कहाँ जा रहा है लोकतंत्र: सुप्रीम कोर्ट के भरोसे चल रहा है देश

भार्गव चन्दोला

क्या हो गया है लोकतंत्र को जब राजनीतिक पार्टियों का अपने नेताओं अपने कार्यकर्ताओं पर ही विश्वाश नहीं हैं तो वो जनता के विश्वाश पर कैसे खडे उत्तरेंगे ? बी.जे.पी. ने अपने उत्तराखंड के सभी विधायक उज्जैन में एकत्रित कर रखे थे और सभी विधायकों के मोबाइल भी ले रखे थे ताकि वो किसी से संपर्क न साध सकें ? भा.ज.पा. को डर है की कहीं कांग्रेस उसी की तरह उनका कोई विधायक तोड़ के न ले जाए जिस प्रकार 2007 में भा.ज.पा. कांग्रेस का विधायक तोड़ कर ले गई थी क्या भारत की ऐसी दुर्दशा के लिए लोकतंत्र ही सबसे बड़ा दुश्मन नहीं है ? हर शाल आम जनता को कोई न कोई चुनाव झेलना पड़ता है कभी लोकसभा, कभी विधानसभा, कभी पंचायत चुनाव, कभी निकाय चुनाव, कभी उप चुनाव | आखिर ये चुनाव की प्रक्रिया हो ही क्यों ? देश में महगाई, भ्रष्टाचार, चोरी, डकैती, बलात्कार, स्मगलिंग, कालाधन आदि जो भी देश के अंदर पनपा है उसके पीछे केवल लोकतंत्र के भ्रष्ट नेताओं का हाथ है देश की संसद में ही जब इस समय 163 सांसद संगीन जुर्मों के आरोपी हैं जिन्होंने देश को चलाना है तो फिर लोकतंत्र को बचायेगा कौन ? कहीं न कहीं लोकतंत्र ही देश का दुश्मन है लोकतंत्र ही समाप्त हो जायेगा तो तभी देश बच सकता है | आज देश को कोई चला रहा है तो वो है सुप्रीम कोर्ट क्योंकि लोकतंत्र सरकार तो गूंगी बहरी हो गई है आम आदमी को न्याय नहीं मिल रहा है आतंकवादी देश की संसद तक घुस जाते हैं और फिर भी उन्हें महमान बनाकर कई कई शालों तक उनकी सेवा की जाती है और अरबों रूपये उनके ऊपर खर्च कर दिए जाते हैं| हमारे देश की दुर्दशा के लिये लोकतंत्र मुसीबत बन कर रह गया है | फिर हम कहते हैं लोग नक्सली क्यों हो जाते हैं जिस देश में इस तरह का लोकतंत्र होगा वहाँ नक्सलवाद नहीं होगा तो क्या होगा| राजनीतिक पार्टियों का अपने वोट के लालच में धार्मिक आरक्षण और जातिगत आरक्षण बांटने से समाज का उथान नहीं बल्कि पतन निश्चित है जब कम जानकर ब्यवस्था के उन पदों पर जा बैठे हैं जिन पदों से सारे देश को चलाया जाना है जिन पदों पर बैठ कर उचित निर्णय लिये जाने हैं तो सही निर्णय कौन लेगा ऐसे में देश का विनाश निश्चित है…. देश को बचाना है तो लोकतंत्र का समाप्त होना ही जरुरी है तभी देश सुरक्षित रह सकता है|

जय हिंद …. जय भारत …. जय उत्तराखंड

2 thoughts on “कहाँ जा रहा है लोकतंत्र: सुप्रीम कोर्ट के भरोसे चल रहा है देश

  1. कसूर लोकतंत्र का नहीं,कसूर हमारे चरित्र का है.कसूर हमारी भीरुता का है.हम अपने दामन में झाँक कर देखते नहीं,दोष मढ़ते हैं लोकतंत्र के सर.हममें से कितनो ने लोकतंत्र को बचाने का प्रयत्न किया?हम में से कितनो ने अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने की कोशिश की?लोकतंत्र बुरा नहीं है.संसार के उन्नत देशों में लोकतंत्र ही हैऔर वही उनके उन्नति का कारण भी है.आवश्यकता है हम में से प्रत्येक को अपने दामन में झाँक कर देखने की कि हमारा अपना व्यक्तिगत चरित्र क्या है?हम लोगों में से प्रत्येक को दूसरों का दाग दिखता है.आवश्यकता अपने चरित्र के दाग को देखनेकी और उनको दूर करने की..लोकतंत्र तभी सार्थक होगा.

  2. आपकी टिपण्णी बहुत ही सटीक है,पर साहब १६३ सासदों को अपराधी कहकर , उनके निशाने पर आ सकते है.क्योकि अब यह लोग चुने जाने के बाद इतने घमंडी हो गए है की इन्हें सच भी अखरता है.इन के खिलाफ कुछ भी कहना इनकी अवमानना हो जाती है.सविधान का अपमान करना,इनका अधिकार है पर उसका पालन करना बेचारों ने सीखा ही नहीं .
    यदि इनमे दम होता तो यह अन्ना टीम के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास करते, पर वे यह जानते है कि उनके नीचे की धरती कितनी पोली है.काश कि सत्ता के उन्माद में वे ऐसा कर बैठते तो उन्हें पता चल जाता कि अब उनका कितना समय बाकि रह गया है.

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