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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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manmohanसुरेश हिन्दुस्तानी
कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सरकार के निर्णय को कठघरे में खड़ा करके यह संकेत दिया है कि संप्रग सरकार दिशा विहीन है। सरकार के कार्य और संगठन के विचार में भिन्नता का संदेश मुखरित करने वाले राहुल का यह कृत्य नि:संदेह प्रशंसा के योग्य है। लेकिन सवाल फिर पैदा होते हैं कि जब पूरी सरकार और कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जाते हैं और कई मामलों में आरोप प्रमाणित भी हुए हैं, तब क्या कांग्रेस यह कहने का सामथ्र्य पैदा कर सकती है कि पूरी की पूरी कांग्रेस साफ सुथरी है। कदाचित ऐसा करने की हिम्मत राहुल तो क्या कांग्रेस के किसी भी नेता में नहीं है।
अध्यादेश के वापस लिए जाने को लेकर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के अन्य घटक दलों ने आंख दिखाना प्रारम्भ कर दिया है। कई दलों का तो कहना है कि क्या केन्द्र में केवल कांग्रेस की ही सरकार है जो राहुल ने कहा और उसकी बात मानकर अध्यादेश वापस ले लिया।
राहुल गांधी के अध्यादेश फाडऩे की बात को लेकर सरकार की छीछालेदर हो रही है। लेकिन सवाल यह भी है कि संप्रग अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी की उपस्थिति में हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में जब यह विधेयक, अध्यादेश बनने की प्रक्रिया में था, तब राहुल गांधी मौन क्यों रहे? इसके अलावा आज जो मंत्री राहुल के साथ सुर मिला रहे हैं वो उस समय समर्थन क्यों कर रहे थे। इस मामले को लेकर जब एक समाचार चैनल पर बहस चल रही थी, तब एक कांग्रेस नेता ने कहा था कि देश के सारे दल ऐसा ही चाहते हैं, किसी दल ने इस विधेयक का विरोध क्यों नहीं किया? यहां पर भी फिर सवाल आता है कि कांग्रेस के मंत्री इतने नासमझ क्यों हो गए हैं, उनको यह भी नहीं पता कि मंत्रिपरिषद की बैठक में केवल सरकार के ही लोग शामिल होते हैं। अन्य दलों के लोग चाहकर भी इसमें शामिल नहीं हो सकते। फिर कांग्रेस के लोग अपनी गलती सुधारने के लिए दूसरों पर आरोप क्यों लगाते हैं?
यह मात्र इतनी भर बात नहीं है कि सरकार के अध्यादेश का विरोध किया गया या फिर मंत्रिमंडल की बैठक में कांग्रेस के मंत्रियों ने इस विधेयक को अध्यादेश क्यों बनने दिया। बल्कि बात इससे कहीं अधिक बड़ी है, बड़ी इन अर्थों में कही जाएगी कि इस विधेयक के सहारे सरकार कानून बदलने की तैयारी कर रही थी। जब यह अध्यादेश कानून बन जाता तब इस बात की संभावना बढ़ जाती कि देश की राजनीति में अपराधियों का बेरोकटोक प्रवेश हो जाता। फिर हमारे देश की राजनीति भविष्य में किस प्रकार का वातावरण तैयार करती।
वास्तव में देखा जाए तो आज की राजनीति विसंगति से सराबोर है, राहुल ने जो कृत्य किया वह प्रथम दृष्टया संगठन विरोधी है, ऐसे मामलों पर संगठन में सर्वानुमति होना जरूरी है। लेकिन लगता है आज कांग्रेस में राहुल संगठन से भी ऊपर हो गए हैं। कांग्रेस के सारे नेता उनके पीछे ऐसे दौड़े कि कहीं पीछे न रह जाएं, नहीं तो हमारे नंबर ही कट जाएंगे। सारे कांगे्रसी नेता केवल नंबर बढ़ाने की ही राजनीति कर रहे हैं। उनके चिन्तन में राष्ट्र की झलक नहीं मिलती। केवल गांधी परिवार के दम पर सत्ता प्राप्त करने की जुगाड़ में लगे रहने वाले आज के कांगे्रसी स्वयं इतने हतोत्साहित हो गए हैं कि उनको हमेशा यही डर सताता रहता है कि कि अगर गांधी परिवार नहीं हुआ तो हमारा क्या होगा? हमें सत्ता भी मिलना मुश्किल है। सवाल यह भी आता है कि एक परिवार की दुहाई दे-देकर कांग्रेस कब तक ढपली राग अलापती रहेगी।
वैसे यह बात भी सही है कि कांग्रेस के लोग कहने को तो सत्ता को अपनी जागीर समझते हैं, कई अवसरों पर यह देखने में आया है कि कांग्रेस के पदाधिकारी सत्ता के ऐसे बयान भी दे देते हैं जो शासकीय स्तर पर निर्णयात्मक कहे जाते हैं। इस बात को ऐसे भी कह सकते हैं कि कांग्रेस के पदाधिकारी अपनी ही सत्ता के संचालन करने वालों को कुछ समझते ही नहीं हैं, जिस प्रकार से राहुल गांधी ने सरकार के निर्णय पर सवाल उठाए हैं, वह तरीका गलत था। मेरी समझ से सही तरीका यह भी हो सकता था कि राहुल गांधी सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से अपनी बात रख सकते थे।
दागियों को बचाने के अध्यादेश को चुनौती देकर राहुल गांधी ने उसी बात पर बल दिया है जो प्रणब मुखर्जी ने पिछले 24 घंटे के अंदर उठाई थी और तीन वरिष्ठ मंत्रियों को बुलाकर इस अध्यादेश पर सवाल-जवाब किए थे और अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था। क्या यह सच नहीं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दागियों के मसले पर समान सोच वाले अन्य दलों को साथ लेकर कांग्रेस की सरकार ने दागियों को बचाने का अध्यादेश लाने का फैसला किया तो वह किसी से छिपा हुआ नहीं था.. राहुल का घटना घटित होते समय नहीं बोलना और राष्ट्रपति के प्रश्नचिह्न खड़ा कर देने के बाद अचानक उत्तेजित होकर अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा करना उन्हें शाबाशी तो दिलवाता है लेकिन उनकी दूरगामी सोच और तुरंत फैसले करने की गति पर सवाल भी खड़े करता है। देश ऐसे राहुल का स्वागत करेगा जो दागियों को बचाने के अध्यादेश का कड़े शब्दों में विरोध करें कि पूरी सरकार हिल उठे और उसे फैसला वापस लेने की दिशा में तैयार होना पड़े। ..लेकिन क्या यह सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए कि कांग्रेस शासित मनमोहन सिंह सरकार जिन नीतियों के आधार पर काम कर रही है और मंत्रिमंडल सामूहिक रूप से जो फैसले ले रहा है उसकी दिशा-दृष्टि कांग्रेस की ही तय की हुई है। यदि भ्रष्टाचारियों सहित दागियों के खिलाफ कांग्रेस की दृष्टि सदैव पाक-साफ रही होती तो मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री दागियों को बचाने का अध्यादेश कभी नहीं लाते। यह जानकारी में होना चाहिए कि दागियों को बचाने के अध्यादेश पर देर से उचित फैसला करके कांग्रेस के अघोषित नेतृत्वकर्ता राहुल गांधी ने दिशा देने का काम तो किया है लेकिन यह भी स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी द्वारा संचालित सरकार दिशाविहीन है और उसे दिशाविहीन बनाने में उसके नेतृत्वकर्ताओं का ही हाथ है।
अगर कांग्रेस वास्तव में साफ सुथरा भारत चाहती है तो कांग्रेस को देश में चल रहे हर उस काम का समर्थन करना चाहिए जो देश को संस्कारित दिशा प्रदान कर सकते हैं। इसके लिए देश में अनेक संगठनों द्वारा कई देश हित के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

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