क्या गुर्जर एक विदेशी जाति है ?

भारत में एक भयानक षडयंत्र के अंतर्गत लेखकों का एक ऐसा वर्ग सक्रिय रहा है जो भारत की अनेकों जातियों को विदेशी सिद्ध करने का प्रयास करता रहता है । जबकि भारत की इतिहास परम्परा के ऐसे अनेकों स्पष्ट प्रमाण हैं कि भारत की लगभग सभी वे जातियां जो अपने आप को आर्यों की संतान कहती हैं या भारतीय इतिहास , धर्म और संस्कृति में अपना विश्वास व्यक्त करती हैं मूल रूप से सभी भारतीय हैं । जो लोग आर्यों की संतानों के रूप में भारत में बस रही जातियों को विदेशी सिद्ध करने का प्रयास करते हैं उनके ऐसा करने से उन्हें यह लाभ होता है कि ऐसी परिस्थितियों में भारत पर कोई भी एक जाति अपना दावा नहीं कर सकेगी और सब अपने आपको विदेशी मूल की होने के कारण अलग – अलग समझने की भूल करते रहेंगी । जिसका परिणाम यह होगा कि भारत की प्रत्येक जाति अपना मूल विदेशों में खोजेगी तो स्वाभाविक रूप से उसका लगाव भारत से ना होकर विदेशों के किसी विशिष्ट स्थान या भौगोलिक क्षेत्र से होगा । जहां से वह अपना निकास मान रही होगी । इसका अंतिम परिणाम यह होगा कि भारत टूटेगा , बिखरेगा । क्योंकि जिस राष्ट्र में सांस्कृतिक एकता ना हो और जिसकी इतिहास की परम्पराएं एक न हों , जिसका धर्म एक न हो , जिसकी मान्यताएं एक न हों , उसमें बिखराव आता ही आता है । भारत के लोगों की और विशेष रूप से भारत में निवास कर रही जातियों की इन सारी चीजों को अलग – अलग सिद्ध करने के उद्देश्य से ही भारत की जातियों को विश्व के अन्य भौगोलिक क्षेत्रों से आई हुई दिखाने का षड्यंत्र किया जाता रहा है ।
भारत की जिन जातियों को षड्यंत्रकारी लेखकों ने विदेशी सिद्ध करने का प्रयास किया है उनमें से एक गुर्जर जाति भी है । गुर्जर जाति भारत की बहुत प्राचीन जाति है। इसने भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मजबूत करने में तो महत्वपूर्ण योगदान दिया ही है साथ ही इस जाति के शासकों ने दीर्घकाल तक शासन करके विदेशी मुस्लिम हमलावरों को भारत में प्रवेश करने से रोके रखने का प्रशंसनीय और देशभक्तिपूर्ण कार्य भी किया है । यदि यह जाति विदेशी होती तो विदेशी हमलावरों को मां भारती पर हमला करने से रोकने का प्रशंसनीय कार्य न करती । इसके विपरीत इसके पूर्वज उन विदेशी हमलावरों के साथ मिलकर भारत को लूटने की योजना बनाते और यहां पर उन्हीं की तरह नरसंहार करने के कीर्तिमान स्थापित करते।
भारत के इतिहास में एक पल भी ऐसा नहीं आया जब किसी गुर्जर शासक ने या किसी गुर्जर योद्धा ने किसी विदेशी का साथ दिया हो या मां भारती के विरुद्ध घात किया हो। इसी से पता चल जाता है कि इस जाति के शासकों और योद्धाओं का मां भारती के प्रति कितना सम्मान पूर्ण व्यवहार रहा ? और यदि वह ऐसा कर रहे थे तो इसका एक ही कारण था कि वह अपने आपको इसके मूल से जुड़ा हुआ अनुभव करते थे।
इससे पहले कि हम गुर्जरों के विदेशी या भारतीय होने पर प्रकाश डालें , हम चाहेंगे कि पहले भारत के प्राचीन इतिहास की उस परम्परा पर थोड़ा प्रकाश डाला जाए जो हम सबको एक ही मूल का सिद्ध करने के लिए बहुत प्रमाणिक है। इसके लिए भारत के प्राचीन साहित्य की पड़ताल करना आवश्यक है। इतिहास की अनेकों घटनाओं का उल्लेख पुराणों में मिलता है । पुराण वास्तव में इतिहास की ही पुस्तकें हैं जो पौराणिक काल के इतिहासवृत्त को सुरक्षित रखने के लिए लिखी गयीं । शतायु’ पुराण के अनुसार धरती के सात द्वीपों का हमें पता चलता है । जिनके नाम जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर थे। इनमें से जम्बूद्वीप सभी के मध्य स्थित है। इस जंबू द्वीप को विद्वानों ने आज के यूरोप और एशिया से मिलकर बना हुआ माना है। पुराणों की उपरोक्त साक्षी से यह स्पष्ट है कि संपूर्ण भूमंडल के सातों द्वीपों पर आर्यों का ही शासन था और आर्य संपूर्ण भूमंडल के प्रत्येक क्षेत्र से परिचित थे ।पुराणों की साक्षी से यह भी सिद्ध है कि पहले संपूर्ण आर्य / हिन्दू जाति जम्बू द्वीप पर शासन करती थी। स्पष्ट है कि यूरोप और एशिया के जितने भर भी देश आज हमें विश्व मानचित्र पर दिखाई देते हैं वे सबके सब प्राचीन काल के वैदिक धर्मी आर्यों और कालांतर में उनके स्थान पर हिंदू के नाम से पुकारे गए हमारे पूर्वजों की ही संतानों के देश हैं।
इस जम्बू द्वीप के भी 9 खंड थे :- इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भरत, हरि, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय। इन 9 खंडों में से भरत नाम के खंड को भरतखंड या भारतवर्ष के नाम से जाना गया। इस भरत खंड का उससे पूर्व का नाम अजनाभ था ।
इस भरत खंड के भी नौ खंड थे- इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान, नागद्वीप, सौम्य, गंधर्व और वारुण तथा यह समुद्र से घिरा हुआ द्वीप उनमें नौवां है। यह भारतवर्ष अफगानिस्तान के हिन्दुकुश पर्वतमाला से अरुणाचल की पर्वत माला और कश्मीर की हिमालय की चोटियों से कन्याकुमारी तक फैला हुआ था। दूसरी ओर यह हिन्दूकुश से अरब सागर तक और अरुणाचल से बर्मा तक फैला था। इसका अर्थ हुआ कि उस समय के भरतखंड के अंतर्गत आज के अफगानिस्तान बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, बर्मा, श्रीलंका, थाईलैंड, इंडोनेशिया और मलेशिया आदि देश आते थे।
इस भरत खंड में कुरु, पांचाल, पुण्ड्र, कलिंग, मगध, दक्षिणात्य, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर, अर्बुदगण, कारूष, मालव, पारियात्र, सौवीर, सन्धव, हूण, शाल्व, कोशल, मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण आदि रहते हैं। इसके पूर्वी भाग में किरात और पश्चिमी भाग में यवन बसे हुए थे।
वायु पुराण के अनुसार त्रेतायुग के हजारों वर्ष पूर्व प्रथम मनु स्वायंभुव मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने इस भारतवर्ष को बसाया था । वायु पुराण के अनुसार महाराज प्रियव्रत को कोई अपना पुत्र नहीं था। ऐसे में उन्होंने अपनी पुत्री के पुत्र अग्नीन्ध्र को गोद ले लिया था । जिसका लड़का नाभि था। नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र उत्पन्न हुआ उसका नाम ऋषभ था। इसी ऋषभ के पुत्र भरत थे तथा इन्हीं भरत के नाम पर इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ पड़ा।
प्राचीनकाल में जम्बू द्वीप ही एकमात्र ऐसा द्वीप था, जहां रहने के लिए उचित वातावरण था और उसमें भी भारतवर्ष की जलवायु सबसे उत्तम थी। यहीं विवस्ता नदी के पास स्वायंभुव मनु और उनकी पत्नी शतरूपा निवास करते थे। राजा प्रियव्रत ने अपनी पुत्री के 10 पुत्रों में से 7 को संपूर्ण धरती के 7 महाद्वीपों का राजा बनाया दिया था और अग्नीन्ध्र को जम्बू द्वीप का राजा बना दिया था। इस प्रकार राजा भरत ने जो क्षेत्र अपने पुत्र सुमति को दिया वह भारतवर्ष कहलाया।
महाभारत के अनुसार भरत का साम्राज्य सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में व्याप्त था । जिसमें वर्तमान भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान , तुर्कमेनिस्तान तथा फारस आदि क्षेत्र सम्मिलित थे। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि इन सारे देशों का अतीत भारत का अतीत है । भारत का संपूर्ण इतिहास यदि लिखा जाए तो इन देशों का इतिहास उसमें अपने आप सम्मिलित हो जाएगा । इसे हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि जैसे कोई रेलगाड़ी जिस स्थान से चली वहाँ से लेकर उसके गंतव्य स्थल तक बीच में कई स्टेशन आते हैं। जहाँ पर यात्री उतरते चढ़ते रहते हैं। एक प्रकार से भारत की प्राचीन काल से चली आ रही रेल के ये देश बीच के मार्ग में पड़ने वाले स्टेशन हैं । जिन पर किसी समय विशेष पर कुछ यात्री ( देश ) उतर गए अर्थात भारत से अलग हो गये ।
1947 से पूर्व पाकिस्तान में जन्मे लालकृष्ण आडवाणी और डॉ मनमोहन सिंह भारत की राजनीति में उच्चतम शिखर पर पहुंचे । भारत के लोगों ने उन्हें भरपूर सम्मान और प्यार भी दिया है। यह केवल इसलिए ही संभव हुआ है कि इन दोनों और इन जैसे अन्य अनेकों लोगों ने पाकिस्तान को अपना देश न मानकर भारत को अपना देश माना और भारत की परम्पराओं के साथ अपना आत्मीय भाव प्रदर्शित किया । फलस्वरूप यह विदेशी नहीं माने जा सकते । ऐसे ही जो लोग जंबूद्वीप में कहीं भी पैदा हुए और पर उन्होंने भारत के साथ अपने आत्मीय संबंध को बनाए रखा और भारत को ही अपना देश मानते रहने की परंपरा का निर्वाह किया , वे चाहे जंबूद्वीप में इधर से उधर कहीं चले गए हों परंतु उन्हें भारतीय ही माना जाएगा , यह बात ध्यान रखने योग्य है।

बीबीसी ने भी फैलाई भ्रांति

भारत में गुर्जरों के विदेशी होने की भ्रांति फैलाने वालों में बीबीसी का भी नाम सम्मिलित है । जब राजस्थान में गुर्जर आरक्षण आंदोलन चल रहा था तब 29 दिसंबर 2010 को बीबीसी की ओर से जारी की गई एक रिपोर्ट में कहा गया कि प्राचीन इतिहास के जानकारों के अनुसार गूजर मध्य एशिया के कॉकेशस क्षेत्र ( अभी के आर्मेनिया और जॉर्जिया) से आए थे लेकिन इसी इलाक़े से आए आर्यों से अलग थे।
कुछ इतिहासकार इन्हें हूणों का वंशज भी मानते हैं।
भारत में आने के बाद कई वर्षों तक ये योद्धा रहे और छठी सदी के बाद ये सत्ता पर भी क़ाबिज़ होने लगे। सातवीं से 12 वीं सदी में गूजर कई जगह सत्ता में थे।
गुर्जर-प्रतिहार वंश की सत्ता कन्नौज से लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात तक फैली थी।
मिहिरभोज को गुर्जर-प्रतिहार वंश का बड़ा शासक माना जाता है और इनकी लड़ाई बिहार के पाल वंश और महाराष्ट्र के राष्ट्रकूट शासकों से होती रहती थी।
12वीं सदी के बाद प्रतिहार वंश का पतन होना आरम्भ हुआ और ये कई हिस्सों में बँट गए।
गूजर समुदाय से अलग हुए सोलंकी, प्रतिहार और तोमर जातियाँ प्रभावशाली हो गईं और राजपूतों के साथ मिलने लगीं। अन्य गूजर कबीलों में बदलने लगे और उन्होंने खेती और पशुपालन का काम अपनाया।
ये गूजर राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों में फैले हुए हैं।
इतिहासकार कहते हैं कि विभिन्न राज्यों के गूजरों की शक्ल सूरत में भी फ़र्क दिखता है।राजस्थान में इनका काफ़ी सम्मान है और इनकी तुलना जाटों या मीणा समुदाय से एक हद तक की जा सकती है। उत्तर प्रदेश, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में रहने वाले गूजरों की स्थिति थोड़ी अलग है जहां हिंदू और मुसलमान दोनों ही गूजर देखे जा सकते हैं जबकि राजस्थान में सारे गूजर हिंदू हैं। मध्य प्रदेश में चंबल के जंगलों में गूजर डाकूओं के गिरोह सामने आए हैं ।समाजशास्त्रियों के अनुसार हिंदू वर्ण व्यवस्था में इन्हें क्षत्रिय वर्ग में रखा जा सकता है लेकिन जाति के आधार पर ये राजपूतों से पिछड़े माने जाते हैं।पाकिस्तान में गुजरावालां, फैसलाबाद और लाहौर के आसपास इनकी अच्छी ख़ासी संख्या है।भारत और पाकिस्तान में गूजर समुदाय के लोग ऊँचे ओहदे पर भी पहुँच हैं. इनमें पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति फ़ज़ल इलाही चौधरी और कांग्रेस के दिवंगत नेता राजेश पायलट शामिल हैं।
बीबीसी के उपरोक्त विवरण से ऐसा लगता है कि जैसे गुर्जर भारत में बाहर से आए और यहां के किसी क्षेत्र विशेष पर बलात अपना कब्जा कर शासन करने लगे । उनका इस देश या इस देश की संस्कृति से कोई आत्मिक लगाव नहीं था। वे एक लुटेरे या हमलावर के रूप में आए और यहां बस गए । जिसे धीरे-धीरे भारत ने स्वीकार कर लिया । भारत के प्रति शत्रुभाव रखने वाले इतिहासलेखकों को ऐसा लिखने से यह कहने का अवसर मिलता है कि – ‘काफिले आते गए और हिन्दोस्तान बनता गया ।’ जो लोग बीबीसी को एक प्रमाणिक संस्था मानते हैं उनकी सोच में यह बात पूर्णतया सटीक बैठ सकती है कि जो उसने कहा वह बिल्कुल ठीक है । परंतु सच यह नहीं है । सच की पड़ताल करने के लिए हमें आर्यावर्त , भरतखंड और जंबूद्वीप की वास्तविकता को देखना होगा और यह भी पड़ताल करनी होगी कि क्या जंबूद्वीप के निवासियों को उस समय किस नाम से पुकारा जाता था और यदि वह सब आर्य थे तो वहां से आकर अपने ही देश में किसी समय विशेष पर उनके बस से वह विदेशी नहीं हो गये । इसे ऐसे ही माना जा सकता है जैसे आज के भारतीय पंजाब का कोई व्यक्ति तमिलनाडु में जाकर बस जाए तो आने वाले समय में उसकी पीढ़ियों को विदेशी नहीं कहा जा सकता ।

आजकल कहां कहां बसे हैं गुर्जर

भारत में गुर्जर समाज प्राचीन काल से ही एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है । इसने अपनी वीरता ,शौर्य पराक्रम और देशभक्ति के कार्यों से अलग-अलग समय पर नए-नए कीर्तिमान स्थापित किये हैं । इसे हम इतिहास में गुज्जर, गूजर, गोजर, गुर्जर, गूर्जर और वीर गुर्जर  के नाम से भी जानते हैं।
आजकल गुर्जर समाज के लोग उत्तर भारत सहित  पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में भी बसे हैं। अपने शौर्य और पराक्रम के कारण इस जाति का नाम अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रगान में भी आता है। गुर्जरों के ऐतिहासिक प्रभाव के कारण उत्तर भारत और पाकिस्तान के बहुत से स्थान गुर्जर जाति के नाम पर रखे गए हैं, जैसे कि भारत का गुजरात राज्य, पाकिस्तानी पंजाब का गुजरात ज़िला और गुजराँवाला ज़िला और रावलपिंडी ज़िले का गूजर ख़ान शहर। इसी प्रकार अन्य स्थानों पर भी गुर्जरों के नाम से स्थान विशेष को पुकारा जाता है । जिनसे पता चलता है कि इस समाज के लोग कभी विशाल भूभाग पर अपना या तो प्रभाव रखते थे या शासन स्थापित कर शासक की भूमिका में रहकर काम करते थे।

गुर्जरों की उत्पत्ति

गुर्जरों की उत्पत्ति पर यदि विचार किया जाए तो गुर्जर अभिलेखों के अनुसार ये लोग सूर्यवंशी या रघुवंशी हैं।
स्पष्ट है कि गुर्जर सूर्यवंशी या रघुवंशी अपने आप को यदि मानते हैं और उनके अभिलेख इस बात की पुष्टि करते हैं तो इसका एक ही कारण है कि भारत का सबसे पहला क्षत्रिय राजवंश सूर्यवंश ही है । जो बाद में रघुवंश के नाम से भी जाना गया । इसी में श्री रामचंद्र जी का जन्म हुआ । इस प्रकार सूर्यवंशी या रघुवंशी गुर्जर समुदाय के लोग भारत के सबसे पहले क्षत्रिय राजवंश की परंपरा के ध्वजवाहक हैं।
प्राचीन महाकवि राजशेखर ने गुर्जरों को ‘रघुकुल-तिलक’ तथा ‘रघुग्रामिणी’ कहा है। इससे भी पता चलता है कि गुर्जर लोग सूर्यवंशी क्षत्रिय राजवंशी परंपरा के ही हैं । 7 वीं से 10 वीं शतब्दी के गुर्जर शिलालेखों पर सूर्यदेव की कलाकृतियाँ भी इनके सुर्यवंशी होने की पुष्टि करती हैं।  राजस्थान में आज भी गुर्जरों को सम्मान से ‘मिहिर’ कहकर लोग आज भी बुलाते हैं । मिहिर का अर्थ भी सूर्य से ही है। राजस्थान के लोगों में यह परम्परा आज भी प्रचलित है कि गुर्जर लोग रघुवंशी अर्थात सूर्यवंशी हैं।
 कुछ इतिहासकारों की ऐसी भी मान्यता है कि ये गुर्जर  लोग मध्य एशिया के कॉकस क्षेत्र (अभी के आर्मेनिया और जॉर्जिया) से आए आर्य योद्धा थे।
कुछ विद्वानों का ऐसा ही कहना है कि गुर्जर एक संस्कृत शब्द है । जिसका अर्थ ‘शत्रु का नाश करने वाला’ अर्थात ‘शत्रु विनाशक’ होता है। प्राचीन महाकवि राजशेखर ने गुर्जर नरेश महिपाल को अपने महाकाव्य में दहाड़ता गुर्जर कह कर सम्बोधित किया है।
हमारी मान्यता है कि काकस , आर्मेनिया आदि से गुर्जरों के यहां आने को विदेशों से उनका आना माना जाना उचित नहीं है । इसके लिए यह देखने की आवश्यकता है कि जिस समय गुर्जर किसी भी क्षेत्र से भारत में आए उस समय वह देश अस्तित्व में था या नहीं ? या वह भारतवर्ष का ही एक भूभाग था।
जिन इतिहासकारों ने गुर्जरों को विदेशी जाति माना है उनमें डॉक्टर डीआर भंडारकर का नाम सबसे पहले लिया जा सकता है। यद्यपि यतेंद्र कुमार वर्मा, रतन लाल वर्मा , गणपतसिंह , मुल्तान सिंह वर्मा , स्वामी वासुदेवानंद तीर्थ , गौरीशंकर हीराचंद ओझा , डॉ दशरथ शर्मा , बी .एन. पुरी , सी. वी. वैद्य आदि विद्वान इस बात से सहमत नहीं हैं कि गुर्जर एक विदेशी जाति है। डॉक्टर डीआर भंडारकर गुर्जर्स पर शोध पत्र , जर्नल ऑफ दी बॉम्बे ब्रांच ऑफ द रॉयल एशियाटिक सोसायटी खंड – 21 , पृष्ठ 411 पर अपने उक्त मत को व्यक्त करते हैं।
डॉ भंडारकर और उनके मत का समर्थन करने वाले विद्वानों की मान्यता है कि गुर्जरों को ‘खजर’ जाति से जोड़कर देखा जाए । दूसरे , हूण गुर्जरों के साथ स्थायी रूप से बड़े पैमाने पर राजपूताना में बस गए थे – ऐसा भी स्वीकार किया जाए। डॉ भंडारकर और उनके साथियों के इस मत में कोई दम दिखाई नहीं देता । इन लोगों का खजर जाति का होना मात्र ही उनको गुर्जर के साथ स्थापित करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं बन जाता । इसके अतिरिक्त हूणों के आक्रमण स्कंद गुप्त के काल में हुए हैं । उनका भी गुर्जरों की सामाजिक व्यवस्था के साथ कोई समन्वय स्थापित नहीं दीखता।

गुर्जर ईरानी मूल के थे ?

कुछ इतिहासकारों का ऐसा भी मानना है कि गुर्जरों का सम्बन्ध ईरानियों से रहा है , अर्थात गुर्जर ईरानी मूल के हैं । कैनेडी महोदय गुर्जरों को सूर्य का उपासक होने के कारण ईरानियों के साथ जोड़ने का बेतुका प्रयास करते हैं । उनका मानना है कि गुर्जर लोग ईरान से ही आए थे। हमारा मानना है कि कैनेडी महोदय की इस बात में भी कोई दम नहीं है। क्योंकि हम पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत सूर्योपासना करने वाले लोगों का देश रहा है । सूर्यवंशी शासक यहाँ पर सबसे पहले हुए । इसलिए सूर्य की उपासना करने वाले लोग केवल वही हो सकते हैं जो भारत की संस्कृति में विश्वास रखते हों और अपने आपको भारतीय पूर्वजों की सन्तान मानते हों ।
हमारा मानना है कि ईरान स्वयं कभी एक ‘आर्यान’ प्रांत के नाम से जाना जाता था । यह कोई अलग देश नहीं था । ‘आर्यान’ प्रांत होने से इसका संबंध स्वयं ही आर्यों और उनकी संस्कृति से जुड़ जाता है। ऐसे में यह स्पष्ट हो जाता है कि ईरान के पूर्वज भी आर्य संस्कृति के ही उपासक थे और वे स्वयं भी आर्य ही थे । यदि उन आर्य लोगों में सूर्योपासना का विचार देर तक बना रहा तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है । जब संपूर्ण भूमंडल पर आर्यों का शासन था तो आर्यान प्रांत पर भी उनका शासन था । इसलिए आर्यों की परम्पराएं वहां पर मिलती हैं तो इसका अभिप्राय यह नहीं हो जाता है कि आर्यान प्रांत से निकलकर कोई व्यक्ति यदि उस समय के अपने ही देश अर्थात आर्यावर्त में आ गया तो वह विदेशी हो गया । इसी बात को यदि कैनेडी महोदय इस प्रकार कहते कि भारत के आर्यों की ही सन्तानें ईरान में निवास करती थीं और ईरानी और गुर्जरों की बहुत सी बातें समान हैं , इसलिए यह दोनों एक ही वंश परंपरा के और एक ही संस्कृति के उत्तराधिकारी माने जाने चाहिए तो उनकी बात को माना जा सकता था । परंतु कहने का ढंग दूसरा होने से हम उनसे इस बात पर असहमत हैं । ईरान हमारे लिए विदेश नहीं था और वहां के लोगों की और भारत के लोगों की उस समय की परम्पराओं में कोई विशेष अन्तर भी नहीं था , दोनों एक थे , दोनों का कुल एक था , दोनों का वंश एक था , दोनों की परम्पराएं , दोनों की संस्कृति और दोनों का धर्म एक था । तब आज की कुछ समानताओं को देखकर वहां से गुर्जरों का निकास मानना सर्वथा अतार्किक ही है।

गुर्जर सीथियन मूल के थे ?

चंद्रबरदायी कृत ‘पृथ्वीराज रासो’ में राजपूतों की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए बताया गया है कि यह अग्निकुंड से उत्पन्न हुए थे । जिनमें प्रतिहार , चालुक्य , चौहान और परमार क्षत्रिय वंश प्रमुख हैं । इस अग्निकुंड की चर्चा ‘हम्मीर रासो’ , ‘नैणसी री ख्यात’ , ‘वंशभास्कर’ में भी मिलती है ।अग्निकुंड की इस गाथा को सही मानकर डॉ भंडारकर , कर्नल टॉड , स्मिथ जैसे विद्वानों ने गुर्जरों का सम्बन्ध सिथियनों के साथ जोड़ने का प्रयास किया है।
वास्तव में ‘अग्निकुंड की गाथा’ को भी गलत ढंग से समझने का प्रयास किया गया है । हमें यह समझना चाहिए कि अग्निकुंड से किसी की उत्पत्ति नहीं हो सकती । हाँ , अग्निकुंड पर बैठकर संकल्प अवश्य लिया जाता है । भारतीय इतिहास में ऐसे अनेकों अवसर आए हैं , जब क्षत्रिय लोगों ने अपने देश व धर्म की रक्षा के लिए अग्निकुंड के समीप बैठकर सौगंध उठाई है । कुछ ऐसा ही आबू पर्वत पर रचे गए इस यज्ञ के अवसर पर हुआ था । जब हमारे क्षत्रियों ने भारतीय देश , धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए एक महान संकल्प लिया था । वास्तव में यह अग्निकुंड की घटना हमारे उन चार क्षत्रिय कुलों की यशोगाथा को जन्म देने वाली घटना है जिसने आगे चलकर भारत के लिए बहुत क्रांतिकारी कार्य किया , यद्यपि इसे इतिहास में उचित स्थान नहीं दिया गया।
अग्निकुंड की इस कहानी पर राजस्थान के इतिहासकार श्री देवीसिंह जी मंडावा लिखते है कि – “जब वैदिक धर्म ब्राह्मणों के नियंत्रण में आ गया था और बुद्ध ने इसके विरुद्ध बगावत कर अपना नया बौद्ध धर्म चलाया तो शनै: शनै: क्षत्रिय वर्ग वैदिक धर्म त्यागकर बौद्ध धर्मी बन गया । क्षत्रियों के साथ साथ वैश्यों ने भी बौद्ध धर्म अंगीकार कर लिया ।
क्षत्रियों के बौद्ध धर्म ग्रहण करने के पश्चात उनकी वैदिक परम्परायें भी नष्ट हो गई और वैदिक क्षत्रिय जो कि सूर्य व चंद्रवंशी कहलाते थे, उन परम्पराओं के सम्राट हो गये तथा सूर्य व चन्द्रवंशी कहलाने से वंचित हो गये । क्योंकि ये मान्यतायें और परम्परायें तो वैदिक धर्म की थी जिन्हें वे परित्याग कर चुके थे ।यही कारण है कि ब्राह्मणों ने पुराणों तक में यह लिख दिया कलियुग में ब्राह्मण व शुद्र ही रह जायेंगे व कलियुग के राजा शुद्र होंगे, बौद्ध के अत्याचारों से पीड़ित होकर ब्राह्मणों ने बुद्ध धर्मावलम्बी क्षत्रिय शासकों को भी शुद्र की संज्ञा दे डाली । दुराग्रह से ग्रसित हो उन्होंने यह भी लिख दिया कि कलियुग में वैश्य और क्षत्रिय दोनों लोप हो जायेंगे ।
उस काल में समाज की रक्षा करना व शासन चलाना क्षत्रियों का उतरदायित्व था, चूँकि वे बौद्ध हो गये थे अत: वैदिक धर्म की रक्षा का जटिल प्रश्न ब्राह्मणों के सामने उपस्थित हो गया । इस पर ब्राह्मणों के मुखिया ऋषियों ने अपने अथक प्रयासों से चार क्षत्रिय कुलों को वापस वैदिक धर्म में दीक्षित करने में सफलता प्राप्त कर ली । आबू पर्वत पर यज्ञ करके बौद्ध धर्म से वैदिक धर्म में उनका समावेश किया गया। यही अग्निकुंड का स्वरूप है ।वे प्राचीन सूर्यवंशी व चन्द्रवंशी ही थे इसलिए बाद में शिलालेखों में भी तीन वंश अपने प्राचीन वंश का हवाला देते रहे लेकिन परमारवंश ने प्राचीन वंश न लिखकर अपने आपको अग्निवंश लिखना शुरू कर दिया ।
कुमारिल भट्ट ई.700 वि. 757 ने बड़ी संख्या में बौद्धों को वापस वैदिक धर्म में लाने का कार्य शुरू किया जिसे आगे चलकर आदि शंकराचार्य ने पूर्ण किया । अत: इन चार क्षत्रिय वंशों को वैदिक धर्म में वापस दीक्षा दिलाने का कार्य उसी युग में होना चाहिए। आबू के यज्ञ में दीक्षा का एक ऐतिहासिक कार्यक्रम था जो छठी या सातवीं सदी में हुआ है । यह कोई कपोल कल्पना या मिथ नहीं था , बल्कि वैदिक धर्म को वापस सशक्त बनाने का प्रथम कदम था जिसकी स्मृति में बाद में ये वंश अपने आपको अग्निकुंड से उत्पन्न अग्निवंशी कहने लग गये ।आज भी आबू पर यह यज्ञ स्थल मौजूद है ।”
वास्तव में अग्नि कुंड की यह घटना भारत के इतिहास की एक बहुत ही महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी घटना है , जब वैदिक संस्कृति के प्रति पूर्णत: समर्पित रहे आदि शंकराचार्य जी ने इस महान यज्ञ का आयोजन ,इस उद्देश्य से किया था कि भारत की संस्कृति को बचाने के लिए फिर से क्षत्रिय धर्म की स्थापना की जाए । क्योंकि वह इस बात को लेकर बहुत दुखी थे कि भारत की क्षत्रिय परंपरा को बौद्ध धर्म की अहिंसा का जंग लग चुका है । जिससे विधर्मियों को भारत पर आक्रमण करने का अवसर उपलब्ध होने लगा था । फलस्वरूप उन्होंने बौद्ध धर्म की अहिंसा के बढ़ते वर्चस्व पर लगाम लगाने के लिए और इस्लाम की खूनी तलवार का सामना करने के लिए इस यज्ञ का आयोजन इस उद्देश्य से कराया कि क्षत्रिय लोग फिर अपने आप को पहचानें और जो लोग देश , धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए अपने आप को समर्पित कर सकते हैं , वे अपना सर्वस्व देशहित न्यौछावर करने के उद्देश्य को लेकर सामने आएं ।
जिस पर क्षत्रियों के चार कुलों के योद्धाओं ने शंकराचार्य जी को यह विश्वास दिलाया कि वह संकल्प लेते हैं कि किसी भी स्थिति में भारत को गुलाम नहीं होने देंगे और भारत की संस्कृति के विनाश के जो भी षड्यंत्र भीतरी और बाहरी तौर पर रचे जा रहे हैं उन सबका डटकर सामना करेंगे। इतिहास की इतनी महत्वपूर्ण घटना को हल्के में करके दिखाया जाता है और यह कह दिया जाता है कि अग्नि कुंड से चार क्षत्रियों की उत्पत्ति हुई। इस मूर्खता को यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से और वास्तविकता के सांचे में ढालकर हमारे समक्ष प्रस्तुत किया जाए तो इतिहास का गौरवपूर्ण पक्ष हमारे सामने आएगा। शंकराचार्य जी के इन महान कार्यों को देखकर ही महर्षि दयानंद ने उनके बारे में यह कहा है कि यदि उस समय वैदिक संस्कृति के उत्थान के लिए शंकराचार्य जी परिश्रम न कर पाते तो बहुत संभव था कि वैदिक संस्कृति उसी समय विलुप्त हो गई होती।
जो लोग इस घटना को सिथियनों के साथ गुर्जरों की उत्पत्ति से जोड़ते हैं उनसे यह पूछा जा सकता है कि इस घटना का सिथियनों से क्या मेल है ? आबू पर्वत आज भी भारत में है , शंकराचार्य जी भारत के थे , और प्रतिहार , सोलंकी , परमार और चौहान नाम के वे चारों क्षत्रिय कुल आज भी भारत में ही मिलते हैं जिन्होंने शंकराचार्य जी को उस समय यह विश्वास दिलाया था कि वे हर स्थिति में भारत की एकता और अखंडता के लिए काम करेंगे और भारत के भीतरी और बाहरी शत्रुओं से लड़कर उनका सफाया करने में किसी प्रकार का आलस्य , प्रमाद या संकोच नहीं करेंगे। इस घटना से यह भी समझना चाहिए कि गुर्जर जाति के लोगों ने अथवा योद्धाओं ने भारत की संस्कृति की रक्षा के लिए अपने आप को समर्पित किया था । उनके लिए भारत पहले था , भारत की संस्कृति पहले थी , भारत का धर्म और भारत की परंपराएं पहले थीं – बाकी सब कुछ बाद में था । ऐसे धर्म योद्धाओं और संस्कृति उद्धारकों को विदेशी मानना या उसके लिए अनावश्यक परिश्रम करना समय को नष्ट करना मात्र है।
जिन लोगों ने गुर्जर जाति को किसी कबीले के रूप में माना है , हमारा उनसे भी यह आग्रह है कि वह भी इस प्रकार की अतार्किक और असंगत बातों को परोसने से अपने आप को दूर रखें । कबीला शब्द अपने आप में एक ऐसी संस्कृति को दिखाने वाला शब्द है जहाँ एक कबीला दूसरे कबीले से लड़ता है। दूसरे के खून का प्यासा होता है , दूसरे को मिटा देना चाहता है । जबकि भारत में वर्ण व्यवस्था एक ऐसी पवित्र व्यवस्था है जिसमें एक वर्ण के लोग शेष वर्णों के लोगों के कल्याण के लिए अपना धर्म निभाते हैं , अपना कर्तव्य कर्म करने के लिए प्रयासरत रहते हैं। हमारे यहां वर्ण व्यवस्था जाति में परिवर्तित होने के उपरांत भी अपने आपको किसी एक मूल तने की शाखा मानती है। शाखा और कबीला दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। कबीला एक अलग अस्तित्व खोजता है जबकि शाखा किसी मूल के साथ अपने आप को जोड़ कर देखती है । इसलिए हमारी सोच कभी भी हिंसक नहीं थी , ना है और ना होगी ।क्योंकि हम किसी एक मूल की शाखा हैं और अपने आपको अपने उसे मूल से जुड़ा रहने में गर्व और गौरव की अनुभूति करते हैं। हम अनेकों वर्गों ,संप्रदायों ,जातियों , उप जातियों के होकर भी अपने एक मूल से जुड़े होने के कारण स्वयं को एक परिवार का सदस्य अनुभव करते हैं और वैसे ही रहने के सहज अभ्यासी हैं जैसे परिवार में परिवार के लोग रहते हैं। जबकि कबीला वाले लोग इस प्रकार नहीं रहते।
कर्नल टॉड गुजरात के चापों को सीथियन मानते रहे । क्योंकि चाप उनकी दृष्टि में विदेशी थे और चाप गुर्जरों की एक शाखा है ,साथ ही सोलंकियों का संबंध भी चापों से रहा है , इसलिए टॉड की मान्यताओं को उनके समर्थक भारतीय लेखकों ने सही मानते हुए यह स्थापित करने का प्रयास किया कि गुर्जर लोग भी विदेशी थे । हमारा मानना है कि कर्नल टॉड की उक्त मान्यता में दोष के अतिरिक्त और कुछ नहीं है , इसलिए उसे गुर्जरों के बारे में सही मानना उचित नहीं है।

गुर्जरों को विदेशी मानने वाले विद्वानों के मतों का निष्कर्ष

जिन विद्वानों का मत है कि गुर्जर लोग विदेशी थे उनके मत का सार संक्षेप इतना है कि ये लोग गुर्जरों को विजेता के रूप में भारत आना स्वीकार करते हैं। विभिन्न इतिहासकारों ने यूची ,खर्जर , शक , हूण , कुषाण , तुखार , कुसुर आदि से उनका सम्बन्ध होना स्थापित किया है । इन विद्वानों की मान्यता यह भी है कि मध्य एशिया , समरकंद, बलखबुखारा , ताहिया , गॉर्जिया , सीस्तान (ईरान ) खोतान , कैस्पियन सागर का निकटवर्ती स्थान ख़्वारेजम ,अफगानिस्तान आदि को अलग-अलग रूप से गुर्जरों का इतिहास मूल स्थान माना जाए ।
जब गुर्जरों को या किसी भी जाति को हमारे ये तथाकथित विद्वान लेखक विदेशी सिद्ध करने का प्रयास करते हैं तो वे यह भूल जाते हैं कि वह जिन स्थानों का नाम भारत की किसी विशेष जाति को विदेशी सिद्ध करने के लिए ले रहे हैं वास्तव में उनके द्वारा बताए जाने वाले वे स्थान तो मूल रूप में भारत के ही एक अंग रहे हैं । यहां पर भी यही बात है कि जितने भी स्थान इन विद्वानों ने ऊपर गिनाए हैं कि गुर्जर जाति संभावित रूप से इन -इन स्थानों से निकलकर के भारत में आई – भी मूल रूप में भारत के ही अंग रहे हैं । इसलिए भारत में गुर्जर जाति को इन स्थानों से निकलने के आधार पर विदेशी नहीं माना जा सकता।
वास्तव में भारत की प्राचीन काल से चली आ रही क्षत्रिय परंपरा की प्रतिनिधि जाति के रूप में गुर्जर जाति को माना जाना न्यायोचित होगा । इसका कारण यह है कि इसने ही वह गुरुतर दायित्व निभाया जो आदि शंकराचार्य जी ने आबू अग्निकुंड पर क्षत्रियों को प्रदान किया था अर्थात देश , धर्म व संस्कृति की रक्षा का संकल्प लेकर दीर्घकाल तक मुस्लिम आक्रांताओं को भारत में प्रवेश करने से रोका।
यदि गुर्जर जाति विदेशी होती तो विदेशियों से लड़ने के लिए वह सीमा पर अपने आपको समर्पित ना करती।
यहां पर हम अरबवासियों को इस समय विदेशी मान रहे हैं । यद्यपि हमारा उनके बारे में भी यह स्पष्ट मानना है कि अरब भी कभी वैदिक संस्कृति का गढ़ रहा था । उसके अनेकों स्पष्ट प्रमाण हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि मक्का और मदीना या अरब के अन्य ऐतिहासिक स्थलों में भी कभी वैदिक धर्म ध्वजा ही फहराती थी। जब अरब वाले भारत की ओर चले तो उनका उद्देश्य भारत की संस्कृति और धर्म का सर्वनाश कर अपने मजहब और अपनी संस्कृति का परचम फ़हराना था। उनकी यह सोच उन्हें पहले दिन से ही भारत से अलग करती है । विपरीत मजहब तथा विपरीत सोच एक अलग देश को पैदा करते हैं । उनका मजहब , उनकी सोच और उनका आक्रमण करने का उद्देश्य यह सब कुछ ऐसे थे जो भारत को मिटाना चाहते थे । जबकि गुर्जर प्रतिहार लोगों का या योद्धाओं का उद्देश्य था कि उस विपरीत सोच , विपरीत मजहब और विपरीत संस्कृति को भारत की संस्कृति को मिटाने में सफल नहीं होने दिया जाएगा। इस चिंतन को भी तर्क तराजू पर तौल कर देखने की आवश्यकता है और यह समझने की आवश्यकता है कि जो लोग इस देश को अपना देश मानकर इसके लिए अपना सब सर्वस्व बलिदान करने को तैयार थे वह भारत के ही थे , किसी अन्य देश के नहीं हो सकते।

अंग्रेजों ने चलाया था भारतीयों को विदेशी सिद्ध करने का कुचक्र

‘आर्यों का आदि देश और उनकी सभ्यता’ – नामक अपनी पुस्तक में की प्रस्तावना में स्वामी विद्यानंद सरस्वती जी पृष्ठ संख्या 9 व 10 पर , अंग्रेजों के द्वारा किस प्रकार भारत में आर्यों सहित अनेकों जातियों को विदेशी सिद्ध करने का कुचक्र किन उद्देश्यों से प्रेरित होकर चलाया ? – इस पर प्रकाश डालते हुए 1899 ई0 में मूल रूप से और 1936 ई0 में पुनः प्रकाशित ‘संस्कृत साहित्य का इतिहास ‘ के लेखक ऑर्थर ए. मैकडानल को उद्धृत करते हुए उस पुस्तक के कुछ अंशों को इस प्रकार लिखते हैं : —
1 – आर्यों के आक्रमण के बाद बड़ी तेजी से आर्य सभ्यता ने भारत उपखंड में एक अनोखा विस्तार कर लिया । पृष्ठ 72
2 – वास्तव में भारत में इतिहास का अस्तित्व ही नहीं है । ऐतिहासिक अस्मिता का इतना अभाव है कि सारे संस्कृत साहित्य पर इसकी छाया पड़ी है और कालक्रम का तो संस्कृत साहित्य में सर्वथा अभाव है। पृष्ठ – 10
3 — भारतीयों ने इतिहास लिखा ही नहीं , क्योंकि उन्होंने कभी कोई ऐतिहासिक कार्य नहीं किया ।
पृष्ठ 11
4 — भारत पर प्रथम आक्रमण पश्चिम से आर्यों ने किया । वह पश्चिमोत्तर घाटियों पर उतरे जहां भारत की समतल भूमि पर सदा से आक्रमणों की लहरें आती रहीं । पृष्ठ 40
5 — इतिहास पूर्व काल में जिन आर्यों ने भारत को जीता था वे स्वयं पुराने समय से बाहरी आक्रमणों के शिकार होते चले आए थे । पृष्ठ 408
6 – बेहिस्तून तथा पर्सीपोलिस के शिलालेख बताते हैं कि साइरस – 1 का पुत्र दरायूस हिस्तेसपीस केवल गांधार पर ही नहीं , भारत के लोगों पर भी राज्य करता था । हीरोडोटस भी कहता है कि वह बादशाह उत्तर भारत पर शासन करता था । ईरानी साम्राज्य को भारत सबसे कीमती भेंट देता था तथा जिस सोने के रूप में वह दी जाती थी वह किसी पूर्वी मरुस्थल से आता था । जिसे खोदने वाली चीटियां लोमड़ी से भी बड़ी होती थीं । पृष्ठ 409
7 — ईसा पूर्व 120 से 178 ईसा के बाद तक कुषाण जातियां भारत पर आक्रमण करने में अगवा थीं । उसकी स्मृति भारत के लोगों ने शक वर्ष के रूप में आज तक संजोकर रखी हैं । इसका आरंभ ईसवी सन 78 से होता है। जब उस जाति के सबसे बड़े राजा कनिष्क का राज्याभिषेक हुआ था । इसके बाद शकों के आक्रमण होते रहे । भारत के अनेक राज्यों के टुकड़े हो गए। ईस्वी सन् 1000 ( पूर्णतया झूठ ) के आसपास भारत को मुसलमानों ने जीता । पृष्ठ 413
इस प्रकार भारत सदा से हारने वाला देश रहा है — यह सार संक्षेप है , उस इतिहास का जिसे झूठा होते हुए भी हमने अपनी मानसिक दासता के कारण ”आंग्ल वाक्यम प्रमाणम” के अनुसार स्वीकार किया हुआ है । ”
हमने झूठे इतिहास को पढ़ा और उसको सच मानकर अपने विद्यालयों में भी बच्चों को पढ़ाना आरम्भ किया। उसका परिणाम यह निकला कि झूठ हमारे मन मस्तिष्क में एक सत्य के रूप में स्थापित हो गया। फलस्वरूप 4 सितंबर 1977 को संसद में बेहद शर्मनाक दृश्य उपस्थित हुआ , जब राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य फ्रैंक एंथोनी ने मांग की थी कि संविधान के आठवें परिशिष्ट में परिगणित भारतीय भाषाओं की सूची में से संस्कृत को निकाल देना चाहिए। क्योंकि यह विदेशी आक्रांताओं अर्थात आर्यों के द्वारा लाई जाने के कारण विदेशी भाषा है।
स्वामी विद्यानंद जी ही हमें बताते हैं कि सन 1978 के प्रारंभ में भारत ने अपना पहला उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ा था । उसका नाम भारत के प्राचीन वैज्ञानिक आर्यभट्ट के नाम पर रखा गया था । इस अवसर पर 23 फरवरी 1978 को द्रमुक मुनेत्र कड़गम के प्रतिनिधि के0 लक्ष्मणन ने राज्यसभा में मांग की थी कि भारतीय उपग्रह का नाम आर्यभट्ट नहीं रखा जाना चाहिए था , क्योंकि यह एक विदेशी नाम है।”
कहने का अभिप्राय है कि चाहे वह आर्य लोग हों या फिर गुर्जर जाति के योद्धा हों ,इन सबको विदेशी सिद्ध करने का षड्यंत्र केवल इसलिए रचा गया कि यदि इनको विदेशी घोषित कर दिया जाएगा तो जो वास्तव में विदेशी हैं या विदेशी मूल के मजहब या सोच में विश्वास रखते हैं या विदेशी चिंतन से इस देश को हांकने का प्रयास करना चाहते हैं या भारत की संस्कृति को हेय दृष्टि से देखकर किसी बाहरी संस्कृति को यहां पर थोपना चाहते हैं , उन लोगों के प्रयास तभी फलीभूत हो सकते हैं। अतः षड्यंत्र को पहचानने की आवश्यकता है और यह सोचने की भी आवश्यकता है कि जब हमारे आर्यावर्त का इतिहास हमारे पास है तो आर्य और आर्य से उत्पन्न जातियां यहीं कि मूल निवासी हैं। दूसरे आर्य, आर्यभाषा और आर्यराष्ट्र की जिस सोच को लेकर हमारे ऋषि मुनि चले थे उसको आज हम हिंदी , हिंदू , हिंदुस्तान के नाम से जानते हैं। उसका रूपांतरण चाहे हो गया हो लेकिन शब्दों का अर्थ वही है जो आर्य , आर्यभाषा और आर्य राष्ट्र या आर्यावर्त का था ।

डॉ राकेश कुमार आर्य

2 thoughts on “क्या गुर्जर एक विदेशी जाति है ?

  1. ब्राह्मणवाद से ओतप्रोत लेखन। वर्ण व्यवस्था के कट्टर समर्थन आपकी सोच को दर्शाता है।

    गुर्जरो का कुषाण, हूण गोत्र उसके विदेशी होने के प्रमाण है।
    में भी एक गुर्जर हु,अपना इतिहास एक गैर गुर्जर से जानने का इच्छुक नही।

    1. गुज्जर भारत के आदिनिवासी हिंदू है महान वीर हिंदू जाती है
      विदेशी इसाई ख्रिचन मुस्लिम आंबेडकरवादी नाव भोंदू ये हिदू विरोधी ताकद दलाल को हाथ मे लेकर आर्य गुजर राजपूत सैनी इन सभी हिंदू वीर जाती को विदेशी बताने कत कारस्थान हो गया
      ये सब जाती तुट गाय
      तो भारत से हिंदू धर्म दफन ही जायेगा अरबी मुले इसाई नावं भोंदू बुद्दू इन्के हाथे पे भारत देश चाल जायेगा
      सब हिंदू सभ्यता के निशाण मिटा जाएगी
      अरबी बर्बर इस्लामिक टोलीने पारस सभ्यता जला दिया
      क्रूर नीच अरबी सेमेतिक semetic प्रजाती ने ही प्राचीन सुमेर सभ्यता को विध्वंस किया जला दिया गया

Leave a Reply

%d bloggers like this: