लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

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सुमनजी का फोन आया था । हमलोग डीएवी कॉलेज, सीवान के वनस्पति शास्त्र विभाग में सहकर्मी थे। मुझे सेवानिवृत्त हुए तेइस साल बीत गए हैं। सुमनजी भी प्रायः दस साल पहले सेवानिवृत्त हुए हैं। सुमनजी ने बताया कि अपने विभाग के सभी सहकर्मी सेवानिवृत्त हो गए हैं और नई नियुक्ति नहीं हुई है। नतीजा है कि विभाग में कोई शिक्षक नहीं है । हमारे विभाग और हमारे कॉलेज के अलावा  राज्य के अन्य कॉलेजों और अनेक विश्वविद्यालयीय विभागों में भी यही स्थिति है।
संवाद माध्यम से जानकारी मिली है कि राज्य सरकार तीन नए विश्वविद्यालय स्थापित कर रही है।
तब से मैं बेचैन हूँ। यह कैसा विकास है ? यह विकास का कैसा मॉडल है?
डीएवी कॉलेज का जीव विज्ञान विभाग एक परिवार की तरह रहा था। बायॉलॉजिकल सोसायटी के वार्षिक कार्यक्रम चर्चा में रहा करते थे। डॉ के.पी वर्मा और डॉ आर एस पाण्डे ने इस विभाग और सोसायटी को जीवन्त रखा था। जन्तु विज्ञान विभाग तथा वनस्पति शास्त्र विभाग अलग अलग होते हुए भी एक साथ रह पाए थे। स्टाफ रुम में गाहे बगाहे अकादमिक चर्चाएँ हो जाया करती थीं। मोफस्सिल कॉलेज का ही चरित्र रहा है, जहाँ पढ़ाई का उद्देश्य डिग्री हासिल कर रोजी रोटी जुगाड़ करने की काबिलियत पा लेना भर होता है। हम शिक्षक भी औसत स्तर के थे, हमारी सीमाएँ थीं, पर उन सीमाओं के अंतर्गत हमने विद्यार्थियों के सामने अपने को स्वीकार्य और सम्मानित बनाए रखने का भरसक जतन किया था। अभी भी याद है, प्रचंड गर्मी में , ललाट से आँखों पर बहते पसीने को पोंछते हुए हम पढ़ाते थे और हमारे विद्यार्थी हमें सुनते थे। उन दिनो सीवान में बिजली नाम के वास्ते ही रहा करती थी। हमारी आकांक्षाएँ सामान्य औसत किस्म की हुआ करती थी। कॉलेज में साधन अपर्याप्त थे.। हमें विद्यार्थियों, अभिभावकों और नागरिकों के बीच स्वीकृति भी मिली थी। हमने कॉलेज की गरिमा को कायम रखने में भागीदारी की थी। डीएवी कॉलेज तत्कालीन बिहार विश्वविद्यालय के चंद प्रतिष्ठित संस्थाओं में गिना जाता था।
मुझे व्यक्तिगत स्तर पर एक अपराध-बोध चालता रहता कि मैं उतना नहीं दे पा रहा, जितना मुझे देना चाहिए था। मैं अपनी पढ़ाई नहीं कर पाता था। हालाँकि विद्यार्थियों के बीच कुशल एवम् प्रिय शिक्षक माने जाने का लोभ हमेशा रहा। यह एहसास कि मुझमें स्वीकृति पाने की हैसियत नहीं थी,तकलीफदेह होता है।
सन 1984 में स्नातकोत्तर की पढ़ा शुरु हुई। सरकार की ओर से शर्त थी कि अतिरिक्त शिक्षक, पुस्तक, प्रयोगशाला उपलब्ध नहीं कराया जाएगा।
हमारे लिए चुनौती थी, पर सीखने का संयोग भी था।  कि मेरी पारिवारिक व्यस्तता इस समय पहले के मुकाबले काफी कम हो गई थी, इसलिए मैं चुनौती को सुयोग के रुप में पा सका। अब पीछे मुड़कर देखता हूं तो समझ में आता है कि मेरे लिए यह सही मायने में liberating experience(मुक्ति प्रदान करनेवाला) रहा है मेरे लिए। जीव और परिवेश के बीच के समीकरण की झाँकी मिली इस तजुर्बे से गुजरते हुए। नारायण के अर्जुन को सूक्ष्म में विराट के दर्शन कराने का अर्थ समझ में आया, जब जीवित कोशिका के स्वरुप से परिचय हुआ।
उसी दौरान अपने एक आत्मीय विद्यार्थी से मिलने मेरा जेएनयू जाना हुआ। वह स्कूल ऑफ लाइफ साइन्सेस में छात्र था। उसके साथ प्रयोगशाला में जाना हुआ। जिन उपकरणों को मैंने अपनी पुस्तकों में तस्वीरो के रुप में ही देखा था, वे यहाँ के छात्रों को प्रयोग करने के लिए उपलब्ध थे। मेरे लिए यह एक चौंकानेवाला अनुभव था। सीवान और उसकी हैसियत के अन्य केन्द्रों में पढ़नेवाले विद्यार्थियों के साथ कैसा छलावा किया जा रहा है। उनको समान डिग्री मिल जाएगी, पर कितना खोखला बनाया जा रहा है उन्हें। कहीं भी आमने सामने खड़े नहीं हो सकते वे।
आज सुमनजी के फोन ने पुराने ज़ख्म की टीस को जगा दिया। मैंने रवीन्द्र को फोन कर पूछा कि वे अपने संगठन के माध्यम से जनमत बनाने की जरूरत क्यों नहीं समझते। रवीन्द्र आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारी और जागरुक सेवानिवृत्त शिक्षक हैं। वे भी बहुत फिक्रमंद थे। उन्होंने बताया कि कुलपतियों ने कॉलेजों के प्राचार्यों को अधिकृत किया हुआ है कि जरूरत के अनुसार सेवानिवृत्त शिक्षकों को शर्तानुसार नियक्त किया जा सकता है। मैं सन्तुष्ट नहीं हुआ। मेरी समझ है कि यह गलत नजरिया है। नई जानकारियाँ हर विषय में तेजी से बढ़ती जा रही हैं। विद्यार्थियों को उनकी जानकारी नए शिक्षक ही दे सकते हैं, न कि सेवानिवृत्त लोग। इसलिए हर हालत में शिक्षक के पदों को नियमित रुप से भरा जाना चाहिए। यह एक साजिश जैसी बात लगती है कि विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ती जाए और छात्रों को शिक्षक, पुस्तकालय, प्रयोगशाला और उपकरण तक पहुँच कम होती रहे। समाज अपनी समस्याओं और जरूरतों के लिए अँधेरे में टटोलता रहे।

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