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    Homeराजनीतिगुजरात के शिक्षा उपक्रमों को ‘आप’ की नकल कहना गलत

    गुजरात के शिक्षा उपक्रमों को ‘आप’ की नकल कहना गलत


    -ललित गर्ग-

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गुजरात में मिशन स्कूल ऑफ एक्सीलेंस के उद्घाटन पर आम आदमी पार्टी के संयोजक एवं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल एवं उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की है वह हास्यास्पद होने के साथ अतिश्योक्तिपूर्ण है। मोदी छात्रों के बीच गए और उनके साथ एक स्मार्ट क्लास में बैठे। उन्होंने कुछ देर स्मार्ट क्लास का जायजा लिया और एक छात्र द्वारा बताई गई बातों को ध्यान से सुना। इन सब घटनाओं को केजरीवाल की नकल करार देना निश्चित ही विरोधाभासी है। भले ही आप पार्टी ने शिक्षा की दृष्टि से दिल्ली में उल्लेखनीय काम किया है, लेकिन गुजरात में मिशन स्कूल ऑफ एक्सीलेंस एवं गुजरात में चल रहे शिक्षा उपक्रमों को ‘आप’ की नकल कहना एक तरह से आम आदमी पार्टी द्वारा गुजरात में अपनी राजनीति चमकाने का घटिया एवं अलोकतांत्रिक तरीका है। यह मूल्यहीन राजनीति की पराकाष्ठा है।
    आम आदमी पार्टी का यह आरोप सिरे से गलत है कि गुजरात में शिक्षा उपक्रम आप की नकल है। तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने कार्यकाल में सर्वाधिक जोर शिक्षा पर ही दिया था, उन्होंने न केवल शिक्षा का स्तर उन्नत बनाया बल्कि स्कूल की दशा को सुधारते हुए उसे आधुनिक तकनीक से जोड़ा। सच्चाई यह है कि नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के समय से लेकर लाल किला से प्रधानमंत्री के रूप में बोलते हुए बार-बार भारत की शिक्षा पद्धति एवं सरकारी स्कूलों को उन्नत बनाने का अभिनव कार्य किये। केजरीवाल का यह कहना कि भाजपा गुजरात में 27 साल से सत्ता में है। 27 साल से भाजपा सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार नहीं कर सकी। दिल्ली में हमने 5 साल में सरकारी स्कूलों में सुधार किया। यह बयान वास्तविकता से परे हैं, इसमें सच्चाई नहीं है। सरकारी स्कूलों में दिल्ली से ज्यादा सुधार गुजरात में हुआ है। दिल्ली की सरकारी स्कूलों की वास्तविक दशा आज भी जर्जर है, बैठने से लेकर स्वस्थ पानी की व्यवस्था नहीं है। प्रिंसिपल से लेकर शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं।
    नरेन्द्र मोदी भारत राष्ट्र के नव-निर्माण के शिल्पी है, उनके नेतृत्व में ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 घोषित हुई है। निश्चित ही गुजरात के गांधीनगर में मिशन स्कूल ऑफ एक्सीलेंस की शुरुआत शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव का माध्यम बनेगी। नई शिक्षा नीति गुलामी की मानसिकता बदलेगी और अब गरीब का बेटा भी डॉक्टर, इंजीनियर बन सकेगा। आज शिक्षा व्यवस्था बेहद स्मार्ट हो गई है और गुजरात की शिक्षा व्यवस्था में काफी शानदार बदलाव देखने को मिल रहे हैं। निश्चित ही आज गुजरात अमृत काल की अमृत पीढ़ी के निर्माण की तरफ बहुत बड़ा कदम उठा रहा है। विकसित भारत के लिए, विकसित गुजरात के निर्माण की तरफ ये एक मील का पत्थर सिद्ध होने वाला है। 5जी, स्मार्ट सुविधाएं, स्मार्ट क्लासरूम, स्मार्ट टीचिंग से आगे बढ़कर हमारी शिक्षा व्यवस्था को एक अलग ही लेवल पर ले जाएगा। अब वर्चुअल रिएलिटी, इंटरनेट ऑफ थिंग्स की ताकत को भी स्कूलों में अनुभव किया जा सकेगा। केंद्र सरकार ने पूरे देश में साढ़े 14 हजार से अधिक ‘पीएम श्री’ स्कूल बनाने का फैसला किया है, ये स्कूल पूरे देश में नई नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के लिए मॉडल स्कूल का काम करेंगे। शिक्षा से जुड़ी ये योजनाएं नये भारत के निर्माण की ओर बड़ा कदम है। गुजरात में मिशन स्कूल ऑफ एक्सीलेंस के तहत स्कूलों में 50,000 नए क्लासरूम, 1 लाख से अधिक स्मार्ट क्लासरूम को आधुनिक रूप में विकसित किया जाएगा।
    मोदी ने गुजरात में शिक्षा की दृष्टि से क्रांतिकारी उपक्रम किये। मैं स्वयं इसका साक्षी हूं कि 2007 में सुखी परिवार फाउण्डेशन के एक कार्यक्रम में गणि राजेन्द्र विजयजी के सान्निध्य में मोदी आदिवासी अंचल कवांट में आये। उन्होंने आदिवासी बच्चों की शिक्षा की दृष्टि आगे होकर एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय सुखी परिवार फाउण्डेशन को प्रदत्त किया। आज वह विद्यालय देश के सभी एकलव्य विद्यालयों में अव्वल है। आदिवासी बच्चे अपनी प्रतिभा का लोहा राष्ट्र स्तर पर मनवा रहे हैं। मोदी ने खुद उस दौर का जिक्र किया जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने कहा कि, मैंने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए गांव-गांव जाकर खुद, सभी लोगों से अपनी बेटियों को स्कूल भेजने का आग्रह किया था। आज नतीजा ये हैं कि गुजरात में करीब-करीब हर बेटा-बेटी स्कूल पहुंचने लगा है, स्कूल के बाद कॉलेज जाने लगा है। उनकी ही दिशा-निर्देशों पर दो दशकों में गुजरात सरकार ने अपने राज्य शिक्षा का कायाकल्प करके दिखा दिया है। इन दो दशकों में गुजरात में सवा लाख से अधिक नए क्लारूम बने, दो लाख से ज्यादा शिक्षक भर्ती किए गए हैं।
    विचित्र लगता है जब खुद चोर कोतवाल को चोर कहे। यह सर्वविदित है कि केजरीवाल मोदी की नकल कर-करके अपनी राजनीति को चमकाते रहे हैं। पश्चिमी विचारक शिलर ने कहा भी है कि मानव नकल करने वाला प्राणी है और जो नकल करने में सबसे आगे होता है वही नेतृत्व करता है। आज की राजनीति में यही देखने को मिलता है। सत्ता के मोह ने, वोट के मोह ने शायद ऐसे राजनेताओं के विवेक का अपहरण कर लिया है। कहीं कोई स्वयं शेर पर सवार हो चुका है तो कहीं किसी नेवले ने सांप को पकड़ लिया है। न शेर पर से उतरते बनता है, न सांप को छोड़ते बनता है। मुफ्त सुविधाएं वाले नेता, शिक्षा एवं चिकित्सा के पुरोधा आज जन विश्वास का हनन करने लगे हैं। जनादेश की परिभाषा अपनी सुविधानुसार करने लगे हैं। कोई किसी का भाग्य विधाता नहीं होता। कोई किसी का निर्माता नहीं होता। भारतीय संस्कृति के इस मूलमंत्र को समझने की शक्ति भले ही वर्तमान राजनीतिज्ञों में न हो, पर इस नासमझी से सत्य का अंत तो नहीं हो सकता। अंत तो उसका होता है जो सत्य का विरोधी है, ईमानदारी से हटता है। अंत तो उसका होता है जो जनभावना के साथ विश्वासघात करता है, जनता को गुमराह करता है और झूठ को सच का बनाकर प्रस्तुत करता है।
    कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अरविंद केजरीवाल के काम करने की स्टाइल बहुत हद तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मेल खाती है। जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात को एक मॉडल बनाकर अपने को राजनीतिक तौर पर प्रोजेक्ट किया, उसी प्रकार अरविंद केजरीवाल दिल्ली मॉडल को हर चुनाव में बेचने की कोशिश कर रहे हैं। मोदी के राजनीतिक प्रयोगों को अपनाकर ही केजरीवाल राजनीति करते हैं। केजरीवाल के प्रचार से लेकर योजनाओं, भाषणों से लेकर जनता को लुभाने के सभी तौर-तरीके मोदी जैसे ही है। जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रवाद को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाए हुए हैं, उसी तरह अरविंद केजरीवाल भी हर बात पर राष्ट्रवाद को भुनाने की कोशिश करते हुए दिखाई पड़ते हैं। इसीलिये आजकल वे भगतसिंह को आगे रखते हैं। वे भारत के पहले नेता हैं जो एक राज्य का मुख्यमंत्री होते हुए भी पूरे भारत को दुनिया में नंबर एक बनाने के लिए प्लान लॉन्च करते हुए दिखाई देते हैं। भाजपा और नरेंद्र मोदी की तरह वे तिरंगा फहराने या हिंदुत्व के मुद्दे पर हर जगह लीड लेने की कोशिश करते हैं। शिक्षा के मामले में भी उनकी यही स्थिति हैं।
    निश्चित ही देश ही नहीं, दुनिया के अनेक देशों में दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार के शिक्षा मॉडल का जिक्र हो रहा है या जबरन कराया जा रहा है। चाहे चुनावी मंच हो, किसी दूसरे राज्य के मुख्यमंत्री का दिल्ली आगमन हो या फिर विदेशों से आने वाले राजनयिक मेहमान केजरीवाल सरकार दिल्ली के शिक्षा मॉडल को ही सबसे आगे पेश करती है और संभवतः केजरीवाल सरकार की उपलब्धियों के नाम पर दो ही उपक्रम हैं एक शिक्षा एवं दूसरा मौहल्ला क्लीनिक। दिल्ली के सरकारी कहा जाता है कि स्कूलों की दशा एवं दिशा ही नहीं सुधरी है, बल्कि उनके परीक्षा परिणामों ने चौंकाया है। दिल्ली से शुरु हुई उन्नत शिक्षा की एक सार्थक पहल देश के अन्य प्रांतों द्वारा अपनायी जाना चाहिए। लेकिन गुजरात में जो कुछ शिक्षा के क्षेत्र में हुआ है, वह न तो केजरीवाल सरकार के शिक्षा मॉडल का अनुकरण है न ही नकल है। शिक्षा जैसे मूलभूत क्षेत्र को राजनीतिक चमकाने का जरिया बनाना, केजरीवाल की एक गलत सोच है। अपनी इस उपलब्धि को लेकर भले ही केजरीवाल गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भी भुनाने के जतन करें, कोई आपत्ति नहीं। लेकिन  भाजपा सरकारों पर इसकी नकल का आरोप लगाना औचित्यपूर्ण नहीं है। इस तरह की सोच एवं मानसिकता पार्टी के लिए एक नकारात्मक मोड़ साबित हो सकती है।

    ललित गर्ग
    ललित गर्ग
    स्वतंत्र वेब लेखक

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