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    Homeसाहित्‍यदोहेझरने की हर झरती झलकी!

    झरने की हर झरती झलकी!

    झरने की हर झरती झलकी,
    पुलकी ललकी चहकी किलकी;
    थिरकी महकी कबहुक छलकी,
    क्षणिका की कूक सुनी कुहकी!

    कब रुक पायी कब देख सकी,
    रुख़ दुख सुख अपना भाँप सकी;
    बहती आई दरिया धायी,
    बन दृश्य विवश धरिणी भायी!

    कब पात्र बनी किसकी करनी,
    झकझोर बहाया कौन किया;
    कारण था कौन क्रिया किसकी,
    सरका चुपके मग कौन दिया!

    प्रतिपादन आयोजन किसका,
    क्या सूत्रधार स्वर सूक्ष्म दिया;
    हर घट बैठा घूँघट झाँका,
    चौखट टक टक देखा बाँका!

    चैतन्य चकोरी किलकारी,
    कैवल्य ललित लय सुर धारी;
    क्या बैठा था हर ‘मधु’ पलकी,
    क्या वही नचाया दे ठुमकी!

    ✍? गोपाल बघेल ‘मधु’

    गोपाल बघेल 'मधु'
    गोपाल बघेल 'मधु'
    गोपाल बघेल ‘मधु’ अध्यक्ष अखिल विश्व हिन्दी समिति आध्यात्मिक प्रबंध पीठ मधु प्रकाशन टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा www.GopalBaghelMadhu.com

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