बातचीत से सुलझ सकता है जाधव का मसला

जाधव के मामले में पाकिस्तानी राजनीति में जूतम पैजार शुरु हो गई है लेकिन यह संतोष का विषय है कि भारत में पक्ष और विपक्ष एकजुट हैं। भारत सरकार, खासतौर से हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज बधाई की पात्र हैं, जिन्होंने जाधव के मामले में इतनी दृढ़ता और कर्मण्यता दिखाई लेकिन अभी खुशी से फूलकर कुप्पा हो जाना ठीक नहीं है। पाकिस्तान पर दबाव बनाए रखना जरुरी है। सभी दक्षेस देशों, इस्लामी राष्ट्रों और महाशक्तियों से फोन करवाए जाएं और संयुक्त राष्ट्र के नए महासचिव अंतानियो गुतरस भी मध्यस्थता करें तो बेहतर हो।

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव के मामले में हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने पाकिस्तान की बोलती बंद कर दी है। उस अदालत ने पाकिस्तान सरकार को चार मोटे-मोटे निर्देश दिए हैं। पहला, यह कि जाधव का मामला जब तक उस अदालत में है, उसे सजा-ए-मौत न दी जाए। दूसरा, उसे पाकिस्तान स्थित भारतीय दूतावास से कानूनी मदद लेने दी जाए। तीसरा, किसी आरोपी को दूतावासीय मदद मिले या न मिले, इस बारे में किया गया 2008 का भारत-पाक समझौता जाधव पर लागू नहीं होगा, क्योंकि यह ‘वियना अभिसमय’ के विरुद्ध है। इस राजनयिक अभिसमय पर 193 देशों के हस्ताक्षर हैं, जिनमें भारत और पाकिस्तान भी शामिल हैं। चौथा, जाधव की सुरक्षा के बारे में पाकिस्तान जो भी कार्रवाई करे, उसकी सूचना वह अदालत को देता रहे। ‘वियना अभिसमय’ इस मामले में इसलिए भी लागू होगा कि 2008 का भारत-पाक समझौता संयुक्तराष्ट्र में अभी तक पंजीकृत नहीं हुआ है।

अंतरराष्ट्रीय अदालत ने यह अंतरिम फैसला सर्वसम्मति से दिया है। यदि भारत के पक्ष में कुछ भी विवादास्पद या संदेहजनक होता तो 11 में से दो-चार जज तो पाकिस्तान के पक्ष में बोलते। 11 जजों में चीन, रुस और अमेरिका के भी जज हैं। इन तीनों देशों की आजकल पाकिस्तान से गहरी छन रही है। चीन और अमेरिका तो पाकिस्तान के बरसों से संरक्षक रहे हैं और आजकल रुस भी उसके साथ पींगे बढ़ा रहा है। यदि जाधव के मामले में कुछ भी दम होता तो ये तीनों जज कम से कम तटस्थ रहते या पाकिस्तान के पक्ष में बोलते। अंतरिम फैसला आने के बाद पाकिस्तान के विरोधी दलों ने पूछा है कि उनकी सरकार ने किसी अधकचरे वकील को वहां क्यों भेजा? वह जजों को ठीक से बता ही नहीं पाया कि जाधव को फौजी अदालत में ले जाने और मौत की सजा देने का औचित्य क्या है। पाकिस्तान के कुछ विधिवेत्ताओं ने अपने टीवी चैनलों पर यह भी कहा कि जाधव के विरुद्ध पाकिस्तान का पक्ष कमजोर है।

पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी तो वह खुद ही है। यदि पाकिस्तान जाधव के मामले में अंतराराष्ट्रीय न्यायालय के क्षेत्राधिकार को नहीं मानता तो वह अदालत में गया ही क्यों ? उसने अपने वकील को भेजा, इसका अर्थ क्या हुआ ? यही न, कि वह उस अदालत को मान्यता देता है। कितनी विचित्र स्थिति उसने अपनी बना ली है कि मान्यता देते हुए वह कह रहा है कि मैं मान्यता नहीं देता हूं। मियां साहब साफ छुपते भी नहीं और सामने आते भी नहीं। अजब पर्दा है कि वो चिलमन से लगे बैठे हैं। अब उनकी इस चिलमन को इमरान वगैरह खींचे दे रहे हैं। इधर चिलमन खिंची जा रही है और उधर पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय आंसू बहाते हुए फरमा रहा है कि हम मुकदमा अब जमकर लड़ेंगे। यदि दोनों मुल्क जमकर लड़ेंगे तो क्या यह काूननी लड़ाई एक अगस्त तक पूरी हो जाएगी? अगस्त तक अदालत ने जाधव की सजा पर रोक लगाई है। यदि हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में यह मुकदमा बाकायदा चला तो पाकिस्तान ने इस मुकदमे पर फौजी अदालत का जो टोकरा ढांक रखा है, वह उखड़ जाएगा। भारत यही तो कह रहा है कि आपको जाधव पर मुकदमा चलाना है तो अपनी सिविल अदालतों में खुले-आम क्यों नहीं चलाते ? भारत ने अजमल कसाब पर भी खुली अदालत में मुकदमा चलाया था या नहीं ? क्या जाधव, कसाब से भी ज्यादा संगीन अपराधी है? यदि जाधव ने कोई गैर-कानूनी काम किया है तो पाकिस्तान उसे कंबल में लपेटकर क्यों गुपचुप दफनाना चाहता है ? उसे वह सारी दुनिया को बताता क्यों नहीं ?

क्या यह भी संभव है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की अवहेलना कर दे और जाधव को लटका दे ? यह असंभव नहीं। जो फौज अपने प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को लटका सकती है, उसके लिए जाधव किस खेत की मूली है ? लेकिन पाकिस्तान को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह संयुक्तराष्ट्र संघ का सदस्य है और यह अदालत उसी की शाखा है। हालांकि इस अदालत के पास राष्ट्रीय अदालतों की तरह अपने फैसले लागू करने के लिए कोई ताकत नहीं है लेकिन संसार भर में उसका नैतिक वज़न इतना ज्यादा है कि पाकिस्तान को यह सोचना पड़ेेगा कि उसका उल्लंघन करना उसके लिए कितना नुकसानदेह होगा ? कोई यह तर्क दे सकता है कि जैसे अमेरिका ने हेग की अदालत का उल्लंघन करते हुए 1992 में जर्मन नागरिक, 1998 में पेरेग्वे के बेयर्ड और 2003 में मेक्सिको के कुछ नागरिकों को लटका दिया था, क्या पाकिस्तान भी जाधव को लटका नहीं सकता ? यहां मेरा जवाब यही है कि पहली बात, पाकिस्तान, पाकिस्तान है, अमेरिका नहीं। दूसरी बात, इन तीनों मामलों पर जो फैसले आए थे, वे किसी रहस्यमय फौजी अदालत से नहीं आए थे। अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय से आए थे। तीसरी बात, ये आरोपी व्यक्तिगत अपराध करते हुए रंगे हाथ पकड़े गए थे। यदि पाकिस्तान की फौज और नेताओं को पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि की जरा भी परवाह है तो वे जाधव को नहीं लटकाएंगे। वे उस पर मुकदमा चलाएंगे और उसके जरिए भारत की छवि धूमिल करने की भरसक कोशिश करेंगे।

लेकिन पाकिस्तान को यह पता है कि यदि उसने हेग की अदालत के आदेश का उल्लंघन कर दिया तो भारत सुरक्षा परिषद के दरवाजे खटखटाएगा। भारत के प्रस्ताव पर चीन चाहे वीटो कर दे लेकिन शेष देशों में पाकिस्तान की छवि चूर—चूर हो जाएगी। यह सारा मामला इतना तूल पकड़ जाएगा कि भारत—पाक संबंधों को सामान्य होने में वर्षों लग जाएंगे। यों ही दुनिया के कई देश पाकिस्तान को आतंकवाद का गढ़ मानते हैं। अब जाधव के कारण वह अपनी अंतरराष्ट्रीय अछूत की छवि बना लेगा।

यह देखने लायक है कि जाधव के मामले में पाकिस्तानी राजनीति में जूतम पैजार शुरु हो गई है लेकिन यह संतोष का विषय है कि भारत में पक्ष और विपक्ष एकजुट हैं। भारत सरकार, खासतौर से हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज बधाई की पात्र हैं, जिन्होंने जाधव के मामले में इतनी दृढ़ता और कर्मण्यता दिखाई लेकिन अभी खुशी से फूलकर कुप्पा हो जाना ठीक नहीं है। पाकिस्तान पर दबाव बनाए रखना जरुरी है। सभी दक्षेस देशों, इस्लामी राष्ट्रों और महाशक्तियों से फोन करवाए जाएं और संयुक्त राष्ट्र के नए महासचिव अंतानियो गुतरस भी मध्यस्थता करें तो बेहतर हो। क्या ही अच्छा हो कि दोनों पड़ौसी देश हेग के अखाड़े में खम ठोंके, इसकी बजाय वे दोनों मुकदमा वापस लें और आपस में संवाद से मामला सुलझाएं। कितनी विचित्र बात है कि दोनों देशों के नेता साधारण मुद्दों पर एक-दूसरे को फोन करते रहते हैं लेकिन इस नाजुक सवाल पर उनके बीच कोई संवाद नहीं है। यह मामला इतना टेढ़ा नहीं है कि यह बातचीत से हल नहीं हो सके।

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