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    Homeसाहित्‍यकविताकिसान की व्यथा

    किसान की व्यथा

    मैं किसान हूँ
    अब आपने अनुमान लगा ही लिया होगा
    कि मेरे पिता एवं पितामह भी
    अवश्य ही किसान रहे होंगे

    आपका अनुमान सही है श्रीमान
    मेरे पूर्वज भी थे किसान
    किसान का पुत्र किसान हो या ना हो
    किसान का पिता अवश्य किसान होता है

    किसान होना तो अभिशाप समझा जाता है
    अगर विश्वास ना हो तो आप कभी किसी को
    किसान बनने का आशीर्वाद देकर देख लीजिए
    आपका भ्रम अवश्य दूर हो जाएगा

    किसान पर लिखना और बोलना आसान है
    कठिन तो है किसान बनना
    किसान बनकर जीवन व्यतीत करना आसान नहीं होता
    धैर्य, साहस और समर्पण चाहिए

    किसान को संतान सी प्रिय होती है
    लहलहाती हुई फसल
    और परम प्रिय को खोने की पीड़ा के समान ही होता है
    फसलों के नष्ट होने का कष्ट

    किसान की व्यथा को
    इस भूतल पर
    केवल किसान ही समझ सकता है
    और कोई नहीं

    ✍️ आलोक कौशिक

    आलोक कौशिक
    आलोक कौशिक
    शिक्षा- स्नातकोत्तर (अंग्रेजी साहित्य) पेशा- पत्रकारिता एवं स्वतंत्र लेखन सम्पर्क सं.- 8292043472

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