क्या प. बंगाल में लोकतंत्र जिन्दा है?

ललित गर्ग –
प.बंगाल में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री जेपी नड्डा के काफिले पर पत्थरबाजी की गई, विरोध प्रदर्शन एवं काले झंडे दिखाने आदि हिंसक एवं अराजक घटना से न केवल भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों को गहरा आघात लगा है, बल्कि आमजनता को भी भारी हैरानी हुई है। उसका समर्थन किसी भी रूप मे नहीं किया जा सकता। इन वर्षों में पश्चिम बंगाल में लोकतांत्रिक मूल्यों का जिस तरह से मखौल उड़ाया जाता है, हिंसा का सहारा लिया जाता है, वह एक गंभीर चिन्ता का विषय है एवं प. बंगाल की समृद्ध एवं आदर्श लोकतांत्रिक विरासत को धुंधलाना है। वहां हिंसा से मुक्त राजनीति एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है।


पश्चिम बंगाल में अगले साल की शुरुआती छमाही में विधानसभा चुनाव होने हैं, सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की सरकार एवं पार्टी सुप्रीमो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अपनी सरकार जाती हुई दिखाई दे रही है, बंगाल में भाजपा की गहरी होती जड़े ममता की बौखलाहट का कारण है। बंगाल में बीजेपी ने एक लंबी लड़ाई लड़ी है। 9 साल पहले बंगाल में उसका वोट प्रतिशत 4 था। 2014 में उसकी सीटें 2 होकर वोट प्रतिशत 18 पहुंचा। 2019 में उसकी सीटें 18 हुई और वोट प्रतिशत 40 पहुंचा। अब 2021 के चुनाव में बीजेपी 200 सीट से विजयी होने का दंभ भर रही है। इसलिये ममता और उनकी पार्टी भाजपा पर तरह-तरह के हमले कर रही है। इन्हीं चुनावों की तैयारी सभी राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से कर रहे हैं, भारतीय जनता पार्टी भी इसी तैयारी में जुटी है, इसी सिलसिले में राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री जेपी नड्डा प. बंगाल की यात्रा पर आये, इसी दौरान उनके काफिले पर हमला किया गया जिसमें भाजपा के भी कुछ अन्य नेता थे जिन्हें पत्थरबाजी के दौरान चोटें आयी हैं। प. बंगाल राजनीतिक रूप से बहुत सजग और सांस्कृतिक रूप से बहुत समृद्ध राज्य माना जाता है क्योंकि इस राज्य ने देश की स्वतन्त्रता की लड़ाई में एक से बढ़ कर एक ऐसे बुद्धिजीवी दिये हैं जिनके क्रान्तिकारी विचारों से पूरे देश की जनता प्रेरित हुई है। उनकी इस महान विरासत को इक्कीसवीं सदी में आकर चुनावी विजय के लिए किसी भी स्तर पर कलंकित करने का कार्य कैसे स्वीकार्य हो सकता है?
विडम्बना है कि ममता की शह पर वहां हिंसा, अराजकता, अशांति, डराना-धमकाना, दादागिरी की त्रासद एवं भयावह घटनाएं घटित हो रही है, उसने लोकतांत्रिक मूल्यों के मानक बदल दिये हैं न्याय, कानून और व्यवस्था के उद्देश्य अब नई व्याख्या देने लगे हैं। वहां चरित्र हासिए पर आ गया, सत्तालोलुपता केन्द्र में आ खड़ी हुई। वहां कुर्सी पाने की दौड़ में जिम्मेदारियां नहीं बांटी जा रही, बल्कि चरित्र को ही बांटने की कुचेष्टाएं हो रही हैं और जिस राज्य का चरित्र बिकाऊ हो जाता है उसकी आत्मा को फिर कैसे जिन्दा रखा जाए, चिन्तनीय प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। आज कौन पश्चिम बंगाल में अपने दायित्व के प्रति जिम्मेदार है? कौन नीतियों के प्रति ईमानदार है? कौन लोकतांत्रिक मूल्यों को अक्षुण्ण रखते हुए निष्पक्ष एवं पारदर्शी चुनाव कराने के लिये प्रतिबद्ध है? सवाल है कि चुनाव में शामिल पार्टियां विशेषतः सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस एवं ममता अपने कार्यकर्ताओं को यह बात क्यों नहीं समझा पाती कि हिंसा की छोटी वारदात भी न केवल लोकतंत्र को कमजोर करती है बल्कि यह चुनाव प्रक्रिया पर एक कलंक है।
पश्चिम बंगाल में सर्वत्र आगामी विधानसभा चुनाव शांति, अहिंसक एवं निष्पक्ष तरीके से सम्पन्न कराने के प्रश्न पर एक घना अंधेरा छाया हुआ है, निराशा और दायित्वहीनता की चरम पराकाष्ठा ने वहां राजनीतिक प्रक्रिया को जटिल दौर में लाकर खड़ा कर दिया है। हम यह न भूलें कि प्रदेश के नेतृत्व को निर्मित करने की प्रक्रिया जिस दिन अपने सिद्धांतों और आदर्शों की पटरी से उतर गयी तो पूरी लोकतंत्र की प्रतिष्ठा ही दांव पर लग जायेगी, उसकी बरबादी का सवाल उठ खड़ा होगा। पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र कितनी ही कंटीली झांड़ियों के बीच फंसा हुआ है। वहां की अराजक एवं अलोकतांत्रिक घटनाएं प्रतिदिन यही आभास कराती है कि अगर इन कांटों के बीच कोई पगडण्डी नहीं निकली तो लोकतंत्र का चलना दूभर हो जायेगा। वहां की हिंसक घटनाओं की बहुलता को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि राजनैतिक लोगों से महात्मा बनने की उम्मीद तो नहीं की जा सकती, पर वे पशुता पर उतर आएं, यह ठीक नहीं है।
पश्चिम बंगाल के भाग्य को निर्मित करने के लिये सबसे बड़ी जरूरत एक ऐसे नेतृत्व को चुनने की है जो और कुछ हो न हो- अहिंसक हो, लोकतांत्रिक मूल्यों को मान देने वाला हो और राष्ट्रीयता को मजबूत करने वाला हो। दुःख इस बात का है कि वहां का तथाकथित नेतृत्व लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी पर खरा नहीं है, दोयम है और छद्म है, आग्रही और स्वार्थी है, हठ एवं तानाशाही है। इन आगामी विधानसभा चुनावों में ऐसे नेतृत्व को गहरी चुनौती मिलनी ही चाहिए, जो उसके लिये एक सबक बने। सर्वमान्य है कि वही नेतृत्व सफल है जिसका चरित्र पारदर्शी हो। सबको साथ लेकर चलने की ताकत हो, विकासमूलक शासन जिसका ध्येय हो, सापेक्ष चिंतन हो, समन्वय की नीति हो और निर्णायक क्षमता हो। प्रतिकूलताओं के बीच भी ईमानदारी से पैर जमाकर चलने का साहस हो। वहां योग्य नेतृत्व की प्यासी परिस्थितियां तो हैं, लेकिन बदकिस्मती से अपेक्षित नेतृत्व नहीं हैं। ऐसे में सोचना होगा कि क्या नेतृत्व की इस अप्रत्याशित रिक्तता को भाजपा द्वारा भरा जा सकता है? क्या पश्चिम बंगाल के सामने आज जो भयावह एवं विकट संकट और दुविधा है उससे छुटकारा मिल सकता है?
बंगाल की धरती वैचारिक विविधता के बावजूद लोकतांत्रिक मूल्यों की उर्वरा भूमि रही है। इसमें राष्ट्रवादी विचारों से लेकर समाजवादी व माक्र्सवादी विचारों की नदियां इस प्रकार बहती रही हैं कि आम जनता इन सभी के तात्विक गुणों का जायजा लेकर अपना लोकतान्त्रिक रास्ता तय करती रही है। बेशक साठ के दशक के अंत में इसी राज्य से नक्सली आंदोलन शुरू हुआ था जिसने हिंसक रास्तों से राजनीतिक सत्ता को हथियाने की वकालत की थी परन्तु इस आन्दोलन को इसी राज्य की जनता के समर्थन से समाप्त भी कर दिया गया और संसदीय लोकतन्त्र के चुनावी रास्ते से जनसमस्याएं हल करने के लिए यहां की जनता ने माक्र्सवादी पार्टी के नेतृत्व में वामपंथी दलों को बाद में सत्ता चलाने का अधिकार 34 वर्षों से अधिक समय तक के लिए दिया। इस वामपंथी शासन के दौरान राज्य में जो सीनाजोरी की राजनीति संस्थागत रूप में परिवर्तित हो गई थी उसे वर्तमान मुख्यमन्त्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने जनसमर्थन से उखाड़ फेंका।
ममता दी का शासन पिछले दस वर्षों से इस राज्य में चल रहा है जिसे राजनीतिक तौर पर अब भाजपा चुनौती देती दिख रही है। इस चुनौती का जवाब देने के लिए सत्तारूढ़ दल को केवल लोकतान्त्रिक तरीकों का ही इस्तेमाल करना होगा और स्वयं भाजपा को भी ऐसे तत्वों से दूर रहना होगा जो इस स्थिति का लाभ उठाने की गरज से भेष बदल कर राजनीतिक विरोधियों की जमात में शामिल होने को बेताब हो जाते हैं, परन्तु पिछले कुछ महीनों से जिस तरह भाजपा के कार्यकर्ता हिंसा का शिकार हो रहे हैं उससे यह आशंका तो पैदा होती ही है कि राज्य में इस तरह की घटनाओं में सत्तारूढ़ पार्टी के कार्यकर्ताओं की हिमायत हो सकती है। इस शंका का निवारण केवल राज्य सरकार ही कर सकती है क्योंकि कानून-व्यवस्था उसका विशेष अधिकार क्षेत्र है, परन्तु ऐसे मामलों में राज्य के राज्यपाल का हस्तक्षेप भी अपेक्षित नहीं कहा जा सकता।
पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और पुलिस प्रमुख ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के समन को जिस तरह ठुकराया और दिल्ली जाकर गृह सचिव से मुलाकात करने से इन्कार किया वह केवल राज्य प्रशासन के शीर्ष स्तर पर की जाने वाली मनमानी ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक तौर-तरीकों का निरादर भी है। बंगाल के इन दोनों शीर्ष अधिकारियों की यह हरकत उसी संघीय व्यवस्था को क्षति पहुंचाने वाली है जिसकी रक्षा करने की जरूरत ममता सरकार रह-रहकर जताती रहती है। ममता दी का दायित्व बनता है कि वह किसी भी तरह राजनीतिक हिंसा को न होने दें और इसके लिए राज्य पुलिस प्रशासन को सदा सावधान रखें। हालांकि श्री नड्डा पर हमले की जांच का आदेश उन्होंने पुलिस प्रशासन को दे दिया है और उसने अपना काम भी शुरू कर दिया है परन्तु हमें ऐसी ही पिछली घटनाओं का भी संज्ञान लेना होगा और देखना होगा कि उनमें की गई जांच का क्या निष्कर्ष निकला? इसके साथ ही पुलिस को अपनी भूमिका पूरी तरह अराजनीतिक होकर निभानी होगी और समस्या की जड़ तक जाना होगा।

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