जगनेर के किले को आल्हा-ऊदल के मामा राजा राव जयपाल ने बनवाया

aalha-udalडा. राधेश्याम द्विवेदी
ताजनगरी आगरा से करीब 40 किलोमीटर दूर जगनेर का ऐतिहासिक किला है। उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में जगनेर एक छोटा सा शहर और एक नगर पंचायत है । यह पत्थर और सरसों के तेल निकासी के लिए प्रसिद्ध है। जगनेर के शहर के चारों ओर एक पहाड़ी किला है जो खुद को जमीनी स्तर से ऊपर 122 मीटर की दूरी पर एक तेज़ पहाड़ी पर स्थित है, बाहर फैला हुआ है। किले के एक लोकप्रिय तीर्थ स्थल है, ग्वाल बाबा की दरगाह है, इसलिए सदियों पहले गुफा में रहते के नाम पर घर का नाम पर ‘’ग्वाल बाबा’’ नाम रखा गया । यह आगरा जिले के दक्षिण राजस्थान में की नोक पर स्थित है, यह आगरा शहर से ही लगभग 57 किमी दूर है। बस आगरा से जगनेर चलती हैं और 1.5 से 2 घंटे के बीच कहीं भी ले जा सकते हैं। जगनेर राजा का नाम “जगन सिंह” जो 13 वीं सदी में एक शासक था के नाम से जगनेर का नाम रखा गया है । ‘आगरा गजेटियर’ के अनुसार जगनेर को पहले इस क्षेत्र को ऊँचाखेड़ा कहते थें। कर्नल टाड के अनुसार ‘नेर’ का अर्थ है चारों ओर से प्राचीरबद्ध नगर जैसे बीकानेर, सांगानेर, चंपानेर, अजमेर, बाड़मेर अत्यंत संरक्षितनगर थे और जिन्हें बाद में किले का स्वरुप प्रदान किया।
जगनेर एक ब्राह्मण प्रमुख शहर है। शहर में 95% हिंदुओं और मुसलमानों 5% मिलकर बनता है। शैक्षणिक स्थिति अभी भी एक बड़ी चिंता का विषय है राजा जगन सिंह जगनेर के प्रसिद्ध राजा था। उनकी पत्नी का नाम रानी जमुना कंवर था। वह आगरा के आसपास है कि समय की बहुत सुंदर रानी थी।
ऐतिहासिक किला:- जगनेर का ऐतिहासिक किला-राजस्थान सीमा से लगा आगरा जनपद का सीमावर्ती कस्बा आगरा से कागारौल के रास्ते में तांतपुर जाने वाली सड़क पर लगभग 36 मील दूर ‘आल्ह खंड’ रचयिता राजा जगन सिंह का नाम पर जगनेर बसा है। किले के भग्नावेष की प्रथम दृष्टि डालते ही ऐसा लगता है कि यह किला अपने अन्दर कोई बड़ा इतिहास छुपाये बैठा है कि कोई आये और इस किले के ऐतिहासिक और वीरता से भरा इतिहास की खोज करें क्योंकि किले की सुनियोजित वास्तु-प्रणाली कर दिग्दर्शन से ऐसा लगता है कि महोबा नरेश आल्हा-ऊदल के मामा राजा राव जयपाल ने 10वीं शताब्दी में इसे बहुत ही सुरुचिपूर्ण ढंग से बनवाया था। लाल पत्थर की शिला पर उत्कीर्ण है कि इसे जागन पंवार ने बनवाया था। इसकी पुष्टि कर्निघंम की पुस्तक पूर्वी राजस्थान के यात्रा वृत्त से होती है। इस किले की संरचना चित्तौड़ के किले के समान है। पश्चिम छोर से पहाड़ी पर चढ़ा जा सकता है जहाँ एक बावड़ी भी है। अन्य दिशाओं से बगम्य प्रतीत होता है। जगनेर बस्ती की ओर से लम्बी घुमावदार पत्थर की अनगढ़ सीढि़यों की श्रृंखला प्रतीत होती है।
ग्वाल बाबा मन्दिर व छतरी:- किले में एक जाग मन्दिर है जो जहाँ राजस्थान के भाट-चारण परम्परा का जाग जाति की बहुल्यता का बोध कराती है। हिन्दू भवन निर्माण शैली की विशेषताओं से युक्त इस किले में मन्दिर के अतिरिक्त शासकीय आवास, सैन्य गृह एवं सैन्य सामग्री प्रकोष्ठ के भग्नावेष है। जब देश में राजपूत शासकों के छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों का अभ्युदय हुआ था इससे पूर्व यदु जन-जाति के वंशजों के अधीन था। यदु राज्य कभी स्वतंत्र और कभी केन्द्रीय सत्ता के अधीन रहे। राजपूत शासकों के समय जगनेर परमारों और चंदेलों के अधिकार में था। किन्तु जगनेर के स्वतंत्र शासक बैनीसिंह ने पृथ्वीनाथ चैहान निरन्तर युद्ध किया । गुर्जर प्रतिहारों के पतन के पश्चात् परमारों और चन्देलों का अभ्युदय हुआ। उनकी शक्ति प्रतिदिन बढ़ती गयी। निरन्तर युद्ध और प्रतिस्पर्धा का शिकार जगनेर का किला भी बना रहा। मेवाड़ के शासकों ने परमार को पराजित कर बिजौली की ओर खदेड़ कर उनके द्वारा पुनः अधिकार करने का प्रयास किया। कुतुबद्दिन ऐबक और इल्तुमिश ने राजस्थान पर विजय कर जगनेर के शासक को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। किन्तु यहाँ के वीर राजपूत अपनी अस्मिता के लिए निरन्तर युद्धरत् रहे। 1510 ई0 में इसे मुगलों ने जीत कर अकबर ने जगनेर के दुर्ग पर मुस्लिम सूबेदार नियुक्त किया। जिसके द्वारा इस किले में ‘लाल पत्थर का मेहराबदार द्वार’ बनवाया। किले में उत्कीर्ण एक लेख से ज्ञात होता है कि अकबर ने राजस्थान विजय के लिए केन्द्र जगनेर को ही बनाया। यहाँ पर्याप्त मात्रा में अस्त्र-शस्त्र सैनिक एवं खाद्य सामग्री रखी जाती थी। मुगलों ने 1603 में राजा जगन सिंह को मरवा दिया। उसके बाद से यह किला मुगलों के कब्जे में ही रहा। किले में ग्वाल बाबा का मशहूर मंदिर भी है। यह क्षेत्र अरावली पर्वतमाला की शाखाओं से घिरा है। आज भी यहां के तांतपुर गांव में पत्थर मंडी मशहूर है। उन्होंने बताया कि अंधविश्वास को खत्म करने के लिए जागरूकता कार्यक्रम की योजना है। मुगल साम्राज्य के पश्चात जगनेर के दुर्ग ने जाट, मराठे और अग्रेजों का सत्ता-सघर्ष देखा। इस किले में प्रतिवर्ष ग्वाल बाबा का मेला लगता है किले में ग्वाल बाबा की छतरी भी है। यह किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के संरक्षण में है। एएसआई के अधीक्षण पुरातत्वविद कहते हैं कि जगनेर किला को राजा जगन सिंह ने बनाया था। उसने वर्ष 1550 में राज्य स्थापित किया और किला वर्ष 1573 में बनकर तैयार हुआ।
आल्हा लोक कला टूर्नामेंट का प्रसिद्ध केंद्र:-आल्हा पूर्वी उत्तरी भारत में एक प्रसिद्ध कार्यक्रम है। जगनेर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वी राजस्थान और उत्तरी मध्य प्रदेश में आल्हा कार्यक्रम के प्रसिद्ध केंद्र है। किरोड़ी लाल स्वामी इस केंद्र के आल्हा के प्रसिद्ध गायक था। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में आल्हा टूर्नामेंट के लगातार 50 साल से विजेता रहा था। यह इस टूर्नामेंट जीतने की सबसे बड़ी रिकॉर्ड है। एक क्षेत्र जगनेर में किरोड़ीलाल स्वामी के नाम के बाद नामित किया गया था। उन्होंने कहा कि आगरा में संस्कार भारती के कार्यक्रम और लोक कला विकास कार्यक्रम में कई बार आमंत्रित किया गया था। आल्हा बरसात के समय में आल्हा मनाया जाता है अब किरोड़ीलाल स्वामी के बेटे श्री राम पाल शर्मा ने वर्तमान समय में जारी रखा है। उन्होंने यह भी क्षेत्र के आसपास वर्तमान समय में प्रसिद्ध है।

2 thoughts on “जगनेर के किले को आल्हा-ऊदल के मामा राजा राव जयपाल ने बनवाया

  1. JAGNER ka Kila itihas ki mahan dharovar mna see me me hai yeha ka ek vaibhav shall prachi itihas raha hai aur yenha ke mahan shasak jagn sing parmar ke name yeha ka JAGNER rakha hai lekin durbhagya dekhiye yanha per kisi sarkar ne is kilo ka theek se jeenodhar nanhi Kiya is kilo ko phir se ek sunder rup Diya ja sakta Kila purn rup see hangar ho Chuka hai aur vaise bhi jagner khetra Agra ka sabse pichhada kshetra hai asi se nivedan hai ki is kilo ke saraksha ke ek mota bazut Lana chahiye jisse yna bhi paryatak aadi asake

  2. डॉ राधेश्याम द्विवेदी जी आपके साहित्यिक निबंध, “जगनेर के किले को आल्हा-ऊदल के मामा राजा राव जयपाल ने बनवाया” के शीर्षक में आल्हा-ऊदल के उल्लेख ने बीते युग की मेरी याद ताज़ा कर दी| पूर्वी पंजाब से अपने गाँव के विद्यालय की ग्रीष्म कालीन छुट्टियों में दिल्ली स्थित करोल बाग़ की नाई-वाला गलियों में रहते अपने संबंधी के यहाँ आ १९४७ में पत्थर वाले कुएं के चौराहे पर मैंने पहली बार आल्हा-ऊदल की कथा सुनी थी| छोटी आयु में मुझे हिंदी भाषा का कोई ज्ञान न था लेकिन तख्तपोश पर बैठे कथा-वाचक व उसकी मंडली सप्ताह भर रणबांकुरे आल्हा और ऊदल के युद्ध-कौशल को मृदंग पर गा गा कर मुझे रोमांचित कर देते थे| मेरे देखते देखते न वहां पत्थर वाला कुआं रहा—समय बीतते उसे भर दिया गया था—और सीमा के उस पार से आए पंजाबी शरणार्थियों के सैलाब ने उन आल्हा-ऊदल के दीवानों को न जाने कहाँ भेज दिया|

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