जरुरी हो गई थी सीबीआई अफसरों की छुट्टी।

संदीप सुमन

सीबीआई निर्देशक आलोक वर्मा और संस्था के दूसरे शीर्षस्थ पदाधिकारी राकेश अस्थाना के बीच मचे घमासान के बाद सरकार ने दोनों को अवकाश पर भेज दिया है। इन दोनों का एजेंसी में कार्य करते हुए कभी मधुर संबंध नहीं रहे। दोनों के मध्य आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला पहले से चला आ रहा था। दोनों एक दूसरे को कठघरे में खड़े करने और शह और मात खेल खेलने में लगे हुए थे, उसे देखते हुए इन दोनों को छुट्टी पर भेजने का फैसला बिलकुल सही है अपितु आवश्यक भी हो गई थी, क्योंकि सीबीआई की बची-खुची साख मिट्टी में मिल रही थी और सरकार भी सवालों के घेरे में आ गई थी। चूंकि सीबीआई के निर्देशक आलोक वर्मा और विशेष निर्देशक राकेश अस्थाना ने एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगा रहे थे इससे दोनों के पारदर्शिता के साथ जाँच की जरुरत है ताकि सीबीआई की साख को बचाया जा सके। कुछ लोगो सीबीआई निर्देशक को छुट्टी पर भेजे जाने वाले कदम पर सवाल उठा रहे है कि ऐसा नहीं किया जा सकता क्योंकि सीबीआई निर्देशक के कार्यकाल दो वर्ष के लिए तय होता है। सीबीआई निर्देशक के पद दो वर्ष के लिए तय तो होते है किंतु इसका ये अर्थ नहीं की उसपर कोई भी आरोप लगते रहे फिर भी उसे बनाया रखा जाए। कुछ लोग विशेष निर्देशक पर लगे आरोप पर अपना फैसला सुनाते हुए उन्हें दोषी मान चुके है जबकि निर्देशक को क्लीन चिट भी दे दी है, क्या देश में अब कौन गलत कौन सही है वो न्यायालय के जगह लोग तय करेंगे ? प्रशांत भूषण जिन्होंने अलोक वर्मा की नियुक्ति के समय सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली थी की मोदी सरकार भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए उनकी नियुक्ति की है इसलिए उसकी नियुक्ति पर रोक लगाया जाएं आज वे फिर सुप्रीम कोर्ट में याचिका यह कहते हुए दायर की है कि सरकार भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए उनकी छुट्टी कर दी। अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए लोग समय और परिस्थिति के हिसाब से अपना स्टैंड बदल रहे है जो काफी दुःखद है, ऐसे गलत प्रचार से देश का ही नुकसान होगा एवं संवैधानिक संस्थानों पर लोगों का विश्वास भी कम होगा। वैसे सीबीआई में खेमे बाजी का इतिहास कोई नया नहीं है, इससे पहले भी इसके अंदरूनी कलह कई बार सामने खुल कर आये है, चाहे वो जैन हवाला केस हो या लाखुभाई पाठक केस। चारा घोटाला केस में तो संयुक्त निर्देशक यूएन विश्वास की रिपोर्ट को सीबीआई निर्देशक ने बदलवा दिया था। उसमें लालू प्रसाद का नाम हटा दिया गया था। जब पटना हाइकोर्ट में यूएन विश्वास ने कहा कि ये उनकी रिपोर्ट नहीं है तो कोर्ट ने उनसे कहा कि वह अपनी रिपोर्ट कोर्ट को ही पेश करे। यानि की कोर्ट सीबीआई निर्देशक को विश्वास लायक नहीं समझी। एक तरफ विशेष निर्देशक अपने खिलाफ कार्यवाही के विरुद्ध उच्च न्यायालय के शरण में है तो दूसरी और निर्देशक सुप्रीम कोर्ट में छुट्टी पर भेजे जाने के खिलाफ है, अब सबकी निगाहें न्यायालयों के फैसलों पर है अगर न्यायालय के फैसले से भी कलह समाप्त नहीं होती तो सीबीआई के साख को बड़ा धक्का लगने वाला है। लोगों के मन में सीबीआई को लेकर जो विश्वास है देश में वो भी कम होगा। अगर न्यायालय के फैसले से वैसे परिस्थितियां पैदा नहीं होती जैसा सरकार चाहती है तो भी मुश्किलें पैदा होंगे और आगे की कार्यवाही करने या फैसले लेने में दिक्कतें आएगी। इन सब के अलावे केंद्रीय सतर्कता आयोग भी कम जिम्मेदार नहीं है, जब सीबीआई के अफसरों के मध्य चल रहे इस उठा पटक से वो अवगत था तो फिर कोई कदम क्यों नहीं उठाया गया ? मामले को सुलझाने के लिए हस्तछेप क्यों नहीं की गई ? क्या कैग इसमें समर्थ नहीं है ? ये सब ऐसे सवाल है जिस पर सरकार को गंभीरता से विचार करने की जरुरत है। सरकार को सीबीआई की कार्यप्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन करने की जरुरत है जिससे भविष्य में पुनः कोई तकरार न हो और ऐसी स्थिति बनाने की जरुरत है जिससे आम लोगों तक यह संदेश पहुंचे की देश के इस शीर्ष संस्था में सब कुछ ठीक ठाक है।

 

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