झरने की हर झरती झलकी!

झरने की हर झरती झलकी,
पुलकी ललकी चहकी किलकी;
थिरकी महकी कबहुक छलकी,
क्षणिका की कूक सुनी कुहकी!

कब रुक पायी कब देख सकी,
रुख़ दुख सुख अपना भाँप सकी;
बहती आई दरिया धायी,
बन दृश्य विवश धरिणी भायी!

कब पात्र बनी किसकी करनी,
झकझोर बहाया कौन किया;
कारण था कौन क्रिया किसकी,
सरका चुपके मग कौन दिया!

प्रतिपादन आयोजन किसका,
क्या सूत्रधार स्वर सूक्ष्म दिया;
हर घट बैठा घूँघट झाँका,
चौखट टक टक देखा बाँका!

चैतन्य चकोरी किलकारी,
कैवल्य ललित लय सुर धारी;
क्या बैठा था हर ‘मधु’ पलकी,
क्या वही नचाया दे ठुमकी!

✍🏻 गोपाल बघेल ‘मधु’

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