. में उत्तर औपनेवेशिक काल का कलम और ब्रश की आजादी के जवाबी बहस की पहली आवाज का दावा रखनेवाली हंग्री जेनरेशन(Hungry generation) का प्रकाश बांग्ला साहित्य में पटने में हुआ था। इस आन्दोलन ने दूसरों के अलावे ऑसवाल्ड स्पेंग्लर के सांस्कृतिक विकास एवम् अग्रगति से सम्बन्धित ऐतिहासिक विचारों से प्रेरणा ली थी। इनकी रचनाओं का यूरोपीय भाषाओं में बड़े पैमाने पर अनुवाद हुआ था।

साठ के दशक के मध्य में अमेरिका में युवा आन्दोलन की एक धारा के रुप में हिप्पी उपसंस्कृति का जन्म हुआ और दुनिया भर के अनेको देशों में फैल गया। हिप्पियों के फैशन और मूल्य-बोध ने संगीत, फिल्म, साहित्य और शिल्प पर गहरा असर डाला। इस हिप्पी संस्कृति के अनेको पहलुओं का दुनिया भर के देशों की आज की संस्कृति की मुख्य धारा में समावेश हो गया है।

साठ के दशक में दुनिया के विभिन्न देशों में प्रतिवाद और प्रतिरोध के स्वर गूँजते रहे थे। अमेरिका, यूरोप और एशिया के विश्वविद्यालयों के कैम्पस में छात्र अशान्त और उत्तेजित रहा करते थे। वर्तमान से व्यवस्था से असन्तुष्ट थे वे लोग। उत्तर बंगाल का एक अख्यात गाँव नक्सलबाड़ी प्रतिवाद और प्रतिरोध का उत्स बन गया। भारतीय राजनीतिक और सामाजिक दृश्य-पटलों पर अपरिवर्तनीय बदलावों का ऐसा सिलसिला शुरु हुआ कि एक ने दूसरे के लिए जमीन तैयार की, दूसरे ने तीसरे की और फिर पीछे लौटने की कोई सूरत नहीं रह गई।
कई एक राज्यों में गैर कांग्रेसी हुकूमतें बनने के साथ शुरु हुआ। सत्तर का दशक अधिक दिलचस्प था। पाकिस्तान के विघटन और बांग्ला देश के उदय में भारत की भूमिका के लिए श्रीमती इन्दिरा गाँधी का दुर्गा रुप में अभिनन्दन और उसके तुरत बाद ही उनके शासन के विरुद्ध आन्दोलन, एमर्जेन्सी और फिर केन्द्र की सत्ता से उनकी बेदखली। सन 1989 ई में श्री विश्वनाथ प्रतीप सिंह द्वारा मण्डल कमिशन के द्वारा अनुशंसित पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण को लागू किए जाने के बाद और सन 1991 में बावरी मस्जिद के विध्वंस तथा सन 1992 में सोवियत यूनियन के विघटन के बाद के भारत में पहले जैसा रह पाने की सम्भावना समाप्त हो गई। नई दिलचस्प सम्भावनाओं के दिनों का पथ प्रशस्त हुआ।
भारतीय जनता पार्टी की पूर्वसूरी भारतीय जनसंघ का उदय हिन्दु राष्ट्रवादी पार्टी के रुप में सन 1951 में हुआ । कांग्रेस के साथ अन्य पार्टियाँ इसे साम्प्रदायिक पार्टी कहती थी। सन 1952 के आम चुनाव में जवाहरलाल के निशाने पर मुख्य रुप से यह पार्टी रहती थी। जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष श्यामाप्रसाद मुखर्जी चुटकी लेते थे कि जवाहरलाल ही हमारी पार्टी का प्रचार कर रहे हैं हमारा काम सहज हो जा रहा है। जवाहरलाल नेहरु बहुसंख्यक की साम्प्रदायिकता को अल्पसंख्यक की साम्प्रदायिकता से अधिक खतरनाक बताते थे। जन संघ का जनता पार्टी में विलय और फिर भारतीय जनता पार्टी के रुप में प्रकाश में उभड़ा।
सन 1951 से 2014 तक का यह सफर काफी दिलचस्प रहा है। आगे का सफर कम दिलचस्प नहीं होगा, इतना तो तय है। भारतीय जनता पार्टी के विज़न से भारत सरकार की पहचान निर्धारित होने की राह पहली बार हमवार हुई है। हालाँकि सन 1996 ई से 2004 तक इस पार्टी के नेतृत्व में सरकार चल चुकी है, फिर भी अभी तक भारत सरकार का विजन मौलिक रुप में नेहरु के विज़न से ही दिशा निर्धारित होता रहा था। जाहिर है, आनेवाले दिन दिलचस्प होगे।

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