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    बाल विवाह की कुप्रथा पर रोक जरूरी


        बाल विवाह समाज के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बना हुआ है। आज हम 21वीं सदी में जी रहे है, समाज में स्त्री और पुरूष के समान हक की बात भी करते है। लेकिन समाज में आज भी स्त्रियों को न ही समान हक दिया जाता है और न ही समान शिक्षा। इस बात में कोई अतिश्योक्ति नही की आज भी महिलाओं को समाज में पुरुषों से कमतर ही आका जाता है। आज भी लड़कियों को पराया धन समझा जाता है। यह सबसे बड़ा अभिशाप कहे या समाज की हकीकत, आज भी लड़कियों को या तो पैदा होते ही मार दिया जाता है। और अगर किसी तरह वह जिंदा रह भी गयी तो उन्हें न ही लड़को के समान शिक्षा दी जाती है, और न ही उनके हुनर को तवज्जों दी जाती है। बचपन से ही उन्हें ये कहा जाता है, कि वह पराया धन है। यहां तक की आज भी समाज में कम उम्र में ही लड़कियों की शादी कर दी जाती है। जिससे न केवल उनका मानसिक विकास रुक जाता है, अपितु शारिरिक विकास भी ठीक से नही हो पाता है। 
        भारत में बाल विवाह आज भी चिंता का विषय है। बाल विवाह किसी बच्चे को अच्छे स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा के अधिकार से वंचित करता है।  कम उम्र में विवाह से लड़कियों को हिंसा, दुर्व्यवहार औऱ उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। शिक्षा के अवसर कम हो जाते है। बाल विवाह लड़कियों के लिए सदा एक अभिशाप ही रहा है। बाल विवाह रोकने के लिए समय समय पर कई कानून भी बनाये गए, लेकिन आज भी समाज में बाल विवाह का कलंक ज्यों का त्यों बना हुआ है। बाल विवाह पर रोक लगाने के लिए 1929 में बाल विवाह निरोधक अधिनियम कानून बनाया गया। इस अधिनियम में विवाह के लिए लड़के की उम्र 18 वर्ष और लड़की की उम्र 15 वर्ष निर्धारित की गई। लेकिन बाद में इसमें संशोधन किया गया और लड़के की उम्र 21 व लड़की की उम्र 18 वर्ष कर दी गई।  लेकिन जैसा कि समाज में प्रचलित है अधिनियम बन जाना अलग बात है, लेकिन जमीनी हकीकत पर उसे लागू करने में वर्षों का समय लग जाता है। बाल विवाह पर प्रतिबंध लगाने के लिए राजाराम मोहन राय ने अथक प्रयास किए। इसकी शुरुआत अंग्रेजी शासन काल मे ही हो गई थी। लेकिन इस अधिनियम को प्रभावी बनाने के लिए 1978 में पुनः इसमें परिवर्तन किया गया और इसे शारदा बाल विवाह निरोधक अधिनियम नाम दिया गया। लेकिन आज की वास्तविक परिस्थितियों को देखे तो आज भी ये अधिनियम उतना प्रभावी नहीं हो सका है। आज भी न जाने कितनी मासूम लड़कियां कम उम्र में ही विवाह की बलि चढ़ा दी जाती है। जिस उम्र में उन्हें पढ़ाई लिखाई करना और सामाजिक ताने-बाने को समझने का समय होता उस उम्र में वो अपनी गृहस्थी का बोझ संभालती नजर आती है। 
            यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 47 फीसदी बालिकाओं की शादी 18 वर्ष से कम उम्र ही कर दी जाती है। रिपोर्ट बताती है कि 22 फीसदी लड़कियां 18 वर्ष से कम उम्र में ही मां बन जाती है। ये रिपोर्ट यह बताने के लिए काफी है कि आज भी रीति रिवाज और सामाजिक रूढ़िवादिता के फेर मे हम महिलाओं के साथ किस प्रकार का व्यवहार कर रहे है। 21वीं सदी में भी पितृसत्तात्मक सोच का ही वर्चस्व दिखाई देता है। हमारी भारतीय संस्कृति में जहां लड़कियों को देवी के रूप में पूजा जाता रहा हो आज वही लड़कियां अपमान और तिरष्कृत जीवन जीने को मजबूर हो रही है। और कही न कही इसका सबसे बड़ा कारण भी यही है कि समय से पूर्व ही उनका विवाह कर दिया जाता है और एक ऐसी ज़िन्दगी की बलि-वेदी पर चढ़ा दिया जाता है जहां उसे अपने अधिकार, अपनी बात रखने का कोई हक नही होता है। आज भी देश में एक वर्ग महिलाओं का ऐसा है, जो देश का संचालन कर रही है, ऊंचे पदों पर आसीन है लेकिन इनकी तादात बहुत कम है। 
        गैर सरकारी संस्था यंग लाइवज व एनसीपीसीआर की 2011की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार देश में एक दशक के भीतर 1.2 करोड़ बाल विवाह हुए। जिनमें 69.5 लाख करोड़ लड़के थे, जिनकी 21 साल से कम उम्र में शादी हो गई। 51.6 लाख लड़कियां थी जिनकी शादी 18 साल से कम उम्र में हो गई थी। आज एक बार फिर बाल विवाह कानून को और प्रभावी बनाने के लिए शारदा एक्ट में पुनः परिवर्तन की मांग उठ रही है। पुरुषों और महिलाओं के विवाह की न्यूनतम आयु में अंतर को रूढ़िवादी ओर पितृसत्तात्मक सोच से ग्रसित बताया जा रहा है। साथ ही महिलाओं की आयु को भी 18 वर्ष से बढ़ाकर 21 वर्ष करने की मांग की जा रही है। वैसे देखा जाए तो कम आयु में विवाह से महिलाओं को जीवन भर स्वास्थ्य सम्बंधित समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कम आयु में माँ बनने पर प्रजनन के दौरान मां या बच्चे की मृत्यु होने की संभावना भी बढ़ जाती हैं। कम उम्र में शादी के कई अन्य ख़तरे भी होते। मातृ मृत्यु दर कम उम्र की महिलाओं की सबसे ज्यादा है देश में। महिला और पुरुष की विवाह की आयु में अंतर होना संविधान के अनुच्छेद 14 जो समानता का अधिकार तथा अनुच्छेद 21 गरिमामयी जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन भी है कहीं न कहीं। ऐसे में आगामी समय में अगर लड़कियों की शादी की उम्र क़ानूनी रूप से 21 वर्ष तय कर दी जाती और उसका अनुपालना बेहतरी से होता है। तो इससे महिलाओं की स्थितियों में काफ़ी बदलाव देखने को मिल सकता।
    सोनम लववंशी 

    सोनम लववंशी
    सोनम लववंशी
    स्वतंत्र लेखिका

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