मनोरंजन संगीत

झारखंडी वाद्य यंत्र मांदर को मिला जी आई टैग

-अशोक “प्रवृद्ध”
लेखक, आध्यात्मिक चिंतक व साहित्यकार

झारखंड के गुमला जिले के रायडीह प्रखंड के जरजट्टा गांव के कारीगरों द्वारा निर्मित वाद्य यंत्र मांदर को भौगोलिक संकेतक (जी आई टैग) प्राप्त होना केवल एक विधिक या वाणिज्यिक परिघटना मात्र नहीं है, अपितु यह भारत की उस प्रागैतिहासिक एवं अनादि सांस्कृतिक मेधा की वैश्विक स्वीकृति है जिसका उद्घोष हमारे प्राचीन ग्रन्थों में अनादि काल से होता आया है। चेन्नई स्थित जियोग्राफिकल इंडिकेशन रजिस्ट्री द्वारा ‘मांदर ऑफ झारखंड के रूप में इसे पंजीकृत किया जाना इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि सुदूर वनांचलों में रहने वाले वनवासियों की अनघड़ कलाकृतियां शास्त्रीय मापदंडों पर कितनी खरी हैं। उल्लेखनीय है कि इतिहास केवल राजप्रासादों और शिलालेखों में नहीं, बल्कि जनमानस की धड़कनों और उनके वाद्य यंत्रों की थाप में जीवित रहता है। भारतीय संगीत शास्त्र में वाद्यों को चार श्रेणियों में विभक्त किया गया है- तत (तंत्रीय), सुषिर (फूंक कर बजाए जाने वाले), घन (धातु निर्मित) और अवनद्ध अथवा अनद्ध (चर्ममढ़ित)। मांदर मूलतः एक अवनद्ध वाद्य है, जिसकी संरचना और ध्वनि गूंज सीधे हमारे प्राचीनतम ग्रंथों से जुड़ती है। ऋग्वेद से लेकर सामवेद के मंत्रों तक में दुन्दुभि और आडम्बर जैसे अवनद्ध वाद्यों का उल्लेख मिलता है, जो देवताओं के आह्वाहन और मांगलिक उत्सवों में प्रयुक्त होते थे। भरत मुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र के त्रिपुष्कर और मृदंग के वर्णन को यदि सूक्ष्मता से विश्लेषित किया जाए, तो मांदर उसी का आदिम और अपरिवर्तित रूप दृष्टिगोचर होता है। संस्कृत का मर्दन शब्द, जिसका अर्थ मर्दन करना या थाप देना होता है, प्राकृत और अपभ्रंश के भाषाई सोपानों से गुजरता हुआ मांदर के रूप में लोकमानस में प्रतिष्ठित हुआ।मांदर की सबसे बड़ी विशेषता इसका पूर्णतः प्राकृतिक और जैविक होना है। इसके निर्माण में किसी कृत्रिम तत्व का समावेश नहीं होता। यह पंचमहाभूतों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के सामंजस्य का प्रतीक है। इसकी काया स्थानीय लाल मिट्टी (पृथ्वी) से निर्मित होती है, जिसे जल से गूंथकर, अग्नि में तपाया जाता है, तत्पश्चात् वायु के वेग से निकलने वाली ध्वनि आकाश तत्व में विलीन हो जाती है। गुमला के रायडीह प्रखंड के अंतर्गत जरजट्टा गांव के कारीगरों के पास कोई आधुनिक तकनीकी प्रयोगशाला नहीं है, परंतु उनके पास पूर्वजों से हस्तांतरित वह सूक्ष्म दृष्टि है जो ध्वनि के विज्ञान को समझती है। एक आदर्श मांदर के निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत जटिल एवं तपस्यापूर्ण है। मांदर का मुख्य ढांचा (खोल) बनाने के लिए स्थानीय विशिष्ट लाल मिट्टी का चयन किया जाता है। इस मिट्टी को कूटकर, छानकर पूरी तरह बालू और कंकड़ से मुक्त किया जाता है। यदि मिट्टी में एक भी सूक्ष्म पाषाण कण रह जाए, तो तपन के समय ढांचा चटक जाता है अथवा वाद्य की ध्वनि में वह गंभीर गूंज उत्पन्न नहीं हो पाती जो मांदर की विशेषता है। मांदर का आकार पूरी तरह सीधा बेलनाकार नहीं होता। इसका मध्य भाग थोड़ा फूला हुआ होता है और दोनों छोर व्यास में असमान होते हैं। बायां छोर, जिसे स्थानीय भाषा में धम या भारी कहा जाता है आकार में बड़ा होता है, जबकि दाहिना छोर छिटका या तीक्ष्ण छोटा होता है। यह संरचना ध्वनि विज्ञान के उस नियम पर आधारित है जहां एक ही वाद्य से बास और ट्रेबल दोनों आवृत्तियों को एक साथ संतुलित किया जा सके। दोनों मुखों को मढ़ने के लिए बकरे या बंदर की खाल का प्रयोग पारंपरिक रूप से किया जाता रहा है, जिसे चमड़े की महीन बद्धियों (बदकर) से आपस में कसकर बांधा जाता है। इसके दाहिने छोटे मुख पर एक विशेष लेप लगाया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में खरण कहते हैं। यह लेप लोहे के चूरे, पके हुए चावल के मांड और विशेष वृक्षों के गोंद को मिलाकर बनाया जाता है। प्राचीन ग्रंथों में इसे मर्दन लेप कहा गया है। यह लेप ही मांदर को उसकी वह विशिष्ट खनक प्रदान करता है जो इसे सामान्य ढोलक या नगाड़े से पृथक करती है। चेन्नई की रजिस्ट्री के समक्ष मांदर की ऐतिहासिकता सिद्ध करने के लिए जो मानवशास्त्रीय अकाट्य दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए गए, वे इसके प्राचीन और अद्वितीय होने की पुष्टि करते हैं। प्रसिद्ध मानवशास्त्री शरत चंद्र राय (1915) ने छोटानागपुर के उरांव और मुंडा जनजातियों पर किए गए अपने गहन शोध में मांदर को अखरा (सामुदायिक सांस्कृतिक केंद्र) की धड़कन बताया था। तारक चंद्र दास (1931) एवं डब्ल्यू. जी. आर्चर (1940) की सुप्रसिद्ध कृति द ब्लू ग्रोव में उरांव लोकगीतों और नृत्यों में मांदर की अनिवार्य उपस्थिति का सांगोपांग वर्णन है। तत्कालीन बिहार-ओडिशा गजेटियर और पटना म्यूजियम (1920) की वार्षिक रिपोर्टों में जरजट्टा और गुमला क्षेत्र के कारीगरों के इस अनूठे हस्तशिल्प का ऐतिहासिक संदर्भ मिलता है। ये सभी प्रमाण यह दर्शाते हैं कि यह कला किसी कालखंड विशेष की उपज नहीं, अपितु पीढ़ियों के निरंतर अभ्यास से परिष्कृत हुई एक शाश्वत धरोहर है। मांदर केवल एक वाद्य यंत्र नहीं है, वह झारखंड के सामूहिक जीवन का दर्शन है। सरहुल, करम, सोहराई और जनी शिकार जैसे उत्सवों में जब तक मांदर पर थाप नहीं पड़ती, तब तक लोक जीवन पंगु सा प्रतीत होता है। जीआई टैग मिलने से अब जरजट्टा के कारीगरों को रायडीह मांदर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड के माध्यम से वैश्विक बाजार में सीधे प्रवेश मिलेगा। यह विधिक संरक्षण नकली और मशीनी कंक्रीट या फाइबर से बनने वाले कृत्रिम वाद्यों से इस शुद्ध पारंपरिक विधा की रक्षा करेगा। यह इस बात का जीवंत उदाहरण है कि जब राज्य प्रशासन और स्थानीय मेधा का समन्वय होता है, तो सुदूर वनों में छिपी कला भी वैश्विक क्षितिज पर अपनी प्रामाणिक उपस्थिति दर्ज करा सकती है। उल्लेखनीय है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने जिन तत्वों को आदिम कहकर उपेक्षित कर दिया था, वे वास्तव में विज्ञान और दर्शन के उच्चतम शिखर थे। जरजट्टा के शिल्पकारों ने अंगुलियों के पोरों से मिट्टी और चर्म को जो जीवनदान दिया है, वह भारत की अक्षुण्ण सांस्कृतिक परंपरा का प्रमाण है। मांदर को मिला यह जीआई टैग हमारी पुरखौती थाती और माटी का वह सच्चा सम्मान है, जिसकी गूंज अब अनंत काल तक वैश्विक पटल पर गूंजती रहेगी।

  • अशोक प्रवृद्ध