माँ भारती के सच्चे सपूत जवाहरलाल नेहरू

दीपक कुमार त्यागी

देश की आजादी के संघर्ष में अपना कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष करने वाले, आधुनिक भारत के शिल्पकार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित जवाहरलाल नेहरू की आज पुण्यतिथि है, आज हम इस महान हस्ती के बारे में कुछ जानने का प्रयास करते हैं। हालांकि नेहरू के बारे में लिखना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है, क्योंकि उनके संस्मरणों से देश की आजादी की गाथा के इतिहास में अनेक अध्याय भरे पड़े हैं। नेहरू एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के साथ-साथ अदभुत आकर्षक व्यक्तित्व के धनी, ओजस्वी वक्ता, उत्कृष्ट लेखक, इतिहासकार, आधुनिक भारत का सपना देखने वाले महान स्वपनदृष्टा थे, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश में आधुनिक भारत के शिल्पकार के ख़िताब से नवाज़े जाने का श्रेय अगर किसी एक व्यक्ति को जाता है तो वो नि:संदेह सबसे पहले भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को ही जाता हैं। उन्होंने न केवल देश की आज़ादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाकर अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ मिलकर देश को अंग्रेजों की गुलामी के चंगुल से आजाद करवाने में अहम भूमिका निभाई थी, वहीं देश की आजादी के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में सशक्त आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की पहल करके जिस देश भारत में उस समय सूई तक भी विदेशों से आती हो वहां पर बड़े-बड़े कल-कारखाने लगाकर देश को वास्तव में धरातल पर आत्मनिर्भर बनाने का कार्य किया था। नेहरू ने देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था की बेहद मजबूती के साथ नींव स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाकर देश में आम लोगों की आवाज बनने वाली बेहद सशक्त लोकतांत्रिक व्यवस्था को दिया था। आज देश में राजनीति के चलते उनके नाम पर चाहे कितने भी अनर्गल आरोप-प्रत्यारोप की बाते होती रहे, लेकिन यह तय है कि जिसने भी नेहरू के बारे में राजनीति से ऊपर उठकर बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर निष्पक्ष होकर जानने का प्रयास किया है, वह देश निर्माण में उनके अनमोल अतुलनीय योगदान को कभी भी भुला नहीं सकता है। उनके किये गये देशहित के कार्यो के लिए हिन्दुस्तान हमेशा उनका ऋणी रहेगा। चंद लोग चाहे कितना भी उनकी छवि को खराब करने का प्रयास कर ले, लेकिन जब भी आजाद भारत के इतिहास की बात शुरू होगी तो नेहरू के देश निर्माण के योगदान की अनदेखी करना असंभव होगा।
नेहरू अपने जीवनकाल में देश में एक बहुत बड़े जननेता के रूप में भारत के आम लोगों के बीच बहुत ही ज्यादा लोकप्रिय रहे हैं। नेहरू की देश की जनता के बीच में इतनी जबरदस्त लोकप्रियता थी कि आज हम और आप शायद उसकी कल्पना भी न कर सकें, नेहरू को सुनने के लिए उस साधन-विहीन दौर में भी लाखों लोगों की भारी भीड़ इकट्ठा हो जाती थी। नेहरू की लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि वो भारत के साथ-साथ विदेशों में भी बहुत लोकप्रिय थे, जब वो विदेशी दौरे पर जाते थे तो उस समय विदेशी धरती पर भी उनके स्वागत के लिए भारी जनसैलाब उमड़ पड़ता था, विदेशों के लोगों में उनकी निराली धाक थी। भारत के बट़वारे के बाद जिस समय भारत को अंग्रेजों से आजादी मिली थी तो उस समय देश के हालात आर्थिक रूप से बहुत खस्ताहाल व दंगा-फसाद के चलते बेहद तनावपूर्ण थे, इन हालातों को देखकर बहुत सारे ताकतवर देशों को लगता था कि भारत आजाद होने के बाद इस स्थिति को नियंत्रित करके अपने दम पर कैसे खड़ा हो पायेगा। लेकिन उन देशों की इस सोच को नेहरू ने अपने कुशल नेतृत्व से जल्द ही झुठलाने का काम किया, उन्होंने सफलता पूर्वक भारत का नेतृत्व सम्हालकर देश को विकास की नयी गति देने का कार्य किया। उसके बाद से ही विदेशों में अब तक भी नेहरू की बहुत ज्यादा इज्जत होती है। लेकिन अफसोस आज नेहरू के अपने देश भारत में उनके नाम पर आरोप-प्रत्यारोप की ओछी राजनीति जमकर होती है, हालात यह तक हो गये हैं कि नेहरू की विचारधारा व नीतियों को खुद कांग्रेस पार्टी के चंद शीर्ष नेता तक भूल रहे हैं, वो कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से दूसरे दल के नेताओं से सिखाने तक के लिए बोल देते हैं। हाल के वर्षों में कांग्रेस पार्टी के देश में बेहद कमजोर होने के चलते अन्य राजनीतिक दलों के द्वारा हर विफलता के लिए नेहरू को दोष देकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने का चलन बहुत चल रहा है। कोई भी यह सोचने के लिए तैयार नहीं है कि देश समय काल परिस्थिति बहुत बड़ी होती है अगर वर्षों बाद किसी निर्णय को कसौटी के मापदंडों पर तोला जायेगा तो एक सही निर्णय भी उस समय गलत प्रतीत हो सकता हैं। खैर जो भी हो आज देश में नेहरू के प्रति इतिहास बदलने के चलते काफी स्थितियां बदल गई हैं। अब नेहरू को लेकर राजनीतिक लोगों के द्वारा तरह-तरह के विवादों को जन्म दे दिया गया है। आज देश में बहुत लोग जानते ही नहीं है कि नेहरू ने हमारे देश के लिए क्या किया या वास्तव नेहरू कौन थे। कुछ लोग तो आज की कांग्रेस और उसके चंद नेताओं को देखकर महामानव नेहरू की छवि के बारे में तुलना करके आकलन करने लग जाते हैं। इसके पीछे दशकों तक कुछ राजनीतिक दलों व कुछ लोगों के द्वारा नेहरू के खिलाफ फैलाए गए झूठे तथ्यों के आधार पर किये गये दुष्प्रचार का बहुत बड़ा हाथ है। इसीलिए आज पुण्यतिथि के दिन हम देश व विदेश की धरती पर बेहद लोकप्रिय रहे जवाहरलाल नेहरू के बारे में कुछ बातें अवश्य जानें।
वैसे तो देश के आजाद होने से पहले ही राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने पंडित जवाहर लाल नेहरू को ही अपनी राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी मान लिया था। लेकिन गांधी जी ने 15 जनवरी, 1942 को वर्धा में हुई अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की बैठक में नेहरू को अपना वारिस सार्वजनिक रूप से घोषित कर दिया था, जबकि उस समय देश में गांधी नेहरू के मनमुटाव की खबर चल रही थी, गांधी जी ने इस अधिवेशन में कहा था कि ‘मुझसे किसी ने कहा कि जवाहरलाल और मेरे बीच अनबन हो गई है। यह बिल्कुल गलत है। जब से जवाहरलाल मेरे पंजे में आकर फंसा है, तब से वह मुझसे झगड़ता ही रहा है। परंतु जैसे पानी में चाहे कोई कितनी ही लकड़ी क्यों न पीटे, वह पानी को अलग-अलग नहीं कर सकता, वैसे ही हमें भी कोई अलग नहीं कर सकता। मैं हमेशा से कहता आया हूँ कि अगर मेरा वारिस कोई है, तो वह राजाजी नहीं, सरदार वल्लभभाई नहीं, जवाहरलाल है। उपरोक्त संस्मरण गांधी जी नेहरू का आपसी विश्वास व प्रेम को प्रदर्शित करता है।
नेहरू आजादी से पहले देश में गठित अंतरिम सरकार और आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने थे। देश की स्वतन्त्रता के पूर्व और स्वतंत्रता के पश्चात् की भारतीय राजनीति में नेहरू हमेशा केन्द्रीय व्यक्तित्व के रूप में काम करते रहे थे। वो महात्मा गांधी के संरक्षण में भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के सर्वोच्च स्वीकार्य नेता के रूप में देश में उभरे और वो सन् 1947 में भारत के एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में स्थापना से लेकर सन् 1964 तक अपने निधन के समय तक, भारत के प्रधानमंत्री के साथ-साथ देश की आम जनता के बीच बेहद लोकप्रिय जननेता के रूप में स्थापित रहे। नेहरू आधुनिक भारतीय राष्ट्र एक सम्प्रभु राज्य, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, और लोकतान्त्रिक गणतन्त्र के शिल्पकार मानें जाते हैं। वह छोटे बच्चों से बहुत प्यार करते थे और बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय होने के चलते बच्चे उन्हें प्यार से चाचा नेहरू कहते थे। इसलिए उनकी जयंती को देश में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवम्बर 1889 को ब्रिटिश सरकार के आधीन भारत के उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ था। उनके पिता मोतीलाल नेहरू देश के प्रतिष्ठित बैरिस्टर थे, वो बेहद धनी भी थे, जो कि कश्मीरी पंडित समुदाय से आते थे और वो देश के स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष चुने गए थे। उनकी माता स्वरूपरानी जो लाहौर में बसे एक सुपरिचित कश्मीरी ब्राह्मण परिवार से थी, वो मोतीलाल नेहरू की पहली पत्नी की प्रसव के दौरान मौत होने के बाद दूसरी पत्नी थी, जवाहरलाल तीन बच्चों में से सबसे बड़े थे, जिनमें बाकी दो लड़कियाँ थी। बड़ी बहन, विजया लक्ष्मी, बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनी और सबसे छोटी बहन, कृष्णा हठीसिंग, एक सुप्रसिद्ध लेखिका बनी। मोतीलाल नेहरू ने जवाहरलाल नेहरू को दुनिया के बेहतरीन स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करने का मौका दिया था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो और वह केंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज से प्राप्त की, उन्होंने तीन वर्ष तक अध्ययन करके प्रकृति विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की। उनके विषय रसायनशास्त्र, भूगर्भ विद्या और वनस्पति शास्त्र थे। केंब्रिज छोड़ने के बाद लंदन के इनर टेंपल में दो वर्ष बिताकर उन्होंने अपनी लॉ की पढ़ाई पूरी की। इंग्लैंड में उन्होंने सात साल व्यतीत किए, जिसमें उन्होंने वहां के फैबियन समाजवाद और आयरिश राष्ट्रवाद के लिए एक तर्कसंगत दृष्टिकोण विकसित किया था।
जवाहरलाल नेहरू 1912 में भारत लौटे और वकालत करना शुरू कर दिया। 1916 में उनकी शादी कमला नेहरू से हुई  सन् 1917 में जवाहरलाल व कमला नेहरू को इंदिरा के रूप में एक पुत्री की प्राप्ति हुई। 1917 में जवाहर लाल नेहरू होम रुल लीग‎ में शामिल हो गए। राजनीति में उनकी असली दीक्षा दो साल बाद 1919 में शुरू हुई जब वे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के संपर्क में आए। उस समय महात्मा गांधी ने रॉलेट एक्ट के खिलाफ एक बड़ा अभियान शुरू किया था। नेहरू, महात्मा गांधी के साथ लगातार देश की आजादी के लिए चलाए जाने वाले आंदोलन में सक्रिय रहे, लेकिन वो शांतिपूर्ण सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति खासे आकर्षित हुए।
पंडित जवाहरलाल नेहरू देश को प्रगति के पथ पर ले जाने वाले खास पथ-प्रदर्शक थे। वो शुरू से ही गांधी जी से बहुत प्रभावित रहे और नेहरू ने महात्मा गांधी के उपदेशों के अनुसार खुद को व अपने समस्त परिवार को भी ढाल लिया था। गांधी जी के विचारों से ही प्रभावित होकर जवाहरलाल नेहरू और मोतीलाल नेहरू ने पश्चिमी कपडों और महंगी संपत्ति का त्याग कर दिया था। वे अब एक खादी का कुर्ता और गाँधी टोपी पहनने लगे। जवाहरलाल नेहरू ने 1920-1922 में असहयोग आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया और इस दौरान वह पहली बार गिरफ्तार किए गए। हालांकि कुछ महीनों के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। जवाहरलाल नेहरू 1924 में इलाहाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने शहर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में दो वर्ष तक सेवा कार्य किया, लेकिन 1926 में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों से सहयोग की कमी का हवाला देकर इस पद से इस्तीफा दे दिया था। वर्ष 1920 के प्रतापगढ़ के पहले किसान मोर्चे को संगठित करने का श्रेय भी जवाहरलाल नेहरू को ही जाता है। 1928 में लखनऊ में साइमन कमीशन के विरोध में नेहरू घायल हुए और 1930 के नमक आंदोलन में गिरफ्तार हुए। उन्होंने 6 माह जेल काटी। 1935 में अलमोड़ा जेल में नेहरू ने ‘आत्मकथा’ लिखी। नेहरू अपने जीवनकाल में कुल 9 बार जेल गये और लगभग 9 वर्ष तक 3259 दिन के बेहद लंबे समय तक वह अंग्रेजों की जेल में बंद रहे।
नेहरू ने विश्व भ्रमण किया और एक अंतरराष्ट्रीय महानायक के रूप में अपनी पहचान छोड़ी, और इस भ्रमण से ही सीखकर देश का विकास भी विश्व स्तरीय ढंग से किया। जवाहरलाल नेहरू ने 40 साल की उम्र में साल 1929 में कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली थी। नेहरू 8 बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने। वो 1929-30 (लाहौर अधिवेशन), 1936 (लखनऊ), 1937 (फैज़पुर), 1951 (नासिक), 1952 (दिल्ली), 1953 (हैदराबाद), 1954 (कलकत्ता) अधिवेशन में अध्यक्ष बने और उन्होंने सफलतापूर्वक कांग्रेस के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया। नेहरू ने सन् 1929 में जब कांग्रेस अध्यक्ष का पद ग्रहण किया था, तो रावी के तट पर पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित किया उन्होंने कहा कि ‘हम भारत के प्रजाजन अन्य राष्ट्रों की भांति अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं कि हम स्वतंत्र होकर ही रहें, अपने परिश्रम का फल स्वयं भोगें, हमें जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक सुविधाएं प्राप्त हों, जिसमें हमें भी विकास का पूरा अवसर मिले।’  इसी अधिवेशन में भारत के पूर्ण स्वराज्य के लक्ष्य का समुचित समारोह पूर्वक और बड़े उत्साह पूर्ण ढंग से स्वागत किया गया जैसे ही 31 दिसंबर 1929 को मध्य रात्रि का घंटा बजा और कांग्रेस द्वारा कलकत्ता में 1928 में 1 वर्ष पूर्व दिए गए अल्टीमेटम की तारीख समाप्त हुई वैसे ही कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में जवाहरलाल नेहरू ने लाहौर में रावी नदी के तट पर भारतीय स्वतंत्रता का झंडा फहराया। सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में नेहरू जी 9 अगस्त 1942 को बंबई में गिरफ्तार हुए और अहमदनगर जेल में रहे, जहां वो 15 जून 1945 को रिहा किए गए। 15 अगस्त सन् 1947 में भारत को आजादी मिलने पर जवाहर लाल नेहरू को देश का प्रधानमंत्री बनाया गया। उसके बाद वो लगातार चार बार अपने जीवनकाल तक प्रधानमंत्री रहे, वह 27 मई 1964 तक 16 साल 286 दिन यानी 6130 दिनों तक प्रधानमंत्री पद पर बने रहे। वह भारत को उस मुकाम पर खड़ा देखना चाहते थे जहां हर भारतवासी अमनचैन, प्यार मोहब्बत, सुख और समृद्धि से सराबोर हो। देश को आजादी मिलने के तुरंत बाद ही उन्होंने देश में पहली एशियाई कांफ्रेंस बुलाई और उसमें साफ-साफ कहा कि ‘हमारा मकसद है कि दुनिया में अमनचैन और तरक्की हो, लेकिन यह तभी हो सकता है जब सब मुल्क आजाद हों और इंसानों की सब जगह सुरक्षा हो और आगे बढ़ने का मौका मिले।’ नेहरू ने ‘पंचशील’ का सिद्धांत प्रतिपादित किया और 1954 में वह ‘भारतरत्न’ से अलंकृत हुए नेहरू जी ने तटस्थ राष्ट्रों को संगठित किया और उनका सफलतापूर्वक नेतृत्व किया।उन्होंने अपने प्रधानमंत्री के कार्यकाल में देश में लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करते हुए, राष्ट्र और संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को स्थायी भाव प्रदान किया। उनका विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से देश की जनता और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना हमेशा मुख्य उद्देश्य रहा।
हालांकि नेहरू पाकिस्तान और चीन के साथ भारत के संबंधों में सुधार नहीं कर पाए। उन्होंने चीन की तरफ मित्रता का हाथ भी बढ़ाया, लेकिन 1962 में चीन ने धोखे से आक्रमण कर दिया। चीन का आक्रमण जवाहरलाल नेहरू के लिए एक बड़ा झटका था और शायद इसी वजह से उनकी मौत भी हुई। जवाहरलाल नेहरू को 27 मई 1964 को दिल का दौरा पड़ा जिसमें उनकी मृत्यु हो गई, भारत को विश्व में पहचान दिलाने वाला यह सितारा हमेशा के लिए चिरनिद्रा में सो गया।
लेकिन नेहरू का पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, जातिवाद, एवं उपनिवेश के खिलाफ संघर्ष हमेशा अनुकरणीय रहेगा। वो देश में धर्मनिरपेक्षता और भारत की जातीय एवं धार्मिक विभिन्नताओं के बावजूद भी वे देश की मौलिक एकता को लेकर सजग रहे और सभी देशवासियों को एक सूत्र में पिरोने के लिए हमेशा कार्य करते रहे। कभी ऐसा निर्णय नहीं लिया जिससे कि उन पर धार्मिक या सांप्रदायिक पक्षपात का आरोप लगे। उनका हमेशा स्पष्ट मानना था कि भारत के विकास लिए सभी लोगों को प्यार मोहब्बत से मिलजुलकर एक साथ रहना होगा। नेहरू वैज्ञानिक खोजों एवं तकनीकी विकास में गहरी अभिरुचि रखते थे उन्होंने देश के विकास में इसका खूब उपयोग किया। उन्होंने देश को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए पंचवर्षीय योजनाएं बनाईं। वे हमेशा से मानते थे कि देश के किसानों और कृषि क्षेत्र को मजबूती प्रदान किए बिना देश को तरक्की की राह पर कभी आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इसलिए उन्होंने कृषि भूमि की सिंचाई के उचित प्रबंध के लिए देश में बहुउद्देश्यीय डैम परियोजनाओं का शुभारंभ किया। इन योजनाओं को उन्होंने आधुनिक भारत का तीर्थ कहा। साथ ही देश में रोजगार सृजन और तरक्की की राह को और आसान करने के लिए उन्होंने बड़े-बड़े विशाल शहर रूपी कल-कारखानों की स्थापना की। जो कि अधिकांश आज देश की बड़ी-बड़ी नवरत्ना कंपनी हैं। उन्होंने ही देश स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं का निर्माण किया।
पंडित नेहरू एक महान राजनीतिज्ञ और प्रभावशाली वक्ता ही नहीं, बल्कि महान लेखक भी थे। उनकी रचनाओं में भारत और विश्व, सोवियत रूस, विश्व इतिहास की एक झलक, भारत की एकता और स्वतंत्रता प्रचलित है लेकिन उनकी सबसे लोकप्रिय किताबों में ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ रही, जिसकी रचना 1944 में अप्रैल-सितंबर के बीच अहमदनगर की जेल में हुई। इस पुस्‍तक को नेहरू ने अंग्रज़ी में लिखा और बाद में इसे हिंदी और अन्‍य बहुत सारे भाषाओं में अनुवाद किया गया है। भारत की खोज पुस्‍तक को क्‍लासिक का दर्जा हासिल है। नेहरू जी ने इसे स्‍वतंत्रता आंदोलन के दौर में 1944 में अहमदनगर के किले में अपने 5 महीने के कारावास के दिनों में लिखा था। यह 1946 में पुस्‍तक के रूप में प्रकाशित हुई। इस पुस्‍तक में नेहरू जी ने सिंधु घाटी सभ्‍यता से लेकर भारत की आज़ादी तक विकसित हुई भारत की संस्‍कृति, धर्म और जटिल अतीत को वैज्ञानिक द्रष्टि से अपनी विलक्षण भाषा शैली में बयान किया है।
नेहरू जी ने अपने जीवनकाल में जो काम किये थे आज उसी की नींव पर बुलंद व सशक्त भारत की नई तस्वीर रची जा रही है। नेहरू का मानवीय पक्ष भी अत्यंत उदार और समावेशी था। उन्होंने देशवासियों में निर्धनों और अछूतों के प्रति सामाजिक चेतना पैदा की। हिंदू सिविल कोड में सुधार लाकर उत्तराधिकार और संपति के मामले में विधवाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिया। नेहरू के कुशल नेतृत्व में, कांग्रेस पार्टी ने राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय चुनावों में लगातार प्रभुत्व दिखाते हुए और 1951, 1957, और 1962 के लगातार चुनाव जीतते हुए, देश में एक सर्व-ग्रहण पार्टी के रूप में अपनी पकड़ मजबूत की थी। उनके अन्तिम वर्षों में राजनीतिक मुसीबतों और 1962 के चीनी-भारत युद्ध में उनके नेतृत्व की असफलता के बावजूद, वे भारत के लोगों के बीच हमेशा लोकप्रिय बने रहें। यह महामानव 27 मई 1964 को देशवासियों को छोड़कर हमेशा के लिए चला गया, नेहरू ने अपनी वसीयत में लिखा था कि,
 “जब मैं मर जाऊं, तब मैं चाहता हूं कि मेरी मुट्ठीभर राख प्रयाग के संगम में बहा दी जाए, जो हिन्दुस्तान के दामन को चूमते हुए समंदर में जा मिले, लेकिन मेरी राख का ज्यादा हिस्सा हवाई जहाज से ऊपर ले जाकर खेतों में बिखरा दिया जाए, वो खेत जहां हजारों मेहनतकश इंसान काम में लगे हैं, ताकि मेरे वजूद का हर जर्रा वतन की खाक में मिलकर एक हो जाए।” 
उनकी वसीयत उनके महामानव होने का बहुत बड़ा परिचायक है। आज पुण्यतिथि पर हम माँ भारती के सच्चे सपूत जवाहर लाल नेहरू जी को कोटि-कोटि नमन् करते हुए अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
।। जय हिन्द जय भारत ।।।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

2 thoughts on “माँ भारती के सच्चे सपूत जवाहरलाल नेहरू

  1. भावनात्मक लेख के लिए दीपक कुमार त्यागी जी से मेरी सहानुभूति है| सोचता हूँ निबंध के अंत में प्रस्तुत “जब मैं मर जाऊं, तब मैं चाहता हूँ कि मेरी मुट्ठीभर राख प्रयाग के संगम में बहा दी जाए, …” से पहले १९५० के दशक में गाय बकरियों की भांति माल-गाड़ियों में ढो दिल्ली स्थित लाल किले के मैदान में उनका जन्मदिन मनाने हेतु लाए गए सैकड़ों विद्यार्थियों में एक, यदि मैंने कुछ ही कदम दूर से चाचा नेहरु के साक्षात दर्शन न किये होते तो वर्षों गले में उतारे यह वाक्यांश पढ़ मैं एक बार फिर बिलख बिलख रो देता!

    उनकी पुण्यतिथि पर कुछ अन्यथा न लिख मैं केवल आपसे कहूंगा, दीपक कुमार त्यागी जी निबंध लिखने से पहले माँ भारती से सत्य पूछ लिया होता!

  2. J.L.NEHRU WAS A CURSE TO PARTITIONED INDIA.HE WAS A DAY DREAMER AND HAD A SLAVE AND SEVANT MENTALITY. He did not believe in democrasy because he was defeated by Sardar Patel but Gandhi made him P.M so neither of them were democrates .He kept Montbatten as the first governor general of independent India was due to slave and servant mentality. THERE are hundreds of mistakes for which we are suffering since partition . Hewas a weak in character and had no guts to solve any problem sa a patriot.
    The POK PROBLEM is due to his blunder. Kasmir problem is due to him. He unconsttutionanally put 370 AND 35 articled and fooled Indians. Indus water treaty was a blunder. He withdrew Indian military from Tibet in 1953 after Chau enlai /s visit and surrendered Tibet to Chiana . Two million Hindus were killed during partition because he failed to prepare for safe partition. In 1962 Indo china war we lost our sovereignty by losiing thousands of square miles of land to china and thousands of our soldeires killed The list is two large of his failures and impotency to mention here .His name will go down in history as a joker, coward and and imbecile of first category Almost all the problems we are facing today in India are due to his appeasement of Muslims and Christians if you care to see honestly and as a son of Bharatmata.

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