लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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भाव और शब्द अपहरण तो क्षम्य है किंतु पूरी पंक्ति कैसे निगल सकते हैं

इश्किया फिल्म में गुलजार के लिखे ‘इब्नबतूता’ गीत को लेकर छिड़ा विवाद दुखी करता है। कहा जा रहा है कि इसे मूलतः हिंदी के यशस्वी कवि एवं पत्रकार स्व. सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ने लिखा है। ऐसे मामलों में नाम जब गुलजार जैसे व्यक्ति का सामने आए तो दुख और बढ़ जाता है। वे देश के सम्मानित गीतकार और संवेदनशील रचनाकार हैं। ऐसे व्यक्ति जिन्हें साहित्य और उसकी संवेदना की समझ भी है। हाल में ही चेतन भगत और आमिर खान के बीच थ्री इटियट्स को लेकर छिड़ी बहस को जाने दें तो भी मायानगरी ऐसे आरोपों की जद में निरंतर आती रही है। सहित्य के महानायकों की रचनाएं लेना और उसे क्रेडिट भी न देना कहीं से उचित नहीं कहा जा सकता। यह सिर्फ गलती नहीं है एक ऐसा अपराध है जिसके लिए कोई क्षमा भी नहीं मांगता। दिल्ली-6 में छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में गूंजनेवाला छत्तीसगढ़ी गीत “सास गारी देवे, देवर जी समझा लेवे“ का उपयोग किया गया। सब जानते हैं इसे रायपुर की जोशी बहनों ने गाया था। किंतु क्रेडिट के नाम पर फोक लिख दिया। फोक क्या हवा में पैदा होता है। छत्तीसगढ़ी फोक लिखकर उस राज्य की संस्कृति को मान्यता देने में हर्ज क्या था पर चोरियों से ज्यादा सीनाजोरियां मुंबई की मायानगरी का चलन बन गयी हैं।

सर्वेश्वर जी हिंदी के एक बहुत सम्मानित कवि और पत्रकार होने के साथ-साथ रंगमंच के क्षेत्र में भी खास पहचान रखते थे। वे बच्चों के लिए भी लिखते रहे और अपने समय की महत्वपूर्ण बालपत्रिका पराग के संपादक रहे। उन्होंने बतूता का जूता और महंगू की टाई नाम से बच्चों के लिए कविताओं की दो पुस्तकें भी लिखी हैं। जिसमें बतूता का जूता (1971) में यह कविता है जिसपर विवाद छिड़ा हुआ है। अपने समय की महत्वपूर्ण पत्रिका दिनमान से जुड़े रहे सर्वेश्वर जी को शायद भान भी नहीं होगा कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी रचनाएं इस तरह उपयोग की जाएंगी और उनके नामोल्लेख से भी पीढ़ियां परहेज करेंगीं। पर ऐसा हो रहा है और हमसब इसे देखने को विवश हैं।

भाव का अपहरण क्षम्य है, शब्द का अपहरण भी क्षम्य है किंतु पूरी की पंक्ति निगल जाना और क्रेडिट न देना कैसे माफ किया जा सकता है। यह रोग जिस तरह पसर रहा है वह दुखद है। फिल्मी दुनिया में नित उठते यह विवाद साबित करते हैं कि इससे किसी ने सबक नहीं लिया है। सर्वेश्वर जी ने अपनी एक कविता में लिखा था-

“और आज छीनने आए हैं वे

हमसे हमारी भाषा

यानी हमसे हमारा रूप

जिसे हमारी भाषा ने गढ़ा है

और जो इस जंगल में

इतना विकृत हो चुका है

कि जल्दी पहचान में नहीं आता।”

सर्वेश्वर कहते हैं कि वस्तुतः हमसे हमारी भाषा का छिन जाना हमारे व्यक्तित्व और अस्तित्व का मिट जाना है। चंद मामूली से शब्दों के द्वारा ही (छीनने आए हैं वे… हमसे हमारा रूप) कवि ने यह अर्थ हमें सौंप दिया है कि भाषा का छिन जाना हमारी जातीय परंपरा, संस्कृति, इतिहास और दर्शन का छिन जाना है। सर्वेश्वर हमारी सांस्कृतिक चेतन पर आए इस संकट को पहचानते हैं। वस्तुतः भाषा के सवाल पर यह संजीदगी सर्वेश्वर को एक जिम्मेदार पत्रकार बनाती है। सर्वेश्वर का पत्रकार इसी प्रेरणा के चलते पाठक में एक चेतना और अर्थवत्ता भरता नजर आता है। सर्वेश्वर की लेखनी से गुजरता पाठक, उनकी लेखनी से निकले प्रत्येक शब्द को अपनी चेतना का अंग बना लेता है। ऐसा इसलिए क्योंकि सर्वेश्वर पूरी ईमानदारी और संवेदना के साथ पाठक की चेतना को सम्प्रेषित करते हैं। सर्वेश्वर ने इसीलिए ऐसी भाषा तलाशी है जो वर्तमान परिवेश में सांस लेने वाले हरेक इन्सान की हैं, हरेक की जानी पहचानी है और हरेक का उससे गहरा और करीबी रिश्ता है। किंतु सर्वेश्वर की यही भाषा और शब्द आज मायानगरी के बाजार में सुनाए तो जा रहे हैं पर किसी और के नाम से। हालांकि इस पूरे मामले पर अभी गीतकार गुलजार की प्रतिक्रिया आना शेष है किंतु प्रथमदृष्ट्या यह मामला माफी के काबिल तो नहीं दिखता। इस तरह के विवाद साहित्य की अस्मिता पर हमला हैं और कलमकारों के लिए अपमानजनक भी किंतु क्या इस विवाद से कोई सबक लेने को तैयार है, शायद नहीं।

इन पंक्तियों के लेखक ने सर्वेश्वर की पत्रकारिता पर शोधकार्य भी किया है जिसे निम्न लिंक पर देखा जा सकता हैः

http://sampadakmahoday.blogspot.com/

– संजय द्विवेदी

8 Responses to ““इश्किया” का गीत किसका गुलजार या सर्वेश्वर का”

  1. amitabh

    गुलजार साहेब ने इसके पहले भी कई गीत किसी न किसी से चुराए हे..वो चाहे गालीब हो या मीर साहेब…

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  2. jayshree

    भाषा और शब्द किसी की अमानत नहीं ……..
    लेकिन किसी की रचना को तोड़ मरोड़ कर अपने नाम से परोसना भी उचित नहीं I
    गुलजार जी ने यह गीत सक्सेना जी की रचना से प्रेरित हो कर लिखा, यह स्वीकार कर लेना चाहिए I

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  3. Abyaz

    सर आपने गंभीर सवाल उठाया है… गुलज़ार जैसे बड़े शख्स का नाम इसमें घिसटना और भी गंभीर बात है… जब उंगली उठी है, तो ज़रूर कुछ न कुछ को सच्चाई रही होगी… हो सकता है, इस इल्ज़ाम के बाद कुछ दिन के लिए माहौल भी बने, लेकिन गुलज़ार जी भी किसी के गीत को अपना बना सकते हैं.. बड़ी अफसोसनाक बात है…

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  4. बलराम अग्रवाल

    प्रिय भाई, चोरी और सीनाजोरी बॉलीवुड का जन्मसिद्ध अधिकार है। जल्द ही मैं आपको गुलजार साहब की लिखी एक कहानी भी स्कैन करके भेजूँगा।

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  5. एम अखलाक

    यही तो बाजारवाद की बुराई है। चीजों को उलट-पुलटकर परोस देने की कला को क्रिएटिव राइटिंग मान लेता है। लेकिन, गुलजार साहब को इससे बचना चाहिए, क्‍योंकि उनसे उम्‍मीदें कुछ अलग हैं। उनका व्‍यक्‍ितत्‍व कुछ अलग है।

    एम अखलाक
    वरीय उपसंपादक
    दैनिक जागरण, मुजफ्फरपुर

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  6. डॉ. अभिज्ञात

    डॉ.अभिज्ञात

    प्रेरणा लें पर आभार भी तो जतायें गुलजार!
    फिल्म ‘इश्किया’ में गुलजार के गीत ‘इब्नबतूता, बगल में जूता..’ विवादों में फंस गया है। इस गीत के गीतकार ऑस्कर जीत चुके गुलजार हैं लेकिन उन पर आरोप है कि उन्होंने यह गीत सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता ‘इब्नबतूता पहन के जूता, निकल पड़े तूफान में..’ से लिया गया है और पूरी फिल्म में उनको कहीं कोई श्रेय नहीं दिया गया है।
    चूंकि मामला गुलजार साहब का है इसलिए मामला प्रेरणा लेने का है। प्रेरणा क्या सीधे-सीधे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के गीत की कुछ पंक्तियों को लिफ्ट करने का है। और इसमें कोई बुराई नहीं यदि वह फिल्म का मामला हो। करोड़ों रुपये फिल्म में लगे होते हैं इसलिए वह सिर्फ कला का मामला नहीं रह जाता बल्कि व्यवसाय का मामला अधिक हो जाता है। फिल्म जैसी कला की रचना की सफलता का आकलन भी उसकी कमाई के आधार पर होती है और यही कारण है कि प्रतिबद्ध फिल्मकारों अभिनेताओं की तुलना में व्यावसायिक स्तर पर कामयाब फिल्मकारों अभिनेताओं को सफल माना जाता है। अब जहां करोड़ों दांव पर लगे हों तो फिल्म को बेहतर बनाने के लिए दुनिया में जहां जिस क्षेत्र में भी कुछ बेहतर होता है उसे फिल्म वाले ले उड़ते हैं और किसी कलाकार के अभिनय, संवाद, गीत, संगीत, एक्शन, कहानी आदि सभी मामलों में दुनिया भर की फिल्मों को खंगाल डाला जाता है और उसे मिलाकर एक नयी फिल्म बनती है। फिल्म को कामयाब करने के लिए यह सब कुछ करने वालों से यह तो उम्मीद की ही जानी चाहिए कि वे फिल्म बनायें, कामयाब हों और नोट पीटें लेकिन जहां जहां से ‘प्रेरणा’ ली है उसका जिक्र भी करें और उसका समुचित भुगतान भी करें। (फिल्मी दुनिया में दूसरे की बौद्धिक सम्पदा को ‘झाडऩे’ को ‘प्रेरणा’ ही कहा जाता है)।
    हमारे देश में कई ऐसी फिल्में कामयाब हुईं और बाद में पता चला कि उन्होंने अमुक विदेशी फिल्म से न सिर्फ कहानी उड़ायी थी बल्कि सीन दर सीन भी टीप लिया था। गुलजार जहां फिल्म इंडस्ट्री में हैं और वे आवश्यकतानुसार प्रेरित किये जाते या होते रहते हैं प्रेरणा लेने लिए तो हों इससे गुरेज नहीं होना चाहिए लेकिन पहले भी जिस प्रकार दूसरे रचनाकारों से प्रेरणा लेकर उनका आभार माना था वैसा ही करें तो हमें कोई दिक्कत नहीं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना एक अच्छे कवि थे। अज्ञेय के तीसरा सप्तक से उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनानी शुरू की थी और उन्होंने हिन्दी साहित्य को अद्भुत प्रेम और विद्रोह दोनों की कविताएं दी हैं।
    घुम्मकड़ इब्ने बतूता ने दुनिया के सारे इस्लामी देशों के अलावा अफ्रीका और यूरोप, भारतीय उपमहाद्वीप की लगभग 75,000 मील की यात्रा की और इस दौरान उन्होंने कई खतरों का सामना किया और उनका सफर काफी रोमांचकारी रहा। मोरक्को के सुल्तान ने इब्ने बतूता की यात्रा को देखते हुए एक किताब लिखवाई। पश्चिम उत्तर प्रदेश की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘इश्किया’ में भी नसीरूद्दीन शाह और अरशद वारसी भी कुछ इसी तरह की भूमिका में हैं इसलिये यह गाना फिल्माया गया है, जो दोनों किरदारों पर फिट बैठता है और लोगों की जुबां पर चढ़ गया है।
    फिल्म इश्किया का गाना ‘इब्नेबतूता’ दर्शकों को काफी पसंद आ रहा है पर जिस कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के गीत का मुखड़ा फिल्म में लिया गया है उसके परिवारवाले काफी दुखी हैं। मोरक्को के विद्वान ‘इब्ने बतूता’ के घुम्मकड़ रवैये को दर्शाने के लिये सर्वेश्वर ने यह लिखी कविता लिखी थी। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की बेटी विभा सक्सेना का कहना है ‘मेरे पिताजी ने इब्ने बतूता पर कविता लिखी थी, लेकिन गुलजार साहब ने इसमें थोड़े बदलाव करते हुए यह गाना लिखा है। हमें दुख इस बात का है कि कहीं भी उन्हें श्रेय नहीं दिया गया या ऐसा नहीं बताया गया कि यह गाना सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता ‘इब्ने बतूता’ से प्रेरित है।’ गुलजार साहब खुद एक कवि हैं और अगर वह गाने की पंक्तियां कहीं से उतारते हैं तो उसे हमेशा श्रेय देते हैं। उनकी गरिमा इसी में होगी कि वे मेरे पिताजी को श्रेय दें क्योंकि मेरे पिताजी अब इस दुनिया में नहीं हैं।’
    सक्सेना की कविता के बोल इस प्रकार है, ‘इब्नेबतूता पहन के जूता, निकल पड़े तूफान में, थोड़ी हवा नाक में घुस गई, घुस गई थोड़ी कान में। कभी नाक को, कभी कान को, मलते इब्नेबतूता, इस बीच में निकल पड़ा, उनके पैरों का जूता। उड़ते उड़ते जूता उनका, जा पहुंचा जापान में, इब्नेबतूता खड़े रह गये, मोची की दुकान में।’ विभा सक्सेना के अनुसार-‘हमारा परिवार और सभी साहित्यकार यही चाहते हैं कि सिर्फ मेरे पिताजी की कविता को श्रेय दिया जाये।’
    जो लोग साहित्य रचने से ताल्लुक रखते हैं उन्हें यह स्वाभाविक तौर पर पता होगा कि कई बार लेखक अनजाने की दूसरे की पंक्तियां अपनी रचना में इस्तेमाल कर बैठता है। उसका कारण यह है कि लेखन कार्य काफी कुछ अवचेतन से सम्बंध रखता है और अचेतन मन में कई बार पुरानी पढ़ी रही रचनाएं भी रहती हैं। जो अरसे बाद याद आती हैं और कई बार लेखक को यह भी भ्रम हो जाता है कि यह दूसरे की नहीं बल्कि उसी की सोच है। मैंने अब तक इस पूरे प्रकरण में गुलजार की प्रतिक्रिया नहीं पढ़ी है। वस्तुस्थिति के सम्बंध में तो वे ही बता सकते हैं। मैं तो उनका लिखा पढ़ते-लिखते-गुनते हुए बड़ा हुआ हूं। और उन्हें किसी भी कीमत पर उन्हें साहित्यिक चोर कहे जाने को स्वीकार नहीं कर सकता।

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  7. sadhak ummed singh baid

    भाषा और शब्दों को , बाँधना नहीं है अच्छा.
    सर्वेश्वर का कैसे हो गया इब्नेबतूता?
    इब्नेबतूता पैसे देता, यही है मुश्किल.
    पैसे से गुलजार है दुनियाँ, तभी है मुश्किल.
    कह साधक मानव की विशेषता बोली-भाषा.
    बाँधना अच्छा नहीं, मुक्त हैं शब्द और भाषा.

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