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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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india_sacred_cow_hindu_holy_vegetarगाय विश्व में कमोबेश सभी देशों में पाली जाती है। लेकिन भारत में गाय गौमाता है। यहां गौ संस्कृति है। पश्चिमी दुनिया में गाय सिर्फ दूध और मांसाहार का स्रोत है। भारत में गौ कामधेनु है। इसे सब सुख प्रदा माना जाता है। लेकिन पश्चिमी दुनिया में अब मेडकाऊ रोग व्याधि के लिए जानी जाती है और जिस तरह वर्ड फ्लू के समय लाखों मुर्गियों का विनाश हुआ है, जिन देशों में गौ मांस, गाय की दूध तक उपयोगिता रह गयी है, गाय के साथ वहां लगाव सिर्फ आय प्रदायक पशु से अधिक नहीं है। भारत भूमि में गाय की महिमा आदिकाल से रही है। गौ माता के संरक्षण के लिए भगवान को अवतार लेना पड़ा है। श्रीकृष्ण तो अपना शैशव और किशोरवय गौमाता के लिए समर्पित कर देते हैं।

ऋग्वेद में गाय को अवद्या कहा गया है। यजुर्वेद में गौ माता न पिगते, कह कर इसे अनुपमेय बताया गया है। अथर्ववेद में गाय को धेनु:, सदनम् रमीणाम कहा गया है और इसे धन संपत्ति का भंडार कहा गया है। वैदिक काल में गृहस्थ की धनाढयता गौओ में गिनी जाती थी। सामान्य श्रेणी का गृहस्थ शतगु: सौ गायों वाला होता था। हजारों गायों वाले संपन्न गृहस्थ को शहस्त्र गु: संबोधित किया जाता था। पाश्चात्य सभ्यता ने अंधानुकरण का नतीजा यह हुआ कि हम अपने सांस्कृतिक मूल्यों से दूर चले गए। गौ संपदा की अवनति के रूप में रासायनिक खादों, कीटाणु नाशकों की भरमार हुई। इसकी दुखद परिणति यह हुई कि वातावरण प्रदूषण के साथ मां के दूध तक में इक्कीस गुना, हानिकारक द्रव्य पहुंच गया है। अन्न, फल, सब्जियां भी प्रदूषण से प्रभावित हो चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस मामले में चेताया है।

वारह सौ वर्षों की गुलामी का सबसे त्रासद परिणाम यही है कि हम भूल गये कि भारत गौ संस्कृति, कृषि ऋषि प्रधान देश है। गाय के शरीर में देवता का वास है। इस अवधारणा के पीछे अध्यात्म भले ही न खोजा जाए लेकिन इसके अर्थशास्त्र को तो अब विश्व का विज्ञान और चिकित्सा विज्ञानी भी स्वीकार कर चुके हैं। एक गाय अपने जीवनकाल में चार लाख दस हजार से अधिक व्यक्तियों के आहार उत्पादन में सहायक होती है। लेकिन पश्चिमी उपभोक्ता संस्कृति के तहत इससे अस्सी मांसाहारी ही अपनी तृप्ति पाते हैं। गौ संरक्षण के प्रति बढ़ती जिज्ञासा और सक्रियता के पीछे इसका सात्विक अर्थशास्त्र, गौ उत्पादों में निहित संजीवनी शक्ति की शोध है। जिसने विश्व को चमत्कृत किया है। मजे की बात यह है कि दुनिया में गायों की जितनी नस्लें है. उनमें सर्वाधिक संजीवनी तत्व भारतीय गायों में है। जर्सी गायों में यह संजीवनी नगण्य है। जबकि दुग्ध उत्पादन क्षमता जर्सी में अधिक है। इसका अर्थशास्त्र दुग्ध उत्पादन तक सीमित है।

गाय के उत्पादों पर जो शोध हुए हैं, उससे भारत में गौ की महिमा के वे पृष्ठ खुलते जा रहे हैं, जिन्हें हमने गल्प मान कर खारिज कर दिया था। अमेरिका ने गौ मूत्र का पेन्टेट नं. 6410059 किया है। इसका शीर्षक है- फार्मास्युटिकल कम्पोजीशन कन्टेनिंग काऊ यूरिन, डिस्टीलेट एंड एन एन्टीबायोटिक। इससे कैंसर के उपचार में मदद ली जा रही है। रुसी वैज्ञानिक शिरोविच ने अपने शोध के परिणाम उजागर किये हैं, जिनमें कहा गया है कि गाय का दूध एटामिक रेडीएशन से रक्षा करने में सर्वाधिक शक्ति रखता है।

डॉ.जुलियस, डा.ब्रुक जर्मन विज्ञानी ने कहा है कि गाय अपने निश्वास से प्राण वायु आक्सीजन छोड़ती है। पर्यावरण विज्ञानी डॉ.क्रांति सेन सर्राफ ने अपने शोध के परिणाम में बताया है कि जितना दुर्गंध वाला कचरा शहरों से निकलता है, उस पर गौ गोबर का घोल छिड़क दिया जाए तो दो फायदे होते हैं, कचरा खाद में बदला जाता है और दुर्गंध समाप्त हो जाती है। गौपालन में बढती जनरुचि के संदर्र्भ में यह रोचक तथ्य है कि देश में सर्वाधिक गौपशु मध्यप्रदेश में है। उत्तरप्रदेश और बिहार में भी यह संख्या अधिक है। उपयोगिता के आधार पर तीन श्रेणियां मान ली जाती है।

दुधारू मिल्च, मारवाही ड्राट, द्विकाजी-डुअल परपज। सामान्यत: देश में 27 नस्लें हैं। भारत में पायी जाने वाले सभी गौ नस्लें दूध की उत्कृष्टता की दृष्टि से यूरोपीय नस्लों से श्रेष्ठ है। आरोग्य के देवता भगवान धन्वतंरी ने उपदेश देते हुए आचार्य सुश्रुत से कहा कि गाय के शरीर में देवताओं का निवास होता है। गाय सर्वदेवमयी है। गोमय और गौमूत्र में साक्षात लक्ष्मी और गंगा का निवास है। गाय प्रेम और वात्सल्य की साक्षात मूर्ति है। इससे गाय के आयुर्वेदिक, वैज्ञानिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक सभी दृष्टिकोण से गुण सामने आते हैं। आज भौतिक युग में गाय के आर्थिक पहलुओं को जनता के सामने लाकर गौ पालन को आर्थिक दृष्टि से लाभ दायक बनाए बिना गौपालन की प्रतिष्ठा संभव नहीं हो सकती है। गाय के उत्पाद दुग्ध, गोमय (गोबर) और गौ मूत्र के उपयोग को आर्थिक कसौटी पर कसना होगा।

गाय का दूध, धृत, मक्खन, छांछ के स्वास्थ्य चिकित्सकीय पहलुओं की जानकारी सामने लायी जाना चाहिए। आधुनिक शोध ने गौमूत्र के सेवन से रक्तचाप ठीक होने, भूख बढ़ने, किडनी के रोग ठीक होने की बात सिध्द कर दी है। अमेरिका का चिकित्सक क्राकोड हेमिल्टन ने इसका प्रयोग कर सिध्द कर दिया है कि गौमूत्र के उपयोग से हृदय रोग को ठीक किया जा सकता है। डॉ.सीमर्स ने गौमूत्र से रक्त बहने वाली नलियों को अनपेक्षित कीटाणुओं से मुक्त करने की बात उजागर की है। गोमूत्र अर्क से कैंसर का इलाज करने का नुस्खा अमेरिका में पेंटेट किया गया है। इसकी पेंटेट संख्या 6410056 है।

गोमूत्र और गोमय (गोबर) से आयुर्वेद की औषधियां, रसायन, टाइल्स, डिस्टेंपर, कीटाणु नाशक चूर्ण, दंत मंजन, हवन सामग्री का औद्योगिक उत्पादन कई शहरों में आरंभ हो चुका है। इससे गौमूत्र 5 रु. लीटर और गोबर 5 रु. किलो खरीदे जाने का सिलसिला आरंभ हो चुका है। गौमूत्र, गोबर से बनने वाले उत्पाद कुटीर उद्योग का रुप लेते जा रहे हैं। इससे रोजगार के नये अवसर पैदा हो रहे हैं।

पंचगव्य भारतीय समाज में सनातन काल से चला आ रहा है। इसका प्रतीकात्मक उपयोग देखते आ रहे हैं। इसके चिकित्सकीय गुणों का आकलन कर जन-जन के सामने लाने का वक्त आ गया है। पंच गव्य, देह, मन, बुध्दि को शुध्द करता है।

आजादी के पहले महात्मा गांधी ने कहा था कि आजादी प्राप्त होने पर पहला काम देश में गौ वध पर प्रतिबंध लगाना होगा। लेकिन राय सरकारों ने गौवंश के वध पर प्रतिबंध लगाने की पहल की है। जब तक केन्द्रीय कानून नहीं बनता, इस पर समग्र रोक संभव नहीं हो पाएगी। विडंबना की बात है कि भारत में गौवंश की हत्या ने उद्योग की रूप हासिल कर लिया है। एक ओर गौ वंश का क्षरण हो रहा है, दूसरी ओर देश में पोषक आहार का संकट गहराता जा रहा है। गौपालन के प्रति निरुत्साहित होने के पीचे गौपालन का अलाभकारी हो जाना है। इसे आर्थिक आधार देना होगा। इसके लिए गौ उत्पादों का व्यावसायीकरण करना होगा। पंचगव्य की महिमा को प्रामाणिकता के साथ जन-जन तक पहुंचाना सामयिक आवश्यकता है। पंचगव्य गौ दुध, गौ दही, गौ धृत, गोमय और गौ मूत्र के लिए स्वदेश गाय की नस्ल की जरूरत पड़ेगी। देशी गाय के दूध में अन्य रसायनों के साथ जो लवण, धातुएँ हैं, उनमें सोना भी है। गाय के पचास किलोग्राम दुध में एक ग्राम सोना की मात्रा होती है। यही वे तत्व हैं जो मानव जीवन को स्वास्थ्य, दीर्घ आयु, तेज, ओज प्रदान करते हैं। गाय के दूध में प्राप्त स्वर्णतत्व अन्यत्र दुर्लभ है। इससे गौपालन और पंचगव्य के गुणकारी होने का प्रमाण मिलता है।

-भरतचन्द नायक

4 Responses to “गौ कामधेनु है, गोसंरक्षण के लिए भारत में अवतार होता है”

  1. lovekesh gaur

    aap ke dara di gai jankari bahaut hi acchi hai .sara gobhakt pichili baato ko batata hai yae koi nahi batata ki logo ko go ke labh un tak pauhanay ke liya kya kiya jaay taki log gomata ki amhiat samaj logo ko panchgavya use karanay ke liya prothisait kiya jaya taki go ke gobar gomutra ki bi keemat ho jaay sahari chetro may go ke liya hum kya kar saktay hai

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  2. mahipal singh negi

    Really this article in very nice. Cow is our mother, she gives us new life. In our hindu community every body gives regard just like their own mother. her sweet milk like is nector for us. those people who are protecting cow are really is big job.

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  3. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    भारतीय-गौवंश के बारे में कुछ ख़ास बातें जानने योग्य हैं. एक चिकित्सक के रूप में मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि संसार के लगभग सभी रोगों का इलाज भारतीय गौवंश के पञ्च-गव्य, स्पर्श तथा उनकी (गौवंश) की सेवा से संभव है. ऐलोपथिक दवाइयां बनाना-बेचना संसार का सबसे बड़ा व्यापार(हथियारों के बाद)बनचुका है या यूँ कहें की बनादिया गया है. ऐसे में अपने व्यापार को बढाने के लिए हर प्रकार के अनैतिक ,अमानवीय हथकंडे अपनानेवाली बहुराष्ट्रीय-कम्पनियां गौवंश के अस्तित्व को कैसे सहन कर सकती हैं, इस सच को समझना ज़रूरी है.
    भारतीय गौधन को समाप्त करने के हर प्रयास के पीछे इन पश्चिमी कम्पनियों का हाथ होना सुनिश्चित होता है, हमारी सरकार तो केवल उनकी कठपुतली है.इन विदेशी ताकतों की हर विनाश योजना की एक खासियत होती है कि वह योजना हमारे विकास के मुखौटे में हमपर थोंपी जाती है. गोउवंश विनाश की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. वह कैसे ——?
    १.दूध बढाने के नाम पर विदेशी गौवंश को बढ़ावा दिया गयाऔर इसके लिए अरबों रूपये के अनुदान दिए गए. भारतीय गौवंश की समाप्ति चुपके से होती चलीगयी. जबकि अमेरिकी और यूरोपीय वैज्ञानिक सन 1986-88 में ही जान चुके थे कि हालिसटीन , फ्रीजियन, जर्सी तथा रेड-डेनिश नामक अमेरिकन-यूरोपियन गौओं के दूध में ‘बीटाकेसिन ए-१’ नामक प्रोटीन पाया गया है जिससे मधुमेह , मानसिक रोग, ऑटिज्म तथा कई प्रकार के कैंसर यथा स्तन, प्रोस्टेट, अमाशय, आँतों, फेफड़ों तक का कैंसर होने के प्रमाण मिले हैं. यह महत्वपूर्ण खोज ऑकलैंड ‘ए-२ कारपोरेशन’ के साहित्य में उपलब्ध है. तभी तो ब्राज़ील ने ४० लाख से अधिक भारतीय गौएँ तेयार की हैं और आज वह संसार का सबसे बड़ा भारतीय गौ वंश का निर्यातक देश है. यह अकारण तो नहीं होसकता. उसने अमेरिकी गोवंश क्यों तैयार नहीं करलिया ? वह अच्छा होता तो करता न. और हम क्या कर रहे हैं ? अपने गो-धन का यानी अपना विनाश अपने हाथों कर रहे हैं न ?
    २.दूध बढाने का झांसा देकर हमारी गौओं को समाप्त करने का दूसरा प्रयास तथाकथित दुग्ध-वर्धक हारमोनो के द्वारा किया जा रहा है. बोविन- ग्रोथ (ऑक्सीटोसिन आदि) हारमोनों से २-३ बार दूध बढ़ कर फिर गौ सदा के लिए बाँझ होजाती है. ऐसी गौओं के कारण सड़कों पर लाखों सुखी गौएँ भटकती नजर आती हैं. इस सच को हम सामने होने पर भी नहीं देख पा रहे तो यह बिके हुए सशक्त प्रचारतंत्र के कारण.
    ३.गोवंश के बाँझ होने या बनाये जाने का तीसरा तरीका कृत्रिम गर्भाधान है. आजमाकर देख लें कि स्वदेशी बैल के संसर्ग में गौएँ अधिक स्वस्थ, प्रसन्न और सरलता से नए दूध होने वाली बनती हैं. है ना कमाल कि दूध बढाने के नाम पर हमारे ही हाथों हमारे गो-धन कि समाप्ति करवाई जारही है और हमें आभास तक नहीं.
    हमारे स्वदेशी गो-धन क़ी कुछ अद्भुत विशेषताएं स्मरण करलें—————–

    *इसके गोबर-गोमूत्र के प्रयोग से कैंसर जैसे असाध्य रोग भी सरलता से चन्द रोज़ में ठीक होजाते हैं.

    *जिस खेत में एक बार घुमा दिया जाए उसकी उपज आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है जबकि विदेशी के प्रभाव से उपज नष्ट हो जायेगी. चाहें तो आजमालें.
    इसके गोबर, गोमूत्र,दूध, घी,दही लस्सी के प्रयोग से भी तो फसलें और हमारे शरीर रोगी बन रहे हैं, इसे समझना चाहिए. विश्वास न हो तो आजमाना चाहिए.
    *हमने अपने अनेक रोगियों पर अजमाया है क़ी हमारी गौओं के गोबर से बने सूखे उप्क्प्लों पर कुछ दिन तक नंगे पैर रखने से उच्च या निम्न रक्तचाप ठीक होजाता है. सर से पूंछ क़ी और १५ दिन तक रोज़ कुछ मिनेट तक हाथ फेरने से भी पुराना रक्तचाप ठीक हो जाएगा.

    **एक बड़ी कीमती और प्रमाणिक जानकारी यह है कि हमारे गो- बैल के गोबर का टुकडा प्रातः-सायं जलाने से संसार के हर रोग के कीटाणु कुछ ही देर (आधे घंटे) में मर जाते हैं. यदि गोबर के इस टुकड़े पर थोडासा गोघृत लगादेंगे तो असर और बढ़ जाएगा. इस जलते उपले के ऊपर २-४ दाने मुनक्का, दाख, किशमिश या देसी गुड के रख कर जलाने से सोने पर सुहागा सिद्ध होगा. प्लेग, हेजा, तपेदिक तक के रोगाणु नष्ट होना सुनिश्चित है. नियमित दोनों समय २ -३ इंच का गोबर का टुकड़ा इसी प्रकार जलाएं तो असाध्य कीटाणु जन्य रोग ठीक होते नज़र आयेगे, नए रोग पैदा ही नहीं होंगे. हमने ॐ और गोबर के इस प्रयोग से ऐल्ज़िमर के ३ रोगियों का इलाज करने में सफलता प्राप्त क़ी है, आप भी अपनी गोमाता पर विश्वास करके ये कमाल कर सकते हैं.

    अब ऐसे में संसार क़ी दवानिर्माता कम्पनियां आपकी गो के अस्तित्वा को कैसे सहन कर सकती हैं. इनकी समाप्ति के लिए वे कुछ भी करेंगी,कितना भी धन खर्च करेंगी, कर रही हैं. विडम्बना यह है कि जिस सच को गो- वंश नाशक कम्पनियां अच्छी तरह जानती हैं उसे आप नहीं जानते. अपने अस्तित्व क़ी रक्षा के लिए, प्राणिमात्र की रक्षा के लिए और सारे निसर्ग क़ी रक्षा के लिए भारतीय गोवंश क़ी रक्षा ज़रूरी है, इस सच को जितनी जल्दी हम जान समझ लें उतना अछा है,हमारे हित में है.

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  4. R.Kapoor

    सुन्दर लॆख् है. हॊसकॆ तॊ गो पर और वेग्यानिक तथ्य प्राप्त् करनॆ का प्रयास करॆ. शुभ कामनायॆ.

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