लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

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गंगानन्द झा

अन्ना हजारे के अनशन को केन्द्र में ऱखते हुए हो रही हलचल सन 1974 ई में बिहार के जयप्रकाश आन्दोलन की याद ताजा करती है। फर्क है इन आन्दोलनों के पीछे की शक्ति की पहचान में, अन्ना की सेना सिविल सोसायटी कहलाते हैं, जयप्रकाश की सेना छात्र कहलाते थे। उस समय सिविल सोसायटी का फैशन नहीं उभड़ा था।

वे दिन अलग किस्म के थे, समानता थी कि भ्रष्टाचार तब भी था। लोग तब भी सार्वजनिक रूप से भ्रष्टाचार की भर्त्सना करते थे, यद्यपि भ्रष्टाचारियों को सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती रही थी। फिर अस्सी के दशक में भ्रष्टाचार को सार्वजनिक संभाषण में केन्द्रस्थ स्थान में श्री विश्वनाथ प्रसाद सिंह बोफोर्स के मुद्दे से ले आए थे। भ्रष्टाचार विरोध को समाजिक संभाषण में लाने का लाभ इन सबों को मिलता रहा है,तो यह इनका प्राप्य रहा है।साठ का दशक भारतीय राजनीति में दूरगामी परिवर्तन की संभावना का संकेत तो देता रहा, पर सत्ता-परिवर्तन मरीचिका ही बना रहा। राजनीतिक परिवर्तन की सम्भावनाएँ सन 1971 ई में आयोजित आम चुनाव में सभी गैर-कॉंग्रेसी राजनीति दलों के महागठजोट(Grand alliance) की निर्णायक पराजय से ध्वस्त-सा हो गया। सन 1967ई में पहली बार राज्यों में तो गैर-कॉंग्रेसी सरकारें बनी, पर केन्द्र में सत्ता बचाए रखने में कॉंग्रेस सफल रही । फिर सन 1969 ई. में भी वैसा ही हुआ. केन्द्र में कॉंग्रेस का पहुमत कम होने पर भी सरकार चलती रही। जब सन 1972 ई के आम चुनाव में तमाम विरोधी दल महागठजोड़ (grand alliance) बनाने के बावजूद निर्णायक रूप से हार गए तो इनकी हताशा चरम अवस्था पर पहुँच गई। ऐसी अफवाह को भी वे स्वीकार करते दिखे कि बैलॉट पेपर पर छाप देने वाली स्याही विशेष रूप से रूस से मँगाई गई थी। इसकी खासियत थी कि चाहे किसी भी दल के चुनाव चिह्न पर लगाया जाए, यह स्याही कॉंग्रेस के चिह्न पर ही उगती थी। नतीजा हुआ कि राजनीतिक प्रक्रिया द्वारा सत्ता में आने का भरोसा क्षीणतर हो गया। सन 1972 ई में बांग्ला देश के आविर्भाव होने पर तो प्रधानमंत्री के रूप में इन्दिरा गांधी राष्ट्र को गौरव की प्रतीक हो गईं। गैर कॉंग्रेसियों में हताशा, अविश्वास का निराशावाद स्वीकृति पाता दिखने लगा। इधर बांग्ला देश के जन्म में धात्री की भूमिका का निर्वहन करने के कारण देश की आर्थिक स्थिति काफी संकटग्रस्त हो गई थी। टैक्सेस बढ़ाए गए, आवश्यक सामग्रियों के उत्पादन में कमी आ गई थी। तस्करी-कालाबाजारी, मिलावट में बढ़ोत्तरी आई थी। सन 1972 ई. में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने प्रशासनिक आदेश द्वारा विश्वविद्यालयों में सरकारी अधिकारियों को कुलपति और कुल सचिव के पद पर नियुक्त कर दिया। नई व्यवस्था से परीक्षाओं में एकाएक प्रभावी रूप में कदाचार पर रोक लग गई। फलस्वरूप शिक्षण-संस्थाओं में बेरोक-टोक पनप रहे निहित स्वार्थ के तंत्र के लिए अस्तित्व का संकट प्रत्यक्ष होने लगा। सन 1973 ई. में आयोजित विशवविद्यालयीय परीक्षाओं में इनेगिने परीक्षार्थियों को ही सफल घोषित होने का अवसर मिला। इस पृष्ठभूमि में बिहार सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरूद्ध छात्र-संगठनों के बैनर तले आन्दोलन की घोषणा की गई और इसे सम्माननीयता प्रदान करने के लिए जयप्रकाश नारायण को प्रेरित किया गया। जयप्रकाश ने मोर्चा सँभाला और छात्रों को पढ़ाई एवम् परीक्षा का वहिष्कार करने का आह्वान किया। शिक्षा पद्धति के दोषपूर्ण होने की बातें कही गईं, बिना किसी खाके के रूप रेखा के सम्पूर्ण- क्रान्ति के नारे उठाए गए। बिहार सरकार ने जवाब में परीक्षार्थियों को परीक्षाओं में नकल, कदाचार करने की पूरी छूट की व्यवस्था कर दी ।

कॉंग्रेस की रण-नीति काम आई । भ्रष्टाचार जीतता गया, भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन जीतता गया। शिक्षा- पद्धति का दोषगुण अक्षत रहा और सम्पूर्ण क्रान्ति की उपयोगिकता एवम् प्रसंगिकता आई-गई बात हो गई । फिर बिहार में चुनाव के बाद गैर कॉंग्रेसी सरकार बनी। शिक्षण संस्थाओं में परीक्षाएँ आयोजित हुईँ । कदाचार में पकड़े जाने पर छात्र आन्दोलन को सफल बनाने वालों ने नारे लगाए —“चोरी से सरकार बनी है.चोरी से हम पास करेंगे।”

अस्सी के दशक में श्री विश्वनाथ प्रसाद सिंह की अगुवाई में बोफोर्स तोपों की खरीद में 996 करोड़ रूपयों के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया और अन्ततोगत्वा राजीव गांधी की सरकार अप्रतिष्ठित किया। फिर जयप्रकाश के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से उभड़े लालू प्रसाद के हजार करोड़ से अधिक के चारे घोटाले की चर्चाएँ जनता के लिए मुखरोचक बनी रहीं । आज, जब अन्ना मोर्चे पर हैं तो लाखों करोड़ो से कम के घोटाले चर्चा का सम्मान नहीं पाते।

भ्रष्टाचार विरोध सदा से कामधेनु रहा है। सत्तर के दशक के बाद तेजी से पसरे गैर-सरकारी संस्थाओं(N.G.Os) की बेल ने इस मुहिम को सफलता से आगे बढ़ाया है। और भ्रष्टाचार भी साथ साथ दृढ़ता से पाँव पसारता जा रहा है।

2 Responses to “जयप्रकाश से अन्ना तक”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    गंगानंद झा जी से मैं अनुरोध करता हूँ की थोड़ा समय निकाल कर इन्ही पन्नों में प्रथम मई को प्राकाशित मेरा लेख ‘नाली के कीड़े’ देखने का कष्ट करें.

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  2. हरपाल सिंह

    harpal singh sewak

    जयप्रकाश ने तो देश को बर्बाद किया ही रही कसर अन्ना पूरा कर देगे जिस तरह जयप्रकाश के साथ आन्दोलन करने वाले सत्ता पर आने के बाद भ्रष्ट हो गए उसी प्रकार पहले से ही दागदार लोग अन्ना के आन्दोलन में है फिर उम्मीद करना बेवकूफी है जयप्रकाश और अन्ना कठपुतली है ऐसे लोगो से स्थाई परिवर्तन नहीं होता बल्कि देश रसातल में चला जाता है पाच दिनों तक आन्दोलन में साथ रहकर अपनी आँखों से देखा है जनाब अन्ना को हर घंटे बयान बदलते हुए जनाबो ने पाच दिनों में ही ४० लाख खर्चा दिखा दिया अरविन्द केजरीवाल बार बार भाषण में कार्पोरेट के चंदे से आन्दोलन नहीं चल रहा है ८० लाख का जनता का है इसके बारे एक बार भी विरोध नहीं किया अन्ना की आंधी में अंधा होने की जरुरत नहीं आँखे खोलकर रहने की जरुरत है जनाब

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