इस समाजवाद को क्या नाम दूँ ?

 

समय के साथ – साथ भारत का विकास काफी तेजी के साथ हुआ है लेकिन उससे भी ज्यादा तेजी से राजनीतिक दलों के विचारधारा का विकास हुआ है । हो भी क्यों न भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिये जरुरी है कि भारत विकास का हर क्षेत्र में हो , चाहे वह वैचारिक ही क्यों न हो । ऐसी सोच इस समय के आधुनिक समाजवादियों की है तभी तो मनोरंजन के लिये ये लोग “महोत्सवों” के बहाने रस आखेट करने के लिये बेताब रहते है । अपने आप को समाजवादी कहने वाले ये लोग सैफई महोत्सव में ख़ुद को “ नायिकाओं ” के बीच पा कर काफी खुश व आनन्दित महसूस कर रहे थे। इसके लिये समाजवादियों को विगत तीन महीनों में दो बार अवसर मिला , पहला मौका था नेता जी के “ जन्मदिन महोत्सव ” का तो दूसरा “ सैफई महोत्सव ” का , लेकिन इन महोत्सवो के माध्यम से मनोरंजन भी ख़ूब हुआ । खैर अपने आप को समाजवादी कहने वाले ये लोग या तो समाजवाद की परिभाषा भूल गए है या फ़िर पश्चिमी सभ्यता के चकाचौंध से अपने आप को दूर नहीं रख पा रहे है ।

राजनेताओ के जन्मदिन महोत्सव की भव्यता की शुरुआत अपने आप को दलितों का मसीहा कहने वाली बसपा अध्यक्षा मायावतीजी ने किया था और यही से शुरू हुआ , इन महोत्सवों के नाम पर ढेर सारे खर्च होने वाले पैसों का दौर ।पिछले दिनों सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादवजी बिलायती बग्घी पर सवार हो , अपने जन्मदिन के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम स्थल तक पहुचें ।इस कार्यक्रम की भव्यता ऐसी थी , मनो कोई राजशाही कार्यक्रम हो ।इस कार्यक्रम के द्वारा पैसे को पानी की तरह बहाया गया , लेकिन हद तो तब हो गई जब ऐसे कार्यक्रमों पे ख़र्च होने वाले पैसों को ये समाजवादी नेता, आतंकियों से मिला पैसा बताने लगे। अगर इनके आदर्श “ लोहिया जी ” के विचारों पर प्रकाश डाला जाय तो अपने आप को समाजवादी कहने वाले इन लोगों को मुह की खानी पड़ेगी क्योकि जब 1954 ई० में एक वरिष्ठ मंत्री कानपुर के सर्किट हॉउस में एक लग्जरी गाड़ी से “ लोहियाजी ” से मिलने आये तो लोहियाजी ने उन्हें कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि “ कल तक तुम लोग चप्पल घसीटते थे , अब इतनी बड़ी – बड़ी गाडियों पर चलोगे तो उनमे और तुममें क्या फर्क है ।” ये मंत्री खाटी समाजवादी श्रीरामस्वरूप वर्मा जी थे । इस सर्द मौसम में हाल ही में आयोजित “ सैफई महोत्सव ” के नाम पर इटावा के सैफई में मुम्बईयां अभिनेताओं व अभिनेत्रीयों का जमावड़ा हुआ था और ये कलाकार लोग अपनी कला के माध्यम से इन समाजवादियों का ख़ूब मनोरंजन कियें । यह पहला मौका नहीं था जब सपा के द्वारा ऐसा कार्यक्रम आयोजित किया गया पिछले साल भी यह कार्यक्रम आयोजित हुआ था तथा काफी सुर्खियाँ भी बटोरने में कामयाब रहा क्योंकि एक तरफ़ मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ितों के बच्चें शर्द मौसम में अपना दम तोड़ रहे थे तो दूसरी तरफ ये खाटी समाजवादी सैफई महोत्सव में नृत्य का तड़का लगा रहे थे । बहरहाल इन समाजवादियों को इसकी कीमत 2014 के लोक सभा चुनाव में चुकानी पड़ी और उत्तर प्रदेश की सत्ता पर पूर्ण बहुमत के साथ काबिज सपा को केवल 5 संसदीय सीटों पर सिमटना पड़ा ।

इस बार के सैफई महोत्सव पर अगर ध्यान दिया जाय तो कुछ बदलाव जरुर देखने को मिला । एक तरफ इसकी शुरुआत इस बार प्रख्यात सूफ़ी गायक “ हंस राज हंस ” के सूफ़ियाना अंदाज से हुआ तो वही बीच में मुलायम सिंह जी का “ फ़ाग गायन ” भी ख़ूब चर्चा में रहा । वैसे असली समाजवादी रंग महोत्सव के अंत में देखने को मिला जब पूरा मुम्बईया समाज ऋतिक रोशन के नेतृत्व में सैफई आ धमका क्योकि समय था फ़िल्मी नृत्य का । दौर जब शुरू हुआ तो दर्शकों के साथ यें खांटी समाजवादी भी दिल थाम कर इस फ़िल्मी नृत्यांगनाओं के नृत्य का ख़ूब रसास्वादन कियें और दर्शकों के साथ तालियां भी बजाते रहें । जों एक और बदलाव देखने को मिला , वह आयटम सांग के चयन का रहा । क्योकिं इस बार नृत्य के लिये हिन्दी फ़िल्मी गीत “ श्री गणेशा देवा ” को चुना गया था जो सकारात्मक बदलाव था लेकिन समाजवाद व लोहियावाद इसे अनुमती नही देता । लोहिया जी हमेशा सरकार को जनता के सेवक के रूप में देखना पसंद करते थे और सरकार को जनता का सेवक मानते थे तभी तो उन्होंने केरल में पट्टम थाणु पिल्लई की सरकार द्वारा छात्रों पर फायरिंग कराने के मसले पर सरकार को त्याग – पत्र देने के लिए बाध्य किया ।अभी हाल ही में जहरीली शराब हत्याकांड उत्तर प्रदेश सरकार के लिये नागपाश का काम किया है क्योकि सराकर के विरोध में उत्तसाह से लबरेज विपक्षी पार्टी भाजपा आन्दोलन करने का मुड बना चुकी हैं । इस हत्याकांड में अब तक 27 लोगों ने दम तोड़ दिया हैं और 100 से ज्यादा लोग अभी भी जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं ।इस हत्याकांड की जबाबदारी से सरकार अपने आप को अलग नहीं कर सकती । अगर सपा सचमुच लोहियाजी के आदर्शों को मानती है तो सरकार के लिए केवल अधिकारियों की बर्खास्तगी ही काफी नहीं हैं , इस समाजवादी सरकार को भी अपने कार्यों का विवेचना करना होगा क्योंकि इस मामलें में सरकार भी उतनी ही जिम्मेदार हैं जितना ये बर्खास्त अधिकारी । अब मुलायम सिंह जी को यह सुनिश्चित करना पड़ेगा कि आम जनमानस इस समाजवाद को किस रूप में देखे । क्या केवल “ लोहिया ग्राम योजना ”, “समाजवादी पेन्सन योजना ” जैसी योजनाओ से समाजवादी बना जा सकता है या फिर लोहियाजी के विचारों के साथ चल कर समाजवादी बना जा सकता है । अगर सपा लोहिया जी को सही में सपा अपना “ आदर्श ” मानती है तो उसे वास्तविक समाजवाद को स्वीकारना होगा ।

नीतेश राय

 

0 thoughts on “इस समाजवाद को क्या नाम दूँ ?

  1. आदरणीय आपने इन लोहियावादियों के एक या दो जिक्र नहीं किये. इनके एक मंत्री की भेंसगुम होजाने पर पूरा पुलिस महकमा ओन ड्यूटी हो जाता है. दूसरे इनके परिवार वाद ने अबतक के सभी राजनीतिक परिवार वादियों को पीछे छोड़ दिया है . लैपटॉप बाँटने के बाद शिक्षा विभाग के पास परीक्षा की उत्तरपुस्तिकाएं उपलब्ध कराने का बजट नहीं था, लोहियावादियों ने उनके सिद्धातों का अच्छा प्रचार किया.

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