लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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कभी भाजपा के दिग्गज नेता रहे और अब विश्वसनीयता का संकट

kalyansinghकल्याण सिंह को आखिर क्या हुआ है कि उन्हें फिर भगवान राम की याद आ गयी है। दरअसल कल्याण सिंह राजनीतिज्ञों की उस परंपरा का हिस्सा बन गए है जिसके लिए सच समय के साथ बदलता रहता है। कल्याण सिंह ऐसे कैसे बने यह एक अलग विमर्श का मुद्दा है लेकिन वे ऐसे बन गए हैं यह एक कड़वा सच है। कल्याण सिंह, एक टीवी चैनल पर साक्षात्कार दे रहे थे और इंटरव्यू के आखिरी हिस्सों में उन्होंने लगभग हर सवाल के जवाब में यही कहा –धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद। जाहिर तौर पर उनके पास अब कहने को कुछ नहीं है। विचारधारा के प्रति समर्पण, ईमानदारी, व्यापक जनाधार,संगठन क्षमता और प्रशासनिक दक्षता जैसी बातें अब उनके लिए अप्रसांगिक हैं। जबकि यह सारे विशेषण कभी उनके संदर्भ में बहुत प्रासंगिक हुआ करते थे। उप्र की जनता सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए कल्याण सिंह का जो कद और प्रभाव उभरकर सामने आया था उसने उनमें एक बड़ा नेता होने की सारी संभावनाएं प्रकट कर दी थीं।

बाद के दिनों में अयोध्या आंदोलन की छाया में वे प्रबल बहुमत पाकर मुख्यमंत्री भी बने। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि वे अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवानी के बाद भाजपा के भविष्य के रूप में देखे जाने लगे। पहली बार जब वे मुख्यमंत्री बने तो उनकी ईमानदार छवि और प्रशासनिक कुशलता के किस्से लखनऊ से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में गूंजते रहे। विवादित ढांचे की शहादत के बाद भी उप्र की आमजनता और संगठन में उनके प्रति भरोसा बना रहा। वे एक राष्ट्रीय व्यक्तित्व बन चुके थे। किंतु राजनीति में सारा कुछ यथावत कहां चलता है। वे अपने ही दल की आंतरिक राजनीति का शिकार बन गए। स्थानीय नेताओं ने अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते उन्हें दिल्ली के नेताओं से लड़ा दिया। जिन कुसुम राय की काफी चर्चा होती रही है कि कल्याण सिंह उन्हें काफी ज्यादा महत्व देते हैं। वही कुसुम राय आज भाजपा से राज्यसभा की सदस्य हैं। कल्याण सिंह अपने प्रथम मुख्यमंत्रित्व काल में जहां व्यापक सरोकारों वाले नेता साबित हुए वहीं जब उन्हें दुबारा मुख्यमंत्री बनाया गया तो मिलीजुली सरकार होने के कारण उनका पूरा कार्यकाल विवादों से धिरा रहा। पहली सरकार में जहां कल्याण सिंह माफियाओं के लिए सिरदर्द थे तो दूसरी बार माफिया उनकी सरकार में मंत्री बने बैठे थे। सो उनका इकबाल खत्म सा हो गया। फिर रही सही कसर कुसुम राय ने पूरी कर दी। इसके साथ ही भाजपा का एक धड़ा जिसमें खुद मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा थी, उनके पीछे लगा ही था। हालात ऐसे बनाए गए कि कल्याण अपने दिग्गज नेताओं अटल जी और लालकृष्ण आडवानी से ही भिड़ गए। केंद्र में मंत्री बनाए गए पर वह उन्हें रास नहीं आया। जिस तरह से उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाया गया वह बात उन्हें दंश देती रहती थी। कल्याण सिंह दिल से ज्यादा दिमाग से काम कम लेते हैं। सो वे दिल की बात कई बार सार्वजनिक रूप से कहने में संकोच नहीं करते। उनका यही स्वभाव उन्हें दल के शीर्ष नेतृत्व की नजर में अप्रिय बनाता गया। आज हालात यह हैं कि भाजपा उप्र में कहीं नहीं है तो इसका कारण यही है उसके पास कल्याण सिंह का कोई विकल्प नहीं है। कल्याण पार्टी से निकाले गए और राष्ट्रीय क्रांति दल नाम से अपनी पार्टी बना कर उप्र में भाजपा की लुटिया डुबोने में कामयाब रहे। भाजपा को बुरी पराजय मिली। वे फिर भाजपा में लौटे किंतु दल में बहुत कुछ बदल चुका था। कल्याण सिंह जो चाहते थे वह होना संभव भी नहीं था। सो वो अपने इस दौर में कभी भाजपा के साथ बहुत सहज न रह पाए। चुनाव में उन्हें मुख्यमंत्री का प्रत्याशी धोषित कर चुनाव भी लड़ा गया किंतु जो होना था वही हुआ, बसपा की प्रबल बहुमत से सरकार बनी। लोकसभा चुनावों में हालात यह हुए कि कल्याण सिंह एक लोकसभा सीट के लिए पार्टी छोड़कर फिर चलते बने और इस बार उनके साथ मुलायम सिंह यादव थे। यह ऐसा समय था जिसने कल्याण सिंह की रही- सही विश्वसनीयता भी खत्म कर दी। एक ऐसा नेता जो अपनी दृढ़ता, ईमानदारी, सच बोलने के लिए जाना जाता था उसका ऐसा हश्र देखने लायक था। चुनावों में मुलायम को जब झटका लगा तो वे भी कल्याण सिंह से पल्ला झाड़ने के लिए मजबूर हो गए। सच कहें तो कल्याण सिंह ने अपने पल-पल बदलते बयानों, व्यवहार से अपनी स्थिति बहुत हास्यापद बना ली है। विश्वसनीयता और प्रामणिकता के मोर्चे पर वे बेहद दयनीय दिखते हैं। अब जब वे पुनः एक नया दल बनाकर राम की शरण में वापस लौट आए हैं तो उनके दावों और वादों को कितना विश्वसनीय माना जा सकता है।

भाजपा के लिए भी यह सोचने का समय है कि उसके जनाधार वाले नेताओं उमा भारती, बाबूलाल मरांडी, मदनलाल खुराना, कल्याण सिंह, शंकर सिंह वाधेला का जो हाल हुआ है उसके लिए वह खुद कितनी जिम्मेदार है ? क्या भाजपा के तंत्र में कोई ऐसी कमी है कि वह उर्जा के रचनात्मक इस्तेमाल में विफल हो जाती है ? ये सारे नेता उसके तपे तपाए नेता रहे हैं क्या कारण है कि भाजपा उनके लिए अपने दिल और दल में इतनी जगह नहीं बना पाती कि वे सहज होकर अपनी राजनीतिक पारी अपने मूल दल के साथ ही खेल सकें। कल्याण सिंह का प्रसंग इस बात की गवाही है कि राजनीति में आपका एक गलत कदम किस तरह आपको हास्यास्पद बना देता है और दिशाहीन भी। कल्याण सिंह आज जिस स्थिति में उसके लिए वे खुद जिम्मेदार हैं। धैर्य के अभाव ने उन्हें राजनीति के रेगिस्तान में ला पटका है। यहां से वे कौन सी राह पकड़ते हैं इसके लिए थोड़ा इंतजार तो करना ही पड़ेगा। फिलहाल कल्याण के लिए तो हारे को हरिनाम जैसी ही स्थिति है। फिलहाल तो कल्याण सिंह विश्वसनीयता के संकट से धिरे हैं ऐसे में उन्हें राम का नाम कितनी मदद कर पाएगा कहा नहीं जा सकता।

-संजय द्विवेदी

4 Responses to “कल्याण सिंहः आ अब लौट चलें”

  1. sadhak ummed singh baid

    राजनीति को छोङ दो, तब होगा कल्याण.
    उमा,मदन, बाबू सुनो, यह है अटल बयान.
    यह है अटल बयान, आडवाणी धक्का खाते.
    बार-बार- पिट कर, जाने क्यूँ लौट के आते?
    कह साधक गोविन्द ध्या रहे राज्यनीति को.
    उसीमें है कल्याण, छोङ दो राजनीति को.

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  2. arun singh

    ६ december के shivaji हैं कल्याण, बीजेपी में क्या puri भारतीय राजनीति में un jaisa saahsi कोई नहीं.

    कोई कुछ भी कहे, कितना विश्लेषण करे, कल्याण सिंह भारतीय इतिहास में सदा याद किए जाएंगे. आने वाली शताब्दियाँ शायद ही किसी भाजपा नेता का नाम इतिहास के पृष्ठों पर देखेंगी, अटल हों या आडवानी, राजनाथ हों या सुषमा स्वराज या फिर कोई और, किसी को इतिहास याद शायद ही करेगा. लेकिन कल्याण सिंह हमेशा याद किए जायेंगे, एक वर्ग उन्हें खलनायक कहेगा तो एक विशेष कालखंड के लिए एक वर्ग उन्हें नायक भी कहेगा.

    सत्ता अटल बिहारी को भी मिली, आडवानी को भी और कल्याण सिंह को भी, अपनी जुबान पर कौन खरा उतरा, सत्ता का कार्यकाल देखकर तौल लीजिए. पता लग जायेगा damdaar नेता किसे कहते हैं. शायद अटल की जगह कल्याण प्रधानमंत्री बने होते तो आज भारत का नक्शा और होता. क्या ये साधारण बात है कि एक मुख्यमंत्री अपने संगठन के lie apni sarkaar kurbaan kar de. कल्याण के काल में ६ दिसम्बर और अटल के नेतृत्व में राजनाथ और विष्णुकांत शास्त्री का दिया शिलादान कार्यक्रम. बीजेपी नेताओं ने सत्ता के लिए पूरे हिन्दू आन्दोलन को कूड़ा कर दिया. कोई तुलना है इन सबकी कल्याण सिंह से. घटिया चरित्र के लोगों और बीजेपी नेताओं ने ही कुसुम राय कि आड़ लेकर कल्याण को बदनाम किया. इस बदनामी के आलम में कौन नेता apna जमीर बेचकर बीजेपी में बना रहता. सब जानते थे कि कुसुम राय के पिता कल्याण सिंह के परम मित्रों में रहे थे. कुसुम राय खुद बीजेपी की इलेक्टेड नेता थी. सभासद थी. प्रान्त स्तर पर महिला मोर्चे में सक्रिय थी. बाप-बेटी जैसे संबंधों को बीजेपी के आला नेताओं और संगठन मंत्रियों ने ही पियक्कड़ पत्रकारों का इस्तेमाल कर गली गली में charcha की वस्तु बना दिया.
    जब इन नेताओं का स्वार्थ साध गया तो सब शांत हो गए. अटलजी के साथ भी तो पिछले ३०-४० saalon से एक maan jaisi देवी समर्पित bhav से rah rahin हैं, advaani पर unki sagi bahu ने anek vibhatsa aarop laga कर bete jayant से talak liya, लेकिन किसी mai के laal बीजेपी नेता mki या संगठन mantri की या varishtha पत्रकारों की himmat नहीं padi की unke khilaph कुछ likhta, और jo apna chehara clean karae ghum रहे हैं unke kale kaarnaamen किसी ने na dekhe. pichde varga के एक kaddavar नेता का चरित्र hanan कर बीजेपी के dhurandharon को क्या mila. yahi na कि खुद ही charo khane chitta हो गए.

    कल्याण ने mulaayam का साथ liya पर uski party में तो नहीं गए, क्या bura किया, pucho अटल-advaani से की nda के samay mulayam की sarkaar uttar pradesh में banvaakar unhone कौन sa बीजेपी का कल्याण किया. matti koot de puri party की inhone up में. और jahan tak jaankari है advaani ji ने jaanbujh कर कल्याण को बीजेपी से nikalkar mulaayam के साथ jane से नहीं roka. yah तो khuda ही khilaaph हो गया, और बीजेपी buri tarah loksabha chnav में pit गई नहीं तो yadi 25-३० seet piche रहे होते तो yahi कल्याण आज advaani और बीजेपी के taranhaar बने होते. mulayam को बीजेपी के paale में khada कर chuke होते, khair yah rajniti है, kis पर vishvaas करे कोई और avishvaas.

    कल्याण ने अपने mool और nishkalush man को prakat कर दिया है. jeevan bhar jis vichaar-path पर और jis lagan के साथ इस vyakti ने jansangh और बीजेपी का साथ nibaha yah bahut badi बात है, do kaudi के log कल्याण को नहीं samajh sakte. anyaay, apmaan sahnaa lodh raajpooton की vansh parampara में नहीं aata, so कल्याण har asmaan पर react hue. इस बात को ठीक samajh लीजिए कल्याण भारतीय इतिहास में हमेशा याद किए जायेंगे, जब जब ram की ayodhya का chitra samne aayega, hinduon का नायक कल्याण ही rahenge, कल्याण ६ december की ghtna के लिए chatrapati shivaji के rup में jane जायेंगे. baakii बीजेपी नेता sonche की unki जगह इतिहास में क्या hogi.

    आपने ठीक कहा की बीजेपी विचार करे कि वह अपने कल्याण sing जैसे नेता का सकारात्मक उपयोग करने में कहाँ चूक गई और लेखिका तवलीन सिंह के शब्दों में कहें तो घटिया किस्म के नेता कैसे बीजेपी की राजनीति पर छा गए.

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    • indraj singh lodhi rajpoot

      aaj hum apne neta shri kalyan singh ji jo bhrat k liye sub kuch ker sakte h unke liye hum apni jan bhi d sakte h

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  3. pramendraps

    महाशक्ति

    कल्‍याण सिंह की वापसी होनी चाहिये, क्‍योकि नये मंत्र के साथ पुराने मंत्र को भूलना मूर्खता है।

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