संसद पर हमला : पहले भारत अब ईरान बना निशाना

भारत के मित्र देश पर भारत जैसा ही हमला आतंकवादियों ने किया है जैसा कि कुछ समय पहले आतंकवादियों ने भारत की संसद को निशाना बनाया था, अब उसी योजना को आतंकियों ने दोहराया है, जिसका निशाना ईरान की संसद को बनाया गया है, अवगत करा दें कि ईरान भारत का सबसे करीबी मित्र देश है, जिसकी मित्रता पूरे विश्व में जग-जाहिर है, भारत और ईरान की मित्रता ड्रैगन और पकिस्तान के गले नहीं उतर रही है पकिस्तान और चीन ईरान को घेरना चाहते हैं, बता दें कि ईरान के चाबहार बन्दरगाह संधि से पकिस्तान ईरान से पूरी तरह से जला हुआ है जिसका रूप कई बार सीमा रेखा पर देखने को मिला है, पकिस्तान चीन के कहने के अनुसार ईरान पर आतंकी हमला करने की योजना बनाता रहता है और सीमा रेखा पर छुट-पुट घटनाओं को अंजाम देता रहता है| इसलिए की ईरान हमसे बात करे और हमारे साथ रहे न कि भारत के साथ| ईरानी संसद पर आतंकियों द्वारा किया गया हमला निंदनीय कहा जाएगा। इस्लामिक देशों के जातीय व क्षेत्रीय मसलों की लड़ाई का आईएस फायदा उठा रहा है। ऐसे कृत्य में अमेरिका की भूमिका अप्रत्यक्षरूप से सामने आ रही है। कहीं ऐसा तो नहीं कि अमेरिका दो धारी तलवार का प्रयोग कर रहा हो, जिसे दुनिया मित्र समझती है कहीं वह बड़ा खेल तो नहीं खेल रहा है, इसे भी समझने की आवश्यकता है| क्योकि एन.एस.जी में चीन के विरोध के कारण भारत को सदस्यता नहीं मिली, चीन के विरोध का ख्याल कि भारत को सदस्यता देने से इंकार इसे गंभीरता से समझने की आवश्यकता क्योकि एक तरफ चीन से अमेरिका अपनी दुश्मनी जाहिर कर रहा है, तो दूसरी ओर उसके विरोध का इतना बड़ा ध्यान रखना कुछ बड़े संकेत देता है, इसे बड़ी गंभीरता से समझने की आवश्यकता है, कहीं ऐसा तो नहीं कि लड्डू दोनों हांथों में रखा जा रहा हो, यदि ऐसा नहीं है तो चीन का इतना बड़ा ध्यान किस लिए रखा जा रहा है यह एक बड़ा प्रश्न है| तथा दूसरा प्रश्न पाकिस्तान का है क्योकि पाकिस्तान चीन के साथ खड़ा रहता है और चीन को अपना भाई समझता है जिसका चीन खुलकर दुनिया के सामने समर्थन करता है, अमेरिका भी पाकिस्तान की अनदेखी नहीं कर रहा है कभी सीधे-सीधे बात तो कभी मुँह को घुमाकर का बात की कोई भी देखने न पाए और हम बात भी करलें, सऊदी को माध्यम बनाकर अमेरिका दुनिया को अँधेरे में रखना चाहता है, इसपर ध्यान देने की आवश्यकता है साथ ही पकिस्तान पर अमेरिका धन की खूब वर्षा भी कर रहा है इसे समझाना पडेगा| क्योकि एक तरफ चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट का ईरानी संसद व अयातुल्लाह खुमैनी के मकबरे पर किए गए हमले के पीछे की वजह ईरान सीरिया में राष्ट्रपति असद का समर्थन करना बताया जा रहा है। हालांकि आतंकियों ने ईरान को पहले कई बार धमकी दी थी कि वह सीरिया का समर्थन न करे। आतंकियों की धमकियों को ईरान ने अनदेखा किया था। आइएस की धमकियों पर ज्यादा गौर नहीं किया। लेकिन हमले के ठीक दो दिन पहले आइएस ने ईरान सरकार को अंजाम भुगतने को लेकर एक वीडियो जारी किया था। जिसे भी ईरानी सरकार ने दरकिनार कर दिया था। इस बात से आइएस आतंकी गुट खासा नाराज था। उसी नाराजगी का नतीजा है संसद व अयातुल्लाह खुमैनी के मकबरे पर हमला किया गया। ईरान मौजूदा आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सक्रिय और प्रभावशाली स्तंभ है इसलिए आतंकी नुकसान पहुंचाना चाह रहे हैं। इस हमले के बाद हम सबके लिए चिंता की बात यह है कि मध्य-पूर्व देशों के बीच कूटनीतिक जंग का लाभ अगर आतंकी संगठन उठाए, तो यह खतरनाक संकेत होंगे। फिलहाल भारत को फूंक-फूंक कर कदम रखने की जरूरत है। ईरानी संसद पर आइएस ने हमला करके अपने दुस्साहस का एक बार फिर से परिचय दिया है। हमले का कारण साफ है। सीरिया के लिए ईरान का साथ देना उनके लिए फांस बन गया। ईरान सीरिया के साथ देने की कीमत चुका रहा है। हालांकि ईरान अब भी पीछे नहीं हटेगा। लेकिन रास्ते उसके लिए कठिन होने वाले हैं। आतंकी संगठन आइएस ने शिया बहुल देश ईरान पर बड़ा हमला करके पूरे संसार के शिया मुसलमानों को भयभीत कर दिया है। आइएस ने कुछ ही मिनटों में पूरे ईरान को दहला दिया। आतंकियों ने अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देने के लिए मुल्क के दो प्रमुख जगहो को चुना। आतंकियों ने बुधवार की सुबह ईरान की संसद व क्रांतिकारी नेता अयातुल्लाह खुमैनी के मकबरे में घुसकर एक साथ दोनो जगहों पर आत्मघाती हमलाकर अपने दुस्साहस का परिचय दिया। आतंकियों ने हमला उस वक्त किया जब संसद की कार्रवाही चल रही थी जिसमें सभी संसद सदस्य व सरकार के मंत्री-अधिकारी मौजूद थे। हमले के वक्त चारों ओर गोली चलने की तड़तड़ाहट से संसद सदस्यों में भगदड़ और अफरा-तफरी मच गई। करीब दस मिनट की आतंकियों द्वारा गोलीबारी में दर्जनभर से ज्यादा सुरक्षाकर्मियों की मौत हो गई और पचास से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। गनीमत इस बात की रही है सुरक्षाकर्मियों ने सभी सांसदों को सुरक्षित दूसरे कमरों में पहुंचा दिया। शिया बहुल ईरान में यह चरमपंथी गुट आईएस का पहला बड़ा हमला माना है। आइएस के इस हमले पर ईरानी-अमेरिकी राजनीतिक विश्लेषकों ने चिंता जाहिर की है। उन्हें अयातुल्लाह खुमैनी के मकबरे व संसद पर हमले बहुत ही नियोजित लगते हैं। हमलावरों ने दो ऐसी अहम जगहों को चुना, जो इस इस्लामी गणराज्य का प्रतीक हैं संसद और खोमैनी का मकबरा। वह ईरानी सरकार पर सीधा निशाना साध रहे हैं। क्योंकि ईरानी सरकार उनके खिलाफ है। बता दें कि भारत में जिस तरह से महात्मा गांधी को महान शख्सियत का दर्जा दिया गया है। गाँधी खिलाफ कोई भी नागरिक गलत बात नहीं सुन सकता। वैसे खोमैनी के प्रति ईरान की जनता हृदय से सम्मान करती है| खुमैनी के प्रति किसी भी तरीके के असम्मानित शब्दों की कल्पना भी ईरान में नहीं की जा सकती ईरान की उन्हें देश का सर्व श्रेष्ठ सम्मान देती है| बता दें कि खोमैनी 1979 की इस्लामी क्रांति के नेता थे और उन्हें मौजूदा ईरान की सबसे बड़ी शख्सियत समझा जाता है। उनके मकबरे पर यूं हमला करना, वहां की जनता की भावनाओं पर सीधी चोट मारने जैसा है। आतंकी संगठन आइएस गुट ने ईरान पर सीरिया के अलावा कतर का भी सहयोग देने का आरोप लगाया है। ईरान इस्लाम में प्रचलित शिया मत को तरजीह देता है। पर, आईएस कटृरपंथी इस्लामिक विचारधारा वहाबी अरब को मानता है। साउदी अरब भी वहाबी को मानता है। यही वजह है कि साउदी और ईरान के बीच भी सालों से जंग छिड़ी है। एक दूसरे के बीच विचारों व सियासी मापदंड़ों के लेकर दूश्मन बनें हुए हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह अमेरिका है, अमेरिका की गलत कूटनीति का असर है की कट्टरपंथी अपने क्षेत्र को बढ़ाते चले जा रहे हैं, और अमेरिका कई मुस्लिम देशों के बीच जातीय संघर्ष को हवा देकर ऐसे खेल खेलता चला जा रहा है। अमेरिका की पूर्व की दोषपूर्ण कूटनीति का ही परिणाम है कि इस समय मध्य-पूर्व व पश्चिम एशिया में अस्थिरता है और आतंकी गुट आईएस, अलकायदा, तालिबान जैसे अन्य आतंकी संगठनों को जन्म लेने का मौका मिला। अमिरका की कुछ अराजकता भरी नीतियां ही रहीं है जिससे इस तरह की अस्थिरता पनपी है। सीरिया युद्व में जबसे ईरान ने राष्टपति बशर का साथ देने की घोषण की है, तभी से आइएस उसका दुश्मन बना है। आइएस ने इससे पहले ईरान पर प्रत्यक्षरूप से कभी भी हमला नहीं किया। आइएस ने कई मर्तबा ईरान को सीरिया का साथ न देने को चेताया, लेकिन ईरान न उसकी सभी बातों का दरकिनार किया। मौजूदा हमला उसी नजरअंदाजी का परिचायक है। हमले का बाद ईरान का रूख क्या होगा, यह देखने वाली बात होगी। हालात खराब होंगे, इसकी आशंका दिखने लगी है। भारत के लिए सचेत रहने की जरूरत है। वहां रह रहे भारतीयों को दूतावास से संपर्क में रहने को कहें।

पुलिस ने करीब पांच घंटे बाद हमलावरों को मार गिराया। हमले के समय संसद की कार्यवाही जारी थी। खास बात यह है कि सांसदों ने संसद की कार्यवाही जारी रखी, सांसदों ने अपना साहस तनिक भी नहीं खोया जिससे ऐसा प्रतिक हो कि संसद भवन पर हमले से सांसदों में भय फैला हो| संसद भवन के अन्दर सांसदों ने जिस तरह का साहस दिखाया है इस तरह के साहस से फ़ौज के जवानो का साहस निश्चित ही अपने चरम पर पहुच जाता है, जब देश का नेता निर्भीक होता है तो फ़ौज के जवानों की ताकत दोगुना बढ़ जाती है, स्थानीय मीडिया के अनुसार, चार बंदूकधारी तेहरान स्थित संसद में घुस गए, जहां उन्होंने एक सुरक्षाकर्मी और एक अन्य शख्स को मार गिराया। गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि सभी आतंकी महिलाओं की पोशाक पहनकर आगंतुकों के लिए बने प्रवेश द्वार से अंदर घुसे थे। ठीक उसी समय, तीन से चार आतंकी ईरान के क्रांतिकारी नेता अयातुल्लाह रहोल्लाह खुमैनी के मकबरे के परिसर में घुस गए। यहां आतंकियों के हमले में एक माली की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। मकबरे पर हमला करने वाले लोगों में एक महिला भी थी, जिसने खुद को उड़ा लिया। संसद कार्यालय की इमारत में एक आत्मघाती हमलावर ने विस्फोट कर दिया। सोशल मीडिया पर हमले की कुछ तस्वीरें सामने आईं जिसमें देखा जा सकता है कि पुलिस ने टूटी हुई खिड़कियों से लटके स्टाफों को बाहर निकाला। यहां की सभी मोबाइल सेवा भी बंद कर दी गई थी। इन सभी बिन्दुओं को ध्यान रखते हुए ऐसा लगता है कि विश्व स्तर की राजनीति एक नई दिशा की ओर जा रही है, जिसमें किसी न किसी तरह से छोटे देशों को षड्यंत्रों के अंतर्गत परेशान किया जाना साफ़ एवं स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है|

 

विचारक|

सज्जाद हैदर रिज़वी

 

 

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