जहरीले बयानों से वैचारिक हिंसा करते जावेद अख्तर

 विवेक कुमार पाठक

जो संघ स्वयंसेवक विपत्तिकाल में देशवासियों की सेवा के लिए प्राणपन से जुट जाते हैं। जिन्होंने कोरोना महामारी के तांडव में देशभर में अभूतपूर्व सेवा अभियान चलाया है, जो हजारों बेसहारा मृतकों के अस्थि कलश गंगा में प्रवाहित करके उनके लिए मोक्ष की कामना करते हैं, उन्हें आज देश का कथित बुद्धिजीवी लेखक तालिबान की तरह हिंसक बता रहा है। देश में असहिष्णुता का राग अलापने वाली बिग्रेड की यह असली असहिष्णु चेहरा है जिसे राष्ट्र को समर्पित एक राष्ट्रवादी संगठन फूटी आंखों से भी सुहा नहीं रहा है।मित्रों यह बयान अपने आप में बहुत बड़ी हिंसा है। एक खास तबके में हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के प्रति घृणा की फैली बीमारी की यह नजीर भर है। उंचे मंचों पर बैठने वाले लोगों के मन का यह जहर चिंताजनक है। ध्यान दीजिए संघ को तालिबान जैसा कोई सड़क चलता सिरफिरा नहीं कह रहा है। अपनी उन्मादी घृणा में जावेद अख्तर भूल सकते हैं मगर देश नहीं भूल सकता कि हम सबने उन्हें लंबे समय से भरपूर सम्मान दिया है। उनकी फिल्मों में उनके एजेंडे को भूलकर देखा है और उनकी खुले दिल से तारीफ की है। बहुत दूर क्यों जाते हैं शोले को ही देख लीजिए। इस फिल्म में हम गब्बर जय वीरु और बसंती के बीच बीच में दिखलाए गए एजेंडे को नोटिस नहीं कर पाते हैं। कैसे जावेद अख्तर की फिल्मों में मुसलमान धार्मिक किरदारों को शरीफ और उसूल का पक्का दिखलाया जाता रहा है। 786 के बिल्ले को जीवनरक्षक दिखलाया गया है वहीं जावेद अख्तर और उन जैसे अनेक फिल्म पटकथा लेखक मंदिर के पुजारी को कैसा अधर्मी दिखाते रहे हैं किसी को बताने की जरुरत नहीं है।जावेद अख्तर के इस एजेंडाशुदा पटकथा लेखन के बाबजूद भारत में हर पक्ष के लोग उनका सम्मान करते रहे हैं। उनकी लिखी फिल्मों को देखते रहे हैं। उनकी प्रशंसा करते रहे हैं। उन्हें विविध मंचों  पर देश अर्से से सम्मानित करता आया है। मीडिया बिरादरी एक सेकुलर धारा के बड़े विद्वान के रुप में उन्हे मंच देता आया है। इतना सम्मान और इतनी स्वीकार्यता देश भर में मिलने के बाबजूद जावेद अख्तर देश के ही करोड़ों सेवाभावी स्वयंसेवकों को हिंसक आतंकवादी सरीखा बता रहे हैं। तलवार और खून खराबा करके आफगानिस्तान पर काबिज होने वाले तालिबान की तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके कार्यकर्ताओं को बताया जा रहा है। क्या यह देश के करोड़ों राष्ट्रवादियों के प्रति जुबानी हिंसा नहीं है।सवाल उठता है कि बुद्विजीवी का तमगा ओड़े रहने वाले जावेद अख्तर अपने अवचेतन में भरी कटुता और घृणा  के कारण क्या एक हिंसक और एक राष्ट्रवादी देशभक्तिपूर्ण संगठन के बीच का अंतर भी भूल गए हैं। क्या जावेद अख्तर बताएंगे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कब कब देशवासियों पर बंदूकों और तलवारों के बल पर हुकुमत की है अथवा संघ ऐसा करने की कोशिश कर रहा है। कब संघ के करोड़ों कार्यकर्ता भारत में अराजकता और राजनैतिक अस्थिरता के कारण बने हैं। कब संघ के स्वंयसेवकों ने भारत के विमान को अपहरण कराने में बम गोले और हथगोलों वाले आतंकवादियों का साथ दिया है।  कब संघ ने पूरे भारत में बहन बेटियों और बहुओं के खिलाफ हिंसक पाबंदियां लगाई हैं। अख्तर को ये भी जवाब देना चाहिए कि जिस बुर्का के वो समर्थन करते हैं क्या वो बुर्का मुस्लिम महिलाओं के लिए संघ ने बंदूक के दम पर भारत में लागू किया है।मित्रों जावेद अख्तर इन असल सवालों पर कभी नहीं बोलेंगे। दरअसल ये वो बिरादरी है जो अपने देश की माटी की दुनिया में थू थू करने के लिए हमेशा उतारु है। ये संघ के प्रति अपनी नफरत में ये तक भूल गए हैं कि भारत में दुनिया की दूसरी बड़ी मुस्लिम आबादी पूरी आजादी, इज्जत, अधिकार और राज्य के विशेष संरक्षण में रह रही है। इस देश ने तमाम सुविधाएं आगे बढ़कर पहले अल्पसंख्यकों को बांटी हैं। अल्पसंख्यक पूरी आजादी और सम्मान के साथ दुनिया में सबसे अधिक अधिकार संपन्न हैं। देश में जगह जगह हज हाउस बनाए गए हैं। अल्पसंख्यक आज अगर स्वतंत्र रुप से धार्मिक शिक्षा सरकारी सहायता से चलने वाले मदरसों में दे रहे हैं तो ये भारतीय संविधान की उदारता है मगर अख्तर के अनुसार भारत के मुसलमान डरे हुए हैं और संघ की अगुआई में राष्ट्रवादी हिन्दू हिंसा कर रहे हैं। इनके लिए भारत रहने लायक नहीं बचा है। ये बार बार कहते हैं कि भारत में मुसलमानों को तालिबान की तरह संघ से खतरा है।मित्रों जो मिला है उस पर इठलाते हुए देने वाले को लात मारने वाले भारत में भी जहां तहां फैले हुए हैं। जावेद अख्तर भी उसी धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।वे कहते हैं कि जिस तरह तालिबान एक इस्लाम देश बनाना चाहता है उसी तरह आरएसएस भारत को उग्र हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता है। ये सभी लोग एक ही विचारधारा के हैं। जावेद अख्तर ने सिर्फ इतना ही नहीं कहा है। उन्होंने आग उगलते शब्दो के साथ कहा है कि जैसे तालिबान बर्बर है वैसे ही बजरंग दल, आरएसएस और बीएचपी जैसे संगठनों का समर्थन करने वाले उसी तालिबान की तरह हिंसक और बर्बर हैं।जावेद अख्तर के इस बयान ने उनके मन मस्तिष्क में छिपी, घृणा, कुंठा, हिंसा और कटुता को देश के सामने ला दिया है।  साफ हो गया है कि वे राष्ट्रवादी विचार रखने वाले देशभक्त संगठन के प्रति मन में कितना जहर रखते हैं।  वे और उन जैसे सैकड़ों सेकुलरटाइप एजेंडाशुदा लेखक , पत्रकार और कथित विद्वान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति अव्वल दर्जे के असहिष्णु हो गए हैं। संघ के प्रति उनकी नफरत और घृणात्मक बयान देश को चौकाते हैं कि किस कदर विरोध और असहमति का उनका सुर जहरीली नफरत तक पहुंच गया है। जरा सेचिए क्या वे इस विषैले मन के साथ बुद्धिजीवी कहलाने का हक खो तो नहीं चुके।मित्रों जावेद अख्तर और उन जैसे लोग आसमान पर थूककर उसे मैला नहीं कर सकते। सब जानते हैं कि आसमान पर थूकने वाला खुद क्या अनुभव करता है। दुनिया गवाह है कि 130 करोड़ देशवासियों में संघ तालिबान बनकर जन जन तक नहीं पहुंचा है। संघ ने सेवा, समर्पण, देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति से अपनी स्वीकार्यता भारत के लाखों गांव गांव और शहर शहर तक की है। आज संघ के स्वयंसेवक वनवासी भाइयों के बीच सेवा करते है तो बाढ़, आपदा, भूकंप, अकाल के बीच वे सबसे पहले मदद को पहुंचते हैं। ,संघ सेवा का कार्य जीवन के विविध आयामों के बीच बिना रुके बिना थके करते जा रहा है। उसने राष्ट्र के प्रति समर्पण के लिए न कभी पुरस्कार मांगा है और न किसी मंच से प्रशंसा की अभिलाषा रखी है। संघ का कार्य चरैवैती चरैवैती निरंतर चलता रहता है। संघ को न किसी की निंदा से धूप है और न ही किसी की प्रशंसा से छांव है। सेवा और समर्पण के भाव से स्थापित हुए संघ में दशकों से स्वयंसेवक चुपचाप राष्ट्र की सेवा और आरधना में लगे हुए हैं। लाखों स्वयंसेवकों ने भारतमाता की सेवा में अपना जीवन खपा दिया है।  भारत की महान सांस्कृतिक विरासत का गौरव और सम्मान संघ ने देश दुनिया में पुर्नस्थापित किया है। आज दुनिया में अमेरिका , इंग्लैण्ड से लेकर हर देश में संघ के सेवाकार्य चलते हैं। संघ को अंतर्राष्ट्रीय जगत में एक समर्पित अनुशासित सकारात्मक सेवा संगठन के रुप में जाना जाता है। खुद संघ मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के जरिए देश के मुसलमानों को देश की सेवा का सम्मानजक मंच देता है। जब संघ प्रमुख कहते हैं कि भारत में रहने वाले हिन्दुओं और मुसलमान दोनों के पूर्वज एक हैं तो वे भारत की एकता और अखंडता का संदेश देते हैं। वे प्रत्येक भारतवासी को भारतमाता का पुत्र कहते हुए अलगाव नहीं बल्कि जोड़ने और जुड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। जावेद अख्तर जैसे हिंसक बयानवीरों के लिए ऐसे सार्थक और शांतिपूर्ण संदेश ही सच्ची नसीहत हैं। अंत में बस यही कि अख्तर जैसे विभाजनकारी मानसिकता वाले लेखक अपनी इसी जहरीली कटुता से देश में निरंतर अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। वे अपनी बची खुची स्वीकार्यता भी खत्म कर रहे हैं। उनका ताजा बयान आसमान पर थूकने के अलावा कुछ नहीं है।

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