आर्य द्रविड़ को अलग जाति बताके भ्रम फैलाना ठीक नहीं

—विनय कुमार विनायक
आर्य-द्रविड़ को अलग-अलग जाति
बताके भ्रम को फैलाना ठीक नहीं!

‘आर्य’ भारत में नहीं अलग जाति,
यह तो एक संबोधन और उपाधि,
संस्कृत भाषा-भाषियों से संबोधित,
भारतीय भाषाओं द्वारा संपोषित!

आज का ‘सर’ अंग्रेजी सरनेम जैसे,
नाम के आगे या पीछे में लगा देते,
जैसे सर सैयद अहमद, सर इकबाल,
अंग्रेज नहीं, मुस्लिम हिन्दू मूल के!

ज्यों मुहम्मद जिन्ना,मुहम्मद इकबाल,
अरबी नस्ल के नहीं,भारतीय जाति के,
आर्य को जाति बताके उत्तर-दक्षिण में,
आर्य-द्रविड़ में घृणा फैलाना ठीक नहीं!

आर्य नहीं कोई जाति,ये एक संबोधन;
श्रद्धेय, महोदय, महाशय, श्रीमान जैसे,
श्री, मुहम्मद या अंग्रेज की सर उपाधि,
हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई को लगाई जाती,
क्या उनकी मजहबी-जाति बदल जाती?

हमें हिन्दी, पारसी-ईरानियों ने कही थी,
हम हिन्दी हैं,वतन ये हिन्दोस्तां हमारा,
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां, का नारा,
किसी तथाकथित आर्यजाति नहीं बल्कि,
हिन्दू से धर्मांतरित मुस्लिम शायर का!

तय है तथाकथित उत्तर की आर्यजाति ने,
तथाकथित द्रविड़ जातियों को नहीं जीती,
ईरानी, यूनानी, अरबी, तुर्की आक्रांताओं सा,
दक्षिणी स्थानों को धार्मिक संज्ञा नहीं दी!

फिर दक्षिणी आंध्र,तमिल,कर्नाटक,केरल की
स्थानीय संज्ञा विजयनगर,रामेश्वरम,बालाजी,
अनन्तपुर,मीनाक्षीपुरम संस्कृत में कैसे हुई?
ये सारी सांस्कृतिक संज्ञा द्रविड़ों की अपनी!

दक्षिण में भी उत्तर जैसा हिन्दू हैं चतुष्वर्णी,
ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र मिश्रित जातियों की,
जप-तप-पूजन सोलह संस्कार की रीति-नीति,
वेद पूर्व मन्वन्तर परम्परा द्रविड़ भू से चली,
प्रथम स्वायंभुव मनुवंशी ऋषभ से जैन भी!

ऋषभदेव विष्णुअंशी,इन्द्रबाला जयंती-पति,
आदि जैन तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र द्वय;
भरत व बाहुबली, भरत से भारत का नाम,
हम भारती कहलाते मनुर्भरती, बाहुबली की
कर्नाटक के श्रमणबेलगोला में पुण्य भूमि!

आर्य-अनार्य की अवधारणा वर्तमान मनु;
विवश्वान सूर्य पुत्र वैवस्वत मनु से चली,
वैवश्वत मनु के पूर्व छः मनु व प्रजापति,
आदि मनु स्वायंभुव मनुवंश-परंपरा प्रसूत,
स्वारोचिष,उत्तम,तामस,रैवत,चाक्षुष थे मनु!

छः मनु, पैंतालीस प्रजापति; दक्ष तक की
प्राग्वैदिक सतयुग तक अवधि,त्रेता से चली
वैदिक संस्कृति वैवश्वत मनु के पुत्र-पुत्री से,
‘कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम’ अभियान दौर ये,
आर्यकरण था उपनयन संस्कार शिक्षा हेतु!

आर्य कुल परंपरा सूर्यपुत्र वैवश्वत मनु ने
अपने पिता सूर्य के नाम से सूर्यवंश और
मनुपुत्री इला ने श्वसुर से चन्द्रवंश चलाई,
सूर्य पिता कश्यप,दक्ष प्रजापति के जमाई,
चन्द्र पिता अत्रि, कश्यप पिता थे मरीचि!

वैवस्वत मनु के पूर्ववर्ती छ:मनु-मुनि-ऋषि,
दक्ष प्रजापति गण ब्रह्मापुत्र, आर्य नहीं थे,
सिर्फ दक्ष पुत्री अदिति-कश्यपपुत्र आदित्य;
सूर्य संतति मनुवंशी मानव आर्य कहलाती,
दक्ष की अन्य पुत्रियों; कश्यप की संतति;
दिति के दैत्य,दनु-दानव आदि अनार्य थी!

इतना ही नहीं सप्तर्षि मरीचि व अत्रि के
सूर्य चंद्र कुल छोड़ अन्य सप्तर्षि अंगिरा,
पुलह,पुलस्त्य,भृगु,वशिष्ठ आदि के वंशज,
आर्य नहीं थे, पर आज ब्राह्मण कहलाते,
अस्तु आर्य नहीं जाति,बल्कि ये है पदवी
कश्यपगोत्री राजन्य महाजन जातियों की!

ऋषियों ब्राह्मणों ने आर्य संस्कार दिए थे,
मगर खुद वो आर्य कभी नहीं कहलाते थे,
पुलस्त्य वंशी विश्रवा,रावण आदि ब्राह्मण,
भृगु वंशी शुक्राचार्य,परशुराम आदि भार्गव,
किन्तु मारीचि कश्यप सूर्यवंशी इच्छवाकु,
रघु,राम, जैन तीर्थंकर महावीर,बुद्ध आर्य!

आत्रेय चन्द्रवंशी पुरुरवा, नहुष, ययाति,यदु,
सहस्त्रार्जुन, कृष्ण,पौरव, कौरव आदि आर्य,
आश्चर्य है कि इन आर्य उपाधिधारियों ने
कभी अनार्य, असुर, वनवासी, द्रविड़ पे
आक्रमण नहीं किए, बल्कि सहयोगी थे,
आर्य राम तो ब्राह्मण रावण से लड़े थे!

आर्य सहस्त्रार्जुन; भृगु परशुराम से भिड़े,
मुंडा मुरुण्ड, द्राविड़,पौण्ड्र,किरात मित्र थे!
आर्य कृष्ण; मामा कंस व कौरव के शत्रु!
आर्य बुद्ध; ब्राह्मणी कर्मकांड विरोधी थे!
किन्तु इन आर्य उपाधिधारी क्षत्रियों को,
अनार्य,असुर,द्रविड़ के आक्रांता कहे जाते?

क्या द्रविड़ आर्यों से अलग कोई जाति?
तो फिर वैदिक धर्म उद्धारक ब्राह्मण;
आदि शंकराचार्य द्रविड़ गौरव कौन थे?
हिन्दू भक्ति आंदोलन के आदि आचार्य,
द्रविड़ भू क्षेत्र के ब्राह्मण रामानुजाचार्य,
रामानंद,बल्लभाचार्य क्या आर्य नहीं थे?

दक्षिण भारत के राजन्य चेर,चोल,पौण्ड्र,
आंध्र सातवाहन, देवगिरी के हैहय-यादव,
विदर्भ वरार के भीष्मक रुक्मिणी पिता,
कल्याणी के कलचुरी,भारशिव, लिंगायत,
विज्जल,पाशुपतपंथी, दत्तात्रेय के भक्त,

द्रविड़ सामंत बंगाल के सेन राजवंशादि
सूर्य-चंद्र वंशी आर्य उपाधिधारी नहीं थे?

प्रश्न अनुत्तरित है मैक्समूलर वादियों!
अंग्रेजी के अनुवाद नहीं आगम-निगम,
संस्कृत, तमिल आदि धर्मग्रंथ,साहित्य,
अपनी देशी भाषाओं में जो संग्रहित है,
उसके ज्ञान गंगा में सामाजिक हित है!
आर्य व द्रविड़ की अलग नहीं जाति है,
मिथ्या भ्रम व घृणा फैलाना ठीक नहीं!
—विनय कुमार विनायक

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