न्यायिक सुधारों की दिशा मे जड़ से ही सुधार हो

वीरेन्द्र जैन

अभी सरकारी अधिकारियों, चुनाव लड़ने वालों, मंत्रियों, सांसदों विधायकों आदि जन प्रतिनिधियों के साथ न्यायधीशों की सम्पत्ति की घोषणा से सम्बन्धित बहस शांत ही नहीं हुयी थी कि न्यायिक सुधारों से सम्बन्धित नये विधेयक की सुगबुगाहट सुनाई देने लगी है। इस सम्भावित विधेयक के अनुसार न केवल न्यायधीशों के आचरणों को ही नियंत्रित करने का ही प्रयास होगा अपितु किसी प्रकरण में फैसला भी अनावश्यक समय के लिये टाला नहीं जा सकेगा। इतना ही नहीं उक्त निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिये जाँच समिति और निगरानी समिति भी स्थापित किये जाने की व्यवस्था की गई है। उक्त विधेयक के प्रस्तावों की जिस व्यापक स्तर पर सराहना की जा रही है उससे पता चलता है कि न्याय व्यवस्था में सुधारों के लिये लोग कितने बेचैन थे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि देश में तेजी से फैल रहे अपराध और हिंसा के पीछे अपराधियों में न्याय का भय समाप्त हो जाने और आम नागरिकों द्वारा शीघ्र, स्वच्छ, तथा निष्पक्ष न्याय की उम्मीद खत्म हो जाने की प्रमुख भूमिका रही है। सम्पन्न अपराधियों को प्राप्त सुविधाओं की तुलना में राज्य सरकारों के अधीन काम कर रहे अभियोजन विभाग के पास ज़रूरी कानूनी लाइब्रेरी से लेकर उपयुक्त चेम्बर तक उपलब्ध नहीं होते। इनमें से बहुत सारे अपने आप को जनता का नहीं अपितु राज्य सरकार की सत्तारूढ पार्टी का वकील समझते हैं [सन्दर्भ मध्य प्रदेश के सव्वरवाल प्रकरण में न्यायाधीश की टिप्पणी, और गुजरात नर संहार के आरोपियों का छूटना]। जिन प्रकरणों में सज़ा की सम्भावना होती है, उनमें भी अपराधियों के वकील न्याय को विलम्बित कराने और बाद में उच्च न्यायालय आदि में अपील के सहारे अपराधियों की सजाओं को टालते रहने के बाद मुज़रिम की उम्र की दुहाई देकर उसकी सज़ा कम करने की मांग करते हैं। इस बीच अपराध करने वाले समाज में अपने पूरे आतंक के साथ घूम कर राजनीति में भाग लेते हुये मंत्रियों के पद तक पहुँच, न्याय में अनास्था पैदा करते रहते हैं। यदि सचमुच ही सरकार का इरादा न्याय में सुधार करने का है तो उसे सबसे पहले कानून बनाने वाली विधायिका के सदस्यों को न्याय मिलना सुनिश्चित करना चाहिये। 2009 में हुये लोकसभा चुनाव में 50% से अधिक उम्मीदवार, और चुने गये सदस्य ऐसे हैं जिन पर आपराधिक प्रकरण दर्ज़ हैं जिनमें हत्या, हत्या का प्रयास, बलात्कार, चोरी, डकैती, बलवा, सरकारी काम में दखलन्दाज़ी, आदि आरोप हैं। यही हाल विधान सभाओं का भी है। एक सांसद को ही प्रतिमाह वेतन के रूप में बारह हजार रूपये संसदीय क्षेत्र भत्ते के रूप में दस हजार रूपये कार्यालय भत्ते के रूप में चौदह हजार रूपये, यात्रा भत्ते के रूप में अड़तालीस हजार रूपये(तक) तथा संसद चलने वाले दिनों में प्रति दिन पाँच सौ रूपये का भत्ता नकद मिलता है। उन्हें देश में कहीं भी कभी भी किसी भी ट्रेन में प्राथमिकता के आधार पर पत्नी या पीए क़े साथ प्रथम श्रेणी वातानुकूलित दर्जे में मुफ्त यात्रा की सुविधा दी गयी है। वे साल में चालीस हवाई यात्राएं भी मुफ्त कर सकते हैं। उन्हें सालाना पचास हजार यूनिट तक बिजली मुफ्त मिलती है व एक लाख सत्तर हजार टेलीफोन काल्स मुफ्त करने की सुविधा प्राप्त है तथा एमटीएनएल की मोबाइल सुविधा भी उपलब्ध है। विधायकों को भी लगभग ऐसी ही सुविधाएं उनके क्षेत्र के अनुपात में उपलब्ध हैं। दिल्ली में सोलह वीआईपी एक सौ बावन एकड़ जमीन में रहते हैं जबकि गैर वीआईपी क्षेत्र में इतनी जमीन पर दस लाख लोग रहते हैं। इस पर भी [वामपंथियों को छोड़कर] सांसद इन सुविधाओं को कम समझते हैं और इन्हें और बढाने के लिए लगातार इस आधार पर प्रस्ताव लाते रहते हैं कि यह राशि कम है और उनकी हालत दयनीय है। वैसे चुनाव आयोग द्वारा संपत्ति की घोषणा करने का कानून बना दिये जाने के बाद देश वासी यह जान गये हैं कि हमारे कुल सांसदों में पचास प्रतिशत से अधिक की सम्पत्ति पचास लाख रूपयों से अधिक की है और तीन सौ से अधिक लोकसभा सदस्य तो स्वयं की घोषणा के अनुसार ही करोड़पति हैं। इसके बाद भी उन्हें पेंशन, सस्ती दरों पर प्लाट मुफ्त स्वास्थसेवा आदि जीवन भर लगी रहने वाली अन्य सुविधाएं भी हैं भले ही उस सांसद ने कुल एक दिन ही सदन में भाग लिया हो।

जब इन सदस्यों को इतनी सुविधायें देना ज़रूरी स

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