“कैसे कम हो इस्लामिक कट्टरवाद” 

यह कैसी विचारधारा हैं कि हिन्दू घर्मनिरपेक्ष रहकर प्यार-मोहब्बत फैलाये पर मुसलमान धार्मिक कट्टरता की संकीर्णता से उपजी घृणा व वैमनस्यता के जंजाल से बाहर ही न निकले ? ऐसे में एक तरफ़ा केवल हिन्दू समाज से ही यह उपेक्षा क्यों की जाती है कि वह ही आगे बढ़ कर हिन्दू-मुस्लिम मतभेद और विरोध  दूर करें ?
प्रमुख मुस्लिम संगठन “जमीयत उलमा-ए-हिन्द” के महासचिव मौलाना महमूद मदनी  हमेशा से यह कहते आ रहे है कि देश का बहुसंख्यक समाज स्वभाव से सेक्युलर है, हमेशा सेक्युलर रहा है और आज भी सेक्युलर है, इसलिए मुस्लिम समाज को कोई चिंता नही करनी चाहिए। लेकिन सोचने का मुख्य बिंदू यह है कि जो मौलाना मदनी हिन्दुओं की घर्मनिर्पेक्षता पर मुग्ध है तो वे अपने मुस्लिम समुदाय के लोगों से कट्टरपन छोड़कर सेक्युलर बनने का आह्वान क्यों नही करते ?
इससे क्या यह स्पष्ट नही होता कि जब तक बहुसंख्यक हिन्दू समाज धर्मनिरपेक्ष है तब तक ही भारत में मुसलमान सुरक्षित है चाहे मुसलमान कितना ही कट्टरपंथी क्यों न हो ? इसीलिए मौलाना ने मुसलमानों को भारत में निश्चिंत होकर भाईचारा ,एकता व शांति बनाये रखने को कहा है। परंतु उनके पास मुस्लिम समाज को कट्टरता छोड़ कर धर्मनिरपेक्षता अपनाने के लिए कोई सुझाव नही है। क्या इस्लामिक जगत कभी घर्मनिर्पेक्षता को मान्यता देगा या उसके सहारे केवल अपने वैश्विक इस्लामीकरण के गुप्त लक्ष्य को पाने के लिये ही सक्रिय रहेगा ? आज भी जब इस्लामी शिक्षा में गैर मुस्लिमों के लिए सहिष्णुता, सहनशीलता और सह्रदयता का भाव ही नही है और जिसका प्रचार व प्रसार मदरसों व मस्जिदों में निरंतर होता आ रहा हैं तो फिर वह सम्प्रदाय अपने मज़हबी कट्टरपन से कैसे दूर रह सकता है ? जब तक मदरसों में इस्लामी शिक्षा देकर जिहाद को पवित्र बताया जाता रहेगा तब तक गैर मुस्लिमों पर होने वाले अत्याचार व आतंकवाद को नियंत्रित नही किया जा सकेगा ? अतः ऐसे मदरसे व शिक्षण संस्थान जो कट्टरपंथी इस्लास्मिक संगठनों द्वारा चलाये जा रहें हो को भी प्रतिबंधित करके ( जैसा की पाकिस्तान सहित अनेक देशों में भी किया गया है ) सामाजिक सौहार्द को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
यह सुखद है कि इसके उपरांत भी देश में परस्पर शांति, एकता व प्यार-मोहब्बत को प्रोत्साहित करने के लिये 29 अक्टूबर को नयी दिल्ली में “जमीयत उलमा-ए-हिन्द” ने विभिन्न धर्मगुरुओं की उपस्थिति में “अमन और एकता सम्मेलन” का आयोजन किया। “जमीयत उलमा-ए-हिन्द” के  अध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी ने सम्मेलन में कहा कि “देश केवल प्यार और मोहब्बत से चल सकता है। नफरत की राजनीति करने वाले सभी लोग देश के गद्दार हैं।”  यह कहने व सुनने में बहुत सुखद व सराहनीय लगता है। परंतु क्या उनमें यह साहस है कि वे उस संकीर्ण इस्लामिक जिहादी दर्शन का विरोध करेंगे जिसके कारण भारत सहित विश्व के अनेक देशों की विभिन्न संस्कृतियों के परस्पर टकराव होने से घृणा व नफरत फैलने से हिंसा का नंगा नाच होता आ रहा है ?
इस संस्था के महासचिव मौलाना महबूब मदनी ने भी इस सम्मेलन में संबोधित करते हुए मुसलमानों को यह स्पष्ट किया कि “हिन्दू , सिख, ईसाई और पारसी भाइयों की मोहब्बत की उन्हें सबसे अधिक आवश्यकता हैं।” उनका कहना हैं कि “मतभेद हो सकते हैं पर विरोध नही और मतभेदों को मिल बैठ कर बातचीत से हल किया जा सकता हैं”। उनके उपरोक्त कथन पूर्वाग्रहों से ग्रस्त मुस्लिम समाज को कितना प्रभावित करेंगे यह निश्चित ही  संदेहात्मक है। क्योंकि अधिकांश मुस्लिम समाज मानवता, राष्ट्रवाद व घर्मनिर्पेक्षता के स्थान पर धार्मिक कट्टरपन को अधिक महत्व देता हैं। धार्मिक कट्टरता जब सामूहिक हो जाती है तो वह साम्प्रदायिकता भड़काती है और वहीं धीरे धीरे इस्लामिक आतंकवाद या जिहाद का कारण बन जाती है।
काश मुसलमान अपने वैचारिक स्रोत्रों के एकमात्र सत्य या त्रुटिहीन होने की जिद छोड़ दें तो उसमें विवेकशील चिंतन स्वतः ही आरम्भ हो जाएगा। तब उन्हें यह मानने व समझने में कोई दुविधा नही होगी कि विश्व में और भी धर्म व संस्कृतियां है। उन सभी के अपने रीति-रिवाज व शासन व्यवस्था आदि हैं अतः उन्हें इस्लाम के अनुरूप बनाने का इतना अधिक अत्याचारी दुराग्रह क्यों ? अतः इस परिवर्तित चिंतन से “जियो और जीने दो”  के विचार को प्रोत्साहन मिलेगा और कट्टरवाद कम होने से एक-दूसरे समुदायों के बीच भेदभाव भी समाप्त होना सरल हो जायेगा।
मुस्लिम मानसिकता से संबंधित एक और प्रसंग  भी पिछले सप्ताह का है जब ईरानी धर्मगुरुओं के प्रतिनिधि मंडल से नयी दिल्ली में हुई एक मुलाक़ात में हमारे अल्पसंख्यक विभाग के मुस्लिम मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि ” सरकार ने आतंकवाद के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई है और शांति, एकता व सौहार्द भारत के डीएनए में हैं, इसके रहते आतंकवादी / शैतानी शक्तियां यहां कभी सफल नही हो सकती”। जबकि यह सर्वविदित है कि मुगलकालीन भारत के इस्लामिक जिहाद / अत्याचार / आतंकवाद के इतिहास को छोड़ भी दें तो भी हमारा देश पिछले कई दशकों से निरंतर इस्लामिक आतंकवाद से जूझ रहा है। फिर भी हमारे अल्पसंख्यक विभाग के मंत्री कहते है कि शांति व सौहार्द हमारे डीएनए में हैं इसलिए आतंकवादी शक्तियां यहां कभी सफल नही हो सकती। यह दुखद है कि आज जब हम आतंकवाद से अत्यधिक पीड़ित हैं और इसके सैकड़ों / हज़ारों प्रमाण उपलब्ध है फिर भी मंत्री जी ऐसा मान कर क्यों भारतीय समाज को भ्रमित करना चाहते है ? ‎मुस्लिम तुष्टिकरण को पुष्ट करते हुए उसको सशक्तिकरण का नया नाम देने वाले मंत्री जी शांति व सौहार्द की प्रमाणिकता को डीएनए के परीक्षण से जांच रहे है। जबकि डीएनए एक शारीरिक परीक्षण होता है उससे शरीर के भौतिक गुणों की रचना का ज्ञान मिलता है। शांति, सौहार्द, एकता व स्वभाव आदि व्यवहारिक गुण तो केवल संस्कृति व संस्कारों के माध्यम से ही विकसित होते हैं। अतः शांति व सौहार्द आदि को डीएनए के परीक्षण से नही जांचा जा सकता । यहां यह लिखना भी अनुचित नही कि इस्लामिक आतंकवाद (जिहाद) एक बीमारी है इसका छिपा कर इलाज नही किया जा सकता, सच्चाई को स्वीकारना होगा। “इस्लाम में आतंकवाद का कोई स्थान नही” कहकर सभी मुस्लिम बुद्धिजीवी आतंकवादियों का बचाव ही करते रहें है।सामान्यतः इसीलिए विभिन्न दुर्दान्त आतंकवादी संगठनों व घटनाओं पर कभी भी मुस्लिम बुद्धिजीवी कोई विचार गोष्ठी या सम्मेलन आदि नही करते। इस्लाम का यह एक कडुवा सत्य , जिसे जानते हुए भी ये बुद्धिजीवी देखना और समझना भी नही चाहते।
इसलिए सभी मुस्लिम धर्मगुरुओं व राजनेताओं को निष्पक्ष रुप से यह अवश्य विचार करना चाहिये कि समाज में साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड कर आतंकवाद और अलगाववाद कौन बढ़ा रहा है और क्यों ? क्या देश में बढ़ती इस्लामिक कट्टरता और अलगाववादी मानसिकता का कोई मुस्लिम नेता विरोध करेगा ? इतिहास साक्षी है कि कट्टरवाद के कारण ही मुस्लिम उन्मुखी राजनीति आरम्भ हुई थी जिससे देश का विभाजन हुआ और स्वतंत्रता के बाद भी कट्टरपंथी मुसलमानों में भारतीयता और उसके प्रतीकों के प्रति आज तक भी कोई सम्मान नही जागा।
“जमीयत उलमा-ए-हिन्द” के महासचिव मौलाना महमूद मदनी का (अपने गुप्त लांग टर्म एजेंडे को ध्यान में रखकर ) मुस्लिम समाज में यह कहना कि “किसी राजनैतिक दल के शार्ट टर्म पॉलिटकल एजेंडे से कोई हानि नही होनी चाहिये” भविष्य के किस गुप्त उद्देश्य (एजेंडे) का संकेत देता है ? इसकी रहस्यमयी गंभीरता को समझना होगा। ऐसे में केवल बहुसंख्यक हिन्दुओं से ही सौहार्द की अपेक्षा रखकर उनकी उदारता, प्रेम, अहिंसा, शांति व सहिष्णुता का अनुचित लाभ उठा कर क्या भारत को दारुल-इस्लाम बनाने के लिये इसको एक “शांतिपूर्ण जिहाद” का षड्यंत्र कहना अनुचित होगा ?
क्या विश्व में कोई समाजिक, धार्मिक व राजनैतिक नेता ऐसा प्रयास करेगा कि वह भारत सहित समस्त वैश्विक समाज के सहअस्तित्व व समाजिक सद्भावना के लिए उनको अपनी अपनी विचारधाराओं व मान्यताओं के साथ जीवित रहने का कोई मूलमंत्र दे सकें ? जिसमें सभी अपनी मान्यतायें लेकर जीवित रहें और परस्पर न कोई  अन्य धर्मावलंबियों से अपने विचार बदलने के लिए कहें और न बाध्य करें ?

विनोद कुमार सर्वोदय

1 thought on ““कैसे कम हो इस्लामिक कट्टरवाद” 

  1. जनाब कहाँ हो, हिदू आतंकवाद तो अंकुरित हो चुका, पनप रहा है. उत्कृष्ट सिंचाई भी हो रही है फिर उन्हें कट्टरपंथी न रहने का आव्हान क्यों?

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