जेएनयू परिसर में शांति बनाने में अब सामने आएं शिक्षक

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यह क्या हो रहा है, क्या किसी ने सोचा है ? कितना वीभत्स और हृदय विह्वल। एक मुट्ठीभर शरारती तत्वों ने देश के खिलाफ माहौल बनाने में आग में घी डाली और पूरे परिसर के माहौल को अलग रंग और ढंग में ढालने की लगातार कोशिश कर दी गई। कोई कहने लगा कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय तो ऐसे मुद्दों का अड्डा है, कोई ऐसे शरारती तत्वों को समर्थन देने पहुंच गया, किसी ने कुछ तो किसी ने कुछ… क्या जेएनयू के शिक्षक और मेधावी छात्रों को इतना समझ में नहीं आ रहा कि आपके विश्वविद्यालय की गिनती देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित उच्चशिक्षा संस्थानों में होती रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसे मान-सम्मान हासिल होता रहा है। चाहे छात्रसंघ पर किसी भी छात्र संगठन पर यहां कब्जा हो, हम जिस घर (जिस हिन्दुस्तान) में रहते हैं, उस घर की कद्र नहीं कर सकते क्या ? उस घर के सदस्यों का सम्मान और उसकी प्रतिष्ठा का ख्याल नहीं कर सकते क्या ? अगर नहीं सकते तो इतना समझ लीजिए कि आप जिस घर में रहते हैं, अगर उसके नहीं हुए, तो फिर उस घर के आसपास बसे उस समाज और यहां तक कि अपने मित्र के भी क्या होंगे। और यह संदेश उन छात्रों के लिए भी है जिन्हें पहले राष्ट्रवाद की दुहाई और फिर ऐसी वारदातों के लिए बहकाकर जिंदाबाद-मुर्दाबाद के लिए अपने पीछे फौज बढ़ाने के लिए शामिल किया जाता रहा है।

जेएनयू के शिक्षक और मेधावी ये तो सोचें कि प्रगतिशीलता के साथ-साथ खुलेपन, तेज-तर्रार बहस-मुबाहिसों और वैचारिक टकरावों के बीच हर तरह के विचार और असहमति को यहां खुलकर प्रकट होने का मौका मिलता रहा है और इस सबने जेएनयू की एक विशिष्ट छवि बनाई हुई है। लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी (जिसमें असहमत होने का हक निहित है) का यह मतलब नहीं होता कि उसकी कोई मर्यादा ही न हो। जान लें, इसकी मर्यादा समाज तो तय करता ही आया है, हमारे संविधान ने भी इसकी लक्ष्मणरेखा खींची हुई है। आप इतने मेधावी होकर अगर अफजल की फांसी की बरसी आयोजित करने लगें और उसे शहीद बताने लगें तो क्या उस ज्ञान की यही गुरुदक्षिणा है जिस भारतमाता के आंचल में रहकर आप उस ज्ञान का अर्जन करते हैं। याद रखिए हमारे कर्मों का भगतान प्रकृति करती है। जिस धरती पर हम रहते और चरण रखते हैं, उस धरती का सम्मान करना कदापि अनुचित नहीं है। और मुझे ऐसे कांग्रेस नेताओं को नेता कहने में शर्म आती है जो ऐसी मुट्टीभर शरारती तत्वों को समर्थन देने जेएनयू पहुंचते हैं। क्योंकि ऐसे ही नेता ‘नेता’ शब्द को बदनाम करते आए हैं। मेरा सवाल है कि फिर आपमें और हाफिज़ मोहम्मद सईद में अंतर क्या रहा, क्योंकि समर्थन तो वो भी दे रहे हैं और आप भी ! ये अलग बात है कि मीडिया में अपने ऊपर आरोपों का खंडन वो भी करेंगे और आप भी।

दिल्ली पुलिस ने बीते शुक्रवार को जिस छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को देशद्रोह और आपराधिक षड्यंत्र के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। इसके एक दिन बाद सात और छात्रों की गिरफ्तारी हुई, उन्हीं आरोपों में जिनमें कन्हैया कुमार को गिरफ्तार किया गया था। कन्हैया कुमार का कहना है कि वे और उनका संगठन कभी राष्ट्र-विरोधी गतिविधि में शामिल नहीं रहे; उन्हें राजनीतिक कारण से फंसाया जा रहा है। तो फिर सच क्या है, इसकी भी जांच होगी। दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। बारीकी से जांच इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जेएनयू का यह घटनाक्रम तीखे राजनीतिक विवाद का भी विषय हो गया है। जेएनयू की छवि को इन दिनों जैसी क्षति हुई है, शायद ही पहले कभी हुई हो। इसलिए यह विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षक समुदाय और विद्यार्थी जमात, सबके लिए मंथन और चिंतन का समय है कि कैसे इस तरह की अवांछित गतिविधि न होने दी जाए। मैं उन शिक्षकों, छात्रों के साथ कलमकारों (पत्रकारों) से भी अपील करूंगा कि जेएनयू ऐसी गतिविधियों का अड्डा है, जैसी बातें कहकर इसे हवा न दें… क्योंकि हमारी कलम समाज को जोड़ने के लिए उठे.

2 COMMENTS

  1. जिस विश्व विधालय के शिक्षक स्वयं ऐसे छात्रों का पक्ष ले रहे हैं वे क्या माहौल सुधारेंगे? असल में इस बात पर ध्यान पहले दिया जाना चाहिए था , लेकिन पिक्ली सरकारों ने इसे प्रश्रय दिया और अब यह अराजकता की और अग्रसर हो गया , मार्क्सवाद जिसे अब देश ठुकरा चुके हैं , भारत में भी जो अपनी जमीन खो चूका है ,वह इस बहाने फिर वापिस स्थापित होने की जुगत में है

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