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    Homeराजनीतिविपक्षी एकता से पहले ठोस मुद्दों की तलाश जरूरी

    विपक्षी एकता से पहले ठोस मुद्दों की तलाश जरूरी

    • ललित गर्ग
      एनसीपी प्रमुख और राष्ट्रीय राजनीति के कद्दावर नेता शरद पवार इनदिनों विभिन्न राजनीतिक दलों को संगठित करने एवं महागठबंधन की संभावनाओं को तलाशने में जुटे हंै। सियासी रणनीतिकार एवं राजनीति की दशा एवं दिशा पर सशक्त पकड़ रखने वाले प्रशांत किशोर भी ऐसी ही कुछ संभावनाओं को आकार देेने एवं उससे भारत की राजनीति में बड़े बदलाव को देखने की आशा करते हुए पवार से तीसरी बार मिले हैं। एक ही पखवाड़े में उनकी पवार से यह तीसरी मुलाकात अनायास नहीं कही जा सकती, उसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ है। लोकतन्त्र में राजनीतिक परिस्थितियां प्रायः बदलती रहती हैं, इन्हीं बदलाव की आहट को प्रशांत शायद देख भी पा रहे हैं और सुन भी पा रहे हैं। भले विपक्षी एकता अभी दिवास्वप्न हो, असंभव प्रतीत हो, लेकिन लोकतंत्र में कुछ भी संभव है। यदि ऐसा संभव हुआ तो यह भारतीय जनता पार्टी की सशक्त जमीन में सेध लगाना होगा।
      लोकतंत्र में विपक्ष का निस्तेज होते जाना शुभ नहीं है। इसलिये विपक्ष के मजबूत होने का अर्थ है लोकतंत्र का मजबूत होना। लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष के दलों में परिवर्तन जरूरी है, भारत दुनिया का सबसे बड़ा संसदीय लोकतन्त्र कहलाता है, अतः इसमें जो भी बदलाव आता है वह जनता जनार्दन की इच्छा एवं अपेक्षाओं के वशीभूत ही होता है। जनता ही है जो राजनीतिक दलों की भूमिका बदलती रहती है। इसलिए श्री शरद पवार जो भी प्रयास कर रहे हैं वह लोकतन्त्र में और अधिक जिम्मेदारी पैदा करने व जवाबदेह बनाने के लिए कर रहे हैं। विपक्षी एकता के लिये हो रहे प्रयासों की जरूरत इसलिये भी है कि वर्तमान विपक्षी राजनीतिक परिदृश्य में ऐसा कोई दल नहीं है जो अपने बूते पर भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती दे सके। एकमात्र कांग्रेस में यह दमखम था, जिसे पिछले एक दशक में धीरे-धीरे कमजोर कर दिया गया है। अभी आगामी कई वर्षों में कांग्रेस से ऐसी किसी संभावनाओं की गुंजाइश नहीं है।
      पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने निश्चित रूप से ममता की ताकत को दिखाया है और उसी के बल पर विपक्षी खेमे का हौसला बढ़ा है। ममता अपने बल पर 2024 लोकसभा चुनावों में सत्तारूढ़ बीजेपी और एनडीए को हराने का सपना यदि पालती है तो यह अतिश्योक्ति ही कही जायेगी। शायद इसी कारण प्रशांत किशोर विपक्षी एकता की जरूरत को महसूस कर रहे हैं, क्योंकि उनके सारे सपने एवं राजनीति का गणित हवा में न होकर जमीन से जुड़ा होता है, वे इसी जमीन को मजबूत कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव से पहले यूपी विधानसभा चुनाव में खासी जोर-आजमाइश होगी और भविष्य की विपक्षी एकता की तस्वीर भी सामने आयेगी। विपक्षी दलों की ताकतें जो बीजेपी को सत्ता से बाहर देखना चाहती हैं, अगर आपस में संवाद और समन्वय के सूत्र मजबूत करने में जुटी हैं तो वे मिलकर भविष्य की राजनीति में बड़ा बदलाव करने का माध्यम बन जाये, इसमें आश्चर्य की कोई बात भले न हो, महत्वपूर्ण जरूर है। अक्सर ऐसे छोटे-छोटे प्रयासों का बड़ा नतीजा निकलता आया है। दिक्कत बस यह है कि विपक्ष की एकजुटता या उनमें समन्वय का लक्ष्य महज बातचीत से हासिल नहीं होने वाला, उसके लिये त्याग, दूरगामी सोच एवं राजनीतिक परिवक्वता जरूरी है। इस प्रक्रिया में शामिल तमाम छोटी-छोटी पार्टियां और नेता अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन का विस्तार करने एवं अपनी जमीन को मजबूत करने में जुटे रहने से यह लक्ष्य हासिल नहीं होगा। उन्हें विपक्षी एकता को मजबूती देने का मकसद भी साथ में लिए चलना होगा। एक बात विपक्षी एकता का रथ केन्द्र में सत्ता परिवर्तन कर सकता है और वह है कांग्रेस को इस विपक्षी एकता का आधार बनाना। अन्यथा त्रिकोणात्मक राजनीति का लाभ भाजपा को ही मिलेगा। सभी विपक्षी दलों में बातचीत, विचार-विमर्श और मेलजोल के बीच आपस में शक्ति परीक्षण की प्रक्रिया की जटिलताओं के बीच कोई बड़ा नतीजा नहीं आने वाला है।
      विपक्ष की एकजुटता की राह में एक बड़ा रोड़ा और भी है और वह है कि विपक्षी एकता की अगुआई किसके हाथों में होगी से जुड़ा प्रश्न? पूर्व में विपक्षी एकता इसलिये सफल रही कि उस समय कांग्रेस सबसे बड़ी और मजबूत पार्टी के रूप में मौजूद थी। मगर पिछले कुछ वर्षों से उसकी ताकत लगातार कम होती गई है। ऐसे में विपक्षी मोर्चे का हिस्से बनने वाली क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस पर हावी होने की कोशिश करेंगी और यही स्थिति विपक्षी एकता को सफल नहीं होने देगी। ऐसा भी नहीं लगता कि कांग्रेस विपक्षी मोर्चे के नेतृत्व का दावा आसानी से छोड़ देगी? यों भी, 2024 संसदीय चुनाव में अभी तीन साल बाकी हैं। उससे पहले यूपी, पंजाब, गुजरात जैसे महत्वपूर्ण राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं। इन चुनावों में विपक्षी एकता की क्या और कितनी मजबूत तस्वीर सामने आती है, पता लग जायेगा। ये चुनाव भाजपा के लिये भी अग्नि परीक्षा के होंगे।
      शिवसेना सांसद संजय राउत विपक्षी दलों की एकता चाहते हैं। उनके दल की भूमिका भी महत्वपूर्ण होने वाली है। क्या वे संभावित विपक्षी मोर्चे की नेता के तौर पर ममता बनर्जी के नाम पर सहमत होंगे? क्योंकि इसके लिये पहले ही उन्होंने एनसीपी के शरद पवार का नाम ले चुके हैं। ऐसे अनेक मुद्दे हो सकते हैं जो विपक्षी दलों के एक मंच पर आने से पहले ही ’अपनी ठपली अपना राग’ की स्थितियों को दर्शाते हुए विखण्डन का कारण बन जाये। भले ही पश्चिम बंगाल में बीजेपी की उम्मीदों को झटका देते हुए ममता बनर्जी ने जो अप्रत्याशित जीत दर्ज की, उससे विपक्ष का हौसला बढ़ा है, लेकिन इसी आधार पर सभी विपक्षी दल सर्वसम्मति से उन्हें अपना नेता मान ले, इसमें संदेह है। भले ही शिवसेना एवं कांग्रेस ममता बनर्जी के नाम पर नरम पड़ी हो, लेकिन निर्णायक स्थितियों में पहुंचने तक कई रोडे़ हैं। कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने यह तो माना कि भाजपा विरोधी राजनीति की अग्रिम पंक्ति में ममता बनर्जी अपनी जगह पक्की कर चुकी हैं, लेकिन उन्होंने भी साफ किया कि विपक्षी मोर्चे का नेता कौन होगा, जैसे सवाल अभी नहीं उठाने चाहिए। सिंघवी ने एक बड़ा संकेत दिया है कांग्रेस विपक्षी एकता के रथ को हांकने में सहयोगी बन सकती है।
      नये बनते-बिगड़ते राजनीतिक समीकरणों के बीच भाजपा की ताकत को कमतर आंकना अपरिपक्वता एवं जल्दबाजी होगी। प. बंगाल में भाजपा की पराजय से अति उत्साहित दिखने वाले दलों को उसका दूसरा पक्ष देखना चाहिए। इन चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन शानदार रहा है, यह तो भाजपा के बड़े नेताओं की बेजमीनी सोच, उनका अंहकार एवं बडे़ सपने थे, अन्यथा पार्टी का प्रदर्शन उसकी क्षमता से अधिक रहा है। इस प्रदेश में ही नहीं, जहां भी भाजपा चुनाव मैदान पर उतरती है अपना सब कुछ दांव पर लगा देती है। उसकी परिपक्व एवं प्रभावी राजनीति तथा उत्तर-पश्चिमी राज्यों में उसकी ताकत को कम करके नहीं तोला जा सकता। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में यहां के प्रमुख क्षत्रीय दलों बसपा व सपा की राजनीति के बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। ये दोनों दल अपनी गोटियां इस तरह बिछाते हैं कि किसी भी सूरत में कांग्रेस पार्टी अपनी खोई हुई जमीन प्राप्त न कर सके। इसके लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं और सत्ता और विपक्ष का भेद भी भुला सकते हैं।
      क्षेत्रीय दलों के गठबन्धन को आगे बढ़ा कर इस अवसरवादी गठबन्धन से किसी बड़ी लड़ाई को सफलतापूर्वक लड़ना एवं भाजपा को सत्ता से बाहर करना इतना आसान नहीं है। भाजपा अब राष्ट्रीय स्तर की मजबूत पार्टी है और इसका मुकाबला भी राष्ट्रीय स्तर का विकल्प देकर ही किया जा सकता है। लोकतन्त्र की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि इसमें ठोस विकल्पों की जनता के सामने कमी नहीं रहनी चाहिए। श्री पवार को महागठबंधन की संभावनाओं से पहले जनता से जुड़े ठोस मुद्दों की तलाश करनी चाहिए। यही वह राह है जिस पर चलकर विपक्षी एकता सफल भी हो सकती है और सार्थक भी। इसी से लोकतंत्र को मजबूती भी मिल सकती है।
    ललित गर्ग
    ललित गर्ग
    स्वतंत्र वेब लेखक

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