लेखक परिचय

श्रीराम तिवारी

श्रीराम तिवारी

लेखक जनवादी साहित्यकार, ट्रेड यूनियन संगठक एवं वामपंथी कार्यकर्ता हैं। पता: १४- डी /एस-४, स्कीम -७८, {अरण्य} विजयनगर, इंदौर, एम. पी.

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श्रीराम तिवारी

अप्रैल के प्रथम सप्ताह में अन्ना और उनके साथियों द्वारा किये गए जन्तर-मंतर पर धरना और तत विषयक जन-लोकपाल विधेयक पर मेने ‘मात्र-जन-लोकपाल विधेयक से भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हो सकता’ शीर्षक से आलेख लिखा था जो प्रवक्ता. कॉम ,हस्तक्षेप.कॉम,जनवादी.ब्लागस्पाट.कॉम पर अभी भी उपलब्ध है.तब से लेकर अब तक विगत दो महीनो में जो कुछ भी भारत में तत विषयक घटनाक्रम घटित हुए उनका परिणाम कुल मिलकर देश के हित में और भ्रष्ट ताकतों के खिलाफ परिलक्षित होता हुआ लगता है.इस सम्बन्ध में यह नितांत जरुरी है कि जो लोग किसी खास व्यक्ति ,खास राजनैतिक दल और किसी खास खेमे से विलग केवल राष्ट्र के हितों को सर्वोपरि मानते हैं उन्हें विना किसी भय-पक्षपात ,निंदा-स्तुति और प्रत्यक्ष व परोक्ष स्वार्थ के वगैर इस वर्तमान दौर के जनांदोलन -जो देश के संगठित मजदूर वर्ग के द्वारा बहुत सालों से उठाया जाता रहा है और अब अन्ना हजारे,बाबा रामदेव तथा कुछ-कुछ सत्तापक्ष-विपक्ष की कतारों में भी उसकी अनुगूंज सुनाई दे रही है -को अपनी मेधा शक्ति से परिष्कृत करना चाहिए.केवल नित नए हीरो गढ़ना या किसी खास व्यक्ति या दल की चापलूसी करना उनका काम है जो देश को दिशा देने का दावा नहीं करते किन्तु जिन्हें लोकतंत्रात्मक गणराज्य ,संविधान,कार्यपालिका,न्याय पालिका,व्यवस्थापिका और राष्ट्र की सांस्कृतिक,धार्मिक ,भाषिक,वेशज और क्षेत्रीय विविधता का ज्ञान है;वे और जिन्हें दुनिया के नक़्शे पर वास्तविक भारत की तस्वीर का भान है वे इस दौर में अपने गाम्भीर्य अन्वेषण से इतिहास के परिप्रेक्ष्य में ‘जन-लोकपाल’या किसी वैयक्तिक धरना-अनशन को सुव्य्विस्थित रूप और आकार प्रदान कराने में अपनी एतिहासिक भूमिका अदा करें.

यह सर्वविदित है कि ‘लोकपाल विधेयक मसौदा संयुक्त समिति’ की अभी तक सम्पन्न नौ अनौपचारिक मीटिंगों के परिणाम स्वरूप सिविल सोसायटी और सरकार के बीच द्वंदात्मकता की स्थिति बनती जा रही है.एक ओर माननीय ‘ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स’ की अनुशंषाओं पर सत्तापक्ष का कहना है कि सिविल सोसायटी और केंद्र सरकार “असहमति के लिए सहमत” हो गई है.दूसरी ओर किसन वापट बाबूराव हजारे {अन्नाजी] के नेत्रत्व में ‘सिविल सोसायटी’के आरोप हैं कि सरकार हमारे तमाम सुंझावों से इतर अपना अलग एक सरकारी मसौदा पेश कर भ्रष्टाचार के खिलाफ गाँधी दर्शन में किसी शासक या अधिनायकवादी निजाम को झुकाने का अंतिम अस्त्र “अनशन”ही है.आप इस अस्त्र का इस्तेमाल रोज-रोज नहीं कर सकते.यदि अन्ना और उनकी टीम मानती है कि उनकी ८०%मांगें मान ली गईं हैं. अर्थात लोकपाल विधेयक के अधिकांश हिस्से के वांछित प्रारूप को सिविल सोसायटी के अनुरूप ड्राफ्टिंग किया जा रहा है तो प्रश्न क्यों नहीं उठेगा कि बार-बार अनशन की धौंस {खास तौर से १६ अगस्त से} क्यों दी जा रही है?क्या यह वैयक्तिक तानाशाही या ब्लेक मैलिंग नहीं है?माना कि अन्ना और उनके साथियों के सौभाग्य से केंद्र में एक निहायत ही अपराधबोध पीड़ित शाशन तंत्र है और सत्तापक्ष में अन्ना जैसों को सहज सम्मान प्राप्त है ,किन्तु जब सरकार ने उनके पहले वाले अनशन को सम्मान दिया ,उनकी बातें मानी और अब तो लोकपाल बिल भी लगभग अवतरित होने को ही है ,तो यदि अब अन्नाजी कहें कि सरकर{पूरे देश की वैधानिक प्रतिनिधि}मेरी सब शर्तों को माने ;वर्ना में अनशन पर बैठ जाऊँगा ,क्या यह देश की जनता का अपमान नहीं?सरकार ने कहा है कि सभी दलों से राय लेकर आपकी असहमतियों पर उचित कार्यवाही करेंगे.मैं {श्रीराम तिवारी} कहता हूँ कि सिर्फ राजनैतिक दलों से ही क्यों?पूरे देश से पूंछा जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री ,चीफ जस्टिस आफ इंडिया और सांसदों को लोकपाल के दायरे में आना चाहिए कि नहीं?मैं नहीं कहता कि ये सब पवित्रतम हैं या पाप पंक से परे हैं ;किन्तु मैं इतना तो जानता हूँ कि देश के वर्तमान संविधान के अनुसार संसद ही सर्वोच्च है.क्या संसद से ऊँचा लोकपाल हो सकता है?संसद देश की जनता चुना करती है अतेव वह देश की जनता के प्रति जबाबदेह है .लोकपाल ,चुनाव कमीशन ,सुप्रीम कोर्ट और लेखा एवं महानियंत्रक समेत जितने भी स्वायत शाशन प्रतिष्ठान हैं वे संसद के प्रति और प्रकारांतर से देश की जनता के प्रति उत्तरदायी है.

भृष्टाचार मिटाने के लिए सबको मिलकर उपाय करना चाहिए ,देश भृष्टाचार में आकंठ डूबा है,हम अपने-अपने तई लड़ भी रहे हैं लेकिन “भारत में भृष्टाचार पाकिस्तान से भी बड़ा खतरा है”कहकर अन्नाजी न केवल भारत की प्रतिष्ठा धूमिल कर रहें हैं बल्कि पाकिस्तान की जनता को भी उकसाने का काम कर रहे हैं.

जब सिविल सोसायटी की ८०%शर्तें और सुझाव मान्य कर लिएगए हैं तो बाकी २०%के लिए देश की जनता को अपना पक्ष रखने का हक़ है या नहीं?अभी तक भारतीय संविधान में यही वर्णित है कि जनता का प्रतिनिधित्व लोक सभा करेगी .क्या अन्नाजी या सिविल सोसायटी लोक सभा से भी बड़े हैं?यदि वर्तमान सरकार कि सदाशयता को जरुरत से ज्यादा परखोगे तो अन्नाजी १६ अगस्त को आप अनशन नहीं कर पायेंगे.सिर्फ सरकार ही क्यों जनता भी आपसे जानना चाहेगी कि आप एक ही मामले में इतनी जल्दी और बार-बार ‘अनशन’नामक गांधीवादी ब्रह्मास्त्र का इस्तमाल क्यों कर रहे हैं?क्या भृष्टाचार सिर्फ २-५ साल में ही बढ़ा है?क्या भारतीय संविधान ने देश को आगे नहीं बढाया?क्या यह भारतीय संविधान की महानता नहीं है कि आप एक मामूली से एन जी ओ संचालक आज इस देश की सम्प्र्भुत्व सरकार को आँखें दिखा रहे हैं ,न केवल आँखें दिखा रहे हैं बल्कि ऐसे शो कर रहे हैं की आप ही एकमात्र गांधीवादी हैं .एक ही मामले को लेकर बार-बार अनशन उसके प्रभाव को भी भोंथरा बना देता है.गाँधी जी ने अकेले अनशन या सत्याग्रह से ब्रिटिश साम्राज्यवाद का मुकबला नहीं किया था.उन्होंने बमुश्किल दो या तीन बार ही इसका प्रयोग किया था .तभी जब सारे वैधानिक और लोकतान्त्रिक रास्ते बंद मिले.सारी दुनिया जानती है कि लाखों मजदूरों-किसानो ने ,मुबई नेवी की हड़ताल ने,युवा क्रांतिकारियों की शहादत ने देश को आजादी दिलाई थी .फिर भी देशकी जनता ने अपने परप्रिय अहिंसावादी ‘अनशन’सिध्धांत को सबसे ज्यादा सम्मान दिया.अन्नाजी गांधीवादी हैं तो इसका मतलब ये तो नहीं कि मनमोहनसिंह जी ब्रिटिश वायसराय है या सोनिया गाँधी कोई महारानी एलिजावेथ हैं जो अधिनायकवादी तौर तरीके से भारत पर काबिज थे.यह देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है क्योकि यहाँ दुनिया का अब तक का श्रेष्ठतम संविधान है यदि उसे बदलने की बात हो रही हो तो देश की जनता से भी पूंछा जाना चाहिए .यदि कपिल सिब्बल ,वीरप्पा मोइली ,सलमान खुर्शीद या प्रणव मुखर्जी यह जानते हैं तो ये तो उनकी काबिलियत में गिना जाना चाहिए और यदि अन्ना या उनके सलाहकार भले ही वे बड़े-बड़े वकील -वैरिस्टर हों यदि वे देश की जनता को इग्नोर करते हैं तो भृष्टाचार का कोई भी बाल बांका नहीं कर सकेगा.

देश जिन्दा है क्योंकि अभी भी अधिकांश लोग ईमानदार हैं.सभी राजनैतिक दलों में यदि बदमाश और भृष्ट भरे पड़े हैं किन्तु मुठ्ठी भर ईमानदार भी हैं जिन्हें अन्ना और रामदेव से ज्यादा फ़िक्र है.किस मंत्री ने इतना कमाया जितना रामदेव.आशाराम,या प्रशांति निलियम वाले चमत्कारी बाबा के गुप्त तहखानो से निकल रहा है?क्या लोकपाल में यह तथ्य शामिल किया गया है कि जितने भी धार्मिक स्थल हैं {सभी धर्मों के }उनकी जांच लोकपाल करेगा.?संपदा के राष्ट्रीयकरण की कोई मांग सिविल सोसायटी ने उठाई है?

क्या जिन लोगों ने सरकारी नोकरियों की तिकड़मों से देश की उपजाऊ जमीन के बड़े -बड़े कृषि फार्मों व्यापारिक प्रतिष्ठानों और शेयर बाज़ार में बेनामी संपदा जमा कर रखी है उन पर कोई अंकुश इस लोकपाल बिल ने तजबीज किया है?

इन सभी तथ्यों को नज़र अंदाज़ क्यों किया जा रहा है?क्या अन्ना और सिविल सोसायटी के स्वनामधन्य साथी-केजरीवाल ,शशिभूषण और जस्टिस संतोष हेगड़े बता पायेगे कि वे जो -जो मांगें सरकार के समक्ष रख रहे हैं उनकी पात्रता इनको है?यदि मान भी लें की अन्ना और सिविल सोसायटी को ये सब मांगें रखने और मनवाने के लिए अनशन का अधिकार है तब प्रश्न ये उठता है कि सरकार और ‘जी ओ एम् ‘को उनकी हर बात -हर मांग मान कर पूरा करने या कराने का अधिकार है?मैं कहता हूँ कि सरकार को इस तरह का कोई जनादेश नहीं दिया गया कि आप संविधान में आमूल चूल परिवर्तन कर डालें.

वेशक मजबूत लोकपाल विधेयक की दरकार इस देश को है.इस दिशा में जिन व्यक्तियों या संस्थाओं ने संघर्ष किये वे स्तुत्य हैं ‘असहमति के लिए सहमत हो जाना ‘भी देश में एक बड़ी उपलब्धी है.लोकपाल विधेयक मसौदा तैयार करने के लिए सिविल सोसायटी,सरकार दोनों ही अलग-अलग या एक साथ ड्राफ्टिंग करने के लिए आज़ाद हैं किन्तु न केवल संसद बल्कि देश की जनता

के अनुमोदन बिना इसको संवैधानिक दर्जा दे पाना नामुमकिन है .सरकार ने अब तक जो भी फैसले लिए हैं उसमें न केवल उसका सहयोग अन्ना जी को मिला है बल्कि भृष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में भी यूपीए सरकार की सदिक्षा प्रतिध्वनित हो रही है संविधान की रक्षा करना भी सरकार का ही दायित्व है और वर्तमान सरकार काफी हद तक इस बाबत सजग है.सर्वदलीय बैठक और उसके उपरान्त संसद के मानसून सत्र में ‘लोकपाल विधेयक’ पेश किये जाने की सरकार की मन्सा

पर संदेह करना उचित नहीं.अनशन की धमकी तो बिलकुल भी उचित नहीं .यह तो प्रकारांतर से अनशन और लोकशाही कि अवमानना है.आशा है अन्नाजी सब्र से काम लेंगे और देश की जनता को भी साथ लेकर चलेंगे.

8 Responses to “ज़न-लोकपाल मसौदे पर जनता की राय भी ली जानी चाहिए..”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    ऐसे श्रीमान तिवारीजी की बुद्धिमता का लोहा माननाही पड़ेगा. उन्होंने अपनी तीव्र बुद्धि का प्रयोग करके मेरे टिप्पणी में उठाये गये प्रश्नों को इतनी आसानी से टाल दिया है की वह आम इंसान से सम्भव ही नहीं था.वह तो किसी मंजे हुए खिलाड़ी द्वारा ही सम्भव है.

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  2. vimlesh

    आदरणीय आर एन सिंह जी सदर अभिवादन एवम बहुत बहुत साधुवाद
    इन्द्रा गघी कब मरी मुझे कुछ पता नही न ही मै कोई पत्रकार लेखक हु बस मन में एक इच्छा है की की इस देश को यहाँ तक पहुचने वालो के खिलाफ यदि कोई माँ का लाल कुछ कर रहा है तो कम से कम उसके पक्ष में कुछ तो योगदान करू .
    मुझे यह स्वीकार करने में कदापि संकोच नही है मै अपने लेख लिख कर नही प्रेषित करता हु बल्कि नकल मर के आम जनमानस तक पहुचने की कोशिस करता हु .
    आप जैसे प्रबुद्ध लोगो की संगती का अहसास करता हु और आप लोगो से जानने सिखने की इच्छा रखता हु.
    ऐसे प्रबुद्ध लोगो से सक्षात करने के लिए श्री संजीव जी को बहुत बहुत धन्यवाद

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  3. आर. सिंह

    आर.सिंह

    “इन्दिरा गाँधी की मौत की वजह बना था उनका अत्यधिक रक्तस्राव, न कि सिर में गोली लगने से, फ़िर सोनिया गाँधी ने उस वक्त खून बहते हुए हालत में इन्दिरा गाँधी को लोहिया अस्पताल ले जाने की जिद की जो कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AAIMS) से बिलकुल विपरीत दिशा में है?’
    मैंने श्री विमलेश जी द्वारा श्री सुब्रमनियम स्वामी की पुस्तक से उद्धृत पृष्ठों मेसे उपरोक्त हिस्सा इसलिए चुना है की वह हिस्सा श्री स्वामी के पुस्तक की प्रमाणिकता पर एक प्रश्न चिह्न लगा देता है.३१ अक्टूबर १९८४ को इंदिरा गांधी की हत्या उन्हीं के सुरक्षा कर्मी द्वारा की गयी थी,जो स्टेन गन से लैस था और बहुत नजदीक से उसने अनगिनत गोलियां उसी स्टेन गन से चलाई थी.इंदिरा गांधी की तत्काल मौत हो गयी थी,बाद की कार्रवाई मात्र औप्चारिक्ता थी,और शायद इसलिए की गयी थी,जिससे उनकी मौत को कुछ देर तक छुपाया जा सके.हो सकता है की यही कारण रहा हो की उनके मृत शरीर को दो अस्पतालों में ले जाया गया हो.ऐसे उस समय का समाचार तो यही था की उनकोअखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ले जाया गया है. . भारतीय समाचारों में वही था ,जो सरकार चाहती थी,पर बीबीसी ने समाचार यही दिया था की इंदिरा गांधी की स्पाट डेथ यानी तत्काल मृत्यु हो गयी थी. ऐसे जहाँ तक मुझे याद है की समाचारों के अनुसार उनके शरीर में दस गोलियां दागी गयी थी,यह सोचने की बात है की सुरक्षा सैनिक जो एक शार्प शूटर था,उसके स्टेन गन से निकली दस गोलियां अगर किसी की तुरत जान नही ले सकती है तो उसकी पोस्टिंग वैसी जगह पर होती ही क्यों?

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  4. श्रीराम तिवारी

    shriramt tiwari

    श्री आर सिंह जी ,और श्री विमलेशजी की टिप्पणियाँ मेरे आलेख पर भारी पड़ रहीं हैं ,प्रवक्ता .कॉम की टीम को और संजीवजी को साधुबाद कि न केवल मेरे आलेख को बल्कि श्री आर सिंह जी ,विमलेश्जी और मोहनलाल यादवजी के निजी विचारों को यथावत प्रकाशित किया.

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  5. MOHAN LAL YADAV

    मैंने अभी हाल ही में नेट suru किया है. ऊपर जो भी लिखा है वो निसंदेह सोते आदमी को जगाने ke लिए पर्याप्त है. आज yeh kahne में कोई संकोच नहीं है की सरकार में कुछ लोग इमानदार हो सकते है. जो इमानदार है वो मजबूर लगते है ya unka ye manana है की उन्हें तो अपना कम करना है बस इसके आगे कुछ नहीं. इस देश का दुर्भग्य ही है की योग्य आदमी की इसने कभी कदर नहीं की. जहाँ तक चुनी हुई सरकार की baat है इस पे देश व्यापी बहस की जरुरत है. ye kisi se chhipa नहीं है की आज चुनाव कैसे जीते जाते है. एन चुनाव के पहले सरकारें अपने प्रिय I A S ,I P.S . की नियुक्ति क्यों करती है. फिलहाल ye sab baaten अपनी जगह ठीक है lekin देश हित sarvopari है. मैं भी यही कहूँगा की सरकार भी इसी फिराक में है की मौका मिला है जो करना है कर ले फिर न जाने कब ऐसा अवसर आवे. eti जय हिंद. मोहन लाल यादव

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  6. vimlesh

    सोनिया गाँधी को आप कितना जानते हैं? (भाग-३) से आगे जारी…

    राजीव से विवाह के बाद सोनिया और उनके इटालियन मित्रों को स्नैम प्रोगैती की ओट्टावियो क्वात्रोची से भारी-भरकम राशियाँ मिलीं, वह भारतीय कानूनों से बेखौफ़ होकर दलाली में रुपये कूटने लगा। कुछ ही वर्षों में माइनो परिवार जो गरीबी के भंवर में फ़ँसा था अचानक करोड़पति हो गया । लोकसभा के नयेनवेले सदस्य के रूप में मैंने 19 नवम्बर 1974 को संसद में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी से पूछा था कि “क्या आपकी बहू सोनिया गाँधी, जो कि अपने-आप को एक इंश्योरेंस एजेंट बताती हैं
    (वे खुद को ओरियंटल फ़ायर एंड इंश्योरेंस कम्पनी की एजेंट बताती थीं), प्रधानमंत्री आवास का पता उपयोग कर रही हैं?” जबकि यह अपराध है क्योंकि वे एक इटालियन नागरिक हैं (और यह विदेशी मुद्रा उल्लंघन) का मामला भी बनता है”, तब संसद में बहुत शोरगुल मचा, श्रीमती इन्दिरा गाँधी गुस्सा तो बहुत हुईं, लेकिन उनके सामने और कोई विकल्प नहीं था, इसलिये उन्होंने लिखित में यह बयान दिया कि “यह गलती से हो गया था और सोनिया ने इंश्योरेंस कम्पनी से इस्तीफ़ा दे दिया है” (मेरे प्रश्न पूछने के बाद), लेकिन सोनिया का भारतीय कानूनों को लतियाने और तोड़ने का यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ।
    1977 में जनता पार्टी सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय के जस्टिस ए.सी.गुप्ता के नेतृत्व में गठित आयोग ने जो रिपोर्ट सौंपी थी, उसके अनुसार “मारुति” कम्पनी (जो उस वक्त गाँधी परिवार की मिल्कियत था) ने “फ़ेरा कानूनों, कम्पनी कानूनों और विदेशी पंजीकरण कानून के कई गंभीर उल्लंघन किये”, लेकिन ना तो संजय गाँधी और ना ही सोनिया गाँधी के खिलाफ़ कभी भी कोई केस दर्ज हुआ, ना मुकदमा चला। हालांकि यह अभी भी किया जा सकता है, क्योंकि भारतीय कानूनों के मुताबिक “आर्थिक घपलों” पर कार्रवाई हेतु कोई समय-सीमा तय नहीं है।

    जनवरी 1980 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी पुनः सत्तासीन हुईं। सोनिया ने सबसे पहला काम यह किया कि उन्होंने अपना नाम “वोटर लिस्ट” में दर्ज करवाया, यह साफ़-साफ़ कानून का मखौल उड़ाने जैसा था और उनका वीसा रद्द किया जाना चाहिये था (क्योंकि उस वक्त भी वे इटली की नागरिक थीं)। प्रेस द्वारा हल्ला मचाने के बाद दिल्ली के चुनाव अधिकारी ने 1982 में उनका नाम मतदाता सूची से हटाया। लेकिन फ़िर जनवरी 1983 में उन्होंने अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वा लिया, जबकि उस समय भी वे विदेशी ही थीं (आधिकारिक रूप से उन्होंने भारतीय नागरिकता के लिये अप्रैल 1983 में आवेद दिया था)। हाल ही में ख्यात कानूनविद,ए.जी.नूरानी ने अपनी पुस्तक “सिटीजन्स राईट्स, जजेस एंड अकाऊण्टेबिलिटी रेकॉर्ड्स” (पृष्ठ 318) पर यह दर्ज किया है कि “सोनिया गाँधी ने जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल के कुछ खास कागजात एक विदेशी को दिखाये, जो कागजात उनके पास नहीं होने चाहिये थे और उन्हें अपने पास रखने का सोनिया को कोई अधिकार नहीं था।“ इससे साफ़ जाहिर होता है उनके मन में भारतीय कानूनों के प्रति कितना सम्मान है और वे अभी भी राजतंत्र की मानसिकता से ग्रस्त हैं। सार यह कि सोनिया गाँधी के मन में भारतीय कानून के सम्बन्ध में कोई इज्जत नहीं है, वे एक महारानी की तरह व्यवहार करती हैं। यदि भविष्य में उनके खिलाफ़ कोई मुकदमा चलता है और जेल जाने की नौबत आ जाती है तो वे इटली भी भाग सकती हैं। पेरू के राष्ट्रपति फ़ूजीमोरी जीवन भर यह जपते रहे कि वे जन्म से ही पेरूवासी हैं, लेकिन जब भ्रष्टाचार के मुकदमे में उन्हें दोषी पाया गया तो वे अपने गृह देश जापान भाग गये और वहाँ की नागरिकता ले ली।

    भारत से घृणा करने वाले मुहम्मद गोरी, नादिर शाह और अंग्रेज रॉबर्ट क्लाइव ने भारत की धन-सम्पदा को जमकर लूटा, लेकिन सोनिया तो “भारतीय” हैं, फ़िर जब राजीव और इन्दिरा प्रधानमंत्री थे, तब बक्से के बक्से भरकर रोज-ब-रोज प्रधानमंत्री निवास से सुरक्षा गार्ड चेन्नई के हवाई अड्डे पर इटली जाने वाले हवाई जहाजों में क्या ले जाते थे? एक तो हमेशा उन बक्सों को रोम के लिये बुक किया जाता था, एयर इंडिया और अलिटालिया एयरलाईन्स को ही जिम्मा सौंपा जाता था और दूसरी बात यह कि कस्टम्स पर उन बक्सों की कोई जाँच नहीं होती थी। अर्जुन सिंह जो कि मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं और संस्कृति मंत्री भी, इस मामले में विशेष रुचि लेते थे। कुछ भारतीय कलाकृतियाँ, पुरातन वस्तुयें, पिछवाई पेंटिंग्स, शहतूश शॉलें, सिक्के आदि इटली की दो दुकानों, (जिनकी मालिक सोनिया की बहन अनुस्का हैं) में आम तौर पर देखी जाती हैं। ये दुकानें इटली के आलीशान इलाकों रिवोल्टा (दुकान का नाम – एटनिका) और ओर्बेस्सानो (दुकान का नाम – गनपति) में स्थित हैं जहाँ इनका धंधा नहीं के बराबर चलता है, लेकिन दरअसल यह एक “आड़” है, इन दुकानों के नाम पर फ़र्जी बिल तैयार करवाये जाते हैं फ़िर वे बेशकीमती वस्तुयें लन्दन ले जाकर “सौथरबी और क्रिस्टीज” द्वारा नीलामी में चढ़ा दी जाती हैं, इन सबका क्या मतलब निकलता है? यह पैसा आखिर जाता कहाँ है?

    एक बात तो तय है कि राहुल गाँधी की हार्वर्ड की एक वर्ष की फ़ीस और अन्य खर्चों के लिये भुगतान एक बार केमैन द्वीप की किसी बैंक के खाते से हुआ था।

    इस सबकी शिकायत जब मैंने वाजपेयी सरकार में की तो उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया, इस पर मैंने दिल्ली हाइकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट की बेंच ने सरकार को नोटिस जारी किया, लेकिन तब तक सरकार गिर गई, फ़िर कोर्ट नें सीबीआई को निर्देश दिये कि वह इंटरपोल की मदद से इन बहुमूल्य वस्तुओं के सम्बन्ध में इटली सरकार से सहायता ले। इटालियन सरकार ने प्रक्रिया के तहत भारत सरकार से अधिकार-पत्र माँगा जिसके आधार पर इटली पुलिस एफ़आईआर दर्ज करे। अन्ततः इंटरपोल ने दो बड़ी रिपोर्टें कोर्ट और सीबीआई को सौंपी और न्यायाधीश ने मुझे उसकी एक प्रति देने को कहा, लेकिन आज तक सीबीआई ने मुझे वह नहीं दी, और यह सवाल अगली सुनवाई के दौरान फ़िर से पूछा जायेगा। सीबीआई का झूठ एक बार और तब पकड़ा गया, जब उसने कहा कि “अलेस्सान्द्रा माइनो” किसी पुरुष का नाम है, और “विया बेल्लिनी, 14, ओरबेस्सानो”, किसी गाँव का नाम है, ना कि “माईनो” परिवार का पता। बाद में सीबीआई के वकील ने कोर्ट से माफ़ी माँगी और कहा कि यह गलती से हो गया, उस वकील का “प्रमोशन” बाद में “ऎडिशनल सॉलिसिटर जनरल” के रूप में हो गया, ऐसा क्यों हुआ, इसका खुलासा तो वाजपेयी-सोनिया की आपसी “समझबूझ” और “गठजोड़” ही बता सकता है।

    इन दिनों सोनिया गाँधी अपने पति हत्यारों के समर्थकों MDMK, PMK और DMK से सत्ता के लिये मधुर सम्बन्ध बनाये हुए हैं, कोई भारतीय विधवा कभी ऐसा नहीं कर सकती। उनका पूर्व आचरण भी ऐसे मामलों में संदिग्ध रहा है, जैसे कि – जब संजय गाँधी का हवाई जहाज नाक के बल गिरा तो उसमें विस्फ़ोट नहीं हुआ, क्योंकि पाया गया कि उसमें ईंधन नहीं था, जबकि फ़्लाईट रजिस्टर के अनुसार निकलते वक्त टैंक फ़ुल किया गया था, जैसे माधवराव सिंधिया की विमान दुर्घटना के ऐन पहले मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित को उनके साथ जाने से मना कर दिया गया। इन्दिरा गाँधी की मौत की वजह बना था उनका अत्यधिक रक्तस्राव, न कि सिर में गोली लगने से, फ़िर सोनिया गाँधी ने उस वक्त खून बहते हुए हालत में इन्दिरा गाँधी को लोहिया अस्पताल ले जाने की जिद की जो कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AAIMS) से बिलकुल विपरीत दिशा में है? और जबकि “ऐम्स” में तमाम सुविधायें भी उपलब्ध हैं, फ़िर लोहिया अस्पताल पहुँच कर वापस सभी लोग AAIMS पहुँचे, और इस बीच लगभग पच्चीस कीमती मिनट बरबाद हो गये? ऐसा क्यों हुआ, क्या आज तक किसी ने इसकी जाँच की? सोनिया गाँधी के विकल्प बन सकने वाले लगभग सभी युवा नेता जैसे राजेश पायलट, माधवराव सिन्धिया, जितेन्द्र प्रसाद विभिन्न हादसों में ही क्यों मारे गये? अब सोनिया की सत्ता निर्बाध रूप से चल रही है, लेकिन ऐसे कई अनसुलझे और रहस्यमयी प्रश्न चारों ओर मौजूद हैं, उनका कोई जवाब नहीं है, और कोई पूछने वाला भी नहीं है, यही इटली की स्टाइल है।

    [आशा है कि मेरे कई “मित्रों” (?) को कई जवाब मिल गये होंगे, जो मैंने पिछली दोनो पोस्टों में जानबूझकर नहीं उठाये थे, यह भी आभास हुआ होगा कि कांग्रेस सांसद “सुब्बा” कैसे भारतीय नागरिक ना होते हुए भी सांसद बन गया (क्योंकि उसकी महारानी खुद कानून का सम्मान नहीं करती), क्यों बार-बार क्वात्रोच्ची सीबीआई के फ़ौलादी (!) हाथों से फ़िसल जाता है, क्यों कांग्रेस और भाजपा एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं? क्यों हमारी सीबीआई इतनी लुंज-पुंज है? आदि-आदि… मेरा सिर्फ़ यही आग्रह है कि किसी को भी तड़ से “सांप्रदायिक या फ़ासिस्ट” घोषित करने से पहले जरा ठंडे दिमाग से सोच लें, तथ्यों पर गौर करें, कई बार हमें जो दिखाई देता है सत्य उससे कहीं अधिक भयानक होता है, और सत्ता के शीर्ष शिखरों पर तो इतनी सड़ांध और षडयंत्र हैं कि हम जैसे आम आदमी कल्पना भी नहीं कर सकते, बल्कि यह कहना गैरवाजिब नहीं होगा कि सत्ता और धन की चोटी पर बैठे व्यक्ति के नीचे न जाने कितनी आहें होती हैं, कितने नरमुंड होते हैं, कितनी चालबाजियाँ होती हैं…. राजनीति शायद इसी का नाम है..

    सभार द्वारा श्री सुब्रमनियम स्वामी की की लिखी पुस्तक से

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  7. आर. सिंह

    आर.सिंह

    “यदि अन्ना और उनकी टीम मानती है कि उनकी ८०%मांगें मान ली गईं हैं. अर्थात लोकपाल विधेयक के अधिकांश हिस्से के वांछित प्रारूप को सिविल सोसायटी के अनुरूप ड्राफ्टिंग किया जा रहा है”
    चलिए मान लिया की यह वक्तव्य सही है,पर इससे बात बनेगी नहीं,क्योंकि आपने शायद सरकारी मसौदा देखा नहीं ,उसमे अगर २०% , अलग है तो वह ८०% पर भी भारी पड़ रहाहै क्योंकि उससे लोकपाल की स्वायतता ख़त्म हो रही है और बहुत से अन्य प्रश्न भी उठ खड़े हो रहेहैं.पता नहीं, पर आप तो शायद मजदूर संगठन से भी जुड़े हुए हैं.मजदूर संगठन के साथ बहुधा ऐसा होता है की प्रबन्धक और मजदूर संगठनों की मिलीभगत से मांगों की एक बहुत बड़ी सूची बना ली जातीहै,फिर शुरू हो जाता है हड़ताल की धमकी या फिर हड़ताल भी और फिर वही ८०% वाली सहमती पर बात खत्म हो जाती है .बाद में विश्लेष्ण करने पर पता चलता है की प्रबन्धक दल ने कुछ भी नहींमाना .इस केस में भी वही बात दुहराई जा रही है और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधि चाहते तो वाहवाही भी लूट सकते थे,पर वे चूंकि ऐसे संगठन से सम्बन्ध नहीं रखते जिनको अपनी रोजी रोटी भी उसी से चलानी है और साथ साथ अपने अपनी स्वार्थ का भी ध्यान रखना पड़ता है.यहाँ तो ऐसे लोग हैं जिनको शायद इन सब बातों का ध्यान भी नहीं.है और न इनको लागू या न लागू करने से उनके व्यक्तिगत जीवन पर कोई प्रभाव पड़ने वाला है.
    इसका एक अन्य पहलू भी है.सरकार यह क्यों समझती है की जो चीज जनता के लिए ठीक है वह सरकार के लिए खराब है.जन लोकपाल बिल शासन की बाबत तो कुछ नहीं कहता,यह तो केवल शासन या अन्य जगहों से भ्रष्टाचार हटाने की बात करता है.अगर सरकारी तन्त्र सचमुच इमानदार हैं जिसका दावा वे करते हैं तो इस भ्रष्टाचार नियन्त्रण क़ानून और उसके अंतर्गत अन्य विधाओं से भय क्यों? इसके साथ एक अन्य बात भी जुड़ी हुई है .सरकार, जनता द्वारा दिखाए गये या जनता द्वारा सुझाए गयेहर मार्ग को मांग की श्रेणी में क्यों रखती है वह ऐसा क्यों समझती है की सरकार दाता है और जनता या उसके प्रतिनिधि भिखारी हैं..प्रजातंत्र में किसी भी व्यक्ति या व्यक्ति समूह को यह अधिकार है की वह शासक वर्ग को जो जनता के ही चुनी हुए प्रतिनिधि हैं समय समय पर उनकी गलतियाँ दिखाती रहें और शासक वर्ग का भी कर्तव्य हो जाता है की वह इन सुझाओं पर ध्यान दें और अगर वे सुझाव जनता की हित में है तो उस पर अमल करे. .दूसरी बात जो आपने उठाई है वह है जनता की राय,तो इसमें दो मत नहीं है की जनता की राय जानना और उनको विश्वास में लेना भी आवश्यक है,पर मजबूरी यही है की आम जनता की कौन कहे, बहुत से पढ़े लिखों का भी यह हाल है की या तो जन लोक पाल बिल सम्बन्धित यह पूरा आन्दोलन उनके समझ में नहीं आ रहाहै या वे खुद इस भ्रष्ट व्यापार के हिस्सेदार हैं.इन दोनों से जो अलग हैं वे तो साथ दे ही रहें हैं,पर उनकी संख्या नगण्य साबित हो रही है.
    इसी बाबत मैंने अपने एक लेख में लिखा था,
    “यह तो हुआ जन लोकपाल बिल और फिर उसको लागू करने के लिये सत्याग्रह. पर उसके बाद जो हुआ या हो रहा है,वह हमारे असली चरित्र को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है.हम वास्तव में क्या हैं,यह जग जाहिर हो जाता है, सत्याग्रह के बाद के आरोपों प्रत्यारोपों में.इन सब में सच पूछिये तो हमारा राष्ट्रीय चरित्र सामने आा जाता है.यहाँ जो सबसे बडी बात उभर कर सामने आयी है,वह दर्शाती है कि हम अपनी नीचता का बखान करने में भी अपनी बहादुरी ही समझते हैं. मैं बेईमान हूँ तो अन्ना जी या उनके आस पास के लोग भी इमानदार नहीं हैं.मैं तो बेईमान हूं हीं,पर मैं यह प्रामाणित कर सकता हूँ कि आपभी बेईमान हैं. जन लोक पाल बिल का मसौदा किसी खास व्यक्ति के लिये कुछ नहीं कहता और न उस मसौदे को तैयार करने वाले उससे कुछ लाभ उठाने की स्थिति में हैं. क्या वे कमीटी में शामिल हो जायेंगे तो उनको कोई विशेषाधिकार प्राप्त हो जायेगा, जिसका जायज या नाजायज लाभ वे उस समय या बाद में उठा सकें? तो फिर उनको नीचा दिखाने के लिये इतना हो हल्ला क्यों?जन लोकपाल बिल के मार्ग में इतनी अडचने डालने का क्या अर्थ?क्यों हम एक से एक बढकर इस बात पर कम कि जन लोकपाल बिल से लाभ होगा कि नहीं,पर इस बात पर अधिक जोर दे रहे हैं कि जनलोकपाल बिल तैयार करने का उनलोगों को कोई अधिकार ही नहीं,जो इस काम के लिये मनोनीत किये गये हैं.होना तो यह चIहिये था कि जन लोकपाल बिल के मसौदे के एक एक पहलु पर बिस्त्ऋत बहस होता.लोग अपने अपने ढंग से इस पर विचार प्रकट करते .मसौदा सबके सामने है और मेरे विचार से अभी उसमें खामियाँ भी हैं,जो हो सकता है कि कमिटी द़वारा दूर भी कर दी जाये,पर हम भी उस पर अपना विचार तो दे हीं सकते हैं और तब इसमे हमारी सकारात्मक भूमिका होती.जो लोग इसको और प्रभावशाली बनाने की दिशा में निर्देश दे सकतेहैं,उनको सामने आना चाहिये था. पर मेरे विचारानुसार लोग साधारण रूप से दो खेमों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं या यों कहिये कि साधारणतः दो खेमों में बँटे हुए हैं. एक खेमा तो यह प्रमाणित करने में लगा हुआ है कि जो लोग जन लोकपाल बिल तैयार करने वाली कमिटी में हैं,वे हमलोगों से कम बेईमान नहीं हैं.कुछ लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि बईमानी में मेरा और उनका करीब करीब बराबर का साझा है. दूसरा खेमा इस बात पर जोर दे रहा है कि जन लोकपाल बिल लोकपाल को सर्व शक्तिमान बना देगा.बाहर से तो दोनो खेमे अलग अलग दिखाई दे रहे हैं,पर तह में जाईयेगा तो पता चलेगा कि दोनो खेमों का उद़देश्य एक है और वह है,जन लोकपाल बिल को किसी तरह रोकना,पर ऐसा क्यो?”
    यह क्यों हीह्मारे पूरी मानसिकता का केंद्र बिंदु है.(पूरा लेख प्रवक्ता के १ मई के अंक में उपलब्ध है.)

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  8. vimlesh

    तिवारी जी सदर अभिवादन उपरोक्त लेख के लिए बधाई .
    पूर्व में की गयी टिप्पड़ी के लिए क्षमा

    मै पूर्णतया असान्वित हु नीचे लिखे लेख पर आपकी शसक्त लेखनी निश्चय ही जन मानस को उचित अनुचित का बोध कराएगी आज भारत वर्स को आप जैसे लोगो की जरुरत है .
    सादर समर्पित …..

    नकली नोट रिजर्व बैंक और सरकार

    देश के रिज़र्व बैंक के वाल्ट पर सीबीआई ने छापा डाला. उसे वहां पांच सौ और हज़ार रुपये के नक़ली नोट मिले. वरिष्ठ अधिकारियों से सीबीआई ने पूछताछ भी की. दरअसल सीबीआई ने नेपाल-भारत सीमा के साठ से सत्तर विभिन्न बैंकों की शाखाओं पर छापा डाला था, जहां से नक़ली नोटों का कारोबार चल रहा था. इन बैंकों के अधिकारियों ने सीबीआई से कहा कि उन्हें ये नक़ली नोट भारत के रिजर्व बैंक से मिल रहे हैं. इस पूरी घटना को भारत सरकार ने देश से और देश की संसद से छुपा लिया. या शायद सीबीआई ने भारत सरकार को इस घटना के बारे में कुछ बताया ही नहीं. देश अंधेरे में और देश को तबाह करने वाले रोशनी में हैं. आइए, आपको

    आज़ाद भारत के सबसे बड़े आपराधिक षड्‌यंत्र के बारे में बताते हैं, जिसे हमने पांच महीने की तलाश के बाद आपके सामने रखने का फ़ैसला किया है. कहानी है रिज़र्व बैंक के माध्यम से देश के अपराधियों द्वारा नक़ली नोटों का कारोबार करने की.
    नक़ली नोटों के कारोबार ने देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह अपने जाल में जकड़ लिया है. आम जनता के हाथों में नक़ली नोट हैं, पर उसे ख़बर तक नहीं है. बैंक में नक़ली नोट मिल रहे हैं, एटीएम नक़ली नोट उगल रहे हैं. असली-नक़ली नोट पहचानने वाली मशीन नक़ली नोट को असली बता रही है. इस देश में क्या हो रहा है, यह समझ के बाहर है. चौथी दुनिया की तहक़ीक़ात से यह पता चला है कि जो कंपनी भारत के लिए करेंसी छापती रही, वही 500 और 1000 के नक़ली नोट भी छाप रही है. हमारी तहक़ीक़ात से यह अंदेशा होता है कि देश की सरकार और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया जाने-अनजाने में नोट छापने वाली विदेशी कंपनी के पार्टनर बन चुके हैं. अब सवाल यही है कि इस ख़तरनाक साज़िश पर देश की सरकार और एजेंसियां क्यों चुप हैं?

    एक जानकारी जो पूरे देश से छुपा ली गई, अगस्त 2010 में सीबीआई की टीम ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के वाल्ट में छापा मारा. सीबीआई के अधिकारियों का दिमाग़ उस समय सन्न रह गया, जब उन्हें पता चला कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के ख़ज़ाने में नक़ली नोट हैं. रिज़र्व बैंक से मिले नक़ली नोट वही नोट थे, जिसे पाकिस्तान की खु़फिया एजेंसी नेपाल के रास्ते भारत भेज रही है. सवाल यह है कि भारत के रिजर्व बैंक में नक़ली नोट कहां से आए? क्या आईएसआई की पहुंच रिज़र्व बैंक की तिजोरी तक है या फिर कोई बहुत ही भयंकर साज़िश है, जो हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था को खोखला कर चुकी है. सीबीआई इस सनसनीखेज मामले की तहक़ीक़ात कर रही है. छह बैंक कर्मचारियों से सीबीआई ने पूछताछ भी की है. इतने महीने बीत जाने के बावजूद किसी को यह पता नहीं है कि जांच में क्या निकला? सीबीआई और वित्त मंत्रालय को देश को बताना चाहिए कि बैंक अधिकारियों ने जांच के दौरान क्या कहा? नक़ली नोटों के इस ख़तरनाक खेल पर सरकार, संसद और जांच एजेंसियां क्यों चुप है तथा संसद अंधेरे में क्यों है?

    अब सवाल यह है कि सीबीआई को मुंबई के रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया में छापा मारने की ज़रूरत क्यों पड़ी? रिजर्व बैंक से पहले नेपाल बॉर्डर से सटे बिहार और उत्तर प्रदेश के क़रीब 70-80 बैंकों में छापा पड़ा. इन बैंकों में इसलिए छापा पड़ा, क्योंकि जांच एजेंसियों को ख़बर मिली है कि पाकिस्तान की खु़फ़िया एजेंसी आईएसआई नेपाल के रास्ते भारत में नक़ली नोट भेज रही है. बॉर्डर के इलाक़े के बैंकों में नक़ली नोटों का लेन-देन हो रहा है. आईएसआई के रैकेट के ज़रिए 500 रुपये के नोट 250 रुपये में बेचे जा रहे हैं. छापे के दौरान इन बैंकों में असली नोट भी मिले और नक़ली नोट भी. जांच एजेंसियों को लगा कि नक़ली नोट नेपाल के ज़रिए बैंक तक पहुंचे हैं, लेकिन जब पूछताछ हुई तो सीबीआई के होश उड़ गए. कुछ बैंक अधिकारियों की पकड़-धकड़ हुई. ये बैंक अधिकारी रोने लगे, अपने बच्चों की कसमें खाने लगे. उन लोगों ने बताया कि उन्हें नक़ली नोटों के बारे में कोई जानकारी नहीं, क्योंकि ये नोट रिजर्व बैंक से आए हैं. यह किसी एक बैंक की कहानी होती तो इसे नकारा भी जा सकता था, लेकिन हर जगह यही पैटर्न मिला. यहां से मिली जानकारी के बाद ही सीबीआई ने फ़ैसला लिया कि अगर नक़ली नोट रिजर्व बैंक से आ रहे हैं तो वहीं जाकर देखा जाए कि मामला क्या है. सीबीआई ऱिजर्व बैंक ऑफ इंडिया पहुंची, यहां उसे नक़ली नोट मिले. हैरानी की बात यह है कि रिज़र्व बैंक में मिले नक़ली नोट वही नोट थे, जिन्हें आईएसआई नेपाल के ज़रिए भारत भेजती है.

    रिज़र्व बैंक आफ इंडिया में नक़ली नोट कहां से आए, इस गुत्थी को समझने के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश में नक़ली नोटों के मामले को समझना ज़रूरी है. दरअसल हुआ यह कि आईएसआई की गतिविधियों की वजह से यहां आएदिन नक़ली नोट पकड़े जाते हैं. मामला अदालत पहुंचता है. बहुत सारे केसों में वकीलों ने अनजाने में जज के सामने यह दलील दी कि पहले यह तो तय हो जाए कि ये नोट नक़ली हैं. इन वकीलों को शायद जाली नोट के कारोबार के बारे में कोई अंदाज़ा नहीं था, स़िर्फ कोर्ट से व़क्त लेने के लिए उन्होंने यह दलील दी थी. कोर्ट ने जब्त हुए नोटों को जांच के लिए सरकारी लैब भेज दिया, ताकि यह तय हो सके कि ज़ब्त किए गए नोट नक़ली हैं. रिपोर्ट आती है कि नोट असली हैं. मतलब यह कि असली और नक़ली नोटों के कागज, इंक, छपाई और सुरक्षा चिन्ह सब एक जैसे हैं. जांच एजेंसियों के होश उड़ गए कि अगर ये नोट असली हैं तो फिर 500 का नोट 250 में क्यों बिक रहा है. उन्हें तसल्ली नहीं हुई. फिर इन्हीं नोटों को टोक्यो और हांगकांग की लैब में भेजा गया. वहां से भी रिपोर्ट आई कि ये नोट असली हैं. फिर इन्हें अमेरिका भेजा गया. नक़ली नोट कितने असली हैं, इसका पता तब चला, जब अमेरिका की एक लैब ने यह कहा कि ये नोट नक़ली हैं. लैब ने यह भी कहा कि दोनों में इतनी समानताएं हैं कि जिन्हें पकड़ना मुश्किल है और जो विषमताएं हैं, वे भी जानबूझ कर डाली गई हैं और नोट बनाने वाली कोई बेहतरीन कंपनी ही ऐसे नोट बना सकती है. अमेरिका की लैब ने जांच एजेंसियों को पूरा प्रूव दे दिया और तरीक़ा बताया कि कैसे नक़ली नोटों को पहचाना जा सकता है. इस लैब ने बताया कि इन नक़ली नोटों में एक छोटी सी जगह है, जहां छेड़छाड़ हुई है. इसके बाद ही नेपाल बॉर्डर से सटे बैंकों में छापेमारी का सिलसिला शुरू हुआ. नक़ली नोटों की पहचान हो गई, लेकिन एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया कि नेपाल से आने वाले 500 एवं 1000 के नोट और रिज़र्व बैंक में मिलने वाले नक़ली नोट एक ही तरह के कैसे हैं. जिस नक़ली नोट को आईएसआई भेज रही है, वही नोट रिजर्व बैंक में कैसे आया. दोनों जगह पकड़े गए नक़ली नोटों के काग़ज़, इंक और छपाई एक जैसी क्यों है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि भारत के 500 और 1000 के जो नोट हैं, उनकी क्वालिटी ऐसी है, जिसे आसानी से नहीं बनाया जा सकता है और पाकिस्तान के पास वह टेक्नोलॉजी है ही नहीं. इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि जहां से ये नक़ली नोट आईएसआई को मिल रहे हैं, वहीं से रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया को भी सप्लाई हो रहे हैं. अब दो ही बातें हो सकती हैं. यह जांच एजेंसियों को तय करना है कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारियों की मिलीभगत से नक़ली नोट आया या फिर हमारी अर्थव्यवस्था ही अंतरराष्ट्रीय मा़फ़िया गैंग की साज़िश का शिकार हो गई है. अब सवाल उठता है कि ये नक़ली नोट छापता कौन है.

    हमारी तहक़ीक़ात डे ला रू नाम की कंपनी तक पहुंच गई. जो जानकारी हासिल हुई, उससे यह साबित होता है कि नक़ली नोटों के कारोबार की जड़ में यही कंपनी है. डे ला रू कंपनी का सबसे बड़ा करार रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ था, जिसे यह स्पेशल वॉटरमार्क वाला बैंक नोट पेपर सप्लाई करती रही है. पिछले कुछ समय से इस कंपनी में भूचाल आया हुआ है. जब रिजर्व बैंक में छापा पड़ा तो डे ला रू के शेयर लुढ़क गए. यूरोप में ख़राब करेंसी नोटों की सप्लाई का मामला छा गया. इस कंपनी ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को कुछ ऐसे नोट दे दिए, जो असली नहीं थे. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की टीम इंग्लैंड गई, उसने डे ला रू कंपनी के अधिकारियों से बातचीत की. नतीजा यह हुआ कि कंपनी ने हम्प्शायर की अपनी यूनिट में उत्पादन और आगे की शिपमेंट बंद कर दी. डे ला रू कंपनी के अधिकारियों ने भरोसा दिलाने की बहुत कोशिश की, लेकिन रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने यह कहा कि कंपनी से जुड़ी कई गंभीर चिंताएं हैं. अंग्रेजी में कहें तो सीरियस कंसर्नस. टीम वापस भारत आ गई.

    डे ला रू कंपनी की 25 फीसदी कमाई भारत से होती है. इस ख़बर के आते ही डे ला रू कंपनी के शेयर धराशायी हो गए. यूरोप में हंगामा मच गया, लेकिन हिंदुस्तान में न वित्त मंत्री ने कुछ कहा, न ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कोई बयान दिया. रिज़र्व बैंक के प्रतिनिधियों ने जो चिंताएं बताईं, वे चिंताएं कैसी हैं. इन चिंताओं की गंभीरता कितनी है. रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ डील बचाने के लिए कंपनी ने माना कि भारत के रिज़र्व बैंक को दिए जा रहे करेंसी पेपर के उत्पादन में जो ग़लतियां हुईं, वे गंभीर हैं. बाद में कंपनी के चीफ एक्जीक्यूटिव जेम्स हसी को 13 अगस्त, 2010 को इस्ती़फा देना पड़ा. ये ग़लतियां क्या हैं, सरकार चुप क्यों है, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया क्यों ख़ामोश है. मज़ेदार बात यह है कि कंपनी के अंदर इस बात को लेकर जांच चल रही थी और एक हमारी संसद है, जिसे कुछ पता नहीं है.

    5 जनवरी, 2011 को यह ख़बर आई कि भारत सरकार ने डे ला रू के साथ अपने संबंध ख़त्म कर लिए. पता यह चला कि 16,000 टन करेंसी पेपर के लिए रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने डे ला रू की चार प्रतियोगी कंपनियों को ठेका दे दिया. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने डे ला रू को इस टेंडर में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित भी नहीं किया. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और भारत सरकार ने इतना बड़ा फै़सला क्यों लिया. इस फै़सले के पीछे तर्क क्या है. सरकार ने संसद को भरोसे में क्यों नहीं लिया. 28 जनवरी को डे ला रू कंपनी के टिम कोबोल्ड ने यह भी कहा कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ उनकी बातचीत चल रही है, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि डे ला रू का अब आगे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ कोई समझौता होगा या नहीं. इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी डे ला रू से कौन बात कर रहा है और क्यों बात कर रहा है. मज़ेदार बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ख़ामोश रहा.

    इस तहक़ीक़ात के दौरान एक सनसनीखेज सच सामने आया. डे ला रू कैश सिस्टम इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को 2005 में सरकार ने दफ्तर खोलने की अनुमति दी. यह कंपनी करेंसी पेपर के अलावा पासपोर्ट, हाई सिक्योरिटी पेपर, सिक्योरिटी प्रिंट, होलोग्राम और कैश प्रोसेसिंग सोल्यूशन में डील करती है. यह भारत में असली और नक़ली नोटों की पहचान करने वाली मशीन भी बेचती है. मतलब यह है कि यही कंपनी नक़ली नोट भारत भेजती है और यही कंपनी नक़ली नोटों की जांच करने वाली मशीन भी लगाती है. शायद यही वजह है कि देश में नक़ली नोट भी मशीन में असली नज़र आते हैं. इस मशीन के सॉफ्टवेयर की अभी तक जांच नहीं की गई है, किसके इशारे पर और क्यों? जांच एजेंसियों को अविलंब ऐसी मशीनों को जब्त करना चाहिए, जो नक़ली नोटों को असली बताती हैं. सरकार को इस बात की जांच करनी चाहिए कि डे ला रू कंपनी के रिश्ते किन-किन आर्थिक संस्थानों से हैं. नोटों की जांच करने वाली मशीन की सप्लाई कहां-कहां हुई है.

    हमारी जांच टीम को एक सूत्र ने बताया कि डे ला रू कंपनी का मालिक इटालियन मा़िफया के साथ मिलकर भारत के नक़ली नोटों का रैकेट चला रहा है. पाकिस्तान में आईएसआई या आतंकवादियों के पास जो नक़ली नोट आते हैं, वे सीधे यूरोप से आते हैं. भारत सरकार, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया और देश की जांच एजेंसियां अब तक नक़ली नोटों पर नकेल इसलिए नहीं कस पाई हैं, क्योंकि जांच एजेंसियां अब तक इस मामले में पाकिस्तान, हांगकांग, नेपाल और मलेशिया से आगे नहीं देख पा रही हैं. जो कुछ यूरोप में हो रहा है, उस पर हिंदुस्तान की सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया चुप है.

    अब सवाल उठता है कि जब देश की सबसे अहम एजेंसी ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताया, तब सरकार ने क्या किया. जब डे ला रू ने नक़ली नोट सप्लाई किए तो संसद को क्यों नहीं बताया गया. डे ला रू के साथ जब क़रार ़खत्म कर चार नई कंपनियों के साथ क़रार हुए तो विपक्ष को क्यों पता नहीं चला. क्या संसद में उन्हीं मामलों पर चर्चा होगी, जिनकी रिपोर्ट मीडिया में आती है. अगर जांच एजेंसियां ही कह रही हैं कि नक़ली नोट का काग़ज़ असली नोट के जैसा है तो फिर सप्लाई करने वाली कंपनी डे ला रू पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई. सरकार को किसके आदेश का इंतजार है. समझने वाली बात यह है कि एक हज़ार नोटों में से दस नोट अगर जाली हैं तो यह स्थिति देश की वित्तीय व्यवस्था को तबाह कर सकती है. हमारे देश में एक हज़ार नोटों में से कितने नोट जाली हैं, यह पता कर पाना भी मुश्किल है, क्योंकि जाली नोट अब हमारे बैंकों और एटीएम मशीनों से निकल रहे हैं.

    डे ला रू का नेपाल और आई एस आई कनेक्शन
    कंधार हाईजैक की कहानी बहुत पुरानी हो गई है, लेकिन इस अध्याय का एक ऐसा पहलू है, जो अब तक दुनिया की नज़र से छुपा हुआ है. इस खउ-814 में एक ऐसा शख्स बैठा था, जिसके बारे में सुनकर आप दंग रह जाएंगे. इस आदमी को दुनिया भर में करेंसी किंग के नाम से जाना जाता है. इसका असली नाम है रोबेर्टो ग्योरी. यह इस जहाज में दो महिलाओं के साथ स़फर कर रहा था. दोनों महिलाएं स्विट्जरलैंड की नागरिक थीं. रोबेर्टो़ खुद दो देशों की नागरिकता रखता है, जिसमें पहला है इटली और दूसरा स्विट्जरलैंड. रोबेर्टो को करेंसी किंग इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह डे ला रू नाम की कंपनी का मालिक है. रोबेर्टो ग्योरी को अपने पिता से यह कंपनी मिली. दुनिया की करेंसी छापने का 90 फी़सदी बिजनेस इस कंपनी के पास है. यह कंपनी दुनिया के कई देशों कें नोट छापती है. यही कंपनी पाकिस्तान की आईएसआई के लिए भी काम करती है. जैसे ही यह जहाज हाईजैक हुआ, स्विट्जरलैंड ने एक विशिष्ट दल को हाईजैकर्स से बातचीत करने कंधार भेजा. साथ ही उसने भारत सरकार पर यह दबाव बनाया कि वह किसी भी क़ीमत पर करेंसी किंग रोबेर्टो ग्योरी और उनके मित्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करे. ग्योरी बिजनेस क्लास में स़फर कर रहा था. आतंकियों ने उसे प्लेन के सबसे पीछे वाली सीट पर बैठा दिया. लोग परेशान हो रहे थे, लेकिन ग्योरी आराम से अपने लैपटॉप पर काम कर रहा था. उसके पास सैटेलाइट पेन ड्राइव और फोन थे.यह आदमी कंधार के हाईजैक जहाज में क्या कर रहा था, यह बात किसी की समझ में नहीं आई है. नेपाल में ऐसी क्या बात है, जिससे स्विट्जरलैंड के सबसे अमीर व्यक्ति और दुनिया भर के नोटों को छापने वाली कंपनी के मालिक को वहां आना पड़ा. क्या वह नेपाल जाने से पहले भारत आया था. ये स़िर्फ सवाल हैं, जिनका जवाब सरकार के पास होना चाहिए. संसद के सदस्यों को पता होना चाहिए, इसकी जांच होनी चाहिए थी. संसद में इस पर चर्चा होनी चाहिए थी. शायद हिंदुस्तान में फैले जाली नोटों का भेद खुल जाता.

    नकली नोंटों का मायाजाल
    सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि 2006 से 2009 के बीच 7.34 लाख सौ रुपये के नोट, 5.76 लाख पांच सौ रुपये के नोट और 1.09 लाख एक हज़ार रुपये के नोट बरामद किए गए. नायक कमेटी के मुताबिक़, देश में लगभग 1,69,000 करोड़ जाली नोट बाज़ार में हैं. नक़ली नोटों का कारोबार कितना ख़तरनाक रूप ले चुका है, यह जानने के लिए पिछले कुछ सालों में हुईं कुछ महत्वपूर्ण बैठकों के बारे में जानते हैं. इन बैठकों से यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि देश की एजेंसियां सब कुछ जानते हुए भी बेबस और लाचार हैं. इस धंधे की जड़ में क्या है, यह हमारे ख़ुफिया विभाग को पता है. नक़ली नोटों के लिए बनी ज्वाइंट इंटेलिजेंस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि भारत नक़ली नोट प्रिंट करने वालों के स्रोत तक नहीं पहुंच सका है. नोट छापने वाले प्रेस विदेशों में लगे हैं. इसलिए इस मुहिम में विदेश मंत्रालय की मदद लेनी होगी, ताकि उन देशों पर दबाव डाला जा सके. 13 अगस्त, 2009 को सीबीआई ने एक बयान दिया कि नक़ली नोट छापने वालों के पास भारतीय नोट बनाने वाला गुप्त सांचा है, नोट बनाने वाली स्पेशल इंक और पेपर की पूरी जानकारी है. इसी वजह से देश में असली दिखने वाले नक़ली नोट भेजे जा रहे हैं. सीबीआई के प्रवक्ता ने कहा कि नक़ली नोटों के मामलों की तहक़ीक़ात के लिए देश की कई एजेंसियों के सहयोग से एक स्पेशल टीम बनाई गई है. 13 सितंबर, 2009 को नॉर्थ ब्लॉक में स्थित इंटेलिजेंस ब्यूरो के हेड क्वार्टर में एक मीटिंग हुई थी, जिसमें इकोनोमिक इंटेलिजेंस की सारी अहम एजेंसियों ने हिस्सा लिया. इसमें डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस, इंटेलिजेंस ब्यूरो, आईबी, वित्त मंत्रालय, सीबीआई और सेंट्रल इकोनोमिक इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रतिनिधि मौजूद थे. इस मीटिंग का निष्कर्ष यह निकला कि जाली नोटों का कारोबार अब अपराध से बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन गया है. इससे पहले कैबिनेट सेक्रेटरी ने एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई थी, जिसमें रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, आईबी, डीआरआई, ईडी, सीबीआई, सीईआईबी, कस्टम और अर्धसैनिक बलों के प्रतिनिधि मौजूद थे. इस बैठक में यह तय हुआ कि ब्रिटेन के साथ यूरोप के दूसरे देशों से इस मामले में बातचीत होगी, जहां से नोट बनाने वाले पेपर और इंक की सप्लाई होती है. तो अब सवाल उठता है कि इतने दिनों बाद भी सरकार ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की, जांच एजेंसियों को किसके आदेश का इंतजार है?

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