विश्व पर्यावरण दिवस, 5 जून
मोहन मंगलम
मनुष्य तथा प्रकृति का सम्बन्ध अत्यन्त घनिष्ठ है। प्रकृति हमें जीवन के लिए प्राणवायु, पानी, भोजन और आश्रय सब कुछ देती है। हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमें प्रकृति के महत्व को समझाने और पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूक करने का काम करता है। इस दिन का उद्देश्य दुनिया भर के लोगों को पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं जैसे प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूक करना है। बढ़ता प्रदूषण, जंगलों की कटाई और जलवायु परिवर्तन हमारे जीवन पर गंभीर प्रभाव डाल रहे हैं। ऐसे में यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमें प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग करना चाहिए। पर्यावरण को बचाने के लिए छोटे-छोटे कदम उठाने चाहिए। आने वाली पीढ़ियों के लिए पृथ्वी को सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है।
मानव सभ्यता के प्रारम्भिक काल में भौतिक प्रगति का आधार था आवश्यकता। धीरे-धीरे आवश्यकता का स्थान सुविधा एवं उपभोग ने ले लिया। वर्तमान में उपभोगवाद की पराकाष्ठा यह है कि महज सुविधा एवं उपभोग के नाम पर जीवन एवं स्वास्थ्य के मूलभूत आवश्यक तत्वों को विकृत किया जा रहा है। जब जीवन ही नहीं रहेगा, तो उपभोग और सुविधा किसके लिए होगी?
कम आबादी के लिए गृह उद्योग पर्याप्त थे, किंतु बढ़ती जनसंख्या एवं जरूरतों के चलते मशीनीकरण हमारी मजबूरी बन चुका है। पेट्रोल-डीजल एवं अन्य रासायनिक तत्त्वों के इस्तेमाल से निकलने वाली कार्बन डाईऑक्साइड एवं अन्य हानिकारक गैसें वायुमण्डल को निरन्तर प्रदूषित कर रही हैं। इससे उत्पन्न ग्लोबल वार्मिंग ने ऋतुओं का चक्र ही बिगाड़ दिया है। अतिवृष्टि, अल्पवृष्टि, अनावृष्टि, तेजाबी वृष्टि इत्यादि से खाद्यान्न-उत्पादन एवं मानव जीवन पर गम्भीर संकट उत्पन्न होने लगे हैं। असमय आंधी, तूफान एवं ओलावृष्टि से हालात भयंकर होने लगे हैं। बर्फ के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। तापमान ऐसे ही बढ़ता रहा तो ग्लेशियर समाप्त हो जाएंगे और समुद्र में बाढ़-जैसे हालात उत्पन्न हो जाएंगे और तब जलप्रलय का होना भी सम्भव है।
विश्व का वर्तमान पर्यावरणीय परिदृश्य अत्यन्त भयावह है। आज पर्यावरण के मुख्य धारक तत्त्वों – पंचमहाभूतों का मूल स्वरूप तीव्र गति से बिगड़ रहा है। समस्त प्राणियों को धारण कर उन्हें बसाने वाली धरती नित्य बढ़ते ताप से तप्त होकर बुखार से पीड़ित है। जीवनदायक जल का जीवन संकट में है। विश्व के कई भूभागों में लोग पेयजल के लिए संत्रस्त हैं। जल-संकट जनसमुदाय के पलायन, विस्थापन, कलह, आधि-व्याधि, मनमुटाव और आपसी संघर्ष का कारण बनकर दुनिया को तीसरे युद्ध की ओर धकेल रहा है।
‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः’ की पवित्र भावना को मानव तिलांजलि दे चुका है। ऐंद्रिय वासनाओं की पूर्ति हेतु साधन-उपसाधनों को जुटाने में व्यस्त मनुष्य प्रकृति को उचित भाग, समुचित पोषण दिए बिना अनवरत दोहन करता जा रहा है। सुख के साधनों में बेतहाशा वृद्धि से बिजली, प्राकृतिक गैस तथा जीवाश्म ईंधन की खपतमें असीमित बढ़त हो रही है, जिसके परिणामस्वरूप विश्व-वसुधा ग्लोबल वार्मिंग के ताप से झुलसने लगी है।
ग्लोबल वार्मिंग अब वैश्विक चेतावनी दे रही है। यह इस शताब्दी की सबसे खतरनाक पर्यावरणीय समस्या बनकर उभर रही है। धरती के तापमान में हो रही वृद्धि से जमीन की शुष्कता बढ़ रही है तथा कृषि योग्य उपजाऊ जमीन लगातार घट रही है। इस असह्य गर्मी से शारीरिक, मानसिक, आर्थिक तथा सामाजिक दुष्प्रभावों की आशंकाएँ व्यक्त की जाने लगी हैं। पृथ्वी का ताप इसी गति से बढ़ता रहा तो कुछ दशकों के बाद गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं, छोटे बच्चों, खुले में काम करने वाले व्यक्तियों तथा वृद्धजनों का जीवन मुश्किल में पड़ने की प्रबल आशंका है। रात्रिकालीन तापमान में वृद्धि होनेके कारण नींद न आने से सिरदर्द, अवसाद और चिड़चिड़ेपन जैसे जटिल मानसिक रोग बढ़ने के अनुमान हैं। जल-संकट तथा सूखे की वृद्धि से पर्यटन, कृषि, बागवानी तथा पशुपालन व्यवसायों के प्रत्यक्षतः प्रभावित होने, अधिक गर्मी के कारण रोजगार के साधनों में कमी आने, माँग और पूर्ति के मध्य अन्तर से महंगाई में अप्रत्याशित वृद्धि होने तथा आर्थिक मन्दी की आशंका जतायी जा रही है। स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी ढाँचे के अव्यवस्थित होने से जीडीपी पर प्रतिकूल असर पड़ना तय माना जा रहा है।
मनुष्य द्वारा प्रकृति से किया गया अनाचार ही मौजूदा पर्यावरण-संकट का एकमात्र कारण है। यदि सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग की वैश्विक चेतावनी को गम्भीरता से नहीं लिया गया, तो निकट भविष्य में अधिकांश जीव-जन्तुओं और मानव प्रजाति का नामोनिशान सदा के लिए धरती से मिट जाएगा।जल का अपव्यय नहीं करना, समय-समय पर पौधे लगाना और उनकी देखभाल करना, बिजली उपकरणों एवं वाहनों का संयमित रूप से इस्तेमाल करना – इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखकर हम प्रकृति जनित समस्याओं से छुटकारा पा सकते हैं। पर्यावरण-संरक्षण और संवर्धन युगधर्म है और इसका निर्वहन मानव मात्र के लिए परमावश्यक है। यदि पर्यावरण से सम्बन्धित सभी पहलुओं पर विचार कर उनका समाधान नहीं किया जाएगा, तो भविष्य में निश्चित ही इसका परिणाम अत्यन्त भयावह होगा।
पर्यावरण-संरक्षण के मद्देनजर हम सभी को इस मूल बात को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना होगा। यदि पैदल चलने से काम चलता हो तो हम साइकिल का उपयोग न करें, साइकिल से काम चल जाए, तो मोटरसाइकिलका उपयोग न करें, मोटरसाइकिल से काम चल जाता हो, तो चौपहिया वाहन उपयोग में न लें। प्रत्येक मनुष्य प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग मितव्ययिता से करे तथा भावी पीढ़ी के लिए इन्हें संरक्षित रखने हेतु सदा सचेष्ट रहे, यही भारतीय दर्शन की मूल भावना है, जो विश्व-मानव के लिए सदा-सर्वदा वरेण्य है।
पर्यावरण-संरक्षण हेतु व्यक्तिगत प्रयत्नों के साथ ही राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी सार्थक प्रयास अपेक्षित हैं। इनमें वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन को घटाने के लिए ठोस रणनीति तैयार कर उसमें अमल करना, दृष्टिबाधित वर्तमान विकास के स्थान पर इसके टिकाऊ मॉडल का अनुसन्धान, नवीकरण ऊर्जा का अन्वेषण, प्राकृतिक चिकित्सा-पद्धति को अपनाये जाने हेतु प्रभावी पहल, रासायनिक उर्वरकमुक्त कृषि एवं कम पानी की खपत वाले बीजों का विकास तथा टेक्नोलॉजी एवं इकोलॉजी के मध्य बेहतर समन्वय स्थापित कर भारी उद्योगों तथा बड़ी मशीनों, भीमकाय यन्त्रों के उपयोग के स्थान पर पर्यावरणोन्मुखी लघु तथा कुटीर उद्योगों का संस्थापन शामिल है।
अतः सम्पूर्ण विश्व को इस दिशा में गम्भीर प्रयास करने ही होंगे। सौर ऊर्जा, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता बढ़ाकर कार्बन-उत्सर्जनको रोकना होगा। पौधरोपण अभियान चलाने के साथ ही वृक्षों की कटाई पर भी रोक लगानी होगी। ध्वनि-प्रदूषण भी वायुमण्डल की शान्ति को भंग करता है, जिससे मस्तिष्क एवं ज्ञानेन्द्रियों पर दुष्प्रभाव पड़ता है। अतः ध्वनि प्रदूषण को रोकने के प्रयास भी युद्ध स्तर पर करने होंगे।