लघुकथा : जल्दी करो

सुधीर मौर्य

download (4)जल्दबाजी में इकरा बचते-बचाते गैर मजहब इलाके में आ गयी। धार्मिक नारे लगते लोग उसकी तरफ बढे, इकरा सूखे पत्ते की तरह कांपने लगी। किसी तरह आरती उसे उन्मादियों से बचा कर अपने घर लायी और कुछ दिन अपने मजहब की तरह कपड़े पहनने को कहा।

दूसरे मजहब के लोग अल्लाह हो अकबर के नारे लगाते मोहल्ले में बदला लेने की गरज से घुसे, जो मर्द सामने काट डाला और लड़कियों की अस्मत लूटने लगे।

इकरा भी उनके हत्थे चढ़ी, बेचारी रो-रो कर अल्लाह की दुहाई देती रही कि वो उनके मजहब की है। पर वो ये कहते हुए, साली बचने के लिए बहाना करती है, उस पर टूट पड़े।

इकरा का भाई लूट-पाट करता उसी घरमें घुसा और बहन को अपने ही मजहबियों से लूटते देख अवाक रह गया।

भाई को देख कर कराहती हुई इकरा के होठो पर एक फीकी मुस्कान उभरी। फिर वो अपने ऊपर लेटे बलात्कारी से बोली ”जल्दी करो” आपका एक साथी और आ गया है।

1 thought on “लघुकथा : जल्दी करो

  1. क्या यह लघु कथा मेरी कहानी ” खतना” की याद नहीं दिलाती?

Leave a Reply

%d bloggers like this: