लेखक परिचय

अनिल अनूप

अनिल अनूप

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार व ब्लॉगर हैं।

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-अनिल अनूप
अनुराग कश्यप की बहुचर्चित फिल्म गैंग ऑफ वासेपुर का संगीत देने वाली स्नेहा खानवल्कर भारतीय फिल्मी इतिहास की मात्र चौथी महिला संगीतकार हैं. उनसे पहले सिर्फ तीन और महिला संगीतकार रही हैं जिन्होंने फिल्मों में संगीत दिया. वो थीं जद्दन बाई,सरस्वती देवी और ऊषा खन्ना.
1935 का साल भारतीय चित्रपट संगीत के लिए बहुत महत्वपूर्ण साल था क्युँकि इसी साल में न केवल हिंदी बल्कि भारतीय चित्रपट संगीत को पहली दो महिला संगीतकार मिल गयी
1935 में रिलीज हुई फिल्म ‘ तलाश-ए-हक़ ‘ का संगीत जद्दन बाई ने तैयार किया था। इस फिल्म के डेढ़ महीने बाद रिलीज हुई ‘ जवानी की हवा ‘ का संगीत सरस्वती देवी ने तैयार किया था
आज शायद ही कोई जद्दन बाई को जानता होगा लेकिन अगर हम ये बताये की वो मशहूर अभिनेत्री नर्गिस की माँ है तो शायद पहचान में आसानी हो जायेगीl
शुरु से आखीर तक जब जद्दनबाई के जीवन और शख्सियत पर दृष्टिपात करता हूँ तो आंसुओं व कहकहों, आहों और मुस्कानों हंसी और रुदन, बेइन्तिहा हर्ष और अपार विषाद।
यानी न जाने कितने विरोधाभासी रंगों को लेकर प्रकृति के द्वारा बनाई गई एक ऐसी तस्वीर अतीत के पर्दे से निकलकर सामने चलती-फिरती प्रतीत होती है, कि जितना उसे देखो दिल उसमें डूबता चला जाता है। दिमाग सोचता रह जाता है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोसवारा ग्राम में ठाकुर-परिवार में एक कन्या ने जन्म लिया। नाम था -दलीया। बचपन की कच्ची व मासूम उम्र में ही दलीया की भी शादी कर दी गई। मगर अभी कुछ ही समय बीता था कि विधाता ने बड़ी निर्दयता से उस मासूम मांग का सिन्दूर पोंछा दिया। उन दिनों किसी हिन्दू-परिवार में किसी बालिका-वधू का विधवा हो जाना क्या अर्थ रखता था इसे सभी जानते हैं। पुनरविवाह का तो प्रश्न ही नहीं उठता ऐसी अभागियों को वैधव्य रुपी सामाजिक-पारिवारिक अभिशाप जीवन भर भोगना पड़ता था!
इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए घरवाले एक दिन उन्हें साथ लेकर बनारस के मेले में गए और मेले के भीड़ में उन्हें अकेला छोड़कर भाग गए ।
घर की चारदीवारी से पहली बार निकली बेचारी दलीया आंसू बहाने के अलावा भला यह सोच भी कैसे सकती थी कि अब उसे क्या करना और कहां जाना चाहिए।
3आसूँ बहती इस मासूम लड़की पर तभी एक आदमी की गिद्द दृष्टि पड़ी। यह व्यक्ति वेश्याओं से कारोबारी संपर्क रखता था। भूली-भटकी लड़कियों को भगाकर, वेश्याओं के हाथों उन्हें बेच डालने वाले दलालों से भी उसकी मिलता थी। वैसे यह व्यक्ति एक सारंगीवादक था। नाम था-मियां जान।
मियां जान को उस पर तरस आ गया। वह उसे किसी वेश्या को हवाले करने के बजाय अपने घर ले आया और लड़की की सहमति से उसे अपनी बीवी बनाकर घर में रख लिया। मियां जान से दलीया को तीन संतानें हुईं। उनमें से एक की मृत्यु हो गई। बच रहीं दो! एक पुत्र जिसका नाम रखा गया-जुलायी। एक पुत्री, नाम पाया-जद्दन।
मियां जान ने अपनी बेटी जद्दन को गाना-बजाना सिखाना शुरु कर दिया।इसी प्रकार गाना-बजाना सीखती हुई जद्दन चौदह वर्ष की हो गई। उसी के साथ जुलायी ने तबला बजाना भी सीख लिया था। अब ये दोनों-भाई और बहन-हाट बाजारों में घूम-फिरकर गाने-बजाने का काम करने लगे। जुलायी तबला बजाता और जद्दन गाती-नाचती। इसी से जो पैसा मिलता उसी से परिवार के चार प्राणियों का पेट भरता।
मियां जान अपनी बेटी के गाने के हुनर को जानते हुए उसे उंची तालीम दिलानेके लिए जद्दन को लेकर कोलकाता पहुंचे औरऔर वहां मालिकाजान को उसकी प्रतिभा के बारे में बताया।
मलिका जान की अन्तरंग सहेली थीं, भारत प्रसिध्द गायिका-गौहर जान। गौहर ने जब जद्दन का गाना सुना तो आश्चर्यचकित रह गईं। उसकी प्रतिभा को देख-परखकर गौहर ने उसे ठुमरी के सुप्रसिध्द उस्ताद मौजुदीन खां साहब के हवाले कर दिया। खां साहब ने बड़ी लगन और मेहनत से जद्दन को बांकायदा तालीम दी। उनके संगति-प्रभाव के प्रताप और अच्छी तालीम से वह ठुमरी की एक अच्छी गायिका के रुप में शोहरत पाने लगी।
तालीम पूरी हो जाने और हर प्रकार की नोक-पलक से दुरुस्त होने के बाद दलीया अपने साथ जद्दन को बनारस ले आई और जद्दन को बांकायदा कोठे पर बैठाया। कोठे की जीनत बनते ही जद्दन ने जगमगाना शुरु कर दिया। उसकी गायकी की प्रसिध्दि सुगन्ध के समान फैलने लगी। इसी दरम्यान जद्दन की शादी नरोत्तमदास खत्री से हुई जिहोने इस्लाम धर्म को अपनाकर नाम रख लिया बच्ची बाबू, इनसे जद्दन को पुत्र हुआ-अख्तर हुसैन।
अब इसे बदनसीबी कहें या कुछ और कि जद्दन की यह मुहब्बत स्थायित्व को प्राप्त नहीं हुई। इरशाद एक दिन जद्दन को छोड़कर न मालूम कहां चला गया। अख्तर व अनवर दो बेटों सहित जद्दन को विषम आर्थिक स्थितियों से जूझना पड़ा। हालत ने कुछ ऐसी सूरत भी दिखाई कि जद्दन ने कलकत्ता त्याग देना ही बेहतर समझा और लखनऊ चली आईं।
जद्दन बाई को क्या पता था कि कोलकाता छोड़ना, उनके दिल की सूनी बगिया में बहार आने का भी कारण बन जाएगा। लखनऊ में एक खानदानी और प्रतिष्ठित रईस थे, जिनके कई सिनेमा हाल वहां चलते थे। उनके सुपुत्र उत्तम चंद मोहन, लखनऊ के मेडीकल कालेज में डाक्टरी पढ़ रहे थे। और शीघ्र ही अपनी पढ़ाई पूरी कर लन्दन जाने की तैयारी में थे। जब मोहन बाबू की दृष्टि प्रथम बार जद्दनबाई पर पड़ी तो पहली नज़र में प्यार हुआ लेकिन उनके घरवालों के एक तवायफ के साथ रिश्ता मंज़ूर नहीं था उन्होंने मोहनबाबू को समझाने की कोशिश की लेकिन उनके न मानने पर उन्हें घर से निकल दिया जद्दन बाई मोहन बाबू के साथ फिर कलकत्ता आई और उनसे शादी कर ली। यह भी बताता चलूं कि मोहन बाबू जद्दन बाई से उम्र में दो वर्ष छोटे थेl
4मोहन बाबू और जद्दन बाई को लड़की हुई नाम था फातिमा। लाड़ से दोनों उसे बेबी रानी कहते थे। वही आगे चलकर अभिनेत्री के रुप में नर्गिस प्रसिध्द हुई!ये नाम उनको ‘रोटी’ ‘औरत’ ‘मनमोहन’ ‘मदर इंडिया आदि अमर व लाजवाब फिल्में के निर्देशक महबूब खान ने दिया ।
शमा पर निसार हुए किसी जांनिसार परवाने की भांति मोहन बाबू आंखिर तक जद्दन के प्रति समर्पित और उन्हीं के साथ छाया के समान रहे! किंतु मौत के निर्दयी फरिश्ते ने सन 1947-48 ई. के लगभग उन्हें जद्दन बाई से सदैव के लिए अलग कर दिया। जद्दन बाई जब तक जीवित रहीं, सांस-सांस में अपने मोहन की स्मृति संजोए रही. वे बात-बात में उन्हीं का नाम लेती थीं।
जब भारत में बोलती फिल्मों (टाकी) का निर्माण आरंभ हुआ तो फिल्मों में काम करने और नाचने-गाने वालों के भाग्य खुल गए। मगर रोचक बात यह कि सिनेमा में काम करना अमूमन अब भी अच्छा नहीं समझा जाता था। और तो और तवायफ भी सिनेमा में कार्य करना अपने पेशे से भी ज्यादा अपमानजनक व गिरा हुआ काम मानती थीं।
लाहौर में एक बड़े उद्यमी हकीम रामप्रसाद थे। व्यवसाय फिल्मों का था। उनके कानों तक भी जद्दन बाई की प्रतिभा की तारींफें और चर्चाएं पहुंच चुकी थीं। इससे प्रभावित होकर उन्होंने अपनी फिल्म ‘राजा गोपीचंद’ में जद्दन को लेने के इरादे से इस आशय का प्रस्ताव भेजा। जद्दन को फिल्म अभिनय का कोई अनुभव था नहीं, अत: एकदम से हां या ना में जवाब नहीं दे सकीं। वे भी ठान बैठे थे कि जद्दन को अवश्य लेना है। उन्होंने फिर प्रस्ताव बढ़ाया। अब जद्दन को स्वीकार करना पड़ा। वे लाहौर पहुंचीं।
फिल्म बनी। पेश हुई। सफल रही। इस फिल्म के हीरो थे-हरिश्चंद्र बाली। यही बाली साहब आगे चलकर संगीतकार वे रुप में अच्छो चमके!
यहां कुछ ही दिन रह पाई थीं कि निर्माता-निर्देशक राम दरियानी उन्हें मुंबई ले आये।
मुंबई आ जाने के बाद जद्दन बाई ने जिस फिल्म में पहली बार हीरोइन की भूमिका निभायी वह आर्देशिर ईरानी के इम्पीरियल स्टूडियो में बनी राम दरियानी की फिल्म थी ‘इन्सान या शैतान’ जब जद्दन बाई रजत-पट पर बतौर हीरोइन जगमगाने लगीं तो उन्हें लेकर सागर मूवीटोन ने एक फिल्म बनाई थी-‘डान्सिग गर्ल’। इसके हीरो याकूब थे, जो आगे चलकर हास्य-कलाकार एवं चरित्र अभिनेता के रुप में काफी प्रसिध्द हुए। इस फिल्म की सह नायिका स्वरुपरानी थीं, जो मुंबई स्वित खुशनुमा महल में ही जद्दन के पड़ौस में रहती थीं। यह फिल्म भी हिट रही थी। राम दरियानी की पेशकश ‘इन्सान या शैतान’ की सफलता ने जद्दन बाई की जीवन दिशा हमेशा के लिए फिल्मों की ओर मोड़ दी। उन्हें इतना अधिक प्रोत्साहन मिला कि उन्होंने अपनी एक फिल्म निर्माण कंपनी ‘संगीत फिल्म कंपनी’ के नाम से खोल ली।
इस फिल्म कंपनी के बैनर तले जद्दन ने जो पहली फिल्म पेश की वह थी ‘तलाशे-हक’ यह सन 1935 में रिलीज हुई थी। इस फिल्म की हीरोइन गायिका, संगीतकार, निर्देशिका और कहानी लेखिका अर्थात सभी कुछ वेखुद थीं। उनके साथ हीरो फिर याकूब थे। दोनों पुत्र अख्तर व अनवर के साथ बेबी रानी भी थी, जिसने बाल-कलाकार के रुप में पहली बार कैमरे का सामना किया था।
वेश्या जीवन और उसकी त्रासदी को लेकर बनाई गई इस फिल्म में एक वेश्या अपने हंक और सचाई की तलाश करती है। अपनी ‘संगीत फिल्म कंपनी’ के बैनर तले जितनी फिल्में जद्दन ने पेश की उनमें सबसे पहली पेशकाश ‘तलाशे-हंक’ के अलावा ‘मार्डन फैशन’ (1936) और इससे अगले ही वर्ष यानी 1937 में पेश हुई फिल्म ‘जीवन स्वरुप’ और ‘मोती का हार’ उल्लेखनीय हैं।
जीवन स्वरूप की कहानी तो खुद जद्दन की अपनी जीवनकथा पर आधारित थी। इसमें मोहन बाबू ने भी काम किया था! तवायंफों की ािन्दगी पर आधारित जद्दन द्वारा निर्मित एक और फिल्म थी-दरोगा जी। इस फिल्म के माध्यम से यह सच्चाई बहुत ही प्रभावशाली ढंग से पेश की गई थी कि भोली-भाली कमसिन लड़कियों को बहला-फुसला, भगाकर कैसे वेश्यावृत्ति में झोंका जाता है। दूसरे शब्दों में शरीफ और कुलीन लड़कियों से जिस्मंफरोशी जैसा पेशा कराने के पीछे सबसे अधिक हाथ समाज का
का होता है, न कि रंडियों का।
यहां यह भी बताता चलूं कि इसी दौरान इरशाद इधर-उधर घूम फिरकर मुंबई आ गए थे और मीर साहब नाम से संगीतकार बन गए। पाठकों को याद होगा कि इरशाद मियां को उनके आंका ऐस. ऐम. नवाब मीर साहब ही पुकारते थे। संगीतकार की हैसियत से मीर साहब ने जिस फिल्म में पहली बार संगीत दिया, वह थी सोहराब मोदी की, अर्ध-ऐतिहासिक फिल्म ‘पुकार’। हीरोइन थीं नसीम बानों।
जद्दन बाई ने अपनी बेटी नर्गिस को नृत्य एवं गाने की तालीम नहीं दिलाई। क्यों? जद्दन बाई खुद बताती थीं-मोहन बाबू इसके खिलांफ थे और सच पूछो तो मुझे भी पसंद नहीं था।
जद्दन बाई ने जो फिल्में बनाईं वे अपनी जगह दुरुस्त सही। मगर उन्होंने बड़ी लगन से बहुत मेहनत से बेहद चाव से अपनी संघर्ष भरी ज़िन्दगी में जो श्रेष्ठतम तामीर की उसी का नाम था-नर्गिस! आज जद्दन बाई विस्मृति के गढ़े में उतार दी गईं। उनकी बनाई फिल्मों, उनके संगीत, उनकी गायी चीजें की किसी को याद नहीं। लेकिन सिने-दर्शक न आज नर्गिस को भूले हैं, न कल भूल पाएंगे!
यह भी बड़ी अचरज बात है कि नर्गिस फिल्म लाइन नहीं अपनाना चाहती थी, न अभिनेत्री बनना चाहती थी, बल्कि वह तो अपने पिता मोहन बाबू की छोड़ी अधूरी लाइन अपनाकर डाक्टर बनना चाहती थी।
जद्दन बाई भारत-प्रसिध्द गायिका और सिने-निर्माता, निर्देशक व संगीतकार ही नहीं,एक काबिल तथा प्रभावशाली महिला थीं।जद्दन साहिबा का व्यक्तित्व बदुआयामी था। वे बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न थीं। यानी वे भारतीय फिल्म जगत की प्रथम संगीत निर्देशिका तो थीं ही। ठुमरी की बेहतरीन गायिका व अच्छी अभिनेत्री भी थीं। समझदार फिल्म निर्माता और ‘संगीत फिल्म कंपनी’ की स्वामिनी होने के साथ फिल्मोद्योग में न्यायाधीश के रुप में भी जानी जाती थीं। इस संदर्भ में एक नामी फिल्म पत्रकार ने लिखा था-‘जद्दन उस व्यवस्था से निकलकर आई थी, जहां पर हर किस्म के लोग उस तरह की औरतों पर अपनी नारें गड़ाये बैठे रहते हैं। इस व्यवस्था से वह बड़ी कामयाबी के साथ निकली। और अपने आप को उसने आम सामाजिक व्यवस्था में झोंककर समाज में अपना एक स्थान बनाया।
उसने अपने माने में, फिल्म-उद्योग में, बड़े-बड़े फैसले किए और उसकी निष्पक्षता पर किसी ने उंगली तक नहीं उठाई।’ आज तो फिल्मों में अनेक पढ़ी-लिखी और तो-तरार्र अभिनेत्रियां हैं, मगर जो बात जद्दन में थी अब कहां?
प्रकृति नटी के कौतुक कहें या विधाता की बेरहमी। प्राय: दुखदायी भी होती है।
जद्दन बाई ने अपनी सबसे लाडली संतान को दिन-रात एक करके बड़े चाव और जतन से, प्रतिभा संपन्न व काबिल बनाया और फिल्मी दुनिया में एक लाजवाब नमूना बनाकर पेश किया, उसी लाडली बेबी रानी उंर्फ आभिनेत्री नर्गिस से उन्हें सबसे अधिक मानसिक पीड़ा भी पहुंची। इस मानसिक पीड़ा का मुख्य कारण था, राजकपूर से नर्गिस का रोमांस। बता दूं कि नर्गिस-राजकपूर का रोमांस आर.के. फिल्म्स की ‘बरसात’ से शुरु हुआ था और पूरे नौ वर्ष तक अबाध रुप से जारी रहकर सन 1956 में इसी बैनर तले पेश हुई फिल्म ‘जागते रहो’ के साथ समाप्त हुआ। इस लोकप्रिय जोड़ी ने 16 फिल्मों में एक साथ काम किया था। बेटी नर्गिस के अलावा अपने दोनों बेटों से भी जद्दन साहिबा की कुछ सुख-संतोषप्रद रुप से नहीं निभ सकी।
इस प्रकार वह महिला जो बदनसीबी उपज बनकर जन्मी गरीबी की मार से जिसनें कोठों में नाच-गाकर अपना पेट पाला, परिजनों का सहारा बनी। कोठे की जीनत बनकर ऐसी चमकी कि दिलों के साथ-साथ शुहरत व दौलत ने उसके कदम चूमे। गायन के क्षेत्र में ऐसा नाम पैदा किया कि लोग आज तक उसकी गायी ठुमरी नहीं भूले हैं। फिल्म-जगत में प्रवेश किया तो निर्माता, निर्देशक, लेखिका, संगीतकार और हीरोइन तक रही। इससे कहीं अधिक अपनी बुध्दि-विवेक के कारण न्यायाधीश व कमांडर जैसी इात पाकर, सिर आंखों पर बिठायी जाती रहीं। वही महिला ज़िन्दगी की शाम में अपने ही खून यानी अपनी ही औलादों के द्वारा ठुकराई जाकर दुख पाती रहीं।
जद्दन बाई के जीवन का सन्ध्या-काल विषाद, हताशा, दुख, संताप और पीड़ाओं के घने कोहरे से ढंका रहा और उसी घुटनभरे कोहरे के अंधकार में 8 अप्रैल 1949 को उनका जीवन-दीप बुझा।
-अनिल अनूप

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