डॉ. नीरज भारद्वाज
भारतीय ज्ञान परंपरा विशाल, विस्तृत और व्यापक है। हमारी ज्ञान परंपरा में श्रृष्टि का हर एक अंग समाहित है। दिन-रात के हर एक पहर का वर्णन है। हर एक ऋतुचक्र के बारे में विस्तार से बताया, समझाया गया है। कब किस मौसम में क्या खाना चाहिए? कैसे रहना चाहिए? आदि सभी ज्ञान है। हमारे शास्त्रों, ग्रंथों में लिखा गया है कि हमारा शरीर पंच तत्वों से बना हुआ है। हमारे साधु, संत, महात्माओं ने हर युग में जन-जन को इसे बताया, समझाया भी है। गोस्वामी तुलसीदास श्रीरामचरितमानस में लिखते हैं कि- छिति जल पावक गगन समीरा।पंच रचित अति अधम सरीरा॥ कहने का भाव है कि मानव का यह शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु, इन पाँच मूल तत्वों (पंचभूत) से मिलकर बना है। विचार करें तो यह नश्वर शरीर अंततः इन्हीं पांच तत्वों में विलीन हो जाता है। यही पांचों तत्व सभी की जरूरत है।
भूमंड़लीकरण के इस दौर में यह पांचों तत्व दूषित हो रहे हैं। चारों ओर आपा-धापी मची हुई है। सरकारें इनके संरक्षण और बचाव के लिए समय-समय पर अभियान चलाकर लोगों को जागरूक करके पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने का प्रयास करती हैं। यह पांचों तत्व सुरक्षित हैं तो श्रृष्टि में सभी कुछ संतुलित और सुरक्षित रह सकता है। हमारा सौभाग्य है कि हम भारतवर्ष में पैदा हुए हैं। यहाँ पर ऋतुचक्र बदलता रहता है। भारतीय पंचाग के अनुसार कुल छह ऋतुएँ हैं। वसंत ऋतु इसे ऋतुराज की संज्ञा भी दी गई है। इसमें फूलों का खिलना और सुहावना मौसम होता है। ग्रीष्म ऋतु इसमें कड़ाके की गर्मी और लू अर्थात गर्म हवाएँ चलती हैं। वर्षा ऋतु इसमें देश के सभी हिस्सों में झमाझम बारिश होती है, चारों ओर हरियाली दिखाई देती है। शरद ऋतु इसमें हल्की ठंड होती है, मौसम मन भावन होता है। हेमंत ऋतु सर्दियों की शुरूआत होती है। शिशिर ऋतु में कड़ाके की ठंड होती है। आधुनिक और भौगोलिक दृष्टि से मुख्य चार ऋतुएं ही मानी जाती हैं- शीत, ग्रीष्म, मानसून और शरद। हमारे शास्त्रों के अनुसार सभी ऋतुओं में फल, भोजन, तीज-त्योहार अलग-अलग होते हैं। हर एक ऋतु प्रकृति का वरदान है। हमें उसी के अनुसार कार्य करना चाहिए।
आज चारों तरफ स्वच्छ पानी की मांग तेजी से बढ़ रही है। बरसात में मेघ पानी बरसा देते हैं लेकिन हम उसे सुरक्षित रख पाने में कितने सफल होते हैं, यह तो हम सभी जानते हैं। जल सुरक्षित तो कल सुरक्षित की बात हम सभी जानते हैं। जल को संभाल कर रख पाना, उसका सही से संचय करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। जल संरक्षण के लिए भारत सरकार ने कैच द रेन (Catch The Rain) अभियान की शुरुआत की। इस अभियान की शुरूआत 22 मार्च, 2021 को विश्व जल दिवस के अवसर पर माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई थी। विचार करें तो ‘कैच द रेन’ अभियान भारत के सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की नींव है। मोदी जी ने मन की बात कार्यक्रम में कितनी ही बार जल संरक्षण और पर्यावरण को लेकर बातें कही हैं। हम सभी देशवासियों को उस पर अमल करना चाहिए। यदि हम आज बारिश के पानी को संभाल कर नहीं रख पायेंगे तो आने वाली पीढ़ियों को पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ेगा।
‘कैच द रेन’ अभियान हमें प्रकृति के इस अनमोल उपहार को सहेजने का सही रास्ता दिखाता है। हम सभी को मिलकर इस अभियान का हिस्सा बननें की जरूरत है। संकल्प लें कि बारिश की एक भी बूंद व्यर्थ नहीं जाने देंगे क्योंकि ‘जल है तो कल है’। वर्षा ऋतु में भारत में हर साल पर्याप्त मात्रा में वर्षा होती है लेकिन सही बुनियादी ढांचे (Infrastructure) और जागरूकता की कमी के कारण वर्षा जल का एक बहुत बड़ा हिस्सा बहकर समुद्र में चला जाता है या प्रदूषित हो जाता है या फिर बाढ़ का रूप लेकर कितने ही गांवों को उजाड़ देता है जिससे जन जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। सरकार पर लोगों के रख-रखाव का बोझ अलग से बढ़ जाता है। तेजी से हो रहे शहरीकरण के चलते, पक्की सड़कों और चारों ओर बिल्डिंगों के बनने से पानी जमीन के अंदर नहीं जा पाता। वह ऐसे ही बह जाता है जिसके कारण गर्मियों में देश के कई राज्यों में पीने के पानी की किल्लत हो जाती है। किसानों को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिलता।
इस गंभीर समस्या से उबरने का सबसे सरल और प्राकृतिक समाधान ‘कैच द रेन’ अभियान है। हमें अपने पारंपरिक जल निकायों (तालाबों, कुओं और झीलों) से गाद निकालना, उनका सही तरीके से रख-रखाव करना होगा। उन्हें साफ करना होगा ताकि वे ज्यादा पानी जमा कर सकें। नदियों के किनारों और बांधों को मजबूत बनाना होगा। इसके साथ ही घरों की छतों, स्कूलों, सड़कों के किनारेऔर सरकारी इमारतों पर रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना होगा जिससे भूजल स्तर में बढ़ोतरी हो सके। जल सुरक्षित रहेगा तो हम सभी सुरक्षित रह सकेंगे। पानी की एक-एक बूंद कीमती है।