“कबिरा खड़ा बाजार में “

इधर अकादमी पुरस्कारों की घोषणा हुई उधर सिद्धवाणी का उद्घघोष शुरू हो गया । वैसे सिद्धवाणी जो खुद को कबीरवाणी भी कहती रही है कि खासियत ये है कि इसकी तुलना आप क्रिकेटर -कम -नेता नवजोत सिंह सिद्धू के स्वागत भाषणों से भी कर सकते हैं जिसका कंटेंट वही रहता है तारीफ चालीसा का बस बन्दे या बन्दी का नाम बदल जाता है ।उन्हें अपने कंटेंट पर इतना नाज है कि वो कभी -कभी दुश्मन देश के उन्हीं लोगों के कसीदे गढ़ देते हैं जो हमसे हमेशा दुश्मनी निभाते आये हैं ।लोग बाग उनके भाषणों की तुलना तेरह नम्बर की रिंच से भी करते हैं जो कहीं भी फिट हो जाती है ।
साहित्य में खुद को कबीर पंथी घोषित करने वाले महापुरुष ने कसीदे गढ़ने शुरू कर दिए और तारीफ के गोले दनादन दागने शुरू कर दिए। अकादमी के पुरस्कार की खबर और महाकवि की फेसबुक पोस्ट शाम को ही शाया हुई ,उससे पहले वो सुबह ही अपनी एक वर्ष पुरानी पोस्ट को साझा कर चुके थे ,जिसमें उन्होंने अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक के कवित्त को अपठनीय,नौकरी को जुगाड़ू ,और हिंदी कविता में उनकी उपस्थिति को असहनीय बताया था।
उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर उन्होंने बहुत ही व्यंग्य बाण चलाये थे।,उनकी पोस्ट पर अभी परिचर्चा शुरू ही हुई थी कि अकादमी पुरस्कारों की खबर आ गयी ,अकादमी के विजेताओं की घोषणा होते ही उनके सुर बदल गए और उन्होंने उनकी कविता को कालजयी ,नरम और सर्दी की धूप करार दिया ।नेटवीरों ने उनकी एक बरस की पहले वाली पोस्ट में उनको टैग किया ।टैगियाने का ये सिलसिला बदस्तूर जारी रहा तो वो आजिज हो उठे और झल्लाकर उन्होंने अपनी सफाई लिखी कि
“मैं उनकी कविता का प्रशंसक हूँ, उनका नहीं “।

नेटवीरों ने उनकी बात को साखी के तुल्य माना और उनके हालिया अपडेटेड स्टैटस
“ना काहू से दोस्ती,ना काहू से बैर “
का स्क्रीनशॉट लेकर उनकी पोस्ट में जोड़ दिया और उन्हें “ताजा -ताजा कबीर ” कबीर करार दे दिया ।ये कबीर नाम का बड़ा गोरखधंधा है ,अब जब चाहें तो परम सेक्युलर ,प्रगतिशील बन जाएं और जैसे ही काम निकल जाए वैसे ही कबीरदास की तरह सन्तुलित और तटस्थ हो जाएं । जैसे कबीर टाइप के कविवर ने अकादमी पुरस्कार पाने पर तुरंत बधाई देने वालों में अपना नाम दे दिया और तब उन्हें अपनी अति सेक्युलर कविता बिरादरी के किसी फरीकैन के अवार्ड पाने पर गर्व हुआ ,थोड़ी देर के लिये कबीर के चोले से बाहर आ गए ,लेकिन जो लुत्फ कबीर होने का है वो किसी विचारधारा के साथ चलने पर कहां ?

कबीरदास जिस तरह खुद को कहा करते थे कि कबीरदास अल्लाह और राम दोनों की संतान हैं ,उसी तरह कबीर नाम भी दोनों धर्मों के लोग बखूबी रखते हैं ,मसलन कबीर खान नामक निर्देशक ने हनुमान की भक्ति में ओत -प्रोत “बजरंगी भाईजान” जैसी फ़िल्म बनायी दूसरी तरफ खुद को मॉडर्न कबीर घोषित कर चुके एक सज्जन दंगों में अपनी उपस्थिति दिखाकर मानवीय बनने क्या गए ,कुछ ज्यादा ही उन्होंने उत्साह दिखा दिया और फिर दंगों के पोस्टर बॉय बन गए । अब वो लोगों से कहते फिर रहे हैं कि वे तो तमाशाई नहीं रहे थे उस वक्त ,तमाशबीन थे अलबत्ता ।

तो कबीरपंथी कविवर को पूंजी वाद से बहुत चिढ़ है ये और बात है कि उन्होंने अपनी सारी कविताएं एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी “मोंट ब्लेंक “के पेन से ही लिखी हैं ।उन्हें पूंजीवाद से इतनी चिढ़ है कि वे सिर्फ रूस की वोदका शराब पीते हैं और पीने के बाद कहते हैं कि जब वो वोदका पीते हैं तो उन्हें रूस के मेहनतकश मजदूरों के पसीने की खुश्बू इसमें आती है ।
कबीरपंथी कविवर पूंजीवाद के इतने घनघोर विरोधी हैं कि वे सिर्फ चीन से आयातित पेपर पर कविताएं लिखते हैं । उनके एक पुराने हमप्याला दोस्त हैं ,उनकी रचनाधर्मिता की पचासवीं सालगिरह एक फाइव स्टार होटल में मनायी गयी थी तरल और गरल के साथ ।ये उन दिनों की बात है जब राजस्थान सूखे की समस्या से जूझ रहा था मगर दिल्ली में कई कैरेट शराब पी गयी।राजस्थान के सूखे के मारे मर रहे लोगों के प्रति संवेदना जाहिर करने के लिये गम गलत करने के लिये इससे बेहतर विकल्प क्या हो सकता था ।
“कौम के गम में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ
रंज लीडर को बहुत है ,मगर आराम के साथ “।
वहीं पर उन दोनों का किसी मठाधीशी को लेकर झगड़ा हुआ जो आज तक बदस्तूर जारी है ।

कविवर ने काफी सारे कवियों और कवयित्री पर इल्जाम पर बहुत से लगाए हैं लेकिन अपने अनुकूल होते ही वो सारे इल्जाम उन्होंने ऐसे गायब कर लिये हैं जैसे सर्फ एक्सेल से धुलाई के बाद दाग । तब अगर कोई कविवर को अतीत के शाब्दिक हमलों के दाग याद दिलाये तो कहते हैं कि कौन से शाब्दिक दाग ?
“ढूंढते रह जाओगे “।

कविवर तुरन्त तटस्थ होकर एक जुमला सुनाते हैं
“मृगा बाण नहीं लगा, बधिक नहीं चूका
पाहुन किये उपवास ,ना सोए भूखा “
अर्थात शिकारी ने बाण तो सही चलाया ,लेकिन मृग को बाण लगा नहीं और मेहमान ने उपवास रखने का निर्णय किया था ,अतिथि भूखे नहीं सोए थे ।

यानी किसी के साहित्यिक चरित्र की छीछालेदर करना उनका साहित्यिक धर्म था ,वरना किसी से उनकी जाती अदावत थोड़े ही थी ,लोगबाग उनकी इस अदा पर बलि -बलि जाते हैं आजकल कविवर अपने वैचारिक कनविक्शन पर खुद कन्फ्यूज होकर अक्सर एक शेर कोट करते रहते हैं
“वो मरासिम थी या अदावत ,हैरत में हूँ मैं
अपनी अना को गंवाकर भी ,बेगैरत नहीं हूं मैं “।

कविवर कबीरपंथी होने के साथ गांधीवादी भी हैं उनका फेसबुक वॉल की टैगलाइन ही महात्मा गांधी के वाक्य से सजी है कि “एक आंख के बदले आँख मांगने से तो पूरी दुनिया अंधी हो जाएगी “सो अपने फ़ेसबुकिया जीवन मे वे बेहद क्षमाशील हैं लेकिन वास्तविक जीवन में यदि उनसे कोई जरा सा असहमत हो जाये तो बिल्कुल फिल्मस्टार धर्मेंद्र की तर्ज पर बर्ताव करते हैं कि “एक एक को चुन -चुन कर मारूंगा “।
फिर वो चुन -चुन कर मारते हैं उस युवा कवि या कवियत्री को ।यदि उनसे असहमत कोई लेखिका है तो उसके चरित्र पर लांछन लगाने से ही उनका बदला पूरा हो जाता है क्योंकि शेष काम तो उनके नेट अनुयायी कर देते हैं और यदि कोई युवा कवि है तो उसको तो नेस्तानाबूद ही कर देते हैं ,मसलन उसका छप रहा संकलन रुकवा देते हैं,पुरस्कारों की दौड़ से उसका नाम कटवा देते हैं ,उसकी फ्री लांसिंग के सारे सौर्स बंद करवा देते हैं और यदि कहीं एडहॉक पर किसी कालेज में वो असहमत कवि पढ़ा रहा हो तो उसकी नौकरी का रिनीवल ही रुकवा देते हैं ।
और हाँ ,अपनी फेसबुक पोस्ट को वे कबीरवाणी कहते हैं ।
“कहो तो छोड़ दूं यहीं इस अफसाने को
तेरा भी जिक्र आएगा आगे फसाने में “
वैसे भी फेसबुक के बाजार में खड़े इस मॉडर्न कबीर के क्या कहने ?😊

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