ईश्वर और आर्यसमाज

मनमोहन कुमार आर्य

               ईश्वर सारे संसार वा ब्रह्माण्ड का स्वामी वा ईश्वर है। वह समी जड़ पदार्थों सहित चेतन जीवों का भी परमेश्वर है। कोई उसको माने या न माने, कोई उसकों जानकर उचित रीति व विधि से उपासना करे न करे या कोई मत-मतानतरों के चक्र में फंस कर अविद्या की रीति से उसको माने और साथ ही ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध कार्यों को भी करे, तो भी ईश्वर उन सबका ईश्वर है। यह बात अलग है कि ईश्वर विद्यायुक्त कार्य करने वाले तथा ज्ञानी ज्ञानी लोगों का अनुगमन करने वालों को सुख देता है और जो मनुष्य ईश्वर की वेदाज्ञा का पालन नहीं करते उसके विपरीत कर्म व्यवहार करते हैं, उनको दण्डस्वरूप नाना प्रकार के दुःख देता है जिससे उनका सुधार हो सके। ईश्वर इस संसार को रचने वाला तथा उसे नियमों में रखकर उन नियमों का पालन कराने वाला है। सृष्टि को ईश्वर ने अब से 1.96 अरब वर्ष पूर्व बनाया था। तब से यह सृष्टि ईश्वर के बनाये नियमों का पालन करती आ रही है। आश्चर्य है कि जड़ जगत, जो चेतना और बुद्धि तत्व से विहीन है, वह तो ईश्वरीय नियमों आज्ञाओं का पालन कर रहा है परन्तु चेतन ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ बुद्धि रखने वाला मनुष्य ईश्वर के नियमों आज्ञाओं को तोड़ता है उसकी उपेक्षा करता है।

               वेदों में आज्ञा है कि लालच मत कर, यह धन मनुष्य का नहीं परमात्मा का है। सृष्टि के धन पर परमात्मा की सभी सन्तानों, मनुष्यों व प्राणियों, का अधिकार है। जो मनुष्य परिग्रही हैं वह ईश्वर के नियमों को तोड़ते हैं और ईश्वर की अन्य सन्तानों के लिये दुःख उत्पन्न करते हैं। संसार में मनुष्यों के बीच आर्थिक दृष्टि से अन्तर होने का एक कारण मनुष्यों के लोभ व परिग्रह की प्रवृत्ति है। यदि मनुष्य पशुओं से शिक्षा लेकर और वेदाज्ञा को पढ़कर व समझकर अनावश्यक लोभ व परिग्रह का त्याग कर दे तो इससे संसार में करोड़ों लोगों के अनेक प्रकार के दुःख दूर हो सकते हैं। देश व संसार में प्रचलित मत-मतान्तर इसके प्रति सर्वथा उदासीन हैं। सरकारी नियम भी परिग्रह को बुरा नहीं मानते परन्तु इसका परिणाम समाज में अवश्य बुरा दृष्टिगोचर होता है। इसके विपरीत हम वैदिक ऋषियों योगियों के जीवन पर दृष्टि डालते हैं तो हमें यह ज्ञात होता है कि वह सभी अपरिग्रही थे। उनके पास किसी प्रकार की भौतिक सम्पत्ति नहीं होती थी। वह एक स्थान पर एक सप्ताह से भी कम निवास करते रहते थें और देश भर में विचरण करते रहते थे। इसीलिये उन्हें अतिथि कहा जाता था। वह जहां जिस परिवार में जाते थे वहां उनका स्वागत व सम्मान होता था और उनकी निवास, भोजन व अन्य आवश्यकतायें पूरी की जाती थीं। आजकल लोग स्वाध्याय व स्वतन्त्र चिन्तन-मनन नहीं करते और इसी कारण काम, क्रोध, लोभ, मोह, द्वेष तथा अनावश्यक व सीमारहित परिग्रह आदि दोषों से युक्त देखे जाते हैं। ईश्वर को जानने वाला मनुष्य सन्तोषी स्वभाव का होता है और वह आध्यात्म और भौतिक जीवन में सन्तुलन बना कर रखता है। वह ईश्वरोपासना सहित स्वाध्याय करता है और जीवन में सत्य व मर्यादाओं से युक्त आचरण को महत्व देता है। यही जीवन श्रेयस्कर व ईश्वर की दृष्टि में उचित एवं करणीय होता है।

               हमें ईश्वर को जानना है जो आर्यसमाज के साहित्य का अध्ययन करके सरलता से जाना जा सकता है। इस कार्य में सहायता के लिये ही ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश सहित ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय, संस्कारविधि तथा वेदभाष्य आदि ग्रन्थों की रचना की है। आर्यसमाज के इस साहित्य से केवल ईश्वर के स्वरूप उसके गुण, कर्म तथा स्वभाव को जाना जाता है अपितु इससे अन्धविश्वासों मिथ्या परम्पराओं सहित अविद्या का ज्ञान भी होता है। सत्यार्थप्रकाश ने अनेक लोगों के जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन किया है। इसका प्रमुख कारण यही था कि उन लोगों ने आर्यसमाज के साहित्य को पढ़ा और वह ईश्वर व जीवात्मा सहित मनुष्य जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य से परिचित हुए थे। उन्होंने ईश्वर की कर्म-फल व्यवस्था को भी जाना व समझा था तथा अशुभ वा पाप कर्मों का जो दण्ड ईश्वर देता है, उस पर भी विचार कर उसका साक्षात किया था। आज संसार के मनुष्यों रोगों, अभाव, अन्याय, शोषण आदि अनेक दुःखों से ग्रस्त दीखते हैं। इन दुःखों का कारण हमारी व्यवस्था के कुछ नियमों में न्यूनता व त्रुटि सहित अच्छे नियमों का पूरा पालन न हो पाना दोनों ही हैं। ऋषि दयानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, पं0 लेखराम, पं0 गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज, स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती, पं0 गणपति शर्मा, योगिराज महात्मा कालूराम जी आदि के नाम लिये जा सकते हैं जिन्होंने वेद विहित ईश्वर की आज्ञाओं का पूरा पूरा पालन किया था। इन्होंने न केवल अपने जीवन का सुधार किया अपितु देश व समाज के अन्य लोगों को भी शिक्षित कर दुष्कर्मों वा पाप कर्मों का त्याग करने की प्रेरणा की थी। इसके साथ सब मनुष्यों को सद्ज्ञान से अलंकृत करने का प्रयत्न भी इन वेदभक्त विद्वानों ने किया था।

               देश व समाज के सभी मनुष्य अविद्या को छोड़े और विद्या को ग्रहण करें, इस प्रयोजन के लिये ही ऋषि दयानन्द सरस्वती ने 10 अप्रैल सन् 1875 को आर्यसमाज की स्थापना की थी। आर्यसमाज आर्य अर्थात् श्रेष्ठ मनुष्यों का समूह है। आर्यसमाज के सम्पर्क में आकर अविद्यायुक्त तथा असत्य का आचरण करने वाला मनुष्य भी अपनी अविद्या दुष्टाचार को छोड़कर आर्य वा श्रेष्ठ आचरण करने सहित विद्यायुक्त बातों को ग्रहण करता है। इससे वेदाचरण करने वाले मनुष्यों, समाज देश का भी हित कल्याण होता है। यही कारण था कि ऋषि दयानन्द ने सबसे अधिक बल ईश्वर व जीव के सत्यस्वरूप को जनाने व उसका देश-देशान्तर में प्रचार करने में लगाया। ऋषि दयानन्द ने ईश्वर की उपासना की विधि भी बताई और जन्म-जन्मान्तर में उपासना से होने वाले लाभों को भी बताया है। उपासना से मनुष्य की अविद्या दूर होकर उसके कुसंस्कार दूर हो जाते हैं और उसका स्थान ईश्वर के सत्य गुण, कर्म व स्वभाव के अनुरूप गुण आदि ले लेते हैं। मनुष्य की आत्मा का बल इतना बढ़ता है कि वह पहाड़ के समान दुःख मृत्यु आदि के आने पर भी घबराता नहीं है। ऐसे अनेक लाभ ईश्वर की उपासना सहित वेद एवं वैदिक ग्रन्थों के स्वाध्याय से होते हैं।

               ईश्वर और आर्यसमाज का परस्पर गहरा सम्बन्ध है। आर्यसमाज ईश्वर के सत्यस्वरूप का वेदों व ऋषियों के ग्रन्थों यथा दर्शन एवं उपनिषद आदि साहित्य से अनुसंधान कर उनका प्रचार व प्रसार करता है जिससे लोग ईश्वर को जानकर उसकी उपासना करते हुए ईश्वर के आशीर्वादों एवं उसकी आध्यात्मिक व भौतिक सम्पत्तियों से सम्पन्न हो सकें। यही कारण है कि आर्यसमाज वेदों में प्रेरित किये ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना सहित अग्निहोत्र यज्ञ आदि शुभकर्मों का धारण व आचरण करने की प्रेरणा करता है। आर्यसमाज ने अपनी स्थापना के बाद से ही गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली को अंगीकार व प्रचारित किया जिससे लोग ईश्वर की उपासना करते हुए सभी सत्य विद्याओं का ज्ञान प्राप्त कर सकें और अपने व दूसरों के जीवन को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा करें।

               सत्य का ग्रहण करना और असत्य का त्याग करना ही मनुष्य जीवन को उन्नति प्रदान करता है और ऐसा न करना ही उसकी अवनति व अधोगति का कारण होता है। इसी कारण आर्यसमाज ने इसे अपने चौथे नियम के रूप में स्वीकार किया है। आर्यसमाज के संस्थापक ऋषि दयानन्द ने ही सर्वप्रथम अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में देश को स्वतन्त्र कराने की प्रेरणा करते हुए कहा था कि कोई कितना ही करे किन्तु जो स्वदेशीय राज्य होता है वह सर्वोपरि उत्तम होता है। अथवा मत-मतान्तर के आग्रह रहित, अपने और पराये का पक्षपात शून्य, प्रजा पर पिता माता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ विदेशियों (अंग्रेजों) का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है। ऐसे ही वचन ऋषि दयानन्द ने अपने ग्रन्थों में अनेक स्थानों पर दिये हैं। देश से मूर्तिपूजा, अवतारवाद, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योतिष, जन्मना जातिवाद आदि सभी धार्मिक व सामाजिक बुराईयों सहित अन्धविश्वासों एवं मिथ्या परम्पराओं को दूर करने के लिये सबसे अधिक प्रभावशाली तरीके से ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज ने कार्य किया जिसका देश व समाज पर अनुकूल व लाभप्रद प्रभाव पड़ा। स्त्री और शूद्रों को वेदाध्ययन तथा शिक्षा से भी वंचित रखा जाता था। उसका निराकरण व वेदों के आधार पर समाधान भी ऋषि दयानन्द ने अपने ग्रन्थों व मौखिक प्रचार से देश के धार्मिक व तीर्थ स्थानों सहित दूरस्थ स्थानों पर जाकर किया। ऋषि दयानन्द ने ही बाल विवाह का निषेध कर पूर्ण युवावस्था में गुण, कर्म व स्वभाव के अनुसार विवाह का विधान किया व इससे सम्बन्धित वेदादि शास्त्रों की तर्कपूर्ण मान्यताओं का समर्थन किया।

               ऋषि दयानन्द के समय जितने भी मत-मतान्तर थे वह सभी अविद्या व अन्धविश्वासों सहित मिथ्या परम्पराओं से ग्रस्त थे। ऋषि ने उनका खण्डन तथा सत्य व बुद्धिपूर्ण तर्कसंगत मान्यताओं का समर्थन किया। ऋषि दयानन्द के समय में ईसाई व मुस्लिम हिन्दुओं का बलात् व भय एवं प्रलोभन आदि के द्वारा धर्मान्तरण करते थे। ऐसा विगत 1100-1200 वर्षों से हो रहा था। भारत में विदेशी मूल के मतों की जो जनसंख्या है, वह धर्मान्तरण का ही परिणाम है। ऋषि दयानन्द ने वेदों की सत्य मान्यताओं का प्रकाश किया और वेदों की मान्यताओं को संसार का सबसे उत्तम व बुद्धि के अनुकूल मान्यताओं वाला धर्म प्रतिपादित किया। वैदिक धर्म प्राणी मात्र का हितकारी धर्म हैं। ऋषि दयानन्द ने वैदिक धर्म को सद्धर्म व श्रेष्ठ धर्म प्रतिपादित किया। वह किसी मत व उसके आचार्य के प्रश्न, शंका व तर्क को सुनकर भागे नहीं अपितु उन्होंने सबका समाधान कर उन्हें निरुत्तर किया। ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज के ऐसे अनेक कार्य हैं जिन्होंने मत-मतान्तरों द्वारा मनुष्यों के बीच खड़ी की गई अज्ञान व मिथ्या मान्यताओं की दीवारों को गिराया। ऋषि दयानन्द आर्यसमाज ने जो भी कार्य किया वह वही कार्य था जिसकी प्रेरणा ईश्वर ने वेदों में की है। ऋषि दयानन्द असत्य, अज्ञान, अविद्या, पक्षपात तथा स्वार्थ से सर्वथा दूर थे। उनके व्यक्तित्व व जीवन में इन दुर्गुणों का लेशमात्र अंश भी नहीं था। वह सच्चे व आदर्श मानव थे।                ऋषियों ने सृष्टि के आरम्भ से महाभारत काल व उसके बाद भी वेदों की मान्यताओं का पालन किया था। वेदों के उन्हीं सन्देशों को ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज ने प्रस्तुत कर उनका प्रचार किया। इस प्रकार आर्यसमाज ईश्वर की वैदिक आज्ञाओं का प्रचार करने वाला पृथिवी पर एकमात्र संगठन हैं। आर्यसमाज कोई असत्य, मिथ्या व अविद्यायुक्त मत व पन्थ नहीं है अपितु यह ईश्वर के सत्य ज्ञान वेद पर आधारित धर्म वा मत है। संसार के सभी मनुष्य ईश्वर के पुत्र व पुत्रियां हैं। सभी को वेदों की शिक्षाओं का उसी प्रकार से पालन करना चाहिये जैसा कि वह अपने माता-पिता तथा आचार्यों की आज्ञाओं का पालन करते हैं। ईश्वर की आज्ञाओं का पालन सबका अधिकार व कर्तव्य दोनों है। इसी से विश्व का कल्याण हो सकता है और सभी समस्यायें व बुराईयां दूर हो सकती हैं। संक्षेप में यही कहेंगे कि आर्यसमाज ईश्वर की शिक्षाओं, मान्यताओं व आज्ञाओं का प्रचारक धरती पर एकमात्र संगठन है। सब मनुष्यों को इसका सहयोग करना चाहिये। इसी में सबका हित व लाभ है।

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